मां वरुणा की पाती

Submitted by admin on Thu, 06/18/2009 - 12:20
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हमारी वरुणा अभियान

मेरे प्यारे बच्चों,

जुग-जुग जियो। सदा सुखी रहो। दु:ख और दवाओं से तुम्हारा वास्ता कभी न पड़े। एक माँ बस यहीं आशीष तो दे सकती है अपने बच्चों को, और वह भी तब, जब माँ खुद असहाय, बीमार और अशक्त हो तिल-तिल कर मर रही हो। मृत्यु शैया पर पड़ी कराह रही हो। मगर मेरे बच्चों, मैं शुरु से ही ऐसी नहीं थी। भगवान विष्णु के चरणों से जब मैं निकली तो देवताओं ने मेरा नाम मानव मित्र देवता वरुण के नाम पर रखा था। उनका मानना था की काशी प्रान्त की जनता की मित्र रहूंगी मैं। मैं तुम सबकी मित्र ही नहीं वरन माँ बनकर रही। अथर्ववेद में वरुणावती, महाभारत के भीष्म पर्व में वाराणसी, मत्स्यपुराण में वाराणसी एवं तीर्थचिन्तामणि में वराणसी के नाम से मैं तो जानी ही जाती हूं। इसके अतिरिक्त बौद्ध ग्रन्थ महावस्तु, कुर्म पुराण, पद्म पुराण, अग्निपुराण में भी मेरा जिक्र मिलता है। कहने का मतलब यह है कि मैंने काशी की सभ्यता को बनते देखा है, मनु और महाभारत से लेकर आज तक का इतिहास समेट रखा है मैंने। तब सर्प के काटे हुए लोगों को लाकर मेरे पानी से सर्प विष उतारते थे तुम लोग। लंगडे आम के बगीचे मेरे ही किनारे पर थे। कितनी खुशी मिलती थी मुझे तुम्हें और तुम्हारे पशुओं को अपने किनारे हँसते, खेलते, चरते और आराम करते देखकर और पंचक्रोशी परिक्रमा के समय तो मेला लग जाता था मेरे इन्हीं किनारों पर।

यह सब सुख साथ-साथ तुम्हारे जिया है मैंने। लेकिन अब? अब लगता है मेरा अंतिम समय करीब आ गया है। मेरे पानी में मछलियां भी नहीं रहती, दुर्गन्ध आती है। तुम्हारे नालों ने मेरे जल को विषहारिणी से विषाक्त बना डाला है। किनारे के पेड़ पौधों का स्थान पक्के मकानों और बििल्डगों ने ले लिया। अब तुम्हारे बच्चों को कौन कहे अब तो तुम्हारे पशु, पक्षी भी मेरे पास नहीं फटकते ऐसी अछूत हो गयी हूं मैं। कहीं-कहीं तो लगता ही नहीं कि कभी मैं भी एक जीवनदायनी नदी थी। वैज्ञानिक विश्लेषण बताते हैं कि अब मेरे जल में आक्सीजन की मात्रा ही नहीं रह गयी है। प्रदूषण के सारे मानक टूट चूके हैं मेरे जल में। अब तो किनारे के गाँवों व शहरों का भू-जल स्तर भी नीचे खतरनाक स्तर तक जा रहा है और प्राथमिक जल स्रोत लगभग सूख चले हैं। सोचती हूं कि तुम सबके रहते मेरी क्या यही दुर्दशा होनी थी।

मैं किसे दोषी कहूं? मेरा तो माँ का हृदय है। माँ हमेशा माँ ही होती है वह अपने बच्चों को दोषी जानते हुए भी कैसे दोषी कह सकती है? क्योंकि सब कुछ करके भी तो आखिर तुम मेरे बच्चे ही हो न।

ढेरों आशीष।
मृत्यु शैया पर तुम्हारी माँ

``वरुणा´´
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