महंगी पड़ी चूक

Submitted by admin on Tue, 09/16/2008 - 10:24
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केंद्रीय जल संसाधन राज्य मंत्री जयप्रकाश यादवकेंद्रीय जल संसाधन राज्य मंत्री जयप्रकाश यादवकेंद्रीय जल संसाधन राज्य मंत्री जयप्रकाश यादव से संजय सिह की बातचीत

अंतरराष्ट्रीय कुसहा बांध के टूटने से बिहार में महाप्रलय की स्थिति पैदा हो गयी है, उसे बचाने के लिए केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने क्या किया?

कुसहा अंतरराष्ट्रीय तटबंध का 67 किलोमीटर का हिस्सा नेपाल में पड़ता है। इसके रख-रखाव की जिम्मेदारी भारत की है। रख-रखाव बिहार सरकार करती है और खर्च होने वाली राशि का भुगतान भारत सरकार का केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय करता है। राज्य की मांग पर हम उसे पैसा उपलब्ध कराते हैं।

फिर भी निगरानी और तटबंध की वर्तमान स्थिति की जानकारी तो आपका मंत्रालय रखता होगा?

हां, हमारे मंत्रालय के अधीन कार्यरत गंगा फ्लड कंट्रोल कमीशन (जीएफसीसी) ने बिहार सरकार के इंजीनियर-इन चीफ को कुसहा बांध के बाबत तीन पत्र लिखे, लेकिन किसी का जवाब नहीं आया। एक पत्र 1 अप्रैल को भेजा गया था। जवाब नहीं आया। फिर दूसरा पत्र 25 अप्रैल को प्रेषित किया गया। उसकी भी सुध नहीं ली गयी। चेतावनी के बावजूद अफसोस है कि राज्य सरकार ने तीनों पत्रों में से किसी भी पत्र का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। राज्य सरकार कुंभकर्णी नींद में थी।

अब तो तटबंध टूट गया है। राज्य ने क्या चूक की? मंत्रालय ने अपनी तरफ से क्या जानकारी जुटायी?

खुद राज्य सरकार के कैलेंडर के मुताबिक कुसहा बांध पर 15 अप्रैल तक कार्य खत्म हो जाना चाहिए था, क्योंकि इसके बाद बरसात शुरू हो जाती है। जाहिर है, बरसात में तटबंधों पर कटाव व दबाव बढ़ जाता है। इसके पहले मरम्मत जरूरी है। इसके लिए टेंडर, वर्क ऑर्डर, निगरानी कार्य राज्य सरकार देखती है। और इसमें जो राशि खर्च होती है, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय भुगतान करती है, जो मैंने पहले ही बताया है। कैलेंडर के मुताबिक कार्य तो हुआ ही नहीं। बांध पर इमरजेंसी होने पर ‘फ्लड फाइटिग’ करने के लिए बोल्डर आदि की व्यवस्था तक नहीं की गयी थी।

तटबंध पर कटाव कब से शुरू हो गया था?

कुसहा तटबंध पर तैनात अभियंता ई. सत्यनारायण द्वारा अपने उच्चाधिकारियों को भेजे गये पत्र के मुताबिक 4 अगस्त से वहां कटाव शुरू हो गयी थी और उन्होंने टेलीग्राम के मार्फत कई सूचनाएं दी थीं। अगर 4 अगस्त से कटाव वाले स्थान पर बोल्डर और बालू की बोरियां डालने का काम शुरू हो गया होता, तो मौजूदा महाप्रलय की हालत पैदा नहीं होती। दरअसल, बांध को बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया। 18 अगस्त को बांध टूट गया। सबसे हास्यास्पद बात तो यह है कि राज्य का जल संसाधन विभाग अपने सभी बांधों को 17 अगस्त तक सुरक्षित होने का बुलेटिन जारी करता रहा।

कोसी परियोजना का लाइजनिग ऑफिसर नेपाल में बैठता है, उसकी क्या रिपोर्ट है?

परियोजना का राज्य सरकार का लाइजनिग ऑफिस नेपाल के विराटनगर में है। राज्य सरकार की घोर लापरवाही और असंवेदनशीलता के चलते कार्यालय के पूरे स्टाफ को वेतन ही नहीं मिल रहा है। कई महीने से वेतन नहीं मिला है। यहां तक कि कार्यालय जहां है, उसका किराया तक नहीं चुकाया गया है। वहां लगे टेलीफोन के मामले में भी यही रवैया है। इसके लिए लाइजनिग ऑफिसर 14-15 अगस्त से पटना में चक्कर काट रहे थे।

क्या इसके पहले भी कुसहा बांध का नेपाल वाला हिस्सा टूट चुका है?

नहीं। इस बांध पर दबाव तो हर साल बरसात में बढ़ जाता है, पर इसकी मरम्मत कर इसे बचा लिया जाता रहा। वर्ष 1993-94 में जब बिहार में लालूजी की सरकार थी और मैं वहां मंत्री था, कुसहा बांध में ठीक इसी तरह कटाव और सीपेज शुरू हो गया था। लेकिन खुद लालूजी और पूरे सरकारी अमले ने बांध पर 20 दिनों तक कैंप कर उसे टूटने से बचा लिया था। फ्लड फाइटिग के लिए 400 ट्रक बोल्डर सिलीगुड़ी और मिर्जापुर से मंगाया गया था। युद्धस्तर पर मरम्मत कार्य पूरा करके हमने तबाही से लोगों को बचा लिया था।
 

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