अरब सागर

Submitted by Hindi on Thu, 10/28/2010 - 10:25
अरब सागर हिंद महासागर का उत्तरी पश्चिमी भाग है। इसकी सीमाएँ पूर्व में भारत, उत्तर में पकिस्तान तथा दक्षिणी ईरान और पश्चिम में अरब तथा अफ्रीका के सोमाली प्रायद्वीप द्वारा निर्धारित होती हैं। इस सागर की दो मुख्य शाखाएँ हैं। पहली शाखा अदन की खाड़ी है जो लाल सागर और अरब सागर को बाबलमंदब के जलसंयोजक द्वारा मिलाती है। दूसरी शाखा ओमान की खाड़ी है जो आगे चलकर फारस की खाड़ी कहलाती है। अरब सागर का क्षेत्रफल (अंतर्गत समुद्रों सहित) लगभग १७,१५,००० वर्ग मील है। यह सागर प्राचीन काल में समुद्रतटीय व्यापार का केंद्र था और इस समय यूरोप और भारत के बीच के प्रधान समुद्रमार्ग का एक अंग है।

अरब सागर में द्वीपों की संख्या न्यून है और वे अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं। इन द्वीपों में कुरिया मुरिया, सोकोत्रा ओर लकादिव द्वीपसमूह उल्लेखनीय हैं। लकादिव द्वीपसमूह समुद्रांतर (सबमैरीन) पर्वतश्रेणियों के द्योतक हैं। इन द्वीपों का क्रम दक्षिण की ओर हिंदमहासागर के मालदिव और चागोज़ द्वीपसमूहों तक चला जाता है। यह समुद्रांतर श्रेणी संभवत: अरावली पर्वत का ही दक्षिणी क्रम है जो तृतीयक (टर्शियरी) युग में, गोंडवाना प्रदेश के खंडन और भारत के पश्चिमी तट के विभंजन के साथ ही मुख्य पर्वत से विच्छिन्न हो गया। लकादिव-मालदिव-चागोज़ श्रृंखला पूर्णत: प्रवाल (कोरल) द्वारा रचित है और विश्व की कुछ सर्वोत्कृष्ट प्रवाल्याएँ (ऐटॉल) एवं उपढ़्ह्रद (लैगून, समुद्री ताल) यहाँ विद्यमान हैं। बंबई और कराची के बीच की तटरेखा को छोड़कर इस सागर में महाद्वीपीय निधाय (कांटिनेंटल शेल्फ़) अत्यंत संकीर्ण है और महाद्वीपीय ढाल (स्लोप) बड़ी तेज है। (उस लगभग चौरस भूमि को महाद्वीपीय निधाय कहते हैं जो समुद्र के तट पर जल के नीचे रहता है और जिसकी गहराई ६०० फुट से कम होती है। इसके बाद गहराई बड़ी तेजी से बढ़ती है। इस प्रकार बढ़ने से उत्पन्न ढाल को महाद्वीपीय ढाल (कॉन्टिनेंटल स्लोप) कहते हैं।)

अरब सागर के अन्य समुद्रांतर कटों (सबमैरीन रिजेज़) में मरे कूट है, जो उत्तर दक्षिण फैला है। अपनी लंबाई के अधिकांश में यह दोहरा है, अर्थात, दो ऊँची श्रेणियों के मध्य एक घाटी स्थित है। यह मध्यवर्ती घाटी लगभग १२,००० फुट गहरी है। पूर्वोक्त कूट संभवत: सिंध की किरथर श्रेणी का समुद्रांतर विस्तार है। कुछ समय पूर्व एक तीसरी गिरिश्रृंला का पता चला जो बलूचिस्तान और ईरान के तट पर पूर्व पश्चिम दिशा में विद्यमान है। यह संभवत: जेग्रोस पर्वतमाला का समुद्रांतर अंश है। समुद्रांतर कूटों के अतिरिक्त अरब सागर में एक महत्वपूर्ण समुद्रांतर नाली है। यह पश्चिम में सिंध नदी के मुहाने पर इंडस स्वाच के नाम से प्रसिद्ध है। यह महाद्वीपीय निधाय के सिरे पर लगभग १०० फुट गहरी है, परंतु क्रमश: आगे चलकर सिंध नदी के मुहाने पर ३,७२० फुट गहरी हो गई है। इस समुद्रांतर नाली के दोनों ओर ६५६ फुट ऊँची दीवारें हैं।

अरब सागर के वितल में विद्यमान शिलाओं के विषय में हमारा ज्ञान अभी अपूर्ण एवं नगण्य है। इन शिलाओं पर एकत्र निक्षेपों का ही साधारण ज्ञान प्राप्त हो सका है। इस सागर के महाद्वीपीय निजाए का अधिकांश भूजात पंक (टेरोजेनस मड) द्वारा आच्छादित है। यह पंक नदियों द्वारा परिवहित अवसाद है। अधिक गहराई पर ग्लोबीजरोना का निकर्दम (कीचड़) तथा टेरोपाड का निकर्दम है और अगाध सागरीय भागों में लाल मिट्टी विद्यमान है।

अरब सागर के जलपृष्ठ का ताप उत्तर में २६सेंटीग्रेड से लेकर दक्षिण में २७ ५सें. तक है। इस सागर की लवणता ३६ से लेकर३७ प्रति सहस्र है।

अरब सागर की धाराएँ पावस (मानसून हवाओं) के दिशापरिवर्तन के साथ साथ अपना दिशापरिवर्तन करती रहती हैं। शीतकाल में पावस (मानसून हवाएँ) उत्तरपूर्व से चलता है, जिसके फलस्वरूप अरब सागरीय तटरेखा के अनुरूप प्रवाहित जलधारा पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। इसे उत्तर पूर्वी पावसप्रवाह (नॉर्थ-ईस्ट मानसून ड्रिफ़्ट) कहते हैं। ग्रीष्मकाल में दक्षिण पश्चिमी पावसप्रवाह अरब सागरीय तट के अनुरूप पूर्व की ओर प्रवाहित होता है। (रा.ना.मा.)

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