आपदा से सुरक्षा की चुनौती

Submitted by Hindi on Tue, 10/11/2011 - 23:40
Source
दैनिक भास्कर ईपेपर, 11 अक्टूबर 2011

यदि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण इन बिंदुओं पर अपना ध्यान केंद्रित करे तो उसके पास यह अवसर है कि वह दुनिया में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक मॉडल के रूप में सामने आ सकता है। भारत की उभरती हुई वैश्विक भूमिका को तब तक पूरी तरह मान्यता नहीं मिल सकती, जब तक कि उसके नागरिक प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित नहीं हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) अपनी स्थापना के सात साल पूरे कर चुका है। ऐसे में भारत के नागरिकों को विभिन्न आपदाओं से सुरक्षा के अपने बुनियादी अधिकार की मांग अब करनी ही चाहिए लेकिन सवाल उठता है कि भारत के नागरिकों को आखिर किस चीज की मांग करनी चाहिए? किसी व्यक्ति को सबसे पहला कदम तो यही उठाना चाहिए कि वह अपने जीवन और संपत्ति के लिए उपयुक्त और वहनीय इंश्योरेंस कवरेज की मांग करे। आपदाओं के कारण लोगों की संपत्ति का भारी नुकसान होता है। उन्हें मिलने वाला मुआवजा आम तौर पर अपर्याप्त होता है और उसे प्राप्त करने में भी काफी समय लग जाता है। आपदाओं का सामना करने की तैयारी का पहला चरण तो जीवन और संपत्ति का इंश्योरेंस ही होना चाहिए। भारत ऐसा देश है, जो लगातार आपदाओं से त्रस्त रहा है। वहीं भारत का इंश्योरेंस बाजार दुनिया के बड़े इंश्योरर्स के लिए लगातार आकर्षक बना हुआ है। प्राकृतिक आपदा की स्थिति में देश के गरीब लोगों का वैश्विक इंश्योरेंस कवरेज आज भी दूर की कौड़ी ही बना हुआ है। बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण तथा एनडीएमए को ऐसे किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए साझा प्रयास करने चाहिए।

नागरिकों को उन संसाधनों की मांग करनी चाहिए, जो उनके घरों को संभावित आपदाओं का सामना करने में सक्षम बना सकें। भारत में अधिकांश भवन आपदाओं को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जाते और उनके निर्माण की गुणवत्ता भी बहुत दयनीय होती है। ऐसे में यह नागरिकों को ही करना होगा कि वे किसी इंजीनियर को बुलवाकर यह प्रमाणित करवाएं कि वे जिस भवन में रह रहे हैं, वह बाढ़ या भूकंप जैसी आपदाओं को सहन करने में सक्षम है या नहीं। यदि भवन असुरक्षित है तो निर्माण की कुल लागत का दस से तीस फीसदी अतिरिक्त खर्च कर भवन को अधिक सुरक्षित बनाने के प्रयास किए जा सकते हैं। आपदा से पहले भवन को सुरक्षित बनाना आपदा के बाद उसकी मरम्मत करने से सस्ता है। राष्ट्रीय विकास परिषद और एनडीएमए को कम से कम शहरी क्षेत्रों में तो ये प्रयास करने ही चाहिए कि वे भवनों की सुरक्षा के लिए नीतिगत और वित्तीय सहायता के प्रयासों को गति प्रदान करें।

घरों की सुरक्षा जितनी ही जरूरी है स्कूलों की सुरक्षा। नागरिकों को यह पूछने का अधिकार है कि जिन स्कूलों में वे अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं, उन्हें राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) द्वारा प्रमाणित किया गया है या नहीं। कुंभकोणम अग्निकांड के बाद सर्वोच्च अदालत ने सभी स्कूलों और एसडीएमए को निर्देशित किया था कि स्कूलों में आपदा से बच्चों की सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंधन किए जाएं। नागरिकों को अभिभावकों के रूप में अपने बच्चों की सुरक्षा की मांग करनी चाहिए। उनके पास एसडीएमए द्वारा सत्यापित सुरक्षा योजना की एक प्रति होनी चाहिए। ईश्वर न करे, लेकिन यदि स्कूल में कभी कोई हादसा होता है तो स्कूल और एसडीएमए पर क्षतिपूर्ति के लिए मुकदमा किया जा सकता है। शिक्षा के अधिकार में यह अधिकार भी सम्मिलित होना चाहिए कि बच्चे सुरक्षित स्कूलों में पढ़ाई करें। अलबत्ता एनडीएमए ने यूनिसेफ के सहयोग से 22 राज्यों के 45 जिलों में भूकंप से सुरक्षा के लिए एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय स्कूल सुरक्षा कार्यक्रम जरूर लॉन्च किया है।

नागरिकों को एक बार अपने जिला कलेक्टर ऑफिस जाकर जिला आपदा प्रबंधन योजना (डीडीएमपी) का अध्ययन जरूर करना चाहिए, ताकि वे आश्वस्त हो सकें कि उनके आवासीय क्षेत्र को योजना में सम्मिलित किया गया है और आपदा की स्थिति में उनके लिए जरूरी प्रावधान हैं। सभी जिला कलेक्टरों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनके पास डीडीएमपी हों, ताकि वे सुरक्षा की बेहतर योजना बना सकें। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने ऐसी योजनाएं बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए हैं और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) ने इसके लिए नए दिशा-निर्देश प्रदान किए हैं। डीडीएमपी के पास आपातकालीन संपर्कों, जीवन रक्षक सेवा प्रदाताओं और नागरिकों की रक्षा के लिए बचाव दल के सदस्यों की सूची होती है। हर साल डीडीएमपी को अपडेट किया जाता है। नागरिकों को इस योजना की कॉपी मांगनी चाहिए, अन्य नागरिकों के साथ उसकी समीक्षा करनी चाहिए और अधिकारियों को इस संबंध में अपने सुझाव देने चाहिए। यदि जिला अधिकारी द्वारा योजना को अपडेट करने में रुचि नहीं ली जाती है तो वे वैधानिक रूप से मुश्किल में पड़ सकते हैं। भारत में सुप्रशासन की जरूरत और मांग दोनों बढ़ती जा रही हैं।

नागरिकों को एक कर्मचारी के रूप में भी अपने अधिकारों के प्रति सजग होना चाहिए। उन्हें यह पता करने का प्रयास करना चाहिए कि क्या उनके नियोक्ता के पास उनकी सुरक्षा की कोई योजना है। यदि है तो उन्हें योजना की समीक्षा करनी चाहिए। पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था में जो उछाल आया है, उस कारण व्यवसाय का भी बहुत विकास हुआ है। मेट्रो शहरों में अधिकांश दफ्तर बहुमंजिला इमारतों में होते हैं। भूकंप या किसी अन्य आपदा की स्थिति में इन बहुमंजिला इमारतों के कारण बड़े पैमाने पर जनहानि हो सकती है। कर्मचारियों को अपने नियोक्ता से न केवल सुरक्षा योजना और उपकरणों की मांग करनी चाहिए, बल्कि जरूरत पडऩे पर सुरक्षा और बचाव अभियानों के लिए प्रशिक्षण की मांग भी करनी चाहिए। दुर्घटना की स्थिति में किसी भी अन्य बचाव दल की तुलना में सहकर्मी ही आपदा प्रभावितों की सहायता करने में अधिक सक्षम होते हैं। यदि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण इन बिंदुओं पर अपना ध्यान केंद्रित करे तो उसके पास यह अवसर है कि वह दुनिया में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक मॉडल के रूप में सामने आ सकता है। भारत की उभरती हुई वैश्विक भूमिका को तब तक पूरी तरह मान्यता नहीं मिल सकती, जब तक कि उसके नागरिक प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित नहीं हैं।

लेखक आपदा राहत संस्थान के संस्थापक हैं।

Email:- mihir@aidml.org

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