लघु बाँध ही समस्या का उपाय है

Submitted by admin on Sun, 09/21/2008 - 18:18
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मानवेंद्र सिंहमानवेंद्र सिंहमानवेंद्र सिंह देश की सबसे युवा पीढ़ी के नेता हैं। तीन वर्ष पहले उन्होंने पहली बार बतौर सांसद शपथ ग्रहण की है। देश के नितांत सूखे इलाके बाढ़मेर के प्रतिनिधि होने की वजह से उनसे काफी अपेक्षायें भी हैं कि वे जल संबंधी कार्य को किस नजर से देखते हैं। उनका नजरिया स्पष्ट है- लघु बाँध ही समस्या का उपाय है। देश दुनिया में घूमे मानवेंद्र को लिखने, पढ़ने में गहरी दिलचस्पी है। वे मूलत: पत्रकार ही थे। वे फुटबाल के भी जबरदस्त फैन हैं व लिवरपूल क्लब के समर्थक हैं। उनके ऑफिस में प्रवेश करते ही किताबों की बड़ी सी शैल्फ, ऑडियो सीडी की रैक व ताबों लिवरपूल क्लब का बड़ा सा पोस्टर दिखाई दे जाता है।

आपका संसदीय क्षेत्र देश के सबसे सूखे इलाकों में से है। इसकी जल संबंधी समस्यायें क्या हैं? देश के किसी अन्य हिस्से में शायद पानी का इतना महत्व नहीं होगा, जितना बाढ़मेर में है। मैं तो इसे पानी संबंधित समस्या के रूप में देखता ही नहीं हूँ, मैं तो प्रस्तावित करता हँ कि बाढ़मेर में हरेक समस्या पानी से संबंधित है।

बाढ़मेर के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न समस्यायें हैं, परंतु सभी का मूल तत्व पानी की कमी ही है। इस समस्या से निबटने के लिये उचित रणनीति का अभाव इसे और विषम बना देता है।



पानी की कमी किसी इलाके की समूची सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। बाढ़मेर की क्या स्थिति है स्थति है? इससे जीवन बुरी तरह से प्रभावित होता है क्योंकि आपकी पूरी जिंदगी पानी के विषय में सोचने में ही निकल जाती है। मनुष्य की जो शक्ति किन्हीं अन्य उत्पादक चीजों में काम आ सकती थी,सिर्फ पानी का इंतजाम करने में ही निकल जाती है। यह बचपन से ही शुरु हो जाता है। छोटे बच्चों को को पानी भरने दूर जाना पड़ता है। लंबे समय में,पानी के अभाव में,समूचा उत्पादन चक्र ढह जाता है।

क्या यह सिर्फ कुछ खंडों में है या पूरा बाढ़मेर इससे प्रभावित है है? पूरे संसदीय क्षेत्र में ही ऐसा है। यद्यपि एक इलाका सेवाना थोड़ा कम प्रभावित है,परंतु यह सिर्फ सापेक्ष अर्थों में ही है। असलियत में पूरा बाढ़मेर ही इससे ग्रस्त है।

राजस्थान में बुंड, टाँका, कुंई जैसे अभूतपूर्व जल सरंक्षण कार्यों की परंपरा रही है। बाढ़मेर में क्या स्थिति है? हमारे यहाँ कुछ टाँके व बाउड़ियाँ हैं। चूंकि रिहायशी क्षेत्र बहुत ही बिखरे हुये हैं, लोग अपने घरों के नजदीक ही टाँके बनवाते हैं। दुर्भाग्य से राज्य सरकार व लोगों ने इन परंपरागत कार्यों की उपेक्षा की है। बाढ़मेर की सबसे पुरानी बाउड़ी आज सूखी पड़ी है।

अगर जल सरंक्षण सदियों से चलता आ रहा है तो फिर इसकी उपेक्षा कैसे होना शुरु हुई?

जल सरंक्षण तो था। परंतु लोगों ने इसकी उपेक्षा की क्योंकि वे सार्वजनिक स्वास्थ्य व इंजीनियरिंग विभाग से पानी आपूर्ति की अपेक्षा करने लगे। पाइप से सप्लाई होने हेतु भू जल को खींचता है जिससे जल स्तर नीचे चला गया। बाढ़मेर में न सिर्फ सबसे कम जल उपलब्ध है, वहाँ जल स्तर भी बहुत नीचे है। एक दशक में जल स्तर दस मीटर से भी नीचे चला गया है।

स्वयं सेवी संस्थाओं का बाढ़मेर में जल संबधी कैसा कार्य है?

कुछ लोग आते हैं, कार्यशाला आयोजित करते हैं, भाषण इत्यादि देते हैं। परंतु पानी संबंधी ऐसा कोई खास काम नहीं है। वे हथकरघा, जीविकोपार्जन, रोजगार जैसे मसलों पर कार्यरत हैं।

2004 में बाढ़मेर से निर्वाचित बीजेपी के आप पहले सांसद हैं। आप भारी अंतर से जीते थे। आपके चुनाव घोषणापत्र में पानी एक प्रमुख मुद्दा था। उसके बाद से क्या हुआ है? आपने पानी संबंधी कितना काम किया है है? आपकी सांसद निधि से कितना पानी के कार्यों पर खर्च हुआ है?

मेरे घोषणापत्र में पानी व पाकिस्तान सीमा का खुलना दो प्रमुख मसले थे। पाकिस्तान के साथ सीमा खोली जा चुकी है। पानी एक दीर्घकालीन प्रयास है। मैंने अपनी सांसद निधि का अस्सी प्रतिशत टाँकों के निर्माण को दिया है। अपने पहले ही वर्ष में मैंने 2300 टाँके बनवाये हैं। मुझे नहीं लगता कि बड़े बाँध राजस्थान की पानी समस्या का कोई हल हैं। इतनी बिखरी हुई आबादी के लिये जल सरंक्षण के स्थानीय उपाय ही उपयुक्त रहेंगे।

एक टाँके की निर्माण लागत क्या है?

लगभग 25000/-

आप अपने इलाके की जल समस्या के लिये क्या समाधान प्रस्तावित करते हैं?

दीर्घकालीन हल तो जल संरक्षण ही है। हमें सिंचाई के बजाय पेय जल को भी महत्व देना होगा। अगर हमारी प्राथमिकता पेय जल होती है तो हम पेय जल के लिये स्वत: ही अधिक प्रयास करेंगे। लोग स्वास्थ्य विभाग से पानी आपूर्ति की अपेक्षा रखते हैं। हमें उसका भी ध्यान रखना होगा। नाशना से लिफ्ट कर बाढ़मेर के विभिन्न इलाकों में पाइप लाइन द्वारा पहुंचाने के लिये लगभग 1600 करोड़ रुपये आबंटित हो चुके हैं। इस पानी को स्वास्थ्य विभाग की पाइपलाइन से जोड़ दिया जायेगा, जिससे घरों में पानी मुहैया हो सकेगा।

सिंचाई के बजाय पेयजल पर महत्व देने से आपका क्या अभिप्राय है?

अगर आप किसी नहर को सिर्फ संचाई के लिये बनाते हैं तो वह आसपास के खेतों के किसानों को ही लाभ पहुँचायेगी। परंतु अगर आपकी प्राथमिकता पेयजल है तो यह कई घरों तक पहुँचेगा व इसके दूरगामी परिणाम होंगे। इससे पशुओं को भी जल उपलब्ध हो सकेगा। मरु अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर नहीं रह सकती। इसे मवेशी जानवरों द्वारा संचालित होना ही होगा।

बाढ़मेर में कृषि की क्या अवस्था है?

राजस्थान में इजराइल से आयातित कम पानी उपयोग करने वाली फसल उपजाने की चर्चा है। खेती बरसात पर निर्भर है। परंतु अगर आप यह सोचकर बाहर से फसल लाते हैं कि चूंकि यह फसल इजराइल में सफल रही इसलिये राजस्थान में भी अच्छी उपज देगी, तो आपका ख्याल गलत है। राजस्थान की मिट्टी इजराइल से अलग है। आयातित पौधों ने स्थानीय फसलों को नष्ट कर दिया है। वे स्थानीय फसलों को उपजने नहीं देते। आप किसी दूसरे का ज्ञान अपने क्षेत्र में लागू नहीं कर सकते। किसी समस्या का समाधान क्षेत्र विशेष की परिस्थितियाँ ही तय करेंगी। हमारे गाँवों में पर्याप्त विशेषज्ञता है। परंतु वातानुकूलित दफ्तरों के लोग इसे नहीं समझते।

इंदिरा गाँधी नहर का विस्तार हो रहा है। इस संदर्भ में क्या प्रगति है है?

यह एक दीर्घकालिक योजना है, परंतु इन दिनों इस पर काम रुका पड़ा है क्योंकि मरु राष्ट्रीय पार्क इसके बीच में स्थित है। इस पार्क से होकर नहर निर्माण नहीं हो सकता। मैं इस नहर के पक्ष में नहीं हूं। मनुष्य व मवेशी के लिये पेयजल मेरा प्रमुख सरोकार है। परंतु सरकार को बड़ी परियोजनायें पसंद आती हैं क्योंकि इसमें बहुत सारा पैसा जुड़ा रहता है जो ठेकेदारों को खुश रखता है। वे इन परियोजनाओं की पुस्तिकायें बनवाते हैं व उन्हें प्रसारित करते हैं। परंतु ये पुस्तिकायें पेयजल नहीं मुहैया करवा पाती हैं।

आप नदियों के जोड़े जाने से कहॉ तक सहमत हैं, जो कि देश की पानी संबंधी शायद सबसे बड़ी योजना है?

मैं पूरी तरह तो इसके पक्ष में नहीं हूं। परंतु किसी इलाके के पर्यावरण को प्रभावित किये बगैर, सभी तकनीकी पहलुओं को ध्यान में रखते हुये कुछ नदियों को जोड़ा जा सकता है। यह ध्यान रखे बगैर कई सारी समस्यायें पैदा हो सकती हैं। मसलन राजस्थान नहर अगर हमारे इलाके में नहीं आयी होती तो हमारे यहाँ कभी भी मलेरिया नहीं होता। नहर के आने से पहले हमारे यहाँ मच्छर व मलेरिया थे ही नहीं। अपने बचपन में मैंने कभी भी अपने गाँव में मच्छर नहीं देखे। आज लोग मलेरिया से मर रहे हैं।

परंतु किसी भी विकास परियोजना के सकारात्मक व नकारात्मक पहलू तो होंगे ही। मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि मलेरिया के डर से हमें पेयजल नहीं उपलब्ध कराना चाहिये। परंतु अगर राजस्थान नहर को पूरी तरह से पेयजल परियोजना में परिवर्तित कर दिया जाये व खुली नहर के बजाय पाइपलाइन हों,तो स्थिति काफी बेहतर हो सकती है। जल रिसाव,भ्रष्टाचार व बीमारी इन तीनों पर ही काबू हो सकेगा। पशु धन समृध्द हो सकेगा। जोड़े जाने से कहीं अधिक नदियों की सफाई आवश्यक है। हम अपनी नदियों की देखभाल नहीं कर रहे हैं। आप गंगा व यमुना को देखिये, इनका प्रदूषण स्तर डराता है। आप किसी नदी को पवित्र कैसे मान सकते हो जब आप खुद ही उस नदी को मैला करते हो।

आप सामाजिक जागृति की बात करते हैं। परंतु आप सांसद हैं और पानी तो छोड़, आपने अभी तक संसद में एक भी प्रश्न नहीं पूछा है।

मैं एक भी प्रश्न नहीं पूछ पाया क्योंकि मेरे प्रश्न अभी तक स्वीकृत नहीं हुये हैं। यह एक लॉटरी से तय होता है और मैं कभी भी लॉटरी में नहीं जीता हूं, भले वह असल जिंदगी हो या संसदीय प्रश्न। संसद में मेरी भागेदारी बहस के माध्यम से रही है। पहली बार चुने गये सभी सांसदों में से मुझे चर्चाओं में भाग लेने का सर्वाधिक समय मिला है, भले वह ग्लोबल वार्मिंग हो, रक्षा हो या नाभिकीय मसला। देखिये शायद इस बार मेरा प्रश्न भाग्यशाली रहे।

आप पहली बार चुने गये हैं। संसद से जुड़े अपने अनुभव बताइये। किन उम्मीदों के साथ आपने संसद के पवित्र गलियारों में कदम रखा था था? क्या वे पूरी हो पायीं?

आप संसद को एक क्लब की तरह लीजिये जिसकी सदस्यता पाँच साल में एक बार वह भी सिर्फ 545 सदस्यों को ही मिलती है। सदस्यता किसी कमेटी द्वारा नहीं बल्कि पूरे देश भर में निर्धारित होती है। इस सदस्यता को पाने के लिये बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। और जब आप सदस्य बनते हैं, आप पाते हैं कि ऐसे भी सदस्य हैं जिन्हें आप शाम की चाय पर घर नहीं बुला सकते। वे निहायत ही गैरभरोसेमंद हैं। कुछ संसद सदस्य अत्यंत मेधावी हैं, जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। परंतु कुछ निरे बेईमान हैं, जिनके साथ आप कभी भी जुड़ना नहीं चाहोगे।

क्या आपको कभी अफसोस होता है कि देश की सर्वोच्च संस्था में ऐसे असामाजिक तत्व भी हैं?

नहीं। अफसोस नहीं होता। आखिर यह हमारे समाज की सच्चाई है। उन्हीं को तो समाज ने चुनकर संसद में भेजा है। उन्होंने अपने आपको जबरन संसद पर थोड़े ही थोपा है। जनता ने उन्हें चुना है। आपको जनता की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को स्वीकारना ही चाहिये। लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति इतने विविध रूपों में व्यक्त हो सकती है, यह अनुभव खुद ही आपको बड़ा विनम्र बना देता है।
 

Comments

Submitted by Anonymous (not verified) on Sat, 03/24/2012 - 15:35

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बूँद बूँद से घड़ा भरता है और बारिश के पानी से धरती माता का पेट.ज़रूरत है आकाश पानी और पाताल पानी को जोड़ने के लिए एक रास्ते की ताकि अतिवृष्टि मे भी पानी बह के बर्बाद ना हो. वर्षा-जलसंधारण ज़रूरी भी है, और ज़िम्मेदारी भी है.पानी रोकने का सही स्थान धरती माँ की गोद नहीं बल्कि उसकी कोख है.www.varshajal.com

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