8000 साल पुरानी दामोदर घाटी सभ्यता दफन हो जाएगी

Submitted by Hindi on Thu, 07/28/2011 - 08:59
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नैचुरल व्यूज

दामोदर नदी अब खत्म होने के कगार परदामोदर नदी अब खत्म होने के कगार परझारखंड में औद्योगीकरण के खिलाफ एक नये मोर्चे की तैयारी शुरू हुई है। जमीन के सवाल पर जन-विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा, अब पर्यावरण संरक्षक भी गोलबंद हो रहे हैं। उनकी तिरछी नजर उद्योगों के लिये आबंटित कोल ब्लॉकों पर है। खास बात यह है कि इस मोर्चे के लिये अंतरराष्ट्रीय सहमति जुटायी जा रही है। जानेमाने पर्यावरण व वन्यजीव संरक्षक बुलु इमाम खुलकर कहते हैं- ‘मानवाधिकार का सवाल सरकारों पर अब प्रभाव नहीं डालता इसलिये हम लोग ग्लोबल वार्मिंग के पहलू को आगे करके अंतर्राष्ट्रीय समर्थन हासिल कर रहे हैं।’

हजारीबाग निवासी इमाम मोर्चे के रणनीतिकारों में से एक हैं। उनके अनुसार, एक प्रतिनिधिमंडल इसी हफ्ते झारखंड के राज्यपाल को मेमोरंडम सौंपते हुए नये उद्योगों के नाम कोल ब्लॉक आबंटनों को खारिज करने की मांग करेगा। उस मेमोरंडम में दो सौ पर्यावरण संरक्षकों के हस्ताक्षर होंगे। आधे, विभिन्न देशों के शख्सियत होंगे। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, इंग्लैंड, जर्मनी, इटली और अमेरिका से समर्थकों की सहमति मिल चुकी है। पर्यावरणविदों का मानना है कि ईंधन के रूप में कोयले के उपयोग से भारी मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है जो ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है। इसलिये जरूरी है कि तमाम कोयला खदानों पर रोक लगायी जाए। तत्काल तो पावरप्लांटों के लिये दिये जा रहे कोल ब्लॉकों को चालू होने से रोका जाए। इस मोर्चे का निशाना झारखंड में एमओयू करने वाले आर्सेलर मित्तल, जिंदल, एस्सार, भूषण, जीवीके, अभिजीत आदि के नाम आबंटित ढाई दर्जन कोलब्लॉकों पर है।

सभी कोल ब्लॉक हजारीबाग और चतरा में फैले कर्णपुरा घाटी में हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि इस इलाके में पिपरवार, अशोका आदि कोयला परियोजनाओं के कारण पहले ही काफी तबाही हो चुकी है अब और कोयला खदानें खुलीं तो दो सौ गांवों के हजारों भूमिपुत्र परिवारों का नामो निशान मिट जाएगा। बचे हुए जंगल व सैकडों बाघ, हाथी जैसे संरक्षित वन्यजीवों का विनाश हो जाएगा। झारखंड का गौरव मानी गयीं 8000 साल पुरानी दामोदर घाटी सभ्यता दफन हो जाएगी। प्रागैतिहासिक मेगालिथिक साइट्स और दर्जन भर आदिमकालीन पेंटिंगवाली गुफायें तबाह हो जाएंगी। बुलु इमाम ने इस आयाम पर भी काफी काम किया है। वह बताते हैं कि इस आंदोलन को विश्वस्तरीय स्वरूप देने के लिये उन्होंने दार्शनिक नॉम चॉम्स्की, वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग, अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति व पर्यावरणविद अल गोर से भी समर्थन के लिये पत्र लिखा है। इसके अलावा भारत की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी इस अभियान में शामिल होने की गुजारिश की है।
 

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