मौसम विभाग की भविष्यवाणियाँ

Submitted by admin on Mon, 06/29/2009 - 16:37
Source
merinews
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा आधिकारिक रूप से जारी मानसून सम्बन्धी भविष्यवाणी के मुताबिक देश के कई भागों में कम वर्षा होने का पूर्वानुमान है। हालांकि जून माह से शुरु होने वाले चार माह के मानसून सीजन के दौरान अखिल भारतीय स्तर पर सामान्य औसत वर्षा होने का अनुमान है।
इस वर्ष भारत में मानसूनी वर्षा 93% होने की उम्मीद जताई गई है, जिसमें +/-4% का अन्तर भी आ सकता है। 1941 से 1990 के बीच भारत में औसतन 89 सेमी वर्षा दर्ज की गई है। मौसम विभाग के अनुसार यदि वर्षाजल के मानक स्तर में 4% की कमी-बेशी भी हो गई तो यह प्रतिशत घटकर 89% हो जायेगा जिससे स्थिति बेहद गम्भीर हो सकती है।

इस वर्ष 17 अप्रैल को मौसम विभाग द्वारा जारी आँकड़ों के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून के देश में 96% रहने की उम्मीद जताई गई थी, जिसमें 5 प्रतिशत की कम-ज्यादा की गलती की सम्भावना थी। मानसून के उड़ीसा तथा महाराष्ट्र से आगे नहीं बढ़ पाने और इसमें 2 सप्ताह की देरी के कारण वर्षा के इस पूर्वानुमान को अब 96% से घटाकर 93% कर दिया गया है। इस वजह से मानसून बिहार, छत्तीसगढ़, दक्षिण मध्यप्रदेश और गुजरात में कुछ देर से पहुँचेगा, तथा मानसून का सीजन मौसम विभाग के अनुसार 22 जून से शुरु माना जायेगा। माह जून के पूर्व में उपलब्ध आँकड़ों की तुलना में इस वर्ष जून माह में भारत की कुल औसत वर्षा में 52%, उत्तर-पश्चिम भारत में 41%, मध्य भारत में 75%, दक्षिण प्रायद्वीप में 23% तथा उत्तर-पूर्व में 53% की कमी दर्ज की जायेगी।

मौसम विभाग के क्षेत्रवार बँटवारे के अनुसार उत्तर-पश्चिम भारत में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तरांचल और उत्तरप्रदेश आते हैं। उत्तर-पूर्व भारत के नक्शे में अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, आसाम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, तथा झारखण्ड आते है, जबकि मध्य भारत में गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गोआ तथा उड़ीसा आते है। दक्षिणी प्रायद्वीप माना जाता है, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, लक्षद्वीप तथा अंडमान निकोबार द्वीप समूह को।

उत्तर-पश्चिम भारत, जो कि देश के खाद्यान्न भंडार का प्रमुख इलाका है, में औसत वर्षा 81% रहने का अनुमान जताया जा रहा है, जो कि मानक स्तर कम-ज्यादा गुणांक से 8% अन्तर अर्थात 73% तक भी हो सकती है, जबकि इस क्षेत्र में मानक गुणांक कई बार 19% तक कम-ज्यादा भी होता है। हालांकि मौसम विभाग के अनुसार मध्य भारत में बारिश से काफ़ी उम्मीदें हैं, और इस साल इस क्षेत्र में यह 99% (8% कम-ज्यादा का मानक गुणांक लेकर) तक हो सकती है।

इसी प्रकार उत्तर-पूर्व भारत में मानसूनी वर्षा 92% (142.9 सेमी) तक रहने का अनुमान जताया गया है, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीप में यह 93% (72.5 सेमी) रहने का अनुमान है (जबकि कम-ज्यादा का मानक गुणांक 15% तक माना गया हो)।
मौसम विभाग द्वारा माह जुलाई में देश की औसत वर्षा 93% रहने का पूर्वानुमान घोषित किया है, जबकि अगस्त में इसे बढ़ाकर 101% (मानक गुणांक +/- 9%) किया गया है। मौसम विभाग बारिश की भविष्यवाणी करने से पहले समूचे वैश्विक आँकड़ों, तथ्यों, ग्राफ़, झुकावों तथा अनुमानों का सहारा लेता है। इस वर्ष भी डायनामिक तथा स्टैटिक आँकड़ों की मदद से विश्लेषण, निरीक्षण और अनुमान लगाकर बताया गया है कि “अल नीनो” का प्रभाव 60% तक रह सकता है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, अल नीनो प्रभाव प्रशान्त महासागर के पानी के सामान्य से अधिक गर्म होने को कहा जाता है, जिसके कारण पूरे विश्व में सूखा या बारिश की गणनायें और भविष्यवाणियाँ की जाती हैं। इस वर्ष प्रशान्त महासागर का पानी सामान्य तापमान पर रहने की उम्मीद 40% ही है, जबकि “ला नीना” प्रभाव (जब प्रशान्त महासागर का पानी सामान्य तापमान से ठंडा होता है) जिसके कारण भारी वर्षा होती है, की कोई सम्भावना नहीं है।

कुल मिलाकर सारे आँकड़ों के विश्लेषण से मौसम विभाग ने एक बात साफ़ कर दी है कि देश के कुछ हिस्से भीषण जल संकट की चपेट में आ सकते हैं, खासकर पंजाब और हरियाणा, जो कि देश के अनाज भण्डार में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं।
केन्द्रीय भू-विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ शैलेष नायक ने बताया कि भारत का मौसम विभाग और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ ट्रापिकल मेटेयोरोलॉजी के वैज्ञानिकों ने Cloud Seeding (बादलों की बुआई) के सम्बन्ध में कुछ शोध और प्रयोग किये हैं, जिसके द्वारा यह पता लगाया जायेगा कि किस प्रकार के बादलों से बारिश होने की सम्भावना है, ताकि एक विशेष रासायनिक प्रभाव के जरिये उन बादलों से बारिश करवाई जा सके। इस प्रोजेक्ट की विस्तृत रिपोर्ट आने में दो वर्ष लगेंगे, लेकिन दो वर्ष का इंतज़ार काफ़ी लम्बा हो जायेगा। इस समय सरकारों को सम्भावित अनिश्चितता को देखते हुए स्थिति से निपटने के लिये जल्द ही ठोस योजनायें बनानी होंगी।

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