‘नदियों ने मनुष्य की चेतना और सभ्यता को इस मुकाम तक पहुँचाया’

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वेब/संगठन

(सुप्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब से प्रेम कुमार के साक्षात्कार का यह अंश हम ‘नया ज्ञानोदय’ के मार्च 2004 के अंक से साभार प्रकाशित कर रहे हैं। -सम्पादक)
प्रेम कुमार:- समुद्र तटों पर सभ्यता के विकास को आप किस दृष्टि से देखते हैं?

इरफान हबीब:- समुद्र की हमारे यहाँ इस लिहाज से खास अब कोई कीमत नहीं है। शुरू में नदियों की करीबी या दूरी से संस्कृति पर फर्क पड़ सकता था, पर अब संचार के इतने ज्यादा माध्यम हो गये हैं कि यह कहना उचित नहीं होगा। आजकल संस्कृति विचार के प्रसार-प्रचार के कारण नदी का वह पहले वाला ‘रोल’ भी नहीं रहा। जब नदियों का रोल था तब भी यह जरूर था कि नदी किस क्षेत्र में है, कैसी है, इसका बड़ा फर्क था। मसलन आप यदि रेगिस्तानी इलाके की बात करें तो वहाँ उनकी संस्कृति में नदी का वह महत्व नहीं होगा। सऊदी अरब में कोई नदी नहीं है। वहाँ बारिश के बाद जो बाढ़ें आ जाती हैं, उन्हें वादी कहा जाता है। वह साल भर नदी नहीं है, सैलाब से हैं बस। ईराक में देखें ! इराक जहाँ पुरानी संस्कृति है, वहाँ दजला, फरात की बड़ी जगह है। उन्होंने कुएँ, नहरें तरह-तरह के माध्यम बनाये खेती के। हॉलैण्ड, केरल में जैसे हुआ, दलदलों को ‘ड्रेन’ किया। तीन-चार हजार साल पहले जहाँ दलदल था, वहाँ अब खेती होने लगी। अफगानिस्तान में पहाड़ों पर बर्फ पड़ती है, वहाँ पहाड़ों से निकलने वाली साल भर की नदियाँ बहती हैं। उनके पानी से खेती होती है। वहाँ नदियों की अहमियत का अंदाज इससे लगाइये कि वहाँ इलाकों, क्षेत्रों के पुराने जमाने में नाम नदियों पर हैं। ये नाम संस्कृत से मिलते-जुलते हैं। वहाँ एक नदी है- हैलमैन। इस नाम को अवेस्ता के ‘हेतमन्द’, संस्कृत के ‘सेतबंध’ से मिलाकर देखिये। वहाँ पूरे एक क्षेत्र का नाम था इस नदी पर, जिसे अब ‘सीस्तान’ कहते हैं। कंधार का क्षेत्र था जैसे। वहाँ की ‘हरफवती’ संस्कृत की ‘सरस्वती’ ही है, जो फारसी में ‘हरखवती’ हो जाती है। उस पर आधारित एरिया का नाम आजकल ‘अरगन्दाब’ हुआ। इसी तरह एक और नदी है- ‘हरोया’। आजकल यह ‘हरीरूद’ कहलाती है। संस्कृत में शब्द है ‘सरयू’ उसे देखिये। यहाँ एक ऐतिहासिक शहर है ‘हिरात’ जिसका नाम ‘हरयू’ से निकला। पुराने जमाने में पूरे क्षेत्र को हरयू कहते थे। आजकल वहाँ एक जिला है हरयू। अब ‘हरयू’ और ‘सरयू’ को एक साथ रखकर देखिये। यहाँ इसलिये नदियों की अहमियत बहुत बढ़ जाती है। पुराने जमाने में जैसा ‘ऋग्वेद’ में आप देखते हैं, अफगानिस्तान के लोग भी गल्लाबानी करते थे, खेती करते थे। उन्होंने खेती के कारण ही क्षेत्रों, इलाकों के नाम नदियों पर रखे।

प्रेम कुमार:- खेती के कारण या सभ्य हो जाने के कारण ?

इरफान हबीब:- ‘ऋग्वेद’ में आर्य हैं तब देखिये नगर शब्द नहीं है। शहर का नाम नहीं है। हरुप्या या हरम्पा को भी बहुत से संस्कृत के लोग नदी का नाम बताते हैं। पर वहाँ नदियों के बहुत नाम हैं। दसवें मंडल में जहाँ सिंधु, गंगा, जमुना आदि व पंजाब और अफगानिस्तान की नदियों के नाम आते हैं, वह भाग तो नदीसूक्त के नाम से मशहूर है। ‘ऋग्वेद’ में इलाकों के नाम कम, पर नदियों के नाम अधिक हैं। उनके नाम हैं जिन्हें वे जन या ‘ट्राइब’ कहते हैं, पर सीमा क्षेत्र का नाम नहीं है, इसके सिवाय ‘सप्त सिंधु’ के। वह भी नदियों के नाम पर है यही अवेस्ता में ‘हफ्त हिन्द’ है। इसका यह संकेत है कि तब दोनों संस्कृतियाँ थीं, साथ रहना भी था और उनमें सांस्कृतिक-वैचारिक आदान-प्रदान भी था।

आप इस तरह भी देखिए कि जब ‘संस्कृति’ ज्यादा प्रगति करती है, तो नदियों में दिलचस्पी कम हो जाती है। अफगानिस्तान, ईरान तक में शहरों से पहले नदियों से, क्षेत्रों, इलाकों की पहचान थी, उन पर आधारित नाम थे उनके। जब जनजातियाँ बनीं तो उनके आधार पर नाम पड़े- कुरु, पांचाल, मगध, कौशल आदि। फिर शहरों, राज्यों के नाम पड़े आगे।

प्रेम कुमार:- पहले और आज के नगरों के नदी तट पर बसे होने में आप कोई अंतर देखते हैं ?

इरफान हबीब:- पहले खेती नदियों के पास होती थी। बाद में नदियों से खेती की दूरी बढ़ी। सबसे पहले जमीन से पानी निकालने के लिये पुर-चरस का प्रयोग हुआ। पुर-चरस जैसे तरीकों का संकेत ऋग्वेद में भी है। इस तरह नदी से सीधे जुड़ाव में वहाँ से अंतर आया। आगे खेती वहाँ भी होनी लगी, जहाँ जमीन के नीचे से निकले पानी पर ही निर्भर रहना होता था। 1000 बी.सी. में लोहा आ गया और जंगल तेजी से कटने लगे। जंगल ऐसी जगह थे, जहाँ बारिश होती थी खूब। जंगल कटे तो वहाँ खेती का काम बारिश से होने लगा। अब नदी से दूरी और बढ़ी। उसके बाद और तरीके अपनाये जाने लगे। ‘गंगा वैली’ में ही देखें तो पहले नदी से, बारिश से फिर वरस, रहट आदि से खेती को पानी मिलता रहा और इस तरह नदी से मुक्ति मिलती गयी।

प्रेम कुमार:- कृषि का नदी से वास्ता न रहने से क्या संस्कृति से भी वास्ता नहीं रहता ?

इरफान हबीब:- मैं समझता हूँ कि नदी की अहमियत सांस्कृतिक से अधिक आर्थिक आधार पर दिखती है। आप देखिये ऋग्वेद में गंगा का दो जगह जिक्र है, जबकि सरस्वती, सिंधु आदि का जिक्र भी अधिक है और तारीफ भी ज्यादा है। सरस्वती को देवी के नाम पर होने के कारण अधिक आदर मिला हो सकता है। वहाँ गंगा का जिक्र उतने आदर के साथ नहीं है। बड़ी नदी को गंगा नाम दिये जाने की भी ‘टेंडेंसी’ रही है। बौद्धों के यहाँ सरयू को भी गंगा कहा गया। दक्कन में गोदावरी को गंगा कहा जाने लगा। सिंधु और सरस्वती नाम एक से अधिक नदियों के हैं। हरियाणा में एक नदी है, जो सतलज में मिलती है आगे, उसे सरस्वती कहा जाता रहा। सिरसा होली सरस्वती के अंत पर होने के कारण यह नाम प्राप्त कर गया। उसके नाम में ‘सरस्वती’ की भूमिका है। इसका यही अर्थ हुआ कि नदियों के नाम हस्तांतरित होते हैं। एक बड़ी नदी को देख लिया तो फिर प्रवासी, स्थानांतरित लोग जहाँ पहुँचे या रहे, वहाँ बड़ी नदी को वह नाम दे दिया।

गंगा को बाद में इतनी महत्ता या अहमियत क्यों मिली, यह सोचने की बात है। मेरा ख्याल है कि व्यापार के लिये तब गंगा एक बड़ा माध्यम थी। साथ ही खेतों की दृष्टि से भी यह नदी महत्वपूर्ण थी। तब नदियों से सफर आसान भी था और सस्ता भी। पूरे गंगा के बेसिन पर मगध साम्राज्य स्थापित इसीलिये हो सका कि वे नदियों के नेटवर्क से हर जगह पहुँच सके। बहुत सी अन्य तरह की आसानियाँ और सहूलियतें थीं वहाँ। इसका असर भाषा पर भी पड़ा। आप अशोक के स्तम्भों को देखें तो समझ आएगा कि यदि गंगा नदी न होती तो इतने भारी और बड़े पत्थर एक जगह से दूसरी जगह जा ही नहीं पाते। फीरोज तुगलक ने इस काम के लिये यमुना का उपयोग किया। आज भले ही उस दृष्टि से हम इन नदियों का महत्व न समझें पर तब ये व्यापार का, आवागमन का, आदान-प्रदान का, पानी का, मिलने-जुलने का सबसे आसान और सस्ता माध्यम थीं।

एक और बड़ा रोचक हिस्सा है भाषा के लिहाज से। नदियों के माध्यम का, मिलने-जुलने का भाषा पर भी बड़ा असर पड़ता है। ग्रियर्सन बाहरी और मध्यवर्ग की भाषा में अंतर करते हैं, जिसमें गंगा बेसिन की भाषायें दो भागों में दो बँट जाती है। आज हिन्दी का जो मुख्य क्षेत्र है और बंगाल में भी, आप अशोक के काल में एक ही भाषा देखते हैं- मागधी। प्राकृत के बजाय वहाँ ‘ल’ है। मागधी प्राकृत की ‘स’ ‘श’ अलग नहीं है। बांग्लादेश से हरियाणा तक ‘ल’ वाली यह प्रवृत्ति दिखेगी। अशोक के समय के बहुत सारे शिलालेख हैं, जिनसे मालूम होता है कि उस काल में गंगा बेसिन में भाषा एक है। यहाँ की और दूसरी जगहों की अशोक काल की प्राकृत में अंतर है। अशोक के साम्राज्य में तीन प्राकृत डाइलेक्ट्स रहीं- मागधी, उज्जैनी और गंधार। मागधी प्राकृत में संस्कृत का धर्म ‘धम’ है, तो गंगा बेसिन के बाहर पंजाब में वह ‘ध्रम’ हो जाता है। गंगा के बेसिन और इंडस बेसिन के बीच मेलजोल कम होने के कई कारण और प्रभाव रहे। पर यही संस्कृति जब दक्कन पहुँचती है तो वहाँ के लोगों को इच्छा गोदावरी को गंगा कहने की होती है। इसी वजह से नासिक का भी महत्व हो जाता है।

संस्कृति जब ज्यादा विकसित होती, यातायात के माध्यम ज्यादा हो जाते हैं, तो लोगों का परस्पर संबंध बढ़ता है। ऊँट आने से, रहट आने से नदियों से दूर और जमीन के काफी नीचे से पानी निकाला जाने लगा। गंगा बेसिन में पुर-चरस का चलन ज्यादा रहा, रेगिस्तान में रहट कामयाब हुआ। इसका फर्क आप मुगलकाल में देख लें तब नदियों पर आर्थिक निर्भरता कम होने लगती है। लम्बी नहरें निकलने पर उनसे खेती होना शुरू हो जाती है।

अफगानिस्तान में पहाड़ों पर बर्फ पड़ती है, वहाँ पहाड़ों से निकलने वाली साल भर की नदियाँ बहती हैं। उनके पानी से खेती होती है। वहाँ नदियों की अहमियत का अंदाज इससे लगाइये कि वहाँ इलाकों, क्षेत्रों के पुराने जमाने में नाम नदियों पर हैं। ये नाम संस्कृत से मिलते-जुलते हैं। वहाँ एक नदी है- हैलमैन। इस नाम को अवेस्ता के ‘हेतमन्द’, संस्कृत के ‘सेतबंध’ से मिलाकर देखिये। वहाँ पूरे एक क्षेत्र का नाम था इस नदी पर, जिसे अब ‘सीस्तान’ कहते हैं। कंधार का क्षेत्र था जैसे। वहाँ की ‘हरफवती’ संस्कृत की ‘सरस्वती’ ही है, जो फारसी में ‘हरखवती’ हो जाती है। उस पर आधारित एरिया का नाम आजकल ‘अरगन्दाब’ हुआ। इसी तरह एक और नदी है- ‘हरोया’। आजकल यह ‘हरीरूद’ कहलाती है। संस्कृत में शब्द है ‘सरयू’ उसे देखिये। यहाँ एक ऐतिहासिक शहर है ‘हिरात’ जिसका नाम ‘हरयू’ से निकला। पुराने जमाने में पूरे क्षेत्र को हरयू कहते थे। आजकल वहाँ एक जिला है हरयू। अब ‘हरयू’ और ‘सरयू’ को एक साथ रखकर देखिये। यहाँ इसलिये नदियों की अहमियत बहुत बढ़ जाती है। पुराने जमाने में जैसा ‘ऋग्वेद’ में आप देखते हैं, अफगानिस्तान के लोग भी गल्लाबानी करते थे, खेती करते थे। उन्होंने खेती के कारण ही क्षेत्रों, इलाकों के नाम नदियों पर रखे।प्रेम कुमार:- क्या नदी किनारे की सभ्यताओं और दूरवर्ती सभ्यताओं में कोई बुनियादी भिन्नता दिखायी देती है ?

इरफान हबीब:- नदी किनारे विकसित सभ्यताओं में सांस्कृतिक-भावनात्मक आधार पर अंतर की बात पर कुछ यूँ ही, एकदम कह देना ठीक नहीं होगा। ऐसा हो सकता है कि कुछ खास फर्क हो। मंगोल की बात करें, वहाँ नदी नहीं है। खेती-बाड़ी भी नहीं करते थे वे। उनमें एक तो यह कि एक स्थान से दूसरे स्थान जाने को वे तैयार रहे, उनमें इसकी क्षमता अधिक थी। दूसरा यह कि तुर्क और मंगोल जब अलग-अलग कालों में मंगोलिया से निकले तो वहाँ कोई बड़ी नदी तो नहीं थी। अरबों का भी यही हुआ। उनके पास ऊँट सवार थे, घुड़सवार भी कम थे, पर एकता के कारण बड़ा साम्राज्य बना सके। इसी तरह मंगोल ने इससे भी बड़ा साम्राज्य बनाया। इब्ने खद्दू ने ‘सैटिल्ड’ और ‘नॉमेड’ में फर्क बताया है। जब ‘नॉमेड्स’ नये सभ्य क्षेत्र में पहुँचते हैं तो वहाँ की संस्कृति का पृथक्करण टूटता है। अरबों से, मंगोल्स से बड़ी-बड़ी संस्कृति का आपसी अलगाव टूटा। अरबों ने ग्रीक, ईरानी, हिन्दुस्तानी संस्कृति में उपलब्धियों को जोड़ा और मंगोल्स ने चाइनीज इन्वेंशंस- प्रिंटिंग प्रेस, बारूद आदि को दुनिया भर में फैलाया। हालाँकि इनकी अपनी कोई बड़ी सांस्कृतिक विरासत और परम्परा नहीं थी। हिन्दुस्तान में राजस्थान में मरुस्थल है, पर उस दृष्टि से यहाँ नॉमैड्स ‘खानाबदोश’ की खास बड़ी जनसंख्या नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि राजपूत राजस्थान से निकले, नॉमौडियन एरिया से निकले। वे नॉमैड्स थे यह मुझे अपील नहीं करता। राजपूत एक साथ अनेक क्षेत्रों में मिलते हैं। वे घुड़सवार थे। नॉमैड्स से उनका संबंध नहीं। इतिहास में प्रारम्भिक काल के बाद यह फर्क नहीं पायेंगे आप। नदियों की करीबी या दूरी का आधार ज्यादा फर्क नहीं करेगा। यह जरूर है कि सैटिल्ड जो थे, उनकी अपेक्षा नॉमैड्स को बाहर जाने में आसानी जरूर थी। पर वे हमेशा सफल ही नहीं होते थे। स्थानीय लोग उनका प्रतिरोध भी करते थे और फिर चीनियों ने जब बारूद-गोली का आविष्कार कर दिया तो नामैड्स का उस तरह जगह-जगह जाना भी कम हो गया। जहाँ नदियाँ न हों वहाँ बड़ी सभ्यता और संस्कृति का होना संभव नहीं। खानाबदोश, साम्राज्य बनाने के बाद अलग-अलग संस्कृति को जोड़ते हैं। उस जोड़ने से सभ्यता का विकास हुआ। यह ऐतिहासिक बात है, आज इसका महत्व नहीं।

प्रेम कुमार:- नदियों में जो भयानक प्रदूषण फैल रहा है उसके बारे में आप क्या कहेंगे ?

इरफान हबीब:- हाँ, यह प्रदूषण का मसला बहुत बड़ा है। हम अगर यह भूल भी जायें कि नदियों से हमें क्या फायदा है, तब भी यह याद रखना चाहिये कि उनकी अपनी पहचान है। पहाड़, जंगल, नदी, जीव जंतु सबका अपना अस्तित्व, अपनी पहचान है। यह सोचकर किसी नदी को नाला नहीं बनाना चाहिये। अब तक दुनिया भर में पीने का पानी नदियों से मिलता रहा है। अमेरिका में यह एक बड़ी समस्या बन गई कि नदियोँ अधिक इस्तेमाल से सूख गयी। कई पुरानी नदियाँ खत्म हो रही हैं। हमारे शहर अभी इतने बड़े नहीं हैं, पर फिर भी हमें इन्हीं से पानी मिलता है। हमें इनके अस्तित्व को समझना चाहिये, उसका ख्याल रखना चाहिये। प्रकृति हमें जैसी मिली थी, उसे वैसा ही बचा कर रखना चाहिये। हमारे धर्म में यदि किसी नदी की जगह न भी हो, तो उसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि हम उसे प्रदूषित कर दें।

प्रेम कुमार:- नदियों के प्रति हमारा मातृ-भाव है…..

इरफान हबीब:- प्रकृति या नदियों को लेकर गाने, नज्में तो हर संस्कृति में मिलेंगे, पर जैसे हमारे यहाँ ‘पूजा’ है, ‘आस्था’ है वह अलग है। यहाँ है यह औरों को पता नहीं। पहले नील रिवर गॉडेस थी, पूजा होती थी उसकी। पर अब नहीं। अब संस्कृति के विकसित होने के साथ अंतर आ रहा है। आप और बहुत जगह देखिये वहाँ नदियों के नाम नहीं बदले। यूरोप में बहुत पुराने नाम चले आ रहे हैं। किस किस जुबान के हैं, बाज़ दफा यह भी पता नहीं चलता। पर हमारे यहाँ ज्यादातर नदियों के नाम बदले। ऐसा क्यों है, पता नहीं।

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