आपदा प्रबन्धन में उपयोगी एरियल ड्रोन तकनीक (Aerial drone technology in disaster management)

Submitted by UrbanWater on Sat, 09/16/2017 - 16:47
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विज्ञान प्रगति, सितम्बर 2017

एरियल ड्रोन कैमराएरियल ड्रोन कैमराड्रोन आपदाग्रस्त क्षेत्रों में पहले से प्रोग्राम किये हुए मार्ग पर, बहुत कम ऊँचाई पर, क्षतिग्रस्त भवनों के अन्दर भी उड़ सकते हैं जहाँ से वे अन्धेरे में देखने वाले कैमरों की सहायता से प्रभावित क्षेत्र के लाइव फुटेज भी भेज सकते हैं, जिससे मलबे में दबे जिन्दा व्यक्तियों के स्थान का पता लगाकर उन्हें बचाया जा सकता है।

वर्ष 2009 में प्रदर्शित फिल्म ‘3 इडियट्स’ में सम्भवतः पहली बार ड्रोन कैमरा बनाकर आमिर खान द्वारा उसका प्रदर्शन दिखाया गया था। हॉलीवुड में पूर्व से ही, जबकि विगत कुछ वर्षों से बड़े बजट की बॉलीवुड फिल्मों में, बी.बी.सी., नेशनल ज्यॉग्राफिक, डिस्कवरी चैनल के कई कार्यक्रमों/धारावाहिकों/वृत्तचित्रों में एरियल ड्रोन का उपयोग कर, कई बेहतरीन शॉट्स देखे जा सकते हैं। फिल्मों से बाहर निकलकर अब ड्रोन कैमरों का उपयोग, कई अन्य क्षेत्रों में भी होने लगा है। भीड़ भरे क्षेत्रों में, अपराधों को रोकने में, धरने-प्रदर्शनों-रैलियों में विभिन्न गतिविधियों पर नजर रखने, बड़े शहरों में यातायात प्रबन्धन, यातायात जाम की स्थितियों से निपटने आदि में ड्रोन कैमरे खासे उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। विश्व प्रसिद्ध स्मारकों/धरोहरों/आश्चर्यों (वंडर्स) को सहेजने/निगरानी रखने, अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों, विश्वस्तरीय फुटबॉल, टेनिस स्पर्धाओं के दौरान खिलाड़ी दर्शकों का विभिन्न कोणों से फिल्मांकन, स्टेडियम के बाहर की एवं शहर की अन्य स्थितियों को भी एरियल ड्रोन द्वारा बखूबी दिखाया जाने लगा है। कई बार अन्तरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में अम्पायरों को सही निर्णय देने में भी ड्रोन कैमरे अत्यन्त मददगार साबित होते हैं। आइए, हम समझें… आखिर एरियल ड्रोन क्या हैं? ड्रोन से फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी करने की तकनीक क्या है?

ऐसे दुर्गम क्षेत्र, जहाँ मानवयुक्त वायुयानों, हेलिकॉप्टरों आदि का पहुँचना अत्यधिक कठिन एवं जोखिम भरा तथा कई बार असम्भव भी होता है, एरियल ड्रोन वहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं। ड्रोन मुख्यतः मानवरहित, कैमरायुक्त, दूरसंवेदी, छोटे उपकरण हैं जो संचालक द्वारा जमीन से वायु में संचालित किये जाते हैं। ड्रोन में प्रमुखतः निम्न अवयव होते हैं-

1. एक भाग उड़ने वाला होता है जिसमें आकाश में उड़ने के लिये छोटे रोटर्स, विभिन्न प्रकार के सेंसर्स एवं उनसे सम्बन्धित डायोड्स तथा विभिन्न कोणों से अत्यधिक जूम, हाई रिसॉल्यूशन, फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी करने हेतु वाईफाई, कम्पन मुक्त, तेज लेंस युक्त आधुनिकतम कैमरे आदि लगे होते हैं। दुर्गम एवं सीमित स्थानों पर उतरने हेतु नीचे की ओर ट्राइपॉड अथवा फोरपॉड भी होते हैं। माउंटेन ड्रोन्स में रोटर्स की संख्या छः से आठ तथा नीचे उतरने हेतु विशेष प्रकार के ग्लाइडर्स लगे होते हैं।

2. दूसरे भाग में वीडियो गेम खेलने में उपयोग किये जाने वाले कंसोल की भाँति सुदूर नियंत्रण युक्त एक नियंत्रण इकाई होती है, जिसे ड्रोन उड़ाने वाला व्यक्ति, जमीन से संचालित एवं नियंत्रित करता है। इसी भाग में कैमरे द्वारा की गई वीडियोग्राफी का सम्पूर्ण डेटा सुरक्षित रहता है।

3. चूँकि ड्रोन कई मीटर की ऊँचाई पर उड़ान भरता है तथा कई प्राकृतिक आपदाओं के समय वायुमण्डल पूरी तरह असामान्य रहता है जिस कारण ड्रोन एवं कैमरा अत्यधिक कम्पित होता है। कम्पन को नियंत्रित करने एवं कैमरे को अपनी धुरी पर घुमाने के लिये इनमें गिम्बल्स लगे होते हैं।

4. ड्रोन नियंत्रण में सहायता हेतु संचालनकर्ता के पास कंसोल से जुड़ा एक एल.सी.डी. मॉनीटर भी होता है जिस पर रियल टाइम वीडियो सम्पूर्ण समय दिखाई देता रहता है।

5. वीडियो ट्रांसमीटर की सहायता से, ड्रोन संचालनकर्ता को यह जानकारी प्राप्त होती रहती है कि ड्रोन, कहाँ, किस ऊँचाई पर उड़ रहा है तथा इसकी सहायता से, कैमरा जो देख रहा है, उसका स्पष्ट वीडियो प्राप्त होता रहता है। ड्रोन उड़ाने, संचालित एवं नियंत्रित करने वाला व्यक्ति इन सभी कार्यों में अत्यन्त पारंगत, प्रशिक्षित एवं अनुभवी होता है क्योंकि ड्रोन अत्यन्त कम ऊँचाई से अत्यधिक ऊँचाई पर उड़ान भर सकते हैं, अतः संचालनकर्ता की छोटी-सी असावधानी से उड़ता ड्रोन टकरा कर नष्ट हो सकता है।

आपदा प्रबन्धन के पारम्परिक पक्ष


प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकम्प, ज्वालामुखी उद्गार, बाढ़, भूस्खलन, बवंडर, तूफान, चक्रवात, जंगल की आग आदि में जीवहानि अत्यधिक होती है। बचाव दलों की पूरी कोशिश रहती है कि क्षतिग्रस्त मकानों में यदि कोई जीवित है, तो उसे किसी भी तरह सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाये। यह तभी सम्भव है जब बचाव कार्य समय पर प्रारम्भ कर दिये जाएँ। आपदाओं के कारण बिजली की आपूर्ति, मोबाइल सेवासंचार के साधन, सड़कें, रेलवे मार्ग आदि नष्ट हो जाते हैं। बाढ़, वर्षा, समुद्रतटीय आपदाएँ, खराब मौसम, तेज रफ्तार हवाएँ, क्षतिग्रस्त सड़कें, बचाव कार्य को बुरी तरह प्रभावित भी करती हैं। इस कारण कुछ घंटों का विलम्ब भी, राहत कार्य को अत्यधिक प्रभावित कर, जनहानि की संख्या को अधिकाधिक बढ़ा देता है। एक अध्ययन के अनुसार प्राकृतिक आपदा के प्रारम्भिक 3 घंटों में जीवनता दर सबसे अधिक रहती है, लेकिन 72 घंटों के पश्चात जीवित रहने की सम्भावनाओं में अत्यधिक गिरावट आ जाती है। बचाव कार्य जितनी तत्परता एवं प्रभावी तरीके से किये जाएँ, आपदा प्रभावितों, मृतकों की संख्या उतनी ही कम की जा सकती है। गत कुछ विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं के पश्चात से, आपदा का प्रकार, हुए नुकसान का तरीका आदि का भी अध्ययन किया जाने लगा है। इसके लिये आपदा पूर्व एवं पश्चात के हवाई छाया-चित्रों एवं उपग्रह-चित्रों की मदद ली जाती है। इससे आपदा विन्यास मानचित्र तैयार किये जाते हैं। ऐसे मानचित्र जितनी जल्दी तैयार किये जाएँगे, बचाव कार्य उतने ही प्रभावी तरीके एवं शीघ्रता से प्रारम्भ किये जा सकते हैं। शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध बचाव संसाधनों का बेहतर उपयोग कर तथा बचाव प्राथमिकताओं के आधार पर, प्राकृतिक आपदाओं में क्षति का आकलन कर, मृतक संख्या कम की जा सकती है। यह भी सही है कि आपदा के पश्चात उपग्रह अथवा पारम्परिक मानवयुक्त विमान, हेलीकॉप्टर्स की सहायता से प्रभावित क्षेत्रों के आपदा मानचित्र बनाए जाते हैं, लेकिन उनमें समय अधिक लगता है। साथ ही, वर्तमान में उपयोग की जा रही उपग्रह इमेजिंग तकनीक इतनी विकसित नहीं है कि आपदा प्रभावित क्षेत्र में यदि बादल छाये हुए हों तो उन्हें भेदकर हाई रेसोलुशन छाया-चित्र भेजे जा सकें। मौसम सम्बन्धी अत्यधिक विकट परिस्थितियों में तो यह बिल्कुल भी सम्भव नहीं है। आधुनिक एरियल ड्रोन छाया-चित्रण एवं वीडियोग्राफी तकनीक, पारम्परिक उपग्रह अथवा मानवयुक्त विमान, हेलीकॉप्टर्स आदि की तय सीमाओं को लांघकर जोखिम न्यूनीकरण में अत्यधिक प्रभावी सिद्ध हो रही है।

एरियल ड्रोन के प्रबल पक्ष


एरियल ड्रोन से सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण एवं प्रबल पक्ष निम्नानुसार हैं:

1. ड्रोन अत्यन्त कम ऊँचाई पर भी उड़ान भर सकते हैं तथा प्रभावित क्षेत्र को जिस अत्यन्त निकटता से देख सकते हैं, उसे पारम्परिक विमान, हेलीकॉप्टर द्वारा अधिक क्षेत्रफल घेरने के कारण, अत्यधिक कम ऊँचाई पर उड़ ही नहीं पाते हैं तथा आकार में बड़े होने के कारण ऊँचाई से नीचे देखने की भी कई सीमाएँ होती हैं।

2. ड्रोन से बहुत कम ध्वनि निकलती है, साथ ही इनमें अत्याधुनिक संवेदनशील सेंसर्स लगे होते हैं जो ध्वनि की न्यूनतम आवृत्ति को भी सुन सकते हैं एवं रिकॉर्ड कर सकते हैं जिससे मलबे में दबे जीवित व्यक्ति तक पहुँचकर, उसे बचाया जा सकता है।

3. विमान, हेलीकॉप्टर आदि आकार में बड़े होने के कारण उनके लिये अधिक जगह की आवश्यकता होती है तथा बगैर हेलीपैड के वे नीचे उतर ही नहीं सकते। उनका स्वयं का शोर ही इतना अधिक होता है कि वे आपदा प्रभावित व्यक्ति द्वारा बचाव के लिये की जा रही पुकार सुन ही नहीं सकते।

4. ड्रोन एक सूटकेस के आकार जितने क्षेत्र में भी आसानी से उतर सकते हैं तथा इनसे बिल्कुल भी शोर नहीं होता।

5. ड्रोन आपदाग्रस्त क्षेत्रों में पहले से प्रोग्राम किये हुए मार्ग पर, बहुत कम ऊँचाई पर, क्षतिग्रस्त भवनों के अन्दर भी उड़ सकते हैं जहाँ से वे अन्धेरे में देखने वाले कैमरों की सहायता से प्रभावित क्षेत्र के लाइव फुटेज भी भेज सकते हैं, जिससे मलबे में दबे जिन्दा व्यक्तियों के स्थान का पता लगाकर उन्हें बचाया जा सकता है।

प्राकृतिक आपदाओं में ड्रोन के अनुप्रयोग


भूकम्प/सुनामी


न्यूजीलैंड, प्रशान्त महासागर के चारों ओर स्थित ज्वालामुखी के वृत्ताकार क्षेत्र के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में, ऑस्ट्रेलियन एवं पेसिफिक प्लेट के सन्धि स्थल पर स्थित है। क्रियाशील भूकम्पीय भ्रंशों की अधिकता के कारण न्यूजीलैंड में हमेशा विनाशकारी भूकम्प आते रहते हैं। न्यूजीलैंड में कई प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं विशेषकर ज्वालामुखी, भूस्खलन, सुनामी, भूकम्प आदि की अत्यधिकता है। भूगर्भीय विपत्ति सूचना केन्द्र-जियोनेट के अनुसार वर्ष 2011 में 29,000 भूकम्पीय झटके दर्ज किये गए, जो न्यूजीलैंड का दूसरा सर्वाधिक भूकम्प सक्रिय वर्ष रहा है जिसमें, रिक्टर पैमाने पर 6.3 तीव्रता के विनाशकारी क्राइस्ट चर्च भूकम्प में लगभग 185 लोग मारे गए थे। वर्ष 2016 में जियोनेट ने 32, 828 भूकम्प दर्ज किये जो किसी एक वर्ष में दर्ज किये गए भूकम्पों में सर्वाधिक हैं। इसीलिये न्यूजीलैंड के भूकम्प विज्ञानियों ने वर्ष 2016 को रिकॉर्ड ब्रेकर वर्ष माना जाता है, यह ग्राउण्ड ब्रेकर वर्ष के रूप में भी जाना गया है। सम्भवतः इन्हीं कारणों से न्यूजीलैंड ने प्राकृतिक आपदाओं के अध्ययन एवं प्रबन्धन हेतु एरियल ड्रोन का उपयोग प्रारम्भ किया है।

14 नवम्बर 2016 को न्यूजीलैंड में तटीय शहर काइकाउरा, जो क्राइस्टचर्च से लगभग 93 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में स्थित है, रात्रि के पहले एवं बाद के उपग्रह चित्रों में समुद्र तटीय किनारों पर हुए परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं लेकिन ड्रोन से ही यह ज्ञात हुआ कि पापाटी भ्रंश की लम्बाई में रिवर्स फॉल्टिंग होने के कारण, समुद्र का किनारा 2 से 6 मीटर ऊपर उठ गया (जो किसी भूकम्प में सम्भवतः पहली बार हुआ), जिससे समुद्र में डूबी शैलें एवं उनसे जुड़े अन्य समुद्री जीव एवं वनस्पतियाँ सतह पर उभर आये। अध्ययन की दृष्टि से, हाल ही के वर्षों में आये उच्च परिमाण वाले भूकम्पों में न्यूजीलैंड का यह भूकम्प, आदर्श हो सकता है क्योंकि तीव्र भूकम्प के साथ-साथ इतनी अधिक संख्या में भूस्खलन एवं विनाशकारी सुनामी जैसी गतिविधियाँ एक साथ हुईं।

ज्वालामुखी


ज्वालामुखीय गतिविधियाँ भी प्राकृतिक आपदाओं में अत्यन्त विनाशकारी होती हैं। सक्रिय ज्वालामुखी, जिनकी संख्या 500 से अधिक है, पृथ्वी के अत्यन्त तुनक मिजाजी तथा खतरनाक क्षेत्र हैं। सामान्यतः लावा, गैस एवं धुआँ उगल रहे ज्वालामुखी के निकट जाकर उसका अध्ययन करना, फोटो/वीडियो लेना वैज्ञानिकों के लिये अत्यन्त कठिन, जोखिमयुक्त एवं प्रायः असम्भव ही होता है, ऐसे में ज्वालामुखीय उद्गारों पर नजर रखने, ज्वालामुखी के अत्यन्त निकट जाकर अलग-अलग कोणों से, अलग-अलग ऊँचाइयों से फोटो/वीडियो निकालने का कार्य केवल ड्रोन ही कर सकते हैं। ड्रोन से विस्मयकारी तस्वीरें प्राप्त होती हैं जिन्हें आधुनिकतम कैमरों से भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इन कारणों से ड्रोन का उपयोग ज्वालामुखी अध्ययन हेतु किया जाने लगा है। ज्वालामुखी ड्रोन, विभिन्न गतिविधियों को रिकॉर्ड कर उन्हें प्रसारित करने, विश्लेषण हेतु चट्टानों, तप्त लावा, यहाँ तक कि घातक जहरीली गैसों के नमूने एकत्रित करने में भी सक्षम होते हैं जो पारम्परिक मानव-युक्त हेलीकॉप्टर, हवाई जहाज आदि कर ही नहीं सकते। यह सभी कार्य अत्यन्त चुनौतीपूर्ण होते हैं क्योंकि इनमें ड्रोन नष्ट भी हो जाते हैं लेकिन इनसे ज्वालामुखीविदों को अत्यधिक मदद मिलती है। ज्वालामुखी में कब विध्वंस होगा, लावा कब बाहर निकलेगा, किस दिशा में बहकर कहाँ एकत्रित होगा, पर्यावरण को कितना प्रभावित करेगा, यदि आवश्यक हुआ तो आस-पास के आबादी वाले क्षेत्र को खाली करवाने आदि में भी ड्रोन अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

जनवरी 2015 में सम्भवतः पहली बार ड्रोन की सहायता से आइसलैंड स्थित बारारबंगा ज्वालामुखी के शक्तिशाली उद्गार का अध्ययन एवं फिल्मांकन किया गया। यह सक्रिय ज्वालामुखी औसत समुद्र तल से लगभग 2009 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है तथा इससे दरारी उद्गार के माध्यम से लावा बाहर निकलता है। उद्गार के ठीक ऊपर लगभग 70 मीटर की ऊँचाई पर ड्रोन रखकर तथा लगभग 1 किलोमीटर की दूरी से तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा इसे संचालित किया गया। अध्ययन के समय लावा का तापमान लगभग 2000 डिग्री फारेनहाइट था तथा ज्वालामुखी से सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी विषैली गैसें एवं कई प्रकार की अम्लीय वाष्प निकल रही थीं। विशेषज्ञों ने अत्यधिक जोखिम उठाते हुए अत्यन्त कम ऊँचाई से विस्मयकारी वीडियो लेते हुए ज्वालामुखी का अध्ययन किया जिसमें उनके 2 ड्रोन नष्ट भी हो गए।

वर्ष 2015 में ही दक्षिण-पश्चिम प्रशान्त महासागर स्थित वानुआटु द्वीप के एक अत्यन्त सक्रिय एवं खतरनाक ज्वालामुखी एम्ब्रिम के मारुम क्रेटर का फिल्मांकन एवं अध्ययन भी ड्रोन के माध्यम से किया गया। लगभग 12 किलोमीटर व्यास का यह कॉलडेरा (ज्वालामुखी) विस्फोट से विस्तारित विवर) अन्दर से कैसा है का अध्ययन अत्यन्त जोखिम लेकर किया गया। अत्यधिक कठिन वातावरण, जहरीली गैसों, उबलते लावा जैसी विपरीत परिस्थितियों में जीवों की उपस्थिति को भी तलाशा गया। सक्रिय कॉलडेरा के समीप एवं अन्दर जाकर इस प्रकार का अध्ययन एवं फिल्मांकन ड्रोन के बगैर असम्भव है।

फरवरी 2016 में मध्य अफ्रीका स्थित कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के एक अत्यन्त सक्रिय ज्वालामुखी यिरागोंगो, जहाँ विश्व की सबसे बड़ी लावा झील स्थित है, का अध्ययन ड्रोन द्वारा किया गया। चट्टानों, लावा के साथ-साथ अत्यन्त घातक एवं जहरीली गैसों के नमूने भी विश्लेषण तथा परीक्षण हेतु एकत्रित किये गए तथा अविश्वसनीय छायाचित्र ड्रोन के माध्यम से प्राप्त हुए।

इसी वर्ष 2017 में भी कुछ सक्रिय ज्वालामुखियों का अध्ययन एरियल ड्रोन द्वारा किया गया है उनमें प्रमुख हैं- सिसली (इटली) 3329 मीटर ऊँचा माउंट एटना तथा गुआटेमाला स्थित दो ज्वालामुखियों -यूगो एवं पकाया। इन्हें हाल ही में कैम्ब्रिज व ब्रिस्टल विश्वविद्यालयों के ज्वालामुखीविदों तथा अभियांत्रिकों की एक टीम ने संयुक्त रूप से अध्ययन किया है जिसमें विभिन्न सेंसर्स के माध्यम से तापीय आँकड़े, लावा तथा आस-पास के क्षेत्र का तापमान, आर्द्रता, गैसों की उपस्थिति, राख के नमूने आदि संग्रहीत किये गए हैं।

बाढ़


बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा का सामना, विश्व के छोटे-बड़े प्रायः सभी देश प्रति वर्ष करते हैं। विगत दो वर्षों में, बाढ़ की कई घटनाएँ हुई हैं, जिन्होंने विश्व समुदाय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है, जिनका ड्रोन द्वारा फिल्मांकन तथा अध्ययन भी किया गया। वर्ष 2015 के मई में हस्टन (टेक्सास-अमेरिका), जून में दक्षिण उटाह (अमेरिका), अक्टूबर में न्यू ब्रॉनफेल्स (टेक्सास, अमेरिका), दिसम्बर में कलामा (वाशिंगटन, अमेरिका) तथा मिसूरी बाढ़ (अमेरिका); वर्ष 2016 के अप्रैल में हस्टन, साइप्रस, केटी (टेक्सास, अमेरिका), जून में लाउनसेस्टन (तस्मानिया, ऑस्ट्रेलिया), अगस्त में लाफाये (लौसिआना- अमेरिका), डेकोरा (लोवा, अमेरिका), मनीला (फिलिपीन्स), सितम्बर में वाटरलू (कनाडा), अक्टूबर में केरोलीना (अमेरिका); वर्ष 2017 के जनवरी में कारसन नदी की बाढ़ (डगलस काउण्टी, नेवादा), फरवरी में सऊदी अरब, सेन जोंस (कैलिफोर्निया, अमेरिका), मार्च में लिस्मोर (न्यू साउथ वेल्स-ऑस्ट्रेलिया, चित्र-31), अप्रैल में ब्रिसबेन (क्वींसलैंड, ऑस्ट्रेलिया), बेल्टॅन (टेक्सास, अमेरिका), रेनो (लेमन घाटी, नेवादा) तथा न्यूजीलैंड आदि में आई बाढ़ें प्रमुख हैं। फरवरी 2017 में पूर्वी अफ्रीकी देश मलावी में आई बाढ़ से निर्मित आपातस्थिति से निपटने तथा प्रभावितों की मदद के लिये संयुक्त राष्ट्रबाल कोष ने ड्रोन्स स्थापित किये हैं।

समुद्री तूफान/चक्रवात


कई देशों में उष्णकटिबन्धीय समुद्री तूफान, चक्रवात का खतरा भी हमेशा बना रहता है। ये प्राकृतिक आपदाएँ प्रशान्त महासागर, अटलांटिक महासागर, केरिबियन सागर, मेक्सिको की खाड़ी आदि के तटीय क्षेत्रों में प्रति वर्ष होती हैं। इनमें से कई श्रेणी 4 एवं 5 के होते हैं जिनसे इन महासागरों के तटीय क्षेत्रों में अकल्पनीय तबाही होती है। विगत वर्षों में गोन्जालो, जोक्विन, आइरिस, मिआमी, चार्ली, मैथ्यू, केट्रीना, निकोली आदि ने तटीय राज्यों/शहरों में जबरदस्त हानि पहुँचाई है। इनमें से कुछ तूफानों/चक्रवातों काड्रोन्स द्वारा भी अध्ययन किया गया है जिससे प्रभावितों को अधिकाधिक मदद मिली। अक्टूबर 2016 में समुद्री तूफान मैथ्यू से अमेरिका के फ्लोरिडा एवं हैती में जान-माल का भयंकरतम नुकसान हुआ। चक्रवात कुक ने अप्रैल 2017 में न्यूजीलैंड को भी अत्यधिक प्रभावित किया है।

हिमस्खलन


हिमस्खलन भी प्राकृतिक आपदाएँ हैं लेकिन इनमें जन-धन की हानि, अन्य प्राकृतिक आपदाओं की अपेक्षा कम होती है। कारण, ये घटनाएँ अत्यधिक ऊँचाई वाले ठंडे पहाड़ी क्षेत्रों, हिमनद प्रदेशों, जहाँ बर्फ कभी पिघलती नहीं तथा आबादी लगभग नहीं के बराबर होती है, में होती हैं। अत्यधिक बर्फबारी, तीव्र ढलान विफलता, कभी-कभी अधिक तीव्रता के भूकम्पों के कारण हिमस्खलन की घटनाएँ होती हैं। ऐसे दुर्गम स्थानों पर, जहाँ अन्य साधनों से घटना स्थल तक बचाव के लिये अथवा अध्ययन के लिये समय पर पहुँचना अत्यन्त कठिन होता है, वहाँ माउंटेन ड्रोन अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। विशेष प्रकार के सेंसर्स की मदद से बर्फ में दरारों की चौड़ाई-गहराई, बर्फ आवरण की मोटाई, गहराई, घनत्व, पिघलने की गति, पहाड़ी परिदृश्यों का स्केनिंग, आँकड़ों के द्वारा क्षेत्र के त्रिआयामी डिजिटल उन्नयन मॉडल तैयार किये जाते हैं। इन अध्ययनों से दुर्गम क्षेत्रों में कार्यरत सेना के जवानों, पर्वतारोहण अभियान दलों, हिमनदों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों, बर्फ में दबे पीड़ितों का पता लगाने, अस्थिर एवं पतले बर्फ का पता लगाने आदि में अत्यधिक सहायता मिलती है। सुदूर नियंत्रण द्वारा बमों/विस्फोटकों को संवेदनशील क्षेत्रों में गिराकर हिमस्खलन की घटनाओं को नियंत्रित करने, स्कीइंग क्षेत्रों की सुरक्षा, नए पर्वतीय पर्यटन क्षेत्रों का विकास आदि में भी ड्रोन्स सहायक सिद्ध हो रहे हैं। यद्यपि अत्यधिक ऊँचाई वाले बर्फ आच्छादित प्रदेशों/क्षेत्रों में ड्रोन्स को सुरक्षित उड़ाना, संचालित करना अत्यधिक चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि विपरीत परिस्थितियों, अत्यन्त कम तापमान, प्रचंड हवा आदि के रहते विशेष रूप से डिजाइन किये घटक, जो प्रतिकूल परिस्थितियों को भी सहन कर सकें; दमदार एल.ई.डी., जो प्रतिकूल मौसम में दृश्यता बढ़ा सकें, आदि कारणों से अनुकूल परिणाम प्राप्त हो रहे हैं। विश्व के कई क्षेत्रों में हिमस्खलन की घटनाएँ हुई हैं जिनमें ड्रोन्स की मदद ली गई है। 25 अप्रैल 2015 को नेपाल भूकम्प (तीव्रता 7.8) के बाद एवेरेस्ट एवलांच, 2016 के जनवरी में फ्रेंच आल्प्स, एवलांच, सितम्बर में झंसकार एवलांच, 2017 के जनवरी में इटली एवलांच, फरवरी में फ्रांस एवलांच, मार्च में टोक्यो (जापान) एवलांच आदि को माउंटेन ड्रोन्स द्वारा अध्ययन किया गया है।

भूस्खलन


विश्व के कई देशों/प्रदेशों में भूस्खलन की बड़ी घटनाएँ भी प्रतिवर्ष होती हैं। पर्वतीय/पहाड़ी क्षेत्र इन घटनाओं के लिये अत्यन्त संवेदनशील होते हैं। कई स्थानों पर शैल स्खलन, शैलों का गिरना, मलबे का प्रवाह, कीचड़ फिसलन की घटनाएँ भी होती हैं। पर्वतीय/पहाड़ी क्षेत्रों जहाँ विभिन्न शैलें अत्यधिक कमजोर, खंडित, दरारयुक्त, संधियुक्त होती हैं, वहाँ इस प्रकार की घटनाएँ अधिक होती हैं। ऐसा भी देखा गया है कि भूकम्प के बाद भी ये घटनाएँ प्रायः होती ही हैं। ड्रोन्स का उपयोग इन घटनाओं की निगरानी करने, रोकने, मानचित्रण करने, प्रभावितों को बचाने, पूर्वानुमान आदि के लिये किया जाने लगा है।

अप्रैल 2015 में 7.8 तीव्रता के नेपाल (गोरखा) भूकम्प के पश्चात 20,000 से अधिक स्थानों पर भूस्खलन हुआ, जिन्हें अमेरिका के मिशिगन एवं दक्षिण कैलिफोर्निया विश्वविद्यालयों के अनुसन्धान दल ने ड्रोन के माध्यम से मानचित्रण कर, अध्ययन किया। अप्रैल 2016 में जापान के क्यूशू द्वीप भूस्खलन, नवम्बर 2016 के न्यूजीलैंड भूस्खलन आदि भूकम्प प्रेरित भूस्खलनों के उदाहरण हैं।

दिसम्बर 2015 में दक्षिण चीन के शेन्झेन प्रान्त में भूस्खलन, अप्रैल 2016 में डोर्सेट (इंग्लैंड) का भूस्खलन, भारी वर्षा के बाद नवम्बर 2016 में इटली में हुआ कीचड़ फिसलन, दिसम्बर 2016 में कैलिफोर्निया के तटीय किनारे पर हुए भूस्खलन, जनवरी 2017 का पेसिफिका (कैलिफोर्निया, अमेरिका) भूस्खलन, फरवरी 2017 में सान्ताक्रूज पर्वत (कैलिफोर्निया, अमेरिका) का ग्रेट डिवाइड भूस्खलन, अप्रैल 2017 का मोकोआ (दक्षिण अमेरिका) भूस्खलन आदि कई उदाहरण हैं जिन्हें एरियल ड्रोन के माध्यम से अध्ययन किया गया है।

जंगल की आग


जंगल की आग भी एक प्रकार की प्राकृतिक आपदा है जिससे जैवविविधता एवं पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित होता है। विगत वर्षों में जंगल की आग के अध्ययन में भी ड्रोन का उपयोग किया जाने लगा है। अक्टूबर 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुसन्धानकर्ताओं ने ड्रोन में अत्याधुनिक सेंसर्स की मदद से जंगल की आग को ढूँढने में सफलता प्राप्त की है। शोधकर्ताओं ने ड्रोन्स के सहयोग से ऐसी पर्यावरण छवि-प्रसंस्करण निगरानी प्रणाली विकसित की है जो, रंग उपचार (पेड़ों में क्लोरोफिल की उपस्थिति के कारण हरा रंग, आग के समय लाल एवं पीला रंग तथा उठते धुएँ के श्याम वर्ण) द्वारा जंगल की आग को, शेष जंगल से अलग कर, पहचान लेती है। ये सेंसर रियल टाइम की जानकारी प्रदान करते हैं, इसलिये जंगल की आग द्वारा प्रभावित क्षेत्र, वायु के बहने की दिशा आदि की सूचना लगातार मिलती रहती है। सेंसर्स, जंगल की आग पहचान सूचकांक की मदद से आग-मुक्त क्षेत्र को विभेद कर लेते हैं। घने जंगलों में भी ड्रोन्स, अत्यन्त कम लागत में तथा प्रभावी तरीके से जंगल की आग को सम्पूर्ण सुरक्षा के साथ देख लेते हैं, जो पारम्परिक हेलीकॉप्टर, हवाई जहाज, उपग्रहों आदि से सम्भव नहीं है।

आधुनिक ड्रोन्स में चेतावनी प्रणाली तथा जिओ-फेन्सिंग अलार्म की भी व्यवस्थाएँ की गईं हैं जिनसे ड्रोन संचालनकर्ता को जंगल की आग पर दृष्टि रखने, नियंत्रण करने एवं बुझाने आदि में लगातार मदद मिलती रहती है।

अमेरिका जैसे देशों में जहाँ एक ओर ड्रोन्स का उपयोग, जंगल की आग का अध्ययन करने, नजर रखने में किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर शौकिया ड्रोन उड़ाने वालों की संख्या इतनी अधिक बढ़ गई है कि अग्निशमन कर्मियों को परेशानी होने लगी है तथा आग नियंत्रण हेतु उड़ने वाले अग्निशमन वायु-टैंकरों, हेलीकॉप्टर, हवाई जहाजों आदि से ड्रोन के टकराने के फलस्वरूप दुर्घटनाएँ भी होने लगी हैं।

 

भारत में प्राकृतिक आपदाएँ


भारत विश्व का 7वाँ सबसे बड़ा देश है तथा भारतीय प्लेट का हिस्सा है जो विश्व में एक महत्त्वपूर्ण प्लेट मानी जाती है। भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा है। दक्षिण की ओर हिन्द महासागर, दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर तथा दक्षिण-पूर्व में बंगाल की खाड़ी है। उत्तर, उत्तर-पूर्व में चापाकार हिमालय क्षेत्र उपस्थित है। हिमालय की उपस्थिति के कारण ही दक्षिण-पूर्व एवं दक्षिण-पश्चिम मानसूनी वर्षा, विभिन्न ऋतुएँ तथा मौसम नियंत्रित रहता है।


हिमालय पर्वत शृंखला, विश्व की नवीनतम विवर्तनिक पर्वत शृंखला है तथा यूरेशियन एवं भारतीय प्लेट के टकराने के फलस्वरूप बनी है। दोनों प्लेट्स के एक-दूसरे की ओर गति करने के कारण हिमालय की ऊँचाई लगातार बढ़ रही है। दोनों प्लेट्स के टकराने से सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र, भूकम्प की दृष्टि से विश्व का अति संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। 11 हिमालयी राज्यों तथा भारतीय उपमहाद्वीप के शेष क्षेत्र में विवर्तनिक तथा जलाशय-जनित भूकम्प, सुनामी, भूकम्प तथा वर्षाजनित भूस्खलन, हिमस्खलन, बाढ़, चक्रवात, ज्वालामुखी, जंगल की आग आदि के बचाव अभियानों में प्रायः राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल को नियुक्त किया जाता है। आपदा मानचित्रण, प्रभावितों को बचाने, राहत कार्यों में सहयोग, समन्वय एवं निगरानी को प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन हेतु केन्द्र एवं राज्य सरकारों के आपदा प्रबन्धन प्राधिकरणों को ड्रोन तकनीक का उपयोग अन्य देशों की तरह अधिक-से-अधिक किया जाना चाहिए लेकिन भारत में वर्तमान में ऐसा नहीं हो रहा है।


उत्तराखण्ड राज्य, जो कई प्रकार की आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील है, के केवल वनमण्डल में पहली बार नैनीताल जिले के दूरस्थ स्थान से तीन ड्रोन्स के द्वारा, वर्ष 2016 की जंगल की आग का रियल टाइम निगरानी कर, आग के निवारण के उपाय किये, जो प्रशंसनीय हैं। आपदा न्यूनीकरण में संलग्न विभागों तथा वनमण्डल को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है जिससे भविष्य में आग की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। ड्रोन्स विभिन्न आपदाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।


प्रतिवर्ष 13 अक्टूबर को अन्तरराष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा कमीकरण दिवस मनाया जाता है। अक्टूबर 2016 के विनाशकारी तूफान मैथ्यू ने हैती तथा फ्लोरिडा में बेहिसाब तबाही की थी। यही स्थिति तब थी जब पूर्व जानकारियों एवं पूर्व चेतावनी प्रणालियों का बेहतर उपयोग किया जाने लगा है। लेकिन तीव्रता का सटीक अनुमान नहीं हो पा रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने इन बिन्दुओं पर वैज्ञानिकों, तकनीक के जानकारों का ध्यान आकर्षित करने के लिये तथा इस दिशा में और अधिक कार्य करने के लिये यह दिवस घोषित किया है। केन्द्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्य सरकारों के आपदा प्रबन्धन प्राधिकरणों में अत्याधुनिक एरियल ड्रोन्स का प्रबन्ध कर, प्रशिक्षित ड्रोन संचालकों की नियुक्ति कर, आपदाओं से प्रभावी तरीकों से निपटने के उपाय करना, समय की आवश्यकता बन गई है। इस हेतु विभिन्न विश्वविद्यालयों/संस्थानों में ड्रोन तकनीकी पाठ्यक्रमों/प्रशिक्षणों को भी प्रारम्भ किया जाना चाहिए।

 

लेखक परिचय


डॉ. विष्णु गाडगील एवं डॉ. नरेन्द्र जोशी प्राध्यापक, भूविज्ञान विभाग, शासकीय होलकर, (आदर्श स्वशासी) विज्ञान महाविद्यालय, इन्दौर (मध्य प्रदेश)

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