राज, समाज और पानी : छ:

Submitted by admin on Sat, 02/21/2009 - 09:59
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अनुपम मिश्र


कई बार हम इस लोक जन, जनता वाली शब्दावली में ऐसे फॅंस जाते हैं कि फिर हम विज्ञान में भी जन विज्ञान, लोक विज्ञान की बात तो करते हैं पर प्राय: लोक विमुख खर्चीले विज्ञान का कोई सस्ता संस्करण ही उस नाम से खोज लाते हैं। लेकिन वह भी समाज में वैसा उतर नहीं पाता जैसा हम चाहते हैं। तब हम उदास, निराश भी होते हैं। अपनी असफलता के लिए उसी समाज को कोसने लगते हैं जिसे हम बदलने, सुधारने निकल पड़े थे। उसने हमारी सुनी नहीं, ऐसा हमें लगने लगता है।

जसढोल यहाँ एक सुंदर शब्द है। जस यानी यश का ढोल। मरुप्रदेश में पानी के काम के बहाने एक जसढोल न जाने कितने सैकड़ों वर्षो से जोर-जोर से बज रहा था, पर हमने, हमारे इस नए समाज ने उसकी थाप, उसका संगीत सुना ही नहीं। आज उसकी स्वर लहरी, उसकी लय, थाप का कुछ अंश आप तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हूँ।

शिक्षण, प्रशिक्षण आदि सभी प्रयासों में अक्षर का महत्व माना ही जाता है। यहाँ पानी का जो विशाल काम फैलाया गया, उसमें अक्षर ज्ञान को एकदम किनारे रख दिया गया। उससे परहेज नहीं पर जीवन ज्ञान और जीवन शिक्षा के क्षेत्र में उसकी अनिवार्यता नहीं स्वीकार की गई। अक्षर ज्ञान का यहाँ एक और अर्थ लगाया गया - क्षर, नष्ट न होने वाला ज्ञान।

उनकी इस परिभाषा से देखें बस दो उदाहरण। इनमें से एक का जिक्र पहले आया है पर अधूरा। खारे पानी के बीच अमृत जैसा मीठा पानी देने की एक पद्धति की तरफ कुछ संकेत किया था। रेगिस्तान में कुछ खास हिस्सों में प्रकृति ने रेत की विशाल राशि के नीचे एक आड़ी-तिरछी प्लेटें भी चला रखी है। यह मेट या जिप्सम से बनी है। इस क्षेत्र में कोई 200-300 फुट की गहराई पर खूब पानी है, पर है पूर्णरूप से खारा। पीने के काम का नहीं। लेकिन इस जिप्सम के कारण ऊपर गिरने वाली थोड़ी-सी भी बरसात रेत में धीरे-धीरे छनकर इस प्लेटों पर टकरा कर अटक जाती है और एक विशाल भाग में सतह से, भूमि से नीचे जिप्सम तक नमी की तरह फैल जाती है।

मरुप्रदेश का निरक्षर माना गया, अनपढ़ बताया गया समाज आज से कोई हजार बरस पहले रेत के टीलों, रेत के समुद्र में कोई 10 से 100 फुट नीचे चल रही इस प्लेटों को चिन्हित कर चुका था। केवल चिन्हित ही नहीं, उसने उसका शानदार उपयोग भी खोज निकाला। उसने इस जिप्सम की प्लेटों के कारण रेत में छिपी नमी को सचमुच निचोड़ कर मीठा पानी निकाल लेने का एक बेहद पेचीदा, जटिल इंतजाम कर लिया था। इन इलाकों में हमारी आने-जाने वाली सभी तरह की सरकारों ने टयूबवैल, हैंडपंप आदि लगवाकर इन गाँवों को पानी देने का काम जरूर किया था, पर यह तो खारा ही था।

बेहद पढ़े-लिखे, विकसित जर्मनी के इलाके से बुलाई गई एक नई खर्चीली तकनीक से इन नए यंत्रों से निकल रहे खारे पानी को मीठा बनाने की कोशिश की गई। इस उठापटक के 5-7 वर्षो में गाँवों ने अपनी पद्धति को छोड़ भी दिया था। पर जब पानी का खारापन खत्म नहीं हुआ, बल्कि इतना बढ़ गया कि गाय, बकरियों तक ने उसे पीना छोड़ दिया तो इन इलाकों में अब फिर धीरे-धीरे कुंई बनाने, टूटी फूटी छोड़दी गई कुंईयों को फिर से ठीक करने और अपने दम पर फिर से मीठा पानी पाने का इंतजाम वापस लौटने लगा है। गाय, बकरी, भेड़ों द्वारा पीने से मना किया गया पानी देने को ही विकास का, आधुनिकता का प्रतीक मानने वाली कोई तीन-चार सरकारें इस बीच राज्य में आइं और वापस भी लौट चुकी हैं। शिक्षा के आंदोलन भी गैरसरकारी स्तर पर यहाँ चले हैं और उनके समाजसेवी संस्थाओं ने भी जल चेतना का नारा लगाया है। पर कुंई की वापसी गाँव के दम पर ही हुई है और एक बार फिर इस अक्षर ज्ञान ने, क्षरण न हो सकने वाले ज्ञान ने, शिक्षण ने, उस निराकर संगठन ने खारे पानी के बीच मीठा पानी जुटाया है।

दूसरा बिलकुल विलक्षण उदाहरण जैसलमेर क्षेत्र में एक विशेष तरह की खेती से जुड़ा है। यह भी मेट यानी जिप्सम की प्लेटों से ही जुड़ा अद्भुत विज्ञान है। कहीं-कहीं यह प्लेटों ज़मीन की सतह के आसपास बहुत ही कम गहराई पर ऊपर उठ आती है। तब इसमें रेत में छिपी नमी इतनी नहीं होती कि वह अच्छी मात्रा में मीठा शुद्ध पानी दे सके। तो क्या समाज इसे ऐसे ही छोड़ दे? नहीं। अनपढ़ माने गए समाज ने इस तरह के भूखंडों पर आज से कोई 600 बरस पहले एक प्रयोग किया और मात्र 3 इंच की वर्षा में गेहूँ, चना जैसी रबी की फसल उगाने का नायाब तरीका खोज निकाला। किसी भी आधुनिक कृषि पंडित, विशेषज्ञ से पूछें कि क्या 3 इंच बरसात में गेहूँ पैदा हो सकता है? वह इस प्रश्न का उत्तर देने के बदले पूछने वाले को पागल ही मानेगा।

ऐसे विशिष्ट भूखंडों पर समाज ने एक विशेष तरह की मेंड़बंदी कर इस जरा सी वर्षा को जिप्सम तक अटका कर खडीन नाम कीमती खेत का अविष्कार किया। उसने इस खेत में कृषि के अविश्वसनीय काम तो किए ही, इसमें उसने समाज शास्त्र के, आपसी सद्भाव के, समभाव के, शोषण मुक्त समाज के, स्वामित्व विसर्जन के, यानी मिल्कियत मिटाने के भी शानदार सबक सीखे और सिखाए भी। आज सामूहिक खेती के जो प्रयोग दुनिया में भारी भरकम घांतियों के बाद, हजारों लोगों को मारने के बाद भी सफल नहीं हो पाए, उन्हें यहाँ के विनम्र, मौन, शांत समाज ने अपने खडीन पर चुपचाप कर दिखाया है।

प्राय: अकाल से घिरे इन गाँवों में बरसात ठीक हो जाए तो एक फसल होती है। बरसात न हो तो वह भी हाथ से जाती है। पर खडीन में दो फसलें ली जा सकती हैं। खरीफ भी, रबी भी। हमारे पढ़े लिखे समाज का लगेगा कि ऐसा विशिष्ट खेत तो उस क्षेत्र के, गाँव के ठाकुर, बलवान, सामाजिक पहलवान के कब्जे में ही रहता होगा।

ऐसा नहीं है। यह एक बहुत ही संवेदनशील जटिल सामाजिक ढाँचे पर टिकाया गया है। गाँव में यदि प्रकृति की दया से खडीन जैसा खेत है तो फिर वह गाँव के सब घरों का खेत है। सबके सब उसके मालिक हैं। या कहें कि उसका कोई भी मालिक नहीं होता। लास नामक एक उन्नत सामाजिक प्रथा से इस खेत का सारा काम चलता है। लास शायद संस्कृत के उल्हास से बना है। इसमें सब मिलकर काम करते हैं। यह श्रमदान से भी कहीं ऊँची चीज है। इसमें सारे काम को उल्हास से, आनंद से जोड़ा गया है। लास के अपने गीत होते हैं और वे टी.वी., कैसेट, एफ एम, मोबाइल के इस दौर में भी गायब नहीं हुए हैं।

गाँव के सारे घर मिलकर काम करते हैं, सब के सब। जाति-पाँति का कोई भेद नहीं। खेत तैयार करने से लेकर बुवाई, निंदाई, गुड़ाई, फसल कटने तक में पूरा का पूरा गाँव एक साथ जुटता है। फसल कटने पर उसके उतने ही हिस्से होते हैं और हर ढेर हर घर पहुँच जाता है। कोई बीमार, अशक्य, वृद्ध, महिला हो, पुरुष हो, उसे हर काम से अलग रखा जाता है। पर प्राय: ऐसे सदस्य भी खडीन के किनारे किसी बबूल या खेजड़ी या जाल पेड़ की छाँव में बैठने आ ही जाते हैं। गाते हैं, बच्चों को सँभाल लेते हैं। अपंग और कोई नेत्रहीन भी है, तो भी वह लास खेलने के लिए इस उत्सव को गँवाना नहीं चाहता। सबकी मेहनत, सबका हिस्सा। वर्ण-सवर्ण-दलित का यहाँ कोई भी पाठ नहीं पढ़ा जाता। सब मालिक, सब मजदूर, सब उत्पादक, सब उपभोक्ता, सब शिक्षक, सब शिष्य भी बस यही पाठ खड़ीन में पढ़ाया जाता रहा है।

जीवन की शिक्षा का, समाज की शिक्षा का, जीवन जीने की कला का ऐसा सुंदर पाठ हम पढ़े-लिखों ने ठीक से जाना तक नहीं है। मरुभूमि में अनेक सामाजिक आंदोलन, शिक्षा के आंदोलन इस सुंदर खड़ीन की पाठशाला से बिना टकराए निकल गए हैं।

पानी के बहाने इस समाज ने शिक्षण के सचमुच कुछ अविश्वसनीय प्रयोग किए हैं। ये दो-पाँच बरस चलने वाले प्रयोग नहीं हैं। पंचवर्षीय योजनाओं जैसे नहीं हैं। ये तो पाँच सौ बरस की लंबी उमर सोचकर बनाए गए हैं। आधुनिकता की ऑंधी, समाज से कटी शिक्षा, जीवन शिक्षा के इन प्रयोगों को पूरी तरह से उखाड़ नहीं पाई है।

पिछले वर्ष इसी प्रतिष्ठित व्याख्यान में इंग्लैंड से आए दार्शनिक श्री घिस्टोफर विंच ने अपने भाषण के अंत में कहा था, ''गांधी आज होते तो देश के तेजी से हो रहे ऐसे आर्थिक विकास के कई पहलुओं से वे खुश नहीं होते। वे तो नागरिक को उत्पादक की केन्द्रीय भूमिका में रखना चाहते थे। यह वह भूमिका है जो उसकी मानवता और सच कहें तो उसकी आध्यात्मिकता के महत्वपूर्ण भाग को निखारती है''।

हमारे अनपढ़ माने गए समाज ने गांधीजी की इस बात का खूब ध्यान रखा और नागरिक को उपभोक्ता से पहले आदर्श उत्पादक ही बनाने की पाठशाला खोली थी।

आपने मुझे इस प्रतिष्ठित व्याख्यान में जिस बड़े उद्देश्य को ध्यान में रख कर बुलाया था, मुझे मालूम है कि मैं उसे पूरा कर पाने लायक नहीं हूँ। पर श्री कृष्ण कुमार जी का प्यार यहाँ मुझे ले ही आया है तो अंत में मैं विनोबा के एक कथन से इस प्रसंग को समेटना चाहूँगा।

विनोबा ने कहा है कि पानी तो निकलता है, बहता है समुद्र में मिलने के लिए पर रास्ते में एक छोटा-सा गड्ढा आ जाए तो वह उसे भर कर खत्म हो जाता है। वह उतने से ही संतोष पा लेता है। वह कभी ऐसी शिकायत नहीं करता, कभी इस तरह नहीं सोचता कि अरे मुझे तो समुद्र तक जाने का एक महान उद्देश्य, एक महान लक्ष्य, एक महान सपना पूरा करना था।

मरुप्रदेश के समाज ने अपने जीवन के छोटे-छोटे प्रश्न खुद हल किए हैं, अपने जीवन के छोटे-छोटे गड्ढे भरे हैं। छोटे-छोटे गड्ढे भर सकना सीखना अच्छे शिक्षण का एक उम्दा परिणाम, एक अच्छी उपलब्धि माना जाना चाहिए-इतनी विनम्रता हमें हमारी शिक्षा सिखा सके तो शायद हम समुद्र तक जाने की शक्ति भी बटोर लेंगे।

 

 

पुस्तकः महासागर से मिलने की शिक्षा
(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

सुनहरे अतीत से सुनहरे भविष्य तक

2

जड़ें

3

राज, समाज और पानी : एक

राज, समाज और पानी : दो

राज, समाज और पानी : तीन

राज, समाज और पानी : चार

राज, समाज और पानी : पाँच

राज, समाज और पानी : छः

4

नर्मदा घाटीः सचमुच कुछ घटिया विचार

5

तैरने वाला समाज डूब रहा है

6

ठंडो पाणी मेरा पहाड़ मा, न जा स्वामी परदेसा

7

अकेले नहीं आते बाढ़ और अकाल

8

रावण सुनाए रामायण

9

साध्य, साधन और साधना

10

दुनिया का खेला

11

शिक्षा: कितना सर्जन, कितना विसर्जन

 

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अनुपम मिश्रबहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि सीएसई की स्थापना में अनुपम मिश्र का बहुत योगदान रहा है. इसी तरह नर्मदा पर सबसे पहली आवाज अनुपम मिश्र ने ही उठायी थी.

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