बाढ़ की प्रलय और फल्गु नदी प्यासी

Submitted by admin on Thu, 09/25/2008 - 11:44
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फल्गु नदी में आज भी नहींसूखी फल्गु नदी पटना, 17 सितंबर । एक तरफ उत्तर बिहार की नदियां उफान पर हैं तो दूसरी तरफ दक्षिण बिहार के गया की फल्गु नदी में आज भी नहीं के बराबर पानी है।

एक तरफ बाढ़ के पानी से लोगों को बाहर निकालने के लिए सेना के जवानों को लगाया गया है तो दूसरी तरफ फल्गु नदी में अपने पितरों की आत्मा को मुक्ति देने के लिए तर्पण करने वालों के लिए पानी नदी खोद कर निकालना पड़ रहा है।

गया की फल्गु नदी में पितृपक्ष में पितरों को तर्पण दिया जाता है। गया के पंडा संजय कुमार अग्निकार ने आईएएनएस को बताया कि भगवान पुरुषोत्तम राम अपनी पत्नी सीता के साथ यहां फल्गु नदी के तट पर अपने पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान के लिए आए थे। इसी बीच सीता ने फल्गु नदी को शाप दिया था कि तुम्हारी धारा अब ऊपर नहीं नीचे बहेगी। तब से आज तक फल्गु नदी की धारा ऊपर नहीं बहती है।

ऐतिहासिक फल्गु नदी में लाखों लोग प्रतिवर्ष अपने पितरों की आत्मा मुक्ति के लिए आकर तर्पण करते हैं। पितृपक्ष के प्रारंभ होते ही फल्गु में डुबकी लगाकर अपने पितरों को विष्णुलोक एवं खुद को योग एवं मोक्ष की प्रार्थना करने के लिए लाखों लोग गया आ चुके हैं।

हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि पुनपुन नदी में पिंडदान के बाद गया में पड़ने वाला पिंडदान फल्गु स्नान के बाद ही प्रारंभ होता है। वर्तमान समय में फल्गु की स्थिति ऐसी है कि कहीं-कहीं तो बालू के टीले का रूप बना हुआ है। लोग नदी में गड्ढा कर स्नान के लिए पानी निकाल रहे हैं और तर्पण कर रहे हैं।

फल्गु नदी : प्रदूषित नदी

गया में फल्गु नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए कोई उपाय न होने से लोगों की आस धूमिल होने लगी है। नदी में प्रदूषण की यह समस्या दिनोंदिन सुरसा की तरह मुंह बाये चली जा रही है। गया जिले के एक बहुत बड़े भूभाग को अभिसिंचित करने वाली फल्गु नदी का यहां के लोगों के जीवन से बहुत ही गहरा जुड़ाव है। इस नदी से गांवों के हजारों लोगों का आर्थिक, धार्मिक एवं सामाजिक जुड़ाव है। धार्मिक दृष्टिकोण से भी यह नदी अपना अद्वितीय स्थान रखती है। हर साल इसके तट पर फल्गु महोत्सव मनाया जाता है। इसकी रक्षा के संकल्प लिए जाते हैं। इसके पीछे कई कारण भी है। जिसमें एक तो इसके तट पर कभी भगवान श्रीराम और सीता ने आकर अपने पिता राजा दशरथ के अवसान के बाद पिंडदान किया। वेद व पुराण में फल्गु का वर्णन है। इसे मोक्षदायिनी भी कहा गया है। पर अब जो इसकी स्थिति है। उसे देख कहा जाये कि फल्गु नदी ही अपने मोक्ष को लालायित है। तीज त्योहारों पर बड़ी संख्या में नर-नारी गयाजी के फल्गु नदी में डुबकी लगाकर अपने को धन्य मानते है। इसके बावजूद पावन नदी का जल विगत कुछ वर्षो से प्रदूषण की चपेट में है।

प्रतिदिन लाखों टन सड़ी-गली वस्तुएं नदी में फेंकने तथा नाली का पानी बहने के कारण इसमें दिनोंदिन प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। जिससे इसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगता जा रहा है। एक ओर जहां गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए आंदोलन और संकल्प लोग ले रहे हैं। सरकार भी गंगा की पवित्रता को अक्षुण्ण बनाने के प्रयास में जुट गई है। पर गयाजी के इस पावन व प्राचीन नदी के अस्तित्व की रक्षा को कोई आगे नहीं आ रहा। जिन नदियों ने मां बनकर हमारा पालन-पोषण किया। उन्हीं मा के आंचल और छाती को हमने प्रदूषण से विदीर्ण कर दिया है। अफसोस तो इस बात का है कि सारी गंदगी हम नदियों में बेरहम होकर गिरा रहे है। हमें तनिक भी परवाह नहीं कल क्या होगा? तो इससे आनेवाले भविष्य का कयास लगाया जा सकता है। जिले के बहुत से ऐसे गांव हैं। जहां के निवासी इन नदियों का पानी पीकर ही जीते हैं। ग्रामीण इलाकों में खेती के लिए इसका प्रयोग हो रहा है। भविष्य में 'अंधकार' भी तय मानिए। शहर व ग्रामीण इलाके के छोटे मोटे कल-कारखानों से निकलने वाले प्रदूषण से लेकर घरों के कूड़े तक लोग नदियों में फेंक जा रहे हैं। साथ ही नदी किनारे बने मकान के नालियों का पानी नदी में ही गिराया जा रहा है। ऐसे में कितने दिनों तक इन नदियों के पानी से हमारा काम चलेगा यह कहना मुश्किल है। नदी किनारे पानी इतना गंदा बहता है कि उससे स्नान कर लेने भर से ही कई रोगों का आक्रमण हो जाएगा।

यदि समय रहते सरकार नहीं चेती तो स्थिति अति भयावह हो सकती है। यही नहीं मानव उत्सर्जित गंदगी भी नदियों में मिल रही है। जिससे प्रदूषण चरम सीमा को पार करता जा रहा है। नदी के किनारे स्थित खटालों के पशुओ द्वारा उत्सर्जितगंदगी भी नदी में मिल रही है। इसके कारण प्रदूषण दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है। यदि प्रदूषण का हाल यही रहा तो निकट भविष्य में नदी को साफ करना भी मुश्किल होगा।

फल्गु नदी के बारे में : फल्गु नदी - उद्गम स्थल - उत्तरी छोटानागपुर का पठारी भाग

स्थिति: झारखंड और बिहार की सीमा और फल्गु नदी के तट पर बसा गया बिहार प्रान्त का एक प्रमुख शहर है । वाराणसी की तरह गया की प्रसिद्धी मुख्य रुप से एक धार्मिक नगरी के रुप में है। पितृपक्ष के अवसर पर यहाँ हजारों श्रद्धालु पिंडदान के लिये जुटते हैं। गया सड़क, रेल और वायु मार्ग द्वारा पूरे भारत से अच्छी तरह जुड़ा है। नवनिर्मित गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा द्वारा यह थाइलैंड से भी सीधे जुड़ा हुआ है। गया से 17 किलोमीटर की दूरी पर बोधगया स्थित है जो बौद्ध तीर्थ स्थल है और यहीं बोधी वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

गया बिहार के महत्वपूर्ण तीर्थस्थानों में से एक है। यह शहर खासकर हिन्दू तीर्थयात्रियों के लिए काफी मशहूर है। यहां का विष्णुपद मंदिर पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है। दंतकथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के पांव के निशान पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। हिन्दू धर्म में इस मंदिर को अहम स्थान प्राप्त है। गया पितृदान के लिए भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहां फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृत व्यक्ति को बैकुंठ की प्राप्ति होती है।

गया मध्य बिहार का एक महत्वपूर्ण शहर है, जो गंगा की सहायक नदी फल्गु के पश्चिमी तट पर स्थित है। यह बोधगया से 13 किलोमीटर उत्तर तथा राजधानी पटना से 100 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यहां का मौसम मिलाजुला है। गर्मी के दिनों में यहां काफी गर्मी पड़ती है और ठंड के दिनों में औसत सर्दी होती है। मानसून का भी यहां के मौसम पर व्यापक असर होता है। लेकिन वर्षा ऋतु में यहां का दृश्य काफी रोचक होता है।

साभार - (आईएएनएस)

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