सबको रोजी-रोटी दे सकती है नरेगा

Submitted by admin on Wed, 08/26/2009 - 20:07
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राजेन्द्र सिंह / deshbandhu.co.in
हमारे नए बजट में 39,000 करोड रुपए का नरेगा योजना पर सालाना खर्च करना निश्चित हुआ है। सवा करोड बेरोजगारों को रोजगार देना है। इस पूरी धनराशि को हम केवल जल संरक्षण कार्यों हेतु खर्च करे। निजी-साझी-सरकारी भूमि के मालिकाना विचार को भूल कर वर्षा जल सहेज कर भूमि में नमी बढ़ाने या बाढ़ के जल को उपर पहाड पर ही रोक कर कार्य किया जाए। यह कार्य राज-समाज मिलकर, जल से जुडक़र ही करें।

नरेगा का पैसा जल संरक्षण निर्माण पर खर्च किया जाए। समाज इसमें नदी उद्गम से जुडक़र समुद्र तक जुडा रहे। नरेगा योजना ही नीर-नारी और नदी को जोड़ सकती है। इसी से एक तरफ बेरोजगारी दूर होगी, भूमि में नमी बढ़ेगी, दूसरी तरफ जल, अन्नपूर्ति सुनिश्चित होकर हमारे समाज की लाचारी-बीमारी और बेकारी मिटाएगी। इसलिए नरेगा को नीर और नमी की योजना मानकर भी चलाना चाहिए।

अब धीरे-धीरे पानी का झगड़ा मिटाने हेतु पुलिस कारगर नहीं हुई तो सेना बुलानी पड़ती है। जल विवादों की जड़ें फ़ैलती जा रही हैं। गांवों और शहरों की खेती और पेयजल प्राथमिकता का विवाद है।

सामुदायिक विकेन्द्रित जल प्रबंधन ही जलसंकट का समाधान है, बाढ़-सुखाड क़ा यही एक इलाज है। आज भाखड़ा नांगल बांध में पानी नहीं रहा। बम्बई के लिए पेयजल पूर्ति हेतु जल रासनिंग समाधान मान लिया। कर्नाटक जल संकट तो सुखाड क़े विस्तार में प्रथम स्थान पर आ गया। बिहार की बाढ़ का समय और क्षेत्रफल का विस्तार चार गुणा बढ़ गया है। महाराष्ट्र सबसे ज्यादा बांधों वाला प्रदेश अपने गांवों को टैंकर से पानी पिला रहा है और पानी की कमी के कारण सूखे आंसुओं से रो रहा है। यही हालात तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश के बुन्देलखंड और मालवा में है। यहां के लोग भी अब बेपानी आखों और दिल से रोने लगे है। हमारी परम्परागत जल संरचनाओं ने भारत भूजल में भंडार भर के रखे थे। आज परम्परागत जल संरचनाएं नष्ट हो गई तो भूजल के भण्डार भी खाली हो गए हैं। पुनर्भरण रूक गया है, और भूजल शोषण बेतहाशा बढ़ रहा है। आज दो तिहाई भूजल भण्डार खाली है, न्यायालय बार-बार कह रहा है, जल संरचनाओं को आजादी के समय जैसी थी, वैसी ही बनाए रखें। आजादी के समय भूजल भण्डार भरे थे। हर गांव में तालाब थे। ये धरती का लेन-देन बराबर रखते थे।

आज भूजल शोषण ने हमें बेपानी बना दिया। भारत को पानीदार बनाना अब जरूरी है। यह सरकार की प्राथमिकता बननी चाहिए। राज-समाज जल को समझे। वर्षा जल को सहेजकर अनुशासित उपयोग के कायदे-कानून बनाए। जल संरचनाओं नदी, ताल, पाल, झाल, चाल, कुंए, बावड़ी का अतिक्रमण और लूट रोकें। जल प्रदूशण-भूजल शोषण बंद कराएं। जल ग्रहण विकास, जल-जंगल-जमीन को संरक्षण प्रदान करें।

नदियों से समाज को जोडने का बडा काम सम्पूर्ण भारत में सभी नदियों के जल ग्रहण क्षेत्रों में रोजी-रोटी-पानी देने की योजना चलाकर करना चाहिए। यह कार्य अब नरेगा योजना से भी किया जा सकता है। नरेगा में सामुदायिक विकेन्द्रित जल प्रबंधन में रोजगार मिलेगा, सबको पानी मिलेगा, रोजी-रोटी पानी देने वाले विचार और उद्देश्य पूर्ति हेतु ही नरेगा बनी थी।

भारत सरकार और राज्य सरकारों को दूरदृष्टि से काम करने की जरूरत है। नदी संरक्षण हेतु नीति बने। हमारे शिक्षण पाठ्यक्रम में नदियों के मरने-सूखने से हमारी जीवन और खासकर सेहत पर पडने वाले बुरे असर बच्चों को ही समझाए जाएं। राजस्थान के समाज ने सात नदियां जीवित कीं, वैसे देश की सभी नदी सदानीरा बनाई जा सकती है। लेकिन एक अच्छी नदी नीति और कानून की जरूरत हैं। इस कार्य हेतु स्वैच्छिक संस्थाओं, राज्य सरकारों तथा भारत सरकार और समाज की भूमिका निर्धारित होवे। विद्यालय से विश्वविद्यालय शिक्षा में इसे शामिल किया जाना जरूरी बने। मीडिया की बात सामने आते ही लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी जी याद आते है। उन्होंने समाज को खडा कर दिया और आजादी दिला दी। आज जल आपूर्ति गुलामी से बडा संकट है। इससे मुक्ति दिलाने हेतु पानी की समझ विकसित कराने में मीडिया और स्वैच्छिक संगठनों की भूमिका बनती है।

हमारे संविधान में पानी प्रकृति प्रदत्त जीवन का मौलिक हक है। इस हेतु सबको पानी उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। जो सबको शुद्ध पानी पिलाकर जीवित रखेगा उसे ही सरकार बनाने और चलाने का हक है। इस हेतु स्वैच्छिक संस्थाओं और मीडिया की जिम्मेदारी सामुदायिक घटको को प्रेरित करके पानी प्रबंधन में जन-जन को लगाना है। समाज जल संरचना का निर्माण ही नहीं, रख-रखाव भी वही करें।

उच्चतम् न्यायालय ने वर्ष 2001 में सरकार से कहा था कि सभी जल संरचनाओं के कब्जे हटाकर उन्हें आजादी के समय जैसी हालत में लाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आज भी दिल्ली शहर के पटपडग़ंज के तालाब बचाने हेतु लोग लड रहे है। लेकिन सरकार बेफिक्र है। एक तरफ सरकार की बयानबाजी दिल्ली के सभी तालाब कब्जा मुक्त करा दिए है। दूसरी तरफ तालाबों को अभी भी सीमेन्ट, कंकरीट के जंगल में तब्दील किया जा रहा है।

आज ''जुडो जन-जल जोडो'' आंदोलन देश व्यापी बने। जल को समझने, सहेजने वाला संगठन बने। यही संगठन जल की लूट और जल वाष्पीकरण के विरूध्द सत्याग्रह करके बाढ़-सुखाड मुक्ति हेतु नीति-नियम बनवाए। पूरे देश में सामुदायिक विकेन्द्रित जल प्रबंधन कार्य शुरू करके पूरी धरती को नम, जीवाश्मी और हरी-भरी बनाकर धरती की गर्मी और मौसम का मिजाज स्थानीय स्तर पर ही ठीक किया जा सकता है। उसी रास्ते से गरीब की गरीबी, लाचारी, बेकारी और बीमारी रोकी जा सकती है। सभी के लिए शुद्ध पेयजल एवम् खाद्य पूर्ति सुनिश्चित होगी।

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