भूमि एवं मृदा

Submitted by admin on Tue, 09/23/2008 - 12:31

भूमि क्या है ?

पृथ्वी के पृष्ठ का कोई भाग जो जलाच्छादित नही हो, भूमि कहलाता है। भूमि का अभिप्राय धरातल से होता है जिसके संघटक मृदा, वनस्पति तथा भू-आकृति पृष्ठ लक्षण होते है। भूमि एक आर्थिक वस्तु है जिसका मूल्य होता है एवं इसका स्वामित्व क्रय-विक्रय किया जाता है तथा हस्तान्तरित किया जाता है। यह राष्ट्र की अमूल्य संपदा है। भूमि को क्षेत्रफल की इकाई में जैसे : एकड़, हैक्टेयर, बीघा अथवा नाली में मापा जाता है।

भूमि उन तीन प्राकृतिक संसाधनों, अन्य दो जल तथा वायु है, में से एक है जो इस पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। अति आवश्यक मानव क्रियाओं के लिए भूमि एक अपरिहार्य संसाधन है। यह कृषि तथा वनोत्पादन, जल संग्रह, मनोरंजन तथा आवासन के लिए आधार प्रदान करती है। यही कारण है कि किसी राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक अपनी मातृ भूमि पर गर्व करता है तथा उसके संरक्षण के लिए उत्तरदायी होता है।

कृषि के अतिरिक्त भूमि के कई उपयोग है जैसे वन, चारागाह, मनोरंजन सुविधाएं, बाहरी संरचनाएं, सड़क इत्यादि।

किसान के सत्‌त जीवनयापन के लिए भूमि सबसे मूल्यवान संसाधन है। वह भूमि की जुताई करता है तथा उस पर खाद्यान्न फसलें, फल, सब्जियां तथा अन्य फसले उगाता है।

स्वभाव तथा उपयोग के आधार पर भूमि के कई किस्म होती है यथाकृष्य भूमि जिस पर मौसमी, वार्षिक अथवा बहुवर्षीय फसले जैसे उद्यान लगाए जाते है।
वन भूमि जिसपर बन होते है।
बंजर भूमि जो किसी दुर्गुण के कारण कृषि के लिए उपयुक्त नही है।
अनुर्वर भूमि जो अनुत्पादक है जैसे ऊसर भूमि।
नम भूमि जो प्राय जलाक्रांत रहती है तथा अधिकांश समय में नम रहती है।
निचली भूमि जो निचले क्षेत्र में होती है जहाँ से वाह्‌य जल निकास नही होता है तथा भूमि प्रायः जलाक्रांत रहती है।
उपजाऊ भूमि जो ऊँचे स्थान पर होती है तथा जिससे उत्तम जल निकास होता है।
सिंचित भूमि जिसके सिंचाई हेतु सुनिश्चित साधन होता है।
शुष्क भूमि जिसके सिंचाई की व्यवस्था नही होती तथा वह अत्यन्त कम वर्षा (500 मि.मी. से कम) पर निर्भर होती है।

मृदा क्या है ?

मृदा पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधों की वृद्धि के लिए प्राकृतिक माध्यम प्रदान करता है। पृथ्वी की यह ऊपरी परत खनिज कणों तथा जैवांश का एक संकुल मिश्रण है जो कई लाख वर्षो में निर्मित हुआ है तथा इसके बिना इस पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व असंभव है। भूमि के एक अभिन्न संद्यटक के रूप में मृदा जीवन समर्थक तंत्र का एक संघटक है।
भूमि की उपादेयता उसके मृदा की किस्म पर निर्भर है। इस कारण जनसाधारण भूमि तथा मृदा में कोई अंतर नही मानते किन्तु वैज्ञानिक मानते है। किसी वनस्पति विहीन भूमि पर आप मृदा को प्रथम दृष्टया देख सकते है किन्तु किसी सघन वन में इस प्रकार मृदा नही दिखती क्योंकि वहॉ गिरी हुई पत्तियों से मृदा पृष्ठ आच्छादित रहता है।
पौधों की वृद्धि को समर्थित करने के लिए मृदा एक क्रांतिक संसाधन है। विभिन्न खेतों की मृदाए उनकी उत्पत्ति तथा प्रबंधन के अनुसार दृष्य रूप, लक्षणों तथा उत्पादकता में भिन्न-भिन्न हो सकती है किन्तु वे सभी कृषि तथा खाद्य सुरक्षा, वानिकी, पर्यावरण सुरक्षा तथा जीवन की गुणवत्ता में समान महत्वपूर्ण कार्य संपन्न करती है।

मृदा को कृषि की उपयोगिता के दृष्टिकोण से इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है।
“मृदा एक प्राकृतिक पिन्ड है जो चट्टानों के अपक्षय के परिणाम स्वरूप विकसित होती है, जिसके लाक्षणिक भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुण होते है तथा जो पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए माध्यम प्रदान करती है।”

मृदा एक प्राकृतिक त्रि-आयमी पिन्ड है जिसके गुणधर्म तीनों दिशाओं (लम्बाई, चौड़ाई तथा गहराई) में परिवर्तनीय है। मृदा के इस त्रिआयामी रूप को मृदा परिच्छेदिका कहा जाता है। मृदा-परिच्छेदिका उपरी पृष्ठ से लेकर नीचे पैतृक पदार्थ तक सभी संस्तरो सहित एक उर्द्ध्वाधर कटान है। एक पूर्ण विकसित परिपक्व मृदा परिच्छेदिका में तीन खनिज संस्तर होते है : क, ख तथा ग। किसी स्थान पर मृदा की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करने हेतु वहाँ पर मृदा परिच्छेदिका का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होता है। इसके लिए हमे मृदा का पृष्ठ से नीचे तक एक अनुभाग काटना होगा तथा उसमें विभिन्न परतो का निरीक्षण करना होगा, जिन्हे ''संस्तर'' कहा जाता है। प्रत्येक विकसित मृदा की एक भिन्न परिच्छेदिका लक्षण होते है। मृदा परिच्छेदिकाओं के समानता तथा विषमता के आधार पर उन्हें विभिन्न समूहों में वर्गीकृत किया जाता है।

मृदा पृष्ठ अथवा जुताई परत मृदा परिच्छेदिका का ऊपरी परत है जिसमें पर्याप्त मात्रा में जैवांश होता है तथा यह जैवांश के एकत्र होने से काले रंग का होता है। यह ऊपरी परत ''संस्तर क'' कहलाता है। पृष्ठ मृदा के नीचे की परत में ऊपरी परत से कम जैवांश होता है तथा इसमें प्रायः मृतिका, चूना अथवा लौह यौगिको का एकत्रीकरण होता है। इस मध्यवर्ती परत जिसमें ''संस्तर क'' से निक्षालित सामग्री पुनः निक्षेपित हो जाती है को ''संस्तर ख'' कहा जाता है। मृदा परिच्छेदिका में सबसे नीचे पैतृक सामग्री होती है जिसे ''संस्तर ग'' कहा जाता है।
प्रत्येक संस्तर में मृदा एक समान विकसित हुई है तथा समान लक्षण प्रदर्षित करती है। प्रत्येक संस्तर के विशिष्ट दृष्य लक्षण जैसे कणों का परिमाण तथा आकार, उनका विन्यास, रंग इत्यादि होते है जो एक संस्तर को दूसरे से विभेद करते है।
मृदा परिच्छेदिका का अध्ययन महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मृदा के लाक्षणिक गुणों तथा गुणवत्ता को प्रकट करता है।
मृदा की गहराई अत्यधिक ढलान वाले पहाड़ी पर कुछ सेन्टीमीटर होती है तो जलोढ़ निक्षेपों में यह कई मीटर गहरी हो सकती है।
मृदा निर्माण एक सतत लंबी प्राकृतिक प्रक्रिया है। अनुमानतः पृष्ठ मृदा (15 से.मी. गहरी) के निर्माण में प्राकृति को 3600 से 6000 वर्ष लगते है।

मृदा संघटन

मृदा के चार अवयव होते है : खनिज पदार्थ, जैवांश, सजीव जीवो सहित, जल तथा वायु। शुष्क पृष्ठ मृदा में खनिज पदार्थ का अंश सबसे अधिक लगभग 95-98 प्रतिशत (45 प्रतिशत आयतन) होता है तथा जैवांश सजीव जीवो सहित 2-5 प्रतिशत (5 प्रतिशत आयतन) होता है। शेष ठोस कणों के बीच रंध्राकाश (50 प्रतिशत आयतन) में जल तथा वायु होता है, जिनका परस्पर अनुपात घटता-बढ़ता रहता है। जब वर्षा होती है तो मृदा के रिक्त स्थान जलपूर्ण हो जाते है तथा वायु का अंश कम हो जाता है। मृदा से जल के अतः स्रवण तथा वाष्पीकरण द्वारा ह्यस होने से वायु का अंश बढ़ जाता है।

खनिज पदार्थ
खनिज पदार्थ का परिमाण तथा संघटन परिवर्तनीय है। इसमें सामान्यता चट्टानों के टुकड़े तथा विभिन्न प्रकार के खनिज होते है कुछ खनिज बड़े आकार के होते है किन्तु अन्य जैसे मृतिका कण इतने छोटे होते है कि उन्हें साधारण सूक्ष्मदर्षी से भी नहीं देखा जा सकता।

परिमाण के आधार पर खनिज प्रभाव को चार वर्गो में विभाजित किया जाता हैः
1- बहुत मोटा जैसे पत्थर तथा बजरी
2- मोटा जैसे रेत
3- महीन जैसे सिल्ट (साद)
4- बहुत महीन जैसे मृतिका
सूक्ष्म मृतिका कण (0.002 मिलीमीटर से कम व्यास) कलिल स्वभाव की होती है तथा इन्हे मृदा का सबसे सक्रिय अंश कहा जाता है। खेत में मृदा का गुण एवं व्यवहार मुख्यतः खनिज पदार्थ के स्वभाव पर निर्भर करता है।

जैवांश

मृदा में उपस्थित जैवांश के दो संद्यटक होते है।
1- आंशिक विघटित पादप तथा जन्तु अवशेष ।
2- स्थिर ह्यूमस जो काले अथवा भूरे रंग का तथा कलिल स्वभाव का होता है।

सजीव जीव जैसे सूक्ष्मजीव, केचुए, कीट तथा अन्य अपने निवास तथा भोजन के लिए जैवांश से संवद्ध होते हे। जैवांश मृदा के रंग, भौतिक गुण, सुलभ पोषक तत्वों की आपूर्ति तथा अधिशोषण क्षमता को प्रभावित करता है।
अधिकांश भारतीय मृदाओं में जैवांश की मात्रा अत्यन्त कम है, मात्र 0.2 प्रतिशत से 2 प्रतिशत तक (भारानुसार), किन्तु इसका मृदा गुणों तथा पौधों की वृद्धि पर प्रभाव बहुत अधिक होता है। प्रथमः जैवांश खनिज पदार्थ के ''संबंधक'' का कार्य करता है जिससे उत्पादक मृदाओं की भुरभुरी उत्तम दशा विकसित होती है। द्वितीयः जैवांश दो महत्वपूर्ण पोषक तत्वोः नाइट्रोजन तथा गंधक का प्रमुख स्रोत है। तृतीयः मृदा की उत्तम भौतिक दशा बनाए रखने में जैवांश का महत्वपूर्ण भूमिका होता है जिसके द्वारा मृदा की जल धारण क्षमता तथा वातन नियंत्रित होते है। अंतिमः मृदा सूक्ष्म जीवों के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत जैवांश ही है, जिनकी सक्रियता से स्थानीय तथा वैष्विक पारिस्थितिकी प्रणाली में मृदा एक सक्रिय अंग का स्थान प्राप्त करती है।

मृदा जल

मृदा जल रंध्राकाश में रहता है तथा ठोस कणों (खनिज पदार्थ तथा जैवांश) द्वारा जल की मात्रा के अनुसार परिवर्ती बल से धारित रहता है। मृदा जल में विलेय लवण होते है जो तथाकथित ''मृदा विलयन'' संरचित करते है जो पौधों को पोषक तत्व आपूर्ति करने का माध्यम के रूप में महत्वपूर्ण है। मृदा विलयन से जब पोषक तत्व अवशोषित कर लिए जाते है तो उन्हे ठोस कणों (खनिज तथा जैवांश) से पुनर्नवीकृत किया जाता है। पौधों की वृद्धि के लिए माध्यम के रूप में मृदा कार्य करती रहे, इसके लिए उसमें कुछ जल रहना अनिवार्य है। मृदा में जल के प्रमुख कार्य है।

मृदा में अनेक भौतिक, रासायनिक तथा जैविक सक्रियाओं को प्रोत्साहित करता है।
पोषक तत्वों के विलायक तथा वाहक के रूप में कार्य करता हैं।
पौधों की कोशिकाओं में तनाव बनाए रखने हेतु पौधों की जड़े मृदा से जल अवशोषित करती है।
प्रकाश संष्लेषण प्रक्रिया में एक कर्मक का कार्य करता है।
मृदा जीवों के लिए उपयुक्त पर्यावरण प्रदान करता है।

मृदा वायु

मृदा में होने वाली सभी जैविक अभिक्रियाओं के लिए आक्सीजन अनिवार्य है। इसकी आवश्यकता मृदा वायु से पूरी की जाती है।
मृदा का गैसीय प्रावस्था आक्सीजन प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करता है जिसे मृदा में सूक्ष्म जीव या पौधो की जड़ें अवशोषित करती है। साथ ही यह मृदा सूक्ष्म जीवों तथा पौधों की जड़ों द्वारा निस्काषित कार्बन डाईआक्साइड के मृदा से बाहर निकलने का मार्ग भी प्रदान करता है। इस द्वि-मार्ग प्रक्रिया को मृदा वातन कहा जाता है। जब मृदा में जल की मात्रा अधिक हो तो मृदा वातन क्रांतिक हो जाता है क्योंकि रंधाकाश से जल द्वारा वायु का विस्थापन हो जाता है।

मृदा वायु का संघटन वायुमंडलीय वायु से भिन्न होता है। इसमें मृदा के ऊपर विद्यमान वायुमंडल की तुलना में आक्सीजन कम तथा कार्बन डाइआक्साइड बहुत अधिक होता है। मृदा जल तथा सूक्ष्म जीवों की सक्रियता में परिवर्तन अनुसार मृदा वायु का संघटन गतिक (परिवर्ती) होता है।
 

Disqus Comment