लिख रहे हैं लेखनी अकाल के कपाल पर

Submitted by admin on Thu, 08/20/2009 - 15:16
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लापोड़िया गांव, जयपुर से 80 किलोमीटर दूर है। ‘ग्राम विकास नवयुवक मंडल’ के लक्ष्मणसिंह और उनके साथियों ने चौका व्यवस्था को यही तैयार किया था। इसके बाद इन्होंने जयपुर से दिल्ली तक बहुत से सम्मान पाए। लेकिन दूसरा पहलू यह है कि इस इलाके में सैकड़ों गांवों के अनगिनत समूह आज यहां से बनाए रास्ते से गुजरकर सालभर का चारा-पानी बचाना चाहते हैं।

लापोड़िया में कुल 1144 हेक्टर की जमीन पर करीब 200 घरों के 2500 से ज्यादा लोग रहते हैं। हर घर के लिए 4 से 10 बीघा तक खेतीलायक जमीन है। खेती और पशुपालन ही यहां का मुख्य कामकाज है। लोपड़िया जैसे कई गांव सांभर (नमक क झील) के नीचे होने से खारे पानी से प्रभावित हैं। इसलिए पहले चारागाहों में चारे की पैदावार बहुत कम होती, लोग भी जमीन की देखभाल कम करते और उनकी आमदनी भी कम रहती। लोपड़िया वालों की तमन्ना थी कि यहां पानी रूके और चारे की पर्याप्त पैदावार हो सके। तब लक्ष्मणसिंह के साथ बुजुर्गों में रामकरण और युवाओं में रामजीलाल, रामचंद्र सैनी की ठोलियों ने जगह-जगह घूमकर पानी के बहाव के ढ़लान को जानने की कोशिश की। इन्होंने पाया कि पानी पूरे चारागाह में फैल नहीं पाने से बराबर नमी नहीं फैला पाता और हर तरफ चारा नहीं उगता। गांव ने एक नई तकनीक तैयार की, चर्चा के बाद जो नाम निकला वो ‘‘चौका व्यवस्था’’ कहलाया।

बरसात के बाद गांव का चारागाह हरा-भरा हो गया। 1990 से 94 के बीच सिर्फ 25 बीघा चारागाह में यह व्यवस्था लागू की गई। 2-3 सालों में लापोड़िया गांव का चारागाह पूरी तरह से विकसित हो गया। इसके असर से धीरे-धीरे दुधारू पशुओं की तादाद बढ़ने लगी और दूध के उत्पादन में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई। गांव में सुचारू रुप से चल रही दूध डेयरी इसका सबूत है। चारागाह में पानी रूकने के चलते गांव का भूजल स्तर बढ़ा। करीब 100 कुओं में इसके असर से साल भर पानी भरा रहने लगा। इसी पानी से तो अकाल के वक्त में लापोड़िया गांव के लोगों ने हरे चारे की खेती की। पीने के पानी क समस्या भी न के बराबर कर दी। अकाल के वक्त सरकारी टैंकरों की मदद न लेना इसका सबूत है। यहां बरसात के दिनों में दूब, धामण, करड़, मौथकिया और रेड़ सर्दियों में दूब, ऊंट कटेली, पसर कंटेली के अलावा गर्मियों में दूब, गुफनी, चाऊसी, पील फूली जैसी घास उगाई जाती है।

राजस्थान में गांवों के चारागाह पर सबका बराबर-बराबर हक होता है। हर गांव में कुल जमीन का 10 वां हिस्सा याने 100 से 1000 बीघा पशुओं की चराई के लिए रखा जाता है। राज्य भर में 1.194 मिलियन हेक्टर जमीन चारागाह की है, जिसका 40वां हिस्सा बंजर पड़ा है, जिसकी जलधारण क्षमता न के बराबर है, बरसात का सलाना औसत 200 से 700 मिलीमीटर है और 3 से 4 सालों में 1 बार अकाल जरूर पड़ता है। ऐसे इलाकों के गरीब रहवासी अपनी सलाना आमदनी का 20 वां हिस्सा चारागाहों से पाते हैं। इसलिए बदतर हालत वाले चारागाह अकाल के काल को और भयावह बना देते हैं। आजादी के 62 सालों में चारागाहों के लगातार घटते क्षेत्रफल, नाजायज कब्जे, चरवाहों के पलायन और सामुदायिक जमीन को लेकर रहवासियों के घटते लगाव से यह नौबत आई है।इस कामयाबी के किस्से सुन-सुनकर दूर-दूर के गांव वाले आते हैं। वह देखते और यह जानने की कोशिश करते हैं कि ऐसा किया क्या है जो खारी जमीन भी चारा उगल रही है। वह यह भी जानते हैं कि चारागाह की नमी बढ़ी है और पेड़-पौधे भी बहुत हैं। उन्हें बताया जाता कि ऐसा गांव के लोगों की सामूहिक मेहनत से किस प्रकार संभव हुआ है।

चौका याने आयताकार, जिसमें तीन तरफ से पाल होती है और चौथा तरफ (जमीन के ढ़ाल के ऊपर की तरफ) खुला रहता है। चौथे मुंह से अतिरिक्त पानी चौका में जाता है। इसे मजबूती से बनाते है जिससे यह 9 इंच पानी के भार को सहन कर सके। चौका के दोनों तरफ पाल की लंबाई वहां तक जाती है जहां तक चौका की मुख्य पाल पर 9 इंच की ढ़ाल बनी होती है। इस तरह पूरे चारागाह को कई चौकों में बांटते हैं। चारागाह में 9 इंच पानी फैलने के बाद जरूरत से ज्यादा पानी गांव के तालाब में लाते हैं। यह व्यवस्था की गई है कि सारे चौकों में 9 इंच पानी ही भरे ताकि घास नहीं गले। यह भी ध्यान रखा गया कि दो चौकों के बीच की दूरी 3 मीटर हो जिससे पानी का दबाव पाल पर नहीं पड़े और चौकों में पानी ठहरने में किसी किस्म की समस्या भी न रहे। चौका बनाने के पहले सही माडल का चयन जमीन की स्थिति और बरसात की मात्रा, पानी के रास्ते की उपलब्धता और उसकी दिशा को ध्यान में रखकर किया जाता है।

चौका तकनीक में बरसात का पानी जहां गिरता है वहीं इकट्ठा होता है। इसमें लंबे ढ़लान को छोटे-छोटे ढ़लानों में बांटने से पानी बहने की रफ़्तार इतनी कम हो जाती है कि जमीन का कटाव नहीं होता। इससे पानी का बहाव रूककर जमीन में ही भरता जाता है। साथ ही घास, झाड़िया और पेड़-पौधों को फिर से उगाने में मदद मिलती है। सूखा पड़ने पर भी पानी की उपलब्धता बढ़ती है। इसकी खासियत यह है कि चौका से चौका तक पशु बगैर किसी रोकटोक के चराई कर सकते हैं लेकिन इसके बाद भी घास की अच्छी पैदावार बनी रहती है। यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें बहुत ज्यादा बरसात का पानी इकट्ठा किया जा सकता है। एक चौका अगर 75 गुणा 50 मीटर का बनाया जाए तो उसमें 300.45 घन मीटर पानी इकट्ठा होता है। बरसात के अधिक पानी से तालाब को भी बचाया जा सकता है।

आज विभिन्न संस्थाओं के कार्यकर्ताओं ने गांव वालों के साथ मिलकर पहले चारागाह की समस्या और और गांव की बुनियादी जरूरतों को समझते हैं, उसके बाद ही काम की रणनीति बनाते हैं। पहले छोटे-छोटे समूहों में, उसके बाद गांव के सभी लोगों के साथ चर्चा के दौर चलते हैं। पूरे गांव का फैसला आने पर विकास और प्रबंधन तय किया जाता है। इस तरह लापोड़िया का चौका आंदोलन यह बताता है कि सूखा की बाढ़ से घिरा समाज किस तरह तैरना सीख रहा है।
 

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शिरीष खरेशिरीष खरेमासक्मयुनिकेशन में डिग्री लेने के बाद चार साल डाक्यूमेंट्री फिल्म आरगेनाइजेशन में शोध और लेखन.उसके बाद दो साल 'नर्मदा बचाओ आन्दोलन, बडवानी' से जुड़े रहे. सामाजिक मुद्दों को सीखने और जीने का सिलसिला जारी है.

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