बुंदेलखंड के तालाबों का इतिहास

Submitted by admin on Sun, 09/06/2009 - 12:54
Source
जागरण याहू/ Jul 20,09

बुंदेलखंड में सूखे के कारण मची तबाही के पीछे तालाबों की उपेक्षा भी खास कारण है। तालाब खुदवाना, उनकी मरम्मत कराना यहां की महान परंपराओं में शुमार रहा। बुंदेलखंड नरेश छत्रसाल के पुत्र जगतराज ने एक बीजक के मुताबिक खुदाई करवाकर गड़ा धन प्राप्त किया तो छत्रसाल नाराज हुए। उन्होंने कहा,'मृतक द्रव्य चंदेल को, तुम क्यों लिया उखार '। अगर उखाड़ ही लिया है तो उससे चंदेलों के बने तालाबों की मरम्मत की जाये और नये तालाब बनवाये जायें। इसी धन से पुराने तालाबों की मरम्मत के साथ वंशवृक्ष देखकर संवत 286 से 1162 तक की 22 पीढि़यों के नाम पर पूरे बाइस बड़े-बड़े तालाब बनवाये गये। दुरावस्था में ही सही, लेकिन इनका अस्तित्व अभी भी बुंदेलखंड में मौजूद है।

महोबा नगर एवं आसपास के इलाके को पेयजल की आपूर्ति मदन सागर से होती है। इसका निर्माण चंदेल राजा मदन बर्मन ने 1129 ई. में कराया था। इस जलाशय को अब उर्मिल बांध से जोड़ दिया गया। जर्जर तालाब के बड़े हिस्से पर अतिक्रमण है। वर्ष 2007-08 में सूखा राहत निधि से 80 लाख रुपये से जलाशय की सफाई करायी गयी थी, लेकिन तालाब का चौथाई हिस्सा भी साफ नही हो सका। यहां कीरत सागर का निर्माण चंदेल राजा कीर्ति बर्मन ने वर्ष 1060 ई. में कराया था। आल्हा-ऊदल और पृथ्वीराज चौहान के मध्य इसी तालाब की कछार में युद्ध हुआ था, इस वक्त से यहीं ऐतिहासिक कजली मेला लगता है। तमाम अतिक्रमण और सफाई के अभाव में लंबा भूभाग पट जाने के बावजूद यहां से नहर निकालकर करीब 2500 हेक्टेअर भूमि को सिंचित बनाने का बंदोबस्त किया गया है। वर्ष 2006 में सम विकास योजना से तीन करोड़ रुपये खर्च होने पर तालाब तीन इंच भी मिंट्टी नहीं हटायी जा सकी। महोबा में ही कल्याण सागर, विजय सागर, केड़ारी तालाब, सलालपुर तालाब करीब सात से नौ सौ साल पुराने हैं। इन सभी तालाबों के काफी भूभाग पर अतिक्रमण है। सफाई के अभाव में अब इनकी संचयन क्षमता बहुत कम रह गयी है।


इससे बड़ा नक्शा देखेंसात सुंदर और विशालकाय सरोवरों से घिरा चरखारी कस्बा श्रीनगर की वादियों जैसा प्रतीत होता है। 1782 में महाराजा विक्रमाजीत ने विजय सागर व कोठी तालाब ता निर्माण कराया था। सफाई एवं मरम्मत के अभाव में इन सरोवरों का स्वरूप नष्ट होने लगा तो बीते वर्ष विरासत बचाने के लिए लोग फावड़ा-डलिया कुदाल लेकर निकल पड़े सरोवर की सफाई करने। डीआरडीए के अभियंता ने 25 लाख रुपए मूल्य के श्रमदान का आंकलन किया। वर्ष 1829 में राजा रतन सिंह ने मंगलगढ़ दुर्ग के पिछले भाग के नीचे रतन सागर बनवाया। इसका क्षेत्रफल 60 एकड़ था। वर्तमान में तालाब की 75 फीसदी भूमि पर कृषि पंट्टे हैं और इन दिनों तालाब पूरी तरह सूख चुका है। वर्ष 1882 में राजा मलखान सिंह ने 80 एकड़ में मलखान सागर का निर्माण कराया। सागर के किनारे बने सुंदर पक्के घाट अब लगभग ध्वस्त हो चुके हैं। तालाब की भूमि पर ईंट-भट्ठे तक स्थापित हैं।

जय सागर का निर्माण राजा जय सिंह ने 1860 ई. में कराया था। इस तालाब की भी हालत ठीक नहीं है। गुमान बिहारी मंदिर के सामने गुमान सागर का निर्माण 1890 में राजा जुझार सिंह ने कराया था। कोट स्थित गंडेला तालाब का निर्माण वर्ष 1860 में हुआ। गोलाघाट तालाब का निर्माण राजा गुमान सिंह ने कराया था। गोलाकार इस पक्के घाट वाले तालाब से अन्य सभी छह तालाब भूमिगत जोड़ दिये गये थे। तालाब के बीचोबीच पक्के चबूतरे पर स्थित मुरली बजाते श्री कृष्ण की प्रतिमा थी। जब तालाब का पानी कृष्णजी के पैर के अंगूठे को छू लेता था तो माना जाता था कि सभी तालाब भर गये हैं। 1992 में कृष्ण मूर्ति चोरी चली गयी। इस प्रकार चार किमी की परिधि में बसे चरखारी कस्बे के चारों ओर आठ किमी की परिधि में जलाशय रहे।

महोबा के चंदेल राजा परमाल जूदेव के समकालीन उरई के परिहार नरेश माहिल ने शहर के किनारे विशाल माहिल तालाब का निर्माण कराया था, जिसका क्षेत्रफल दो कोस बताया जाता था। जिला गजेटियर के अनुसार इसका क्षेत्रफल 1.2 हेक्टेअर बचा है। हालांकि वर्तमान में इसका क्षेत्रफल और भी कम हो गया है। वर्ष 2000 में प्रशासन के सहयोग से आम जनता ने श्रमदान कर इस ऐतिहासिक तालाब के अस्तित्व की रक्षा का प्रयास किया। अभी एक पखवारे पहले सूखे के कारण तालाब में पानी काफी कम हो जाने से मछलियों के मरने की सूचना मिली। वैसे उरई में कुल 2878 राजस्व तालाब दर्ज हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 452 हेक्टेयर है, लेकिन वर्तमान में इनमें से अधिकांश तालाब अतिक्रमण का शिकार हैं।


इससे बड़ा नक्शा देखें

चित्रकूट के मानिकपुर विकास खंड में करीब दो सौ साल पहले रीवां नरेश गुलाब सिंह व रघुराज सिंह ने पुष्कर्णीय सरोवर टिकरिया, राजा व रानी तालाब ददरी का निर्माण कराया था। लगातार सूखे के बावजूद राजा तालाब कभी जल विहीन नहीं हुआ। यह बात दीगर है कि रखरखाव व मरम्मत के अभाव में तालाबों का दायरा सिकुड़ गया है। बांदा में नबाब टैंक (जलाशय) के भीतर सात कुएं बताये जाते हैं। यह तालाब भी कभी नहीं सूखा। इन नामी सरोवरों के अलावा बुंदेलखंड में गांव-गांव छोटे-छोटे तालाब भी खूब रहे। इन तालाबों के निर्माण के पीछे यहां की कुछ परंपराएं बतायी जाती हैं। जैसे चारों धाम की यात्रा करके आने के बाद लोग कुएं और तालाब बनवाते थे। पंचायत अगर किसी को दंड भी देती थी तो उसे कुएं या तालाब का निर्माण या मरम्मत कराना पड़ता था। पाठा क्षेत्र में श्रमदान के जरिये कई तालाब व कुएं बनवाने वाली संस्था अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान के संरक्षक गोपाल भाई बताते हैं कि तीन दशक पहले तक यहां के गांवों में जेठ के चारों सोमवार को पूरा गांव (स्त्री, पुरुष व बच्चे सभी) उत्सवपूर्वक तालाबों की सफाई करते थे और दोपहर में पीपल के नीचे सहभोज होता था। इस दौरान महिलाएं अलग मंगल गीत गाती थीं और पुरुष मंडली दोपहरिया में भजन-कीर्तन करती थी। बुंदेलखंड में तालाबों के निर्माण व मरम्मत की सामाजिक परंपरा क्या टूटी, इसके बाद तो मानों प्रकृति ही रूठ गयी। सरकार की ओर नरेगा जैसी योजनाओं के तहत बने तालाब सिर्फ कटोरा साबित हो रहे हैं। आगर क्षेत्र न छूटने के कारण इन तालाबों में बरसाती पानी आने का रास्ता ही नहीं हैं, जिससे सीधे ऊपर से गिरने वाली बूंद ही तालाब की गोद में आ पाती है।
 

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