सांभर में पसेरी भर अन्याय

Submitted by admin on Thu, 09/10/2009 - 09:55
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गांधी मार्ग

कोई सात महीने पहले सांभर झील के पास बसे उलाना, गुड़ा और बंबली गांव के सैकडों लोगों ने जमीन की खुदाई करने वाली मशीनों को गांव में घुसने से रोक दिया था। ये लोग गावों की सार्वजनिक जमीन के अधिग्रहण का विरोध कर रहे थे। जैसी कि पहले से आशंका थी, ग्रामीणों के इस विरोध का सामना करने के लिए सरकारी मशीनरी भी तुरंत हरकत में आ गई। पुलिस ने ग्रामीणों को ऐसे विरोध की भारी कीमत चुकाने की धमकी भी दे डाली थी। मगर लोग अपनी बात पर डटे रहे। ठेकेदार को अपनी मशीनें क्षेत्र से हटानी पड़ी। यह खबर राष्ट्रीय तो क्या जयपुर, अजमेर आदि के अखबारों, टी. वी. में भी कोई खास सुर्खियां नहीं बटोर पाई। लेकिन यह यहां के नमक का अवैध कारोबार करने वालों के खिलाफ पहला अहिंसक आंदोलन था।

नमक उत्पादन के लिए प्रसिद्व सांभर झील जयपुर से 60 किमी दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। झील का 5700 वर्ग किमी का आगौर नागौर, जयपुर, अजमेर और सीकर जिले तक फैला है। यह हमारे देश में खारे पानी की सबसे बड़ी झील है। यहां पिछले 1500 सालों से नमक का उत्पादन किया जा रहा है। पहले यह पूरा कारोबार यहीं कें लोगों के हाथ में था। बाद में राजपूतों से होते हुए मुगलों और अंग्रेजों के कब्जे में आ गया। फिलहाल यहां नमक उत्पादन का अधिकार हिंदुस्तान साल्ट्स लिमिटेड और राजस्थान सरकार के संयुक्त उपक्रम सांभर साल्ट्स लिमिटेड के पास है।

सांभर झील से हर साल होने वाले करीब 2 लाख 10 हजार टन नमक के उत्पादन के कारण राजस्थान देश में इसका सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाले तीन राज्यों में शामिल है। पूरी दुनिया में कुछ खास किस्म की झीलों, तालाबों और दलदलों के संरक्षण के लिए आवाज उठा रहे रामसर नामक प्रयास ने भी इस सांभर क्षेत्र को विशेष दर्जा दिया है। मगर इससे इस इलाके में रहने वाले लोगों की जिंदगी पर कोई खास असर नहीं पड़ा। यहां नमक एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो नमक की क्यारियों में काम करने वालों को एक ओर कुछ रोजगार तो देती है पर दूसरी ओर घातक बीमारियां और असमय मौत भी।

यहां के लोगों की इस खराब हालत के पीछे एक सीधा-सा गणित है। क्षेत्र में नमक उत्पादन की लागत प्रति किलो करीब 40 पैसे आती है। लेकिन खुदरा बाजार में पहुंचते ही यह 10 रूपये हो जाती है। प्रति किलो पर इस तगड़े मुनाफे की चाह के कारण क्षेत्र में नमक की कई अवैध क्यारियां और नमक बनाने वाली कई कंपनियां पसर चुकी हैं। पुलिस, प्रशासन और राजनीति कभी भी इस अवैध कारोबार से टकराने नहीं आते। ये सब आपस में मिले हुए हैं और पैसा बहुत दूर तक जाता है। एक सेवानिवृत बताते हैं, “हमें पता है कि यहां क्या हो रहा है लेकिन हम असहाय हैं।“

नमक क्यारियों में लोगों को नंगे पैर ही नौ-दस घंटे काम करना पड़ता है। बिना किन्हीं सुरक्षात्मक उपायों के। इसका परिणाम इन लोगों की सेहत पर साफ-साफ दिखाई देता है। चेहरे की त्वचा पर सिकुड़न और झुर्रियां, पैरों में पड़े चकत्तों ने एक पूरी पीढ़ी को उम्र के पहले ही बूढ़ा बना दिया है।

इनकी औसत आयु सिर्फ 45 साल है और बिना किन्हीं रोजगार के, फायदों और कानूनी सुरक्षा के क्यारियों में काम करने वाले ये लोग पूरी तरह से अपने मालिकों की दया परी निर्भर रहते हैं। कामगार पुरूष को यहां प्रतिदिन के हिसाब से 125 रूपए तो महिला को 100 रूपए मजदूरी भी हर दिन मिल ही जाए, ये तय नहीं होता। क्यारी मालिक ज्यादातर दिल्ली और हरियाणा के हैं। पिछलें कुछ सालों से नमक उत्पादन के तरीकों में भी भारी बदलाव आए हैं। परंपरागत रूप से पहले नमक उत्पादन मानसून की बरसात पर निर्भर करता था। सांभर झील को मेधा, रूपनगढ़, रवारियन और खाण्डेल इन चार मानसूनी नदियों और इनके अलावा कई छोटी नदियों से पानी मिलता है। झील तलछट से मिलकर यह मीठा पानी खारा हो जाता है। करीब 50 दिन में पानी तो उड़ जाता है और क्यारियों में नमक के ढेले बचे रह जाते हैं।

आज जिस तरीके से नमक- उत्पादन किया जाता है, उनमें सिर्फ 15 दिन का समय लगता है। नमक-उत्पादन इकाइयां अब खारे पानी की जरूरत बरसात के पानी के बदले बोरवेल से पूरी करती हैं। भूजल के अत्यधिक दोहन का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ है कि इसका स्तर 40 फीट और नीचे चला गया है। नमक उत्पादन इकाईयां पानी की कमी से बचने के लिए बाहर से पानी के टैंकर बुलवाती हैं। इससे आसपास के क्षेत्रों में भी भूजल-स्तर में और गिरावट आ रही है। इस कारण अब झील के पूर्व में स्थित कई गांवों में पेयजल का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। यहां से बहुत से लोग पलायन भी कर चुके हैं। झील के सैटेलाइट चित्र बताते हैं कि झील की तली और संरक्षित क्षेत्र में नमक की असंख्य क्यारियां बनाई गई हैं।

आधिकारिक तौर पर यह आंकड़ा 400 से ज्यादा नहीं होना चाहिए। क्षेत्र का अध्ययन बताता है कि करीब 74 फीसदी अवैध क्यारियां तो झील के केंद्र से एक किलोमीटर के दायरे में ही बनी हैं। चूंकि झील में अब और क्यारियां नहीं बनाई जा सकती हैं, इसलिए आसपास के गांवों की जमीन पर इसके लिए कब्जा किया जाने लगा है। गांवों की सार्वजनिक जमीन और चारागाहों की भूमि अवैध रूप से 10 से 20 साल की लीज और नाममात्र की कीमत 20 हजार प्रति बीघा के हिसाब से ली जा रही है। जमीन-हस्तांतरण इतनी होशियारी से किया जा रहा है कि इसमें ग्राम सभा और ग्राम पंचायत की अनुमति को गैरजरूरी बना दिया गया है। उलाना, गुड़ा और बंवली के ग्रामीण आसपास के इलाकों की कई बीघा अच्छी जमीन को नमक की क्यारियों में बदलते जाते देख चुके थे और इसी वजह से लोग अपनी सार्वजनिक जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ खड़े हो गए।

सांभर झील धीरे-धीरे मर रही है। कहा जाता कै कि यह 230 किमी क्षेत्र के लंबे-चौड़े क्षेत्र में फैली हुई है। लेकिन पिछले सात-आठ साल से इस क्षेत्र में सूखा पड़ा है। इस समय झील के सात वर्ग किमी क्षेत्र में ही घुटनों तक पानी है। झील क्षेत्र में चल रही अवैध गतिविधियों का असर यहां आने वाले अप्रवासी पक्षियों का आना बंद है।

झील के आसपास के लोगों को अब धीरे-धीरे यह एहसास हो रहा है कि यदि उन्होंने सामूहिक प्रतिरोध का सहारा नहीं लिया तो गांव के गांव अपनी खेती, अपना मीठा पानी, अपने गोचर और पशु खो बैठेंगे और यह हरा भरा इलाका बस अवैध नमक की सफेद पट्टी भर होकर रह जाएगा।

लेखक द्वारा सांभर झील की ली गई वीडियो देखें

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अमितांग्षु आचार्यअमितांग्षु आचार्यपेशे से डेवलपमेंटल एनालिस्ट, अमितांग्षु ने टाटा इंस्टीट्यूट फॉर सोशल साइंसेज से एमए किया और उसके बाद से ही जल प्रबंधन के मुद्दे से सक्रिय रूप से जुड़ गए।

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