हवा-पानी की आजादी

Submitted by admin on Wed, 09/17/2008 - 14:50

हवा-पानी की आजादीहवा-पानी की आजादीआजादी की 62वीं वर्षगांठ, हर्षोल्लास के माहौल में भी मन पूरी तरह खुशी का आनन्द क्यों महसूस नहीं कर रहा है, एक खिन्नता है, लगता है जैसे कुछ अधूरा है। कहने को हम आजाद हो गए हैं, जरा खुद से पूछिए क्या आपका मन इस बात की गवाही देता है नहीं, क्यों? आजाद देश उसे कहते हैं जहां आप खुली साफ हवा में अपनी मर्जी से सांस ले सकते हैं, कुदरत के दिए हुए हर तोहफे का अपनी हद में रहकर इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन यहां तो कहानी ही उलट है। आम आदमी के लिए न पीने का पानी है न खुली साफ हवा, फिर भी हम आजाद हैं?

आज हर ओर पानी का संकट गहराया है, कहीं बाढ़ की समस्या है तो कहीं सुखाड़ की, कहीं पानी में आर्सेनिक है तो कहीं पानी खारा हो रहा है, बड़े-बांध बन रहे हैं तो कहीं नदियां मर रही हैं। ऐसे माहौल में आजादी का जश्न कोई मायने नहीं रखता। जल ही जीवन है, पूरा पारिस्थिकी तंत्र इसी पर टिका है। जल संसाधनों की कमी को लेकर न केवल आम आदमी बल्कि राज्यों और देशों में भी तनाव बढ़ रहा है। पानी की कमी से विश्व की कुल जनसंख्या की एक-तिहाई प्रभावित है। पृथ्वी के सभी जीवों में पानी अनिवार्य रूप से विद्यमान है। आदमी में 60 फीसदी, मछली में लगभग 80 फीसदी, पौधों में 80-90 फीसदी पानी ही है। जीवित सेल्स में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के लिए पानी ही जरूरी तत्व हैं।

जल, वायु और मृदा प्रदूषणजल, वायु और मृदा प्रदूषण

हमारा भोजन, हमारा स्वास्थ्य, हमारी आजीविका सभी कुछ जैव विविधता पर निर्भर करता है। झीलों और नदियों के आस-पास ही हमारी सभ्यताएं विकसित हुई हैं। खेती से मिलने वाले खाद्य संसाधन, मछली, चिकित्सीय जड़ी-बूटियों की विविधता, पानी पर आधारित उद्योग या पर्यटन संबंधी सभी काम पानी के किनारे ही विकसित हुए हैं। प्रकृति और मानव का अटूट नाता है। प्रकृति ही जल संसाधनों के शुद्धिकरण का काम करती है, जिससे हमें बेहतर मात्रा में साफ पानी प्राप्त होता है।

कुछ पारिस्थितिकी-तंत्र जैसे आर्द्र-भूमि और वनादि में पानी को संरक्षित करने की पर्याप्त क्षमता होती है। यहीं से हमें पानी उपलब्ध होता है और पुन: इकट्ठा हो जाता है। समझने के लिए, सुंदरबन के जंगल इतना पानी बचाते हैं कि जितना टिहरी बांध में नहीं इकट्ठा हो पाता। तेज बहाव के समय यही प्रकृति बहाव को कम भी करती है तो दूसरी ओर गैर-वर्षा ऋतु में यह हमें पानी भी देती है। इतना ही नहीं, अगर मिट्टी में दूषित जल मिल जाता है तो यह जल का शुद्धिकरण भी करती है। इसलिए आर्द्र-भूमि और वन, जंगल आदि सभी जीवों के लिए अनिवार्य हैं।

धरती की सतह पर 70 फीसदी पानी है जिसमें से 97 फीसदी पानी समुद्रों में हैं। इसलिए खारा होने के कारण पीने लायक नहीं है। शेष 3 फीसदी पानी का 0.3 फीसदी ही नदियों में और झीलों में है, शेष बर्फ है।पानी अक्षय स्रोत है जो हमें निरंतर सौर-उर्जा चक्र से प्राप्त होता है। यदि इस पानी को समय और स्थान के अनुसार वितरित कर प्रयोग किया जाए तो ये संसाधन सबके लिए पर्याप्त होंगें। सरसरी तौर पर मानवीय उपभोग के लिए 15000 लीटर प्रति व्यक्ति पानी उपलब्ध है। हालांकि समान रूप से वितरित न होने के कारण इतना पानी मिलता नहीं है।

पारम्परिक रूप से, ताजे पानी को प्रयोग करने वाले तीन मुख्य क्षेत्र हैं। घरेलू क्षेत्र में घरों, नगरपालिका, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों और लोकसेवाओं आदि में प्रयोग होने वाला जल है। औद्योगिक क्षेत्र में उद्योगों के लिए पानी का प्रयोग किया जाता है, इसमें बड़ा हिस्सा तो विद्युत प्लांट को ठंडा करने में इस्तेमाल होता है। कृषि क्षेत्र में सिंचाई और पशुधन के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है।
 

लेकिन यहां 'उपलब्ध जल', 'निकाला गया जल' और 'कन्ज्यूम्ड वाटर' में अन्तर भी समझना जरूरी है। 'उपलब्ध जल' अक्षय संसाधनों की वह मात्रा है जो मानवीय इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है। निकाला गया जल वह जल है जो नदी-नहरों से परिवर्तित किया जाता है और भूमिगत सतह से नलकूपों आदि के माध्यम से मानवीय प्रयोग के लिए निकाला जाता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि इस पानी का उपभोग कर लिया जाए।
निकाले गए पानी का कुछ हिस्सा इस्तेमाल करने के बाद लौटा दिया जाता है और पुन: इस्तेमाल किया जाता है या फिर पर्यावरण में संरक्षित हो जाता है। लेकिन जितने पानी का पुन:प्रयोग नहीं किया जा सकता या फिर प्रकृति में छोड़ दिया जाता है उसे 'कन्ज्यूम्ड वाटर' कहा जाता है, इसे वाष्पीकृत जल अथवा उत्पादों और जीवों में उपस्थित जल भी कहा जाता है, चूंकि यह पानी स्थायी रूप से दूसरों के लिए अनुपलब्ध
ही होता है।

 

        क्षेत्र

  निकाला गया जल

कन्ज्यूम(उपभोग) जल

कृषि

     66 फीसदी

  93 फीसदी

उद्योग

     20 फीसदी

   4 फीसदी

घरेलू प्रयोग

     10 फीसदी

   3 फीसदी

जलाशयों से वाष्पीकरण

     4 फीसदी

 

 


हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिति इतनी भयानक नहीं है जितना कि असमान वितरण से हो गई है। कुछ देश पानी की कमी को झेल रहे हैं तो कुछ बाढ़ में डूब रहे हैं।

स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर अपनी आजादी को सही मायने में कायम रखने के लिए हमें आम-आदमी तक साफ पीने का पानी मुहैया कराना होगा। इसके लिए हमें संकल्प लेना होगा। जल संसाधनों पर गहराते संकट को खत्म करने के लिए अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन करना होगा। इसके लिए सभी लोगों को बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरूष, किसान, उद्यमियों सभी को पहल करनी है। पानी को बचाने की आदत को व्यवहार में ढालना होगा। खेती में प्रदूषकों की रोकथाम से जल संसाधनों के संकट और पारिस्थिकी तंत्र में बदलाव के संकट को कम किया जा सकता है। सामूहिक प्रयास जरूरी है। जल संसाधनों का प्रबन्धन और इस्तेमाल हाथ में लिया जा सकता है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को नियमित करके समस्या को काफी हद तक सुलझाया जा सकता है। उपलब्ध जल संसाधनों तक उपभोग को सीमित करके, संसाधन पर दवाब कम किया जा सकता है।

जल संरक्षण की पारम्परिक तकनीकों को पुनर्जीवित कर, वर्षा-जल का संचयन कर सकते हैं। जल संरक्षण, शुद्विकरण और तेज बहाव को रोकने के लिए अधिक से अधिक पौधारोपण करना चाहिए। पारिस्थिकी तंत्र का संरक्षण नैतिक, सामाजिक वा आर्थिक दृष्टि से भी अनिवार्य है। यूरोपियन यूनियन के विशेषज्ञों का मानना है कि पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा प्रदान की गई वस्तुओं और सेवाओं का वित्तिय मूल्य 26,000 बिलियन यूरो वार्षिक है। यह प्रतिवर्ष मानवीय उत्पादों के मूल्य का लगभग दोगुना है। पर्यावरण के अनुकूल जल प्रबन्धन के लिए आपसी सहयोग-संगठन बहुत जरूरी है। इसी सहयोग में छिपी है हमारी आजादी।

-मीनाक्षी अरोरा

 

 

 

 

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