भारत-बंग्लादेश समस्या जैसी जल समस्या

Submitted by admin on Sun, 09/21/2008 - 17:44
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खीरी संसदीय क्षेत्र के प्रतिनिधि, समाजवादी पार्टी के सांसद रविप्रकाश वर्मारविप्रकाश वर्मा देश के सुलझे हुये विचारवान सांसदों में से हैं। वे नेपाल की नदियों से होने वाले संभावित खतरे के प्रति न सिर्फ सतर्क हैं बल्कि संसद को भी आगाह करते रहे हैं। उनके नजरिये से भारत के पाकिस्तान समस्या मूलत: जल समस्या है। जल की ओर ध्यानाकर्षण करते हुये वे कहते हैं कि मंहगी नाभिकीय बिजली के बजाय हमें अपने जल संसाधनों का बिजली उत्पादन के लिये इस्तेमाल करना चाहिये।
वे समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता हैं व अखबार पत्रिकाओं में भी लिखते हैं।

तराई प्रदेश एक समय देश के जल बाहुल्य इलाकों में से था। आज यह पानी की कमी क्यों महसूस कर रहा है?

नेपाल का सीमावर्ती इलाका तराई क्षेत्र का प्रमुख जल स्रोत है। यहाँ कभी घने वन हुआ करते थे जहाँ माओवादी छुप जाया करते थे। नेपाल सरकार ने उन्हें रोकने के लिये जंगल साफ कर दिये हैं। वनों की निरंतर कटाई के बाद आज वहाँ बहुत कम वृक्ष बचे हैं। नम भूमि यानी वैटलैंड्स का कटाव हो गया है। नेपाल ने नदियों का रुख भी बदल दिया है। इन सब कारणों से न सिर्फ हमारी नदियों में गाद बढ़ गयी है बल्कि नेपाल से आने वाला पानी आज हमारी नदियों में पहले से कहीं अधिक आता है। तीन लाख क्यूसेक की क्षमता वाली नदी आज दस लाख क्यूसेक से कहीं अधिक पानी व गाद झेलती है। इससे हमारी नदियों का भूगौल ही बदल गया है। नदी में पानी रहने के बजाय उफन कर बह जाता है। पहले हमें नेपाल से पूरे साल उपयुक्त मात्रा में आवश्यकतानुसार पानी मिलता था। परंतु आज नेपाल से पानी का प्रवाह बड़ा ही अनिश्चित हो गया है। मानसून के बाद नदियों में पानी की मात्रा काफी कम हो जाती है व वे कई स्थलों पर सूख जाती हैं।

नदियों में पानी न होने से हमारी खेती प्रभावित हो सकती है। हमें अपना कृषि प्रबंधन बदलना ही होगा।

हमें जानना पड़ेगा कि कौन सी फसल उपजाने के लिये कितना पानी चाहिये। हमें कुशल जल प्रबंधन व उचित फसल चुनाव की ओर आना पड़ेगा। मैं बहुत समय खाद्य नीति बनाते वक्त जल व सिंचाई व्यवस्था को मद्देनजर रखे जाने की वकालत कर रहा हूं। देखा जाये तो, हमारी दुर्दशा के लिये हमारी वर्तमान नीतियाँ ही जिम्मेदार हैं। हमने जल भराव की जगहों पर नाले बना दिये जिसने पानी की सहज रीचार्जिंग को नष्ट कर दिया व जल स्तर गिरता गया। हाइड्रोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने मेरे जिले के दो खंडों को डार्क जोन घोषित कर दिया है। यहाँ जल स्तर बहुत अधिक नीचे चला गया है इसलिये किसानों को सिंचाई के लिये बिजली का कनैक्शन नहीं दिया जाता है।

हम जल उपलब्धि की बात करते हैं परंतु पेय जल को भूल जाते हैं, जो जल नीति का महत्वपूर्ण अंग है। क्या आपके जिले का जल पीने योग्य है?

मेरे इलाके के पानी में आर्सेनिक काफी मात्रा में पाया जाता है, जिससे त्वचा, आंखों व पेट के रोग हो जाते हैं। नेपाल से आती नदियाँ बड़ी मात्रा में आर्सेनिक लाती हैं। हमने लोगों को जागरूक करने के लिये अभियान चलाये हैं। जल समस्या के लिये हमने तालाबों की गाद निकलवायी है। जल स्तर के बढ़ाव के लिये एक विस्तृत योजना का निर्माण किया जा रहा है।

तराई इलाके की समस्या को ले हमारी संसद कितनी जागरुक है?

नेपाल से मोड़ा जाता पानी सिर्फ मेरे जिले में ही नहीं, पूरे सीमावर्ती इलाके में -हिमाचल, उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर अरुणाचल प्रदेश में समस्या पैदा कर रहा है। हमने एक परिचर्चा का आयोजन किया था, जिसमें कई सांसदों ने भाग लिया था। कल ही मैंने संसद में बात उठाई थी कि पूरी सीमा पर लघु बाँध बनाने चाहिये। नेपाल ने बिना भारत सरकार को सूचित किये नदियों का रुख बदल दिया है। यह सामरिक दृष्टि से बड़ा ही महत्वपूर्ण कदम है। चीन नदी प्रबंधन में नेपाल की मदद कर रहा है। भारत के लिये इसका बड़ा ही रणनैतिक महत्व हो सकता है। अगर नेपाल ढेर सारा पानी हमारी नदियों में छोड़ता है तो पूरा इलाका डूब जायेगा। रिहायशी स्थल, कृषि भूमि, दुधवा राष्ट्रीय पार्क, रेलवे लाइन सब कुछ नष्ट हो जायेगा।

यह भारत-पाकिस्तान और भारत-बंग्लादेश समस्या जैसी जल समस्या बन सकती है।

बिल्कुल। भारत पाकिस्तान को लीजिये- पूरा झगड़ा पानी का ही तो है। पंजाब पाकिस्तान का कृषि संपन्न इलाका है। इसे भारतीय नदियों से ढेर सारा पानी मिलता है। पाकिस्तान के प्रमुख राजनेता और सेनाधिकारी भी पंजाब के ही हैं। पाकिस्तान के लिये कश्मीर ही पानी का स्रोत है। अगर कश्मीर पाकिस्तान को पानी देना बंद कर देता है तो पूरा पंजाब सूख जायेगा। इसलिये भारत पाक संबंधों में कश्मीर प्रमुख मसला बन जाता है।

पानी एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। सभी देश अधिकाधिक जल संसाधन हथियाने की कोशिश कर रहे हैं।

यह एकदम सही है। यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत अपने जल संसाधनों की उपेक्षा कर रहा है। भारत अमेरिका नाभिकीय समझौते को ही लीजिये, हमारी सरकार बिजली उत्पादन के लिये परमाणु संसाधनों की वकालत तो कर रही है, परंतु सरकार हमारी अपनी भूमि पर बिखरे अपार जल संसाधनों को भूल जाती है। इस समझौते के बजाय हमें पानी से बिजली उत्पादित करने पर ध्यान देना चाहिये।

परंतु हमें नाभिकीय उर्जा भी चाहिये। बहुत जल्दी ही हमारा यूरेनियम भंडार खत्म हो जायेगा व हमारे परमाणु संयंत्र बिजली उत्पादन बंद कर देंगे। नाभिकीय समझौते से हमारा कुल बिजली उत्पादन 40000 मेगावॉट तक बढ़ जायेगा। इस समझौते के अंतर्गत अमेरिका ने वायदा किया है कि वह न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप के निर्देशों में संशोधन करवा कर भारत पर लगे प्रतिबंध हटवायेगा व यूरेनियम की अबाध आपूर्ति करवाने में मदद करेगा। आस्ट्रेलिया व फ्रांस ने तो भारत के साथ नाभिकीय व्यापार शुरु करने में दिलचस्पी भी दिखाई है। आप यह क्यों भूल जाते हैं भाई कि यह यूरेनियम हमें फोकट में नहीं मिलेगा। इस यूरेनियम को खरीदने के लिये हमें बहुत बड़ी राशि देनी होगी। इतनी राशि में हम कहीं बेहतर जल बिजली संयंत्र स्थापित कर सकते हैं, जो स्थानीय जल संसाधन का उपयोग करते हैं व कम राशि में बिजली उत्पादन कर सकते हैं।

नदियों के सूख जाने पर पर्यावरण को क्या खतरे हो सकते हैं?

इससे मौसम व जलवायु में असंतुलन व बेवजह उतार चढ़ाव आ सकते हैं। फसल नष्ट हो जायेगीं, पर्यावरण संतुलन गड़बड़ा जायेगा। सरकार को तेरह प्रतिशत तक राजस्व नुकसान भी झेलना पड़ सकता है। पानी की कमी से कृषि नष्ट हो जायेगी।

कृषक समाज को जल संरक्षण के प्रयास करने ही होंगे, नहीं तो हमारे पास बहुत अधिक पानी नहीं बचेगा। मैंने एक बार संसद में राजस्थान के रेगिस्तान के बढ़ते जाते प्रसार की बात उठायी थी।

बाबरनामा में पेशावर के नजदीक गैंडे के शिकार का जिक्र है। हम जानते हैं कि गैंडा आर्द्र, कीचड़ वाली जगह पर रहता है। अगर पाँच सौ साल पहले ऐसी स्थिति थी तो आज वहाँ इतना विशाल रेगिस्तान आखिर कैसे है? इसका अर्थ हुआ कि रेगिस्तान सदा से वहाँ नहीं है, यह तो निर्माण व प्रसार की निरंतर प्रक्रिया में है। अपने जल संसाधनों का दुरुपयोग ही हमें इस अवस्था में ले आया है। किसी इलाके के रहन सहन का स्तर उसके जल संसाधनों से संचालित होता है। अगर हम जल का समुचित उपयोग नहीं करते हैं तो आगे बड़ा ही कठिन समय देखना पड़ सकता है।
 

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