यमुना किनारे विहार

Submitted by admin on Thu, 08/06/2009 - 09:48
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नईसोच ब्लॉग
आईटीओ के पास यमुना का जो किनारा है वहां एक सूखे दिन में जाना हुआ तो पैर में पहनी खुली काली चप्पलें मटमैली हुए बिना नहीं रह सकी और पैर मिटटी में पसीने के मिल जाने से काले हो गए। पर भीगे नहीं। नदी के किनारे जाने के बावजूद बिना भीगे- भिगाए पैरों का लौट आना बड़ी विडंबना ज़रूर थी। पर वजह जाहिर थी कि इतने गंदे पानी में न पैर भिगाने का जी हुआ और न ही माहौल में घुली बदबू ने ज्यादा देर वहां ठहरने ही दिया। नदियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से नाम वाली नदी के किनारे, नदी होने से उनका होना कुछ अलग ही अहमियत से सराबोर हो जाता है। उन घाटों, उन किनारों में होने वाली चहल-पहल की वजह वो नदी होती है और इस वजह से इर्द-गिर्द कई और वजहें जान बूझकर वहां के रहवासियों और राहगीरों द्वारा बुन ली जाती हैं। ये वजहें उस नदी की अहमियत के सबूतों में शुमार हो जाती हैं। लेकिन कोई नदी तभी अच्छी लगती है जब वह अविरल बहती चली जाए, उसकी सतहों के इर्द-गिर्द स्वच्छ और निर्मल होने की खुश्बू महका करे और वहां एक अजीब सी शांति, एक अजीब सा सुख आने-जाने वालों को मिला करे। अब तक हमेशा यही लगता आया था कि न यमुना ऐसी नदियों में है, न दिल्ली यमुना के होने से मिले उपरोक्त सुखों से परिपूर्ण है। यानी यह कि यमुना दिल्ली में है तो पर दिल्ली और दिल्लीवालों से अलहदा है। पूरी तरह उपेक्षित सी एक कोने में पड़ी हुई। जैसे बनारस की विधवाएं। न यमुना ने दिल्ली को कोई संस्कृति दी है, न ही दिल्लीवालों ने यमुना के इर्द-गिर्द खुद कोई संस्कृति बुनने की जरुरत समझी। परिणाम जो होना था वही हुआ। यमुना एक नाले में तब्दील होती रही। सूखती रही और दिल्लीवालों ने भी उसे किसी कूड़ेदान से बेहतर न समझा।

आईटीओ के पास यमुना का जो किनारा है वहां एक सूखे दिन में जाना हुआ तो पैर में पहनी खुली काली चप्पलें मटमैली हुए बिना नहीं रह सकी और पैर मिटटी में पसीने के मिल जाने से काले हो गए। पर भीगे नहीं। नदी के किनारे जाने के बावजूद बिना भीगे- भिगाए पैरों का लौट आना बड़ी विडंबना ज़रूर थी। पर वजह जाहिर थी कि इतने गंदे पानी में न पैर भिगाने का जी हुआ और न ही माहौल में घुली बदबू ने ज्यादा देर वहां ठहरने ही दिया। वहां चहल पहल के नाम पर कुछ बच्चे मिले जो पास ही से गुजरती रोड पर बहती हुई कारों में मौजूद आस्थावान लोगों की आस्था को उनके द्वारा दी गई मूर्तियों, घड़ों और चंद सिक्कों जैसी चीजों के रूप में इस नदी में उड़ेल आते हैं। बहाने से ये बच्चे इन चंद सिक्कों के हक़दार बन जाते हैं। ये बच्चे स्कूल नहीं जाते और नदी के कूड़े को बीन अपने भविष्य के आईने से दूर चले जाते हैं। वैसे भी इस नदी में वो कुव्वत कहां है कि यह किसी को आईना दिखा भी सके। या कहें कि लोगों ने इस कुव्वत होने की कोई गुंजाईश ही नही छोड़ी। वैसे और जगह होती तो नदी में अपना प्रतिबिम्ब देखना भी कम रोचक नहीं होता। पर यहां आकर इस रोचक अनुभव से गुजर पाना कतई असंभव सा लगा।

अक्षरधाम के पास भी यमुना के कुछ अवशेष बाकी हैं। यहां यमुना का यह छोटा सा अहाता सुबह-सुबह कालेज जाते हुए रोज दिखाई दे जाता है। इन दिनों रोज इसे देखने की गरज से बस के दरवाज़े पर खड़ा रहता हूं। सुबह जब धूप होती है तो सूरज की कई किरणें इसमें सितारों जैसा कुछ बिखेर रही होती हैं और कुछ पक्षी बार-बार इस अहाते में उड़ते-तैरते दिखाई देते हैं। इन पक्षियों के उड़ते वक्त नदी की सतह को ठीक छोड़ते समय, इनके शरीर से पानी को बिखरते हुए देखना मुझे एक अलग आनंद देता है। दूसरी ओर अक्षरधाम की दिशा में जो छोर है वहां एक नर्सरी है और इस नर्सरी के बीच में यमुना को बचाए जाने के लिए यमुना सत्याग्रह का बैनर लगा एक तंबू न जाने कब से लगा हुआ है। सुना है मैगसेसे अवार्डी राजेन्द्र जी यहीं से अपने आन्दोलन को प्रतीकात्मक रूप से चलाते हैं। लेकिन यह समझ से परे है इस जगह पर इस सत्याग्रह को कैसे कोई नोटिस ले पाता है। हांलाकि पास ही बन रहे खेलगांव की इमारतों की मंजिलों को कम करने के पीछे इन लोगों के आन्दोलन की भूमिका ज़रूर रही है।

खैर यमुना खूबसूरत कतई नहीं रह गई है। मेरी इस धारणा को तोड़ने में पिछला हफ्ता बड़ा अहम रहा है। पिछले शुक्रवार को कालिन्दी कुंज के पास बने पक्षी विहार में जाना हुआ। दरअसल अंदर जाना भी एक संयोग था। मैं बाहर से ही नदी में मौजूद एक नाव की तस्वीर लेने पे तुला था कि तभी वहां एक गार्ड आया और मुझे टोका कि मैं क्या कर रहा हूं। हांलाकि यह अजीब सा दुराग्रह ही था कि एक कैमरा पकड़ा हुआ आदमी जो नदी में मौजूद नाव को फोकस कर ही चुका हो उससे पूछा जाए कि वह क्या कर रहा है। खैर उस गार्ड ने बताया कि मैं पहले 30 रुपये का टिकट खरीदूं और फिर अंदर जाकर जी भर फोटोग्राफी करूँ। मैने टिकट खरीदा और अंदर जाकर वह हुआ जो दिन बनने के लिए काफी था। वास्तव में यमुना अब भी निहायत खूबसूरत है। उतनी ही जितनी किसी निर्जन गांव के इर्द-गिर्द बह रही नदी हो सकती है। लगभग चार किलोमीटर के इस अहाते को अगर आप बिना थके केवल यमुना को निहारते, वहां मौजूद पक्षियों से ईर्ष्या करते हुए पैदल पार कर लें तो यह एक नितान्त दार्शनिक अनुभव से कम नहीं है। कम से कम मेरे लिए तो यह सच रहा।
इतनी सुन्दर यमुना और उसकी दार्शनिकता को जिंदा रखना जितना ज़रूरी है उतना ही विडंबनापूर्ण है उसे गंदे नाले में तब्दील होते देखते रहना।

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