आर्द्रता और वर्षण (Humidity and precipitation in Hindi)

Submitted by RuralWater on Wed, 10/30/2019 - 10:52

हमें यह पता है कि जलवाष्प एक छोटा घटक होने के बावजूद वायुमंडल का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण अवयव है। इस पाठ में हम दिन प्रतिदिन में होने वाले मौसम संबंधी परिवर्तनों में जलवाष्प की भूमिका का अध्ययन करेंगे।

जलवाष्प, वायुमंडल का सबसे अधिक परिवर्तनशील अवयव है। वायुमंडल के एक इकाई आयतन में जलवाष्प का अनुपात शून्य से चार प्रतिशत तक होता है। वायु में जल पदार्थ के तीनों रूपों- ठोस (हिमकण), द्रव (जलबिन्दु) तथा गैस (जलवाष्प) में विद्यमान रह सकता है। जल सामान्यतया वायु में स्वाद रहित, गन्ध रहित एवं पारदर्शी गैस के रूप में रहता है। इस गैस को ही जलवाष्प कहते हैं। वायुमंडल में जलवाष्प के विद्यमान रहने के ही कारण पृथ्वी पर जीवन संभव हुआ है। आइये, पृथ्वी पर पाये जाने वाले विविध प्रकार के जीवन के लिये जलवाष्प के महत्त्व का अध्ययन करें।


(1) हमें जान लेना चाहिए कि वायुमंडल में विद्यमान जलवाष्प सूर्यातप एवं पार्थिव विकिरण के महत्वपूर्ण अंश को सोख लेती है। इस प्रकार यह पृथ्वी के तल से होने वाले ऊष्मा ऊर्जा की क्षति को रोकती है और पृथ्वी पर अनुकूल तापमान बनाये रखने में मदद देती है।

(2) वायु में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा वाष्पीकरण की दर को प्रभावित करती है। 

(3) एक इकाई आयतन की वायु में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा उसके गुप्त ताप या उसमें संग्रह की हुई ऊर्जा का निर्धारण करती है जो वायुमंडल में परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(4) किसी स्थान या प्रदेश की वायु में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा वर्षण के लिए उसकी संभावित क्षमता का संकेत देती है। यदि वायु में जलवाष्प की मात्रा अधिक है तो वह अधिक मात्रा में वर्षण करने में सक्षम है। अथवा कम है तो कम मात्रा में ही वर्षण कर सकती हैं

(5) वायु में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा फसलों पर अनुकूल प्रभाव डालती है। इसके विपरीत गर्म और शुष्क वायु फसलों को क्षति पहुँचाती है, जैसा कि उत्तरी-पश्चिमी भारत की रबी की फसल को होता है।

(6) शुष्क वायु हमारे शरीर की त्वचा को शुष्क व कड़ा बना देती है। यही कारण है कि हम लोग कड़ाके की शीत ऋतु और ग्रीष्म ऋतुओं में अपने चेहरे की त्वचा की सुरक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की क्रीमों का उपयोग करते हैं।

आर्द्रता
जल, जलवाष्प में कैसे बदल जाता है? सूर्य की ऊष्मा जल को जलवाष्प में बदलती रहती है। किसी स्थान पर किसी समय वायुमण्डल में गैस के रूप में विद्यमान इस अदृश्य जलवाष्प को वायु की आर्द्रता कहते हैं। दूसरे शब्दों में, आर्द्रता से तात्पर्य जल की उस नमी से है जो किसी वायु में जलवाष्प की मात्रा के रूप में विद्यमान होती है। वायु में विद्यमान आर्द्रता को निम्न दो प्रकार से व्यक्त किया जाता हैः

१. निरपेक्ष आर्द्रता
२. सापेक्ष आर्द्रता


१ - निरपेक्ष आर्द्रता:

किसी इकाई आयतन की वायु में किसी समय विशेष में विद्यमान जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे ग्राम प्रतिघन मीटर में व्यक्त किया जाता है। उदाहरण के लिये, यदि किसी वायु की निरपेक्ष आर्द्रता 10 ग्राम है तो इसका तात्पर्य है कि उस वायु में एक घन मीटर आयतन में 10 ग्राम आर्द्रता जलवाष्प के रूप में विद्यमान है। निरपेक्ष आर्द्रता स्थान व समय के परिवर्तन के साथ बदलती रहती है।

किसी वायु की जलवाष्प धारण करने की क्षमता पूर्णतः उसके तापमान पर निर्भर करती है। तापमान के बढ़ने के साथ वायु में जलवाष्प धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है। उदाहरण के लिये 100  से. तापमान वाली कोई वायु अपने अन्दर 11.4 ग्राम जलवाष्प प्रतिघन मीटर धारण कर सकती है। यदि इस वायु का तापमान बढ़कर 210  से. हो जाता है तो यही वायु एक घन मीटर आयतन में 22. 2 ग्राम आर्द्रता जलवाष्प रूप में धारण कर सकती है।

चित्र देखें, चित्र में वायु तापमान तथा उसमें अधिकतम आर्द्रता धारण करने की क्षमता के संबंध को दर्शाया गया है। इस चित्रा पर एक सामान्य दृष्टि डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि तापमान के बढ़ने के साथ वायु की आर्द्रता धारण करने की क्षमता भी बढ़ जाती है। तापमान तथा वायुदाब में परिवर्तन होने के कारण वायु के आयतन में परिवर्तन होता है, फलस्वरूप उसकी निरपेक्ष आर्द्रता भी बदल जाती है। अतः आर्द्रता मापने के लिये अधिक विश्वसनीय माप की आवश्यकता होती है।

 

2 - सापेक्ष आर्द्रता:

सापेक्ष आर्द्रता वायुमण्डलीय नमी का सबसे महत्वपूर्ण तथा विश्वसनीय माप है। सापेक्ष आर्द्रता किसी निश्चित आयतन की वायु में वास्तविक जलवाष्प की मात्रा तथा उसी वायु के किसी दिये गए तापमान पर अधिकतम आर्द्रता धारण करने की क्षमता का अनुपात है। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।

सापेक्ष आर्द्रता = वायु में वाष्प दबाव/संतप्त वाष्प दबाव ×100

चित्र से यह स्पष्ट है कि कोई वायु किसी दिए गये तापमान पर जलवाष्प की एक निश्चित अधिकतम मात्रा ही अपने अन्दर धारण कर सकती है। जब यह स्थिति आ जाती है तो हम कहते हैं कि वायु पूर्णतया संतृप्त हो गई है जिस तापमान पर वायु पूर्वत या संतृप्त हो जाता है उसे ओसांक या संतृपन बिन्दु कहते हैं। किसी वायु की सापेक्ष आर्द्रता इस बिन्दु पर शत-प्रतिशत होती है।

सापेक्ष आर्द्रता इस पाठ को भली भांति समझने के लिये एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विचार है। अतः इसे एक उदाहरण की मदद से समझें। चित्र से यह स्पष्ट है कि 210  से. वाली वायु अपने अन्दर अधिकतम 22.2 ग्राम प्रति घन मीटर ही आर्द्रता रख सकती है। यदि वायु 210  से. तापमान पर 11.1 ग्राम आर्द्रता धारण किये हुये है। तो इस वायु की सापेक्ष आर्द्रता 11.1/22.2x100 अर्थात 50 प्रतिशत होगी। यदि यही वायु 210  से. पर वास्तव में 22.2 ग्राम आर्द्रता धारण किए हुए हो तो उसकी सापेक्ष आर्द्रता 22.2/22.2X100 अर्थात 100 प्रतिशत होगी।

जब वायु की सापेक्ष आर्द्रता शत प्रतिशत होती है तो वायु संतृप्त हो जाती है। यदि सापेक्ष आर्द्रता 100 प्रतिशत से कम है तो वायु असंतृप्त कहलाती है।

सापेक्ष आर्द्रता उस समय बढ़ती है, जब वायु का तापमान गिर जाता है या उस वायु में अधिक नमी वाली वायु आकर मिल जाती है। सापेक्ष आर्द्रता उस समय घटती हैं जब वायु का तापमान बढ़ जाता है या उस वायु में कम नमी वाली वायु आकर मिल जाती है।

यह स्पष्ट करने के लिए कि किसी वायु में विद्यमान जलवाष्प की सापेक्ष आर्द्रता उसकी निरपेक्ष आर्द्रता की तुलना में अधिक उपयोगी माप है, इसे एक और उदाहरण लेकर स्पष्ट किया जा सकता है। 

मान लीजिये एक गिलास में 250 ग्राम पानी है। लेकिन जब तक किसी को यह ज्ञात न हो कि उस गिलास में अधिकतम कितना पानी भरा जा सकता है, वह यह नहीं बता सकता कि गिलास पानी से कितना भरा है। लेकिन जब उसे यह ज्ञात होता है कि गिलास में 500 ग्राम पानी भरा जा सकता है तो वह तत्काल यह बता सकता है कि गिलास पानी से आधा भरा हुआ है। इसी प्रकार, जब कोई किसी वायु की सापेक्ष आर्द्रता मापता है तो उसे न केवल उसकी वास्तविक जलवाष्प की मात्रा ज्ञात होनी चाहिए, बल्कि यह भी जानना आवश्यक है कि उस वायु में उस तापमान पर कितने ग्राम प्रतिघन मीटर अधिकतम आर्द्रता समा सकती है। 

वाष्पीकरण
वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा जल गैस अवस्था में परिवर्तित होता है, वाष्पीकरण कहलाती है। वाष्पीकरण की प्रक्रिया ओसांक अवस्था को छोड़कर प्रत्येक तापमान, स्थान व समय में होती है, वाष्पीकरण की दर कई कारकों पर निर्भर करती है। इनमें से प्रमुख कारक इस प्रकार हैंः-

क - जल की उपलब्धता: स्थल भागों की अपेक्षा जल भागों से वाष्पीकरण अधिक होता है। यही कारण है कि वाष्पीकरण महाद्वीपों की तुलना में महासागरों पर अधिक होता है।

ख - तापमान: हम जानते हैं कि गर्म वायु ठंडी वायु की तुलना में अधिक नमी धारण कर सकती है। अतः जब किसी वायु का तापमान अधिक होता है, वह अपने अन्दर
कम तापमान की तुलना में अधिक नमी धारण करने की स्थिति में होती है। यही कारण है कि शीत काल की तुलना में ग्रीष्म काल में वाष्पीकरण अधिक होता है, अतः गीले कपड़े सर्दियों की तुलना में गर्मियों में जल्दी सूख जाते हैं।

ग - वायु की नमी: यदि किसी वायु की सापेक्ष आर्द्रता अधिक है तो वह कम मात्रा में अतिरिक्त नमी धारण कर सकती है। इसके विपरीत यदि सापेक्ष आर्द्रता कम है तो अधिक मात्रा में अतिरिक्त नमी धारण कर सकती है। ऐसी स्थिति में वाष्पीकरण अधिक तेजी से होगा। वायु की शुष्कता भी वाष्पीकरण की दर को तेज करती है। वर्षा वाले दिनों में वायु में अधिक नमी होने के कारण गीले कपड़े देर से सूखते हैं।

घ - पवन: हवा भी वाष्पीकरण की दर को प्रभावित करती है। यदि वायु शांत है, तो जलीय धरातल से लगी वायु वाष्पीकरण होते ही संतृप्त हो जाएगी। वायु के संतृप्त होने पर वाष्पीकरण रूक जाएगा। यदि वायु गतिशील है तो वह संतृप्त वायु को उस स्थान से हटा देती है उसके स्थान पर कम आर्द्रता वाली वायु आ जाती है। इससे वाष्पीकरण की प्रक्रिया फिर प्रारम्भ हो जाती है और तब तक होती रहती है जब तक संतृप्त वायु पवन द्वारा हटायी जाती रहती है। 

च- बादलों का आवरण: मेघाच्छादन सौर विकिरण में अवरोध डालता है और किसी स्थान की वायु के तापमान को प्रभावित करता है। इस प्रकार यह अप्रत्यक्ष रूप से वाष्पीकरण प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।

यह रोचक तथ्य है कि एक ग्राम जल को जलवाष्प में बदलने के लिये लगभग 600 कैलोरी ऊष्मा की आवश्यकता होती है। एक ग्राम जल के तापमान को 10 से बढ़ाने में जो ऊष्मा ऊर्जा खर्च होती है उसे कैलोरी कहते हैं। तापमान में बिना परिवर्तन किये जब जल द्रव अवस्था से गैसीय अवस्था में बदलता है या जब वह ठोस (बर्फ) अवस्था से द्रव (जल) अवस्था में बदलता है तो इस क्रिया में जो ऊष्मा ऊर्जा खर्च होती है, उसे गुप्त ऊष्मा कहते हैं।

यह एक प्रकार की छिपी हुई ऊष्मा होती है। इसका प्रभाव तापमापी पर दिखाई नहीं देता। जब जलवाष्प जल की नन्हीं-नन्हीं बूँदों या बर्फ के कणों में बदलती है तो यह गुप्त ऊष्मा वायु में छोड़ दी जाती है। वायुमंडल में छोड़े जाने वाली यह गुप्त ऊष्मा मौसम परिवर्तनों के लिये ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत बनती हैं। वाष्पोत्सर्जन एक विशिष्ट प्रक्रिया है जिसमें वनस्पतियों के पत्तों एवं उसके तनों द्वारा जल वाष्प के रूप में परिवर्तित होता है। किसी क्षेत्रा से वाष्पीकरण तथा वाष्पोत्सर्जन द्वारा संयुक्त रूप से हुए जल के ह्रास को वानस्पतिक-वाष्पोत्सर्जन कहते हैं।

संघनन

संघनन वह प्रक्रिया है जिसमें वायुमंडलीय जलवाष्प जल या बर्फ के कणों में बदलती है। यह वाष्पीकरण के ठीक विपरीत प्रक्रिया है। जब किसी संतृप्त वायु का तापमान ओसांक से नीचे गिरता है तो वह वायु अपने अन्दर उतनी आर्द्रता धारण नहीं कर सकती जितनी वह पहले धारण किये हुये थी। अतः आर्द्रता की अतिरिक्त मात्रा, तापमान (जिस पर संघनन होता है) के अनुसार जल की सूक्ष्म बूँदों या बर्फ के कणों में बदल जाती है।

(क) संघनन की प्रक्रिया 

वायु का तापमान दो स्थितियों में कम होता है। एक तो तब जब स्वतंत्रा रूप से बहती वायु किसी अधिक ठंडी वस्तु के संपर्क में आती है। दूसरी स्थिति में जब वायु ऊँचाई की ओर उठती है। संघनन धुँआ, नमक तथा धूलकणों के चारों ओर होता है; क्योंकि ये कण जलवाष्प को अपने चारों ओर संघनित होने के लिए आकर्षित करते हैं। इन कणों को आर्द्रता ग्राही केन्द्रक कहते हैं। जब किसी वायु की सापेक्ष आर्द्रता अधिक होती है, तो थोड़ी सी ठंड होने पर ही तापमान ओसांक से नीचे आ जाता है। लेकिन, जब किसी वायु की सापेक्ष आर्द्रता कम होती है तथा वायु का तापमान अधिक होता है तो उस वायु के तापमान को ओसांक से नीचे अधिक ठण्ड होने पर ही लाया जा सकता है। इस प्रकार संघनन की गति व मात्रा वायु की सापेक्ष आर्द्रता तथा उसके ठण्डा होने की दर पर निर्भर करती है।

(ख) संघनन के रूप

संघनन दो परिस्थितियों में होता हैः प्रथम, जब ओसांक हिमांक बिन्दु या 00  से. से कम होता है तथा दूसरी स्थिति में तब जब यह हिमांक बिन्दु से अधिक होता है। इस प्रकार, संघनन के रूपों को दो वर्गों में रखा जा सकता हैः-


(I) ओसांक के हिमांक बिन्दु से नीचे तापमान होने पर बनते हैं- पाला, हिम तथा कुछ प्रकार के बादल।
(II) ओस, धुन्ध, कोहरा, कुहासा तथा कुछ प्रकार के बादल ओसांक के हिमांक बिन्दु से ऊँचे तापमान पर बनने वाले रूप हैं।  संघनन के रूपों को स्थान के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए धरातल पर या प्राकृतिक पदार्थों जैसे घास व पेड़-पौधों की पत्तियों पर, भूतल के पास वाली वायु में अथवा क्षोभमण्डल में कुछ ऊँचाइयों पर। 

(III) ओस: जब वायुमण्डलीय नमी संघनित होकर जल बिन्दुओं के रूप में ठोस पदार्थों के ठण्डे धरातल जैसे घास, पेड़-पौधों की पत्तियों तथा पत्थरों पर जमा हो जाती है तो उसे ओस कहते हैं। ओस के रूप में संघनन तब होता है जब आकाश साफ हो, हवा न चल रही हो तथा ठण्डी रातों में वायु की सापेक्ष आर्द्रता अधिक हो। इन दशाओं में पार्थिव विकिरण अधिक तीव्रता से होता है तथा ठोस पदार्थ इतने ठण्डे हो जाते हैं कि उनके संपर्क में आने वाली वायु का तापमान ओसांक से नीचे गिर जाता है। फलस्वरूप, वायु की अतिरिक्त आर्द्रता इन पदार्थों पर जल बिन्दुओं के रूप में जमा हो जाती है। ओस तब बनती है जब ओसांक हिमांक से अधिक होता है। ओस बनने की प्रक्रिया को देखा जा सकता है। जब रेफ्रिजेरेटर में रखी पानी की बोतल से एक गिलास में पानी डालने से गिलास की ठण्डी बाहरी सतह उसके पास की वायु के तापमान को ओसांक से नीचे गिरा देती है, जिससे वायु की अतिरिक्त नमी गिलास की सतह पर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में जमा हो जाती है। 

(IV) पाला: ऊपर बताई गई परिस्थिति में जब ओसांक हिमांक बिन्दु के नीचे होता है तो अतिरिक्त नमी बर्फ के अति सूक्ष्म कणों में बदल जाती है। इसे पाला कहते हैं। इस प्रक्रिया में वायु की नमी प्रत्यक्ष रूप में बर्फ के छोटे-छोटे कणों में बदल जाती है। संघनन का यह रूप खेतों में खड़ी फसलों जैसे आलू, मटर, अरहर, चना आदि के लिये  हानिकारक होता है। यह सड़क यातायात के लिये भी कठिनाई पैदा करता है।


(V) धुंध और कोहरा: जब संघनन पृथ्वी-तल के निकट की वायु में छोटे-छोटे जल बिन्दुओं के रूप में होता है और ये जल बिन्दु वायु में तैरते रहते हैं, तो इसे धुंध कहते हैं। धुंध में दृश्यता एक किलोमीटर से अधिक और दो किलोमीटर से कम होती है। लेकिन जब दृश्यता एक किलोमीटर से कम होती है तो संघनन का यह रूप कोहरा कहलाता है।

(VI) धूम-कोहरा: धूम-कोहरा एक विशेष प्रकार का कोहरा है जो धुँआ, धूल, कार्बन मोनो आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड और अन्य धुओं द्वारा प्रदूषित कर दिया जाता है। धूम-कोहरा बड़े-बड़े नगरों और औद्योगिक केन्द्रों में अक्सर पाया जाता है। इसका लोगों की आँखों तथा श्वसन क्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ता है। 

(VII) बादल: वायुमण्डल में तैरते हुए हम जल बिन्दुओं, बर्फ के कणों अथवा विभिन्न आकार के धूल कणों के साथ दोनों के मिश्रित झुंड को बादल कहते हैं। एक बादल में 060.01 से लेकर 0.02 मि.मि. के लाखों कण होते हैं। 10 लाख कणों के बादल में इसके मात्रा 10वें भाग के बराबर जल या बर्फ के कण होते हैं। बादलों को सामान्यतया उनके रूप या आकृति तथा ऊँचाई के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। इन दोनों विशेषताओं को मिलाने से बादलों को निम्न वर्गों में बाँटा जा सकता हैः

  • निम्न मेघ: ये बादल धरातल से 2000 मीटर की ऊँचाई तक बनते हैं। स्तरीय मेघ इस परिवार का प्राथमिक मेघ हैं जो निम्न परन्तु धरातल से ऊपर कुहरे के समान पर्तों की आकृति वाला होता है। स्तरीय कपासी मेघ निम्न भूरी पर्तों वाला गोलाकार होता है। यह पक्तियों, झुंड या लहरदार रूप में व्यवस्थित होता । वे बादल जो ऊध्र्व रूप में विकसित होते हैं इनको दो भागों में विभाजित कर सकते हैंः- कपासी और कपासी वर्षा मेघ कपासी मेघ सघन, गुम्बदाकार एवं सपाट आधार वाले होते हैं। ये ही बढ़कर कपासी वर्षा वाले मेघ बन जाते हैं। इनका ऊध्र्व मुखी विकास बादल के नीचे स्थित ऊध्र्व तरंग की शक्ति एवं बादल बनते समय छोड़ी गई गुप्त उष्मा की मात्रा के ऊपर निर्भर करता है। कपासी वर्षा मेघ से ठीक नीचे से देखने पर पूरा आकाश बादल से भरा दिखाई देता है तथा वर्षा स्तरीय (Nimbo stratus) मेघ की तरह दिखता है। निम्बस (Nimbus/Nimbo) शब्द का अर्थ उस मेघ से होता है जिससे तेज वर्षा होती है। यह लेटिन की भाषा से लिया गया है।
  • मध्यम मेघ- ये बादल 2000 से 6000 मीटर की ऊँचाई के मध्य बनते हैं। इस वर्ग में उच्च कपासी मेघ(Alto-cumulus) एवं उच्च स्तरी मेघ (Alto-stratus) शामिल हैं। 
  • उच्च मेघ- इन बादलों का निर्माण 6000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर होता है। इनमें पक्षाभ (Cirrus), पक्षाभ स्तरी (Cirro-stratus), पक्षाभ कपासी (Cirro-cumulus) मेघ शामिल हैं।    

वर्षण

जब जल तरल (जल बिन्दुओं) या ठोस (हिमकणों) रूप में धरातल पर गिरता है तो उसे वर्षण कहते हैं। वायु में संघनन की सतत प्रक्रिया के परिणामस्वरूप जल बिन्दुओं या हिम कणों का भार अधिक व आकार बड़ा हो जाता है तथा वे वायु में तैरते हुये रूक नहीं पाते तो पृथ्वी के धरातल पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे गिरने लगते हैं। 

वर्षण के रूप
पृथ्वी पर वर्षण कई रूपों में होता है जैसे जल की बूंदों, हिमलव व ठोस बर्फ या ओला तथा कभी-कभी एक साथ जल की बूदों व ओले के रूप में। वर्षण का रूप अधिकाशतः संघनन की विधि व तापमान पर निर्भर करता है।

वर्षण के अनेक रूप हैंः-

(I) फुहार तथा वर्षा: जब समान आकार की अत्यन्त छोटी-छोटी बूदें जिनका व्यास 0.5 मि.मि. से कम होता है धरातल पर गिरती हैं तो उसे फुहार कहते हैं। जब जल की छोटी-छोटी बूदें मिलकर बड़ी बूदों के रूप में धरातल पर गिरती है तो उसे वर्षा कहते हैं। 

(II) हिमपात: जब संघनन हिमांक (-0से) से नीचे तापमान पर होता है तो वायुमण्डलीय आर्द्रता हिमकणों में बदल जाती है। ये छोटे-छोटे हिमकण मिलकर हिमलव बनाते हैं। जो बड़े और भारी होकर धरातल पर गिरने लगते हैं। वर्षण के इस रूप को हिमपात कहते हैं। पश्चिमी हिमालय, मध्य व उच्च अक्षांशीय प्रदेशों में शीत काल में सामान्यतया हिमपात होता है।

(III) सहिम वर्षा: सहिम वर्षा जमी हुई वर्षा है। यह तब होती है जब वायु की ठंडी परत से गुजरती हुई पानी की बूदें जमकर ठोस होकर धरातल पर गिरती हैं। सामान्यतया यह पानी की बूंदों तथा छोटे-छोटे ठोस बर्फ के गोलियों का मिश्रित रूप है।

(IV) ओला पात: जब बर्फ का टुकड़ा या छोटा गोला (Hailstones) जिसका व्यास 5 से 50 मि.मी. तक होता है, अलग-अलग या सम्मिलित होकर विभिन्न आकारों के पिण्ड के रूप में धरातल पर गिरता है तो उसे ओला पात कहते हैं। ओला पारदर्शी एवं पारभासी बर्फ के अदल-बदलकर बने सतह का बना होता है। 

वर्षा के प्रकार

हम जानते हैं कि जब आर्द्रता से युक्त वायुराशि आकाश में अधिक ऊँचाइयों की ओर चढ़ती है तो ठंडी होकर उसका तापमान नीचे गिरता है। ऐसा होने पर जब वायु का तापमान ओसांक के नीचे गिर जाता है तो संघनन और वर्षण होता है। प्रकृति में किसी वायु राशि को मुख्यतः तीन प्रकार से ऊपर उठने के लिये बाध्य होना पड़ता है और प्रत्येक परिस्थिति में होने वाले वर्षण या वर्षा की अपनी.अपनी विशेषतायें होती हैं। ;कद्ध संवहनीय वर्षारू उष्णकटिबन्ध में पृथ्वी के अत्याधिक गर्म होने से ऊध्र्वाधर वायु
धाराएँ पैदा होती है। ये वायु धारायें गर्म.आर्द्र वायु को वायुमण्डल के उच्च स्तरों तक उठा देती हैं। जब इस प्रकार की आर्द्र वायु का तापमान ओसांक से नीचे लगातार गिरता है तो बादल बनते हैं। ये बादल बिजली की चमक व गरज के साथ वर्षा करते हैं। इस प्रकार की वर्षा को संवहनीय वर्षा कहते हैं। इस प्रकार की वर्षा विषुवतीय प्रदेशों में प्रायः प्रतिदिन दोपहर के बाद होती है। 

पर्वतकृत वर्षा: जब गर्म आर्द्र पवनों के मार्ग में कोई पर्वत श्रेणी अवरोध उपस्थित करती है तो उन्हें बाध्य होकर ऊपर उठना पड़ता है। ऊपर उठती हुई ये आर्द्र पवनें ठंडी होने लगती हैं। जब उनका तापमान ओसांक से नीचे गिरता है तो बादल बनते हैं। इन बादलों से पवनाभिमुख ढालों के विस्तृत भागों में वर्षा होती है। इस प्रकार की वर्षा को पर्वतकृत वर्षा कहते हैं। यद्यपि जब ये पवनें पर्वतीय श्रेणी को पार कर दूसरी ओर पवनविमुख ढालों पर उतरती हैं तो गर्म हो जाती हैं और बहुत कम वर्षा करती हैं। पवनविमुख ढालों की ओर के क्षेत्रों को वृष्टि छाया क्षेत्रा कहते हैं। (देखिये चित्रा 12.4) भारत के मेघालय प्रदेश की खासी पहाड़ी के दक्षिणी सीमांत पर स्थित चेरापूंजी, पर्वतकृत वर्षा का एक प्रसिद्ध उदाहरण है।

अभिसरण या चक्रवातीय वर्षा: अभिसरण वर्षा की उत्पत्ति तब होती है जब वायु तरंग अभिसरित होकर उठती हैं। एक कटिबन्धीय क्षेत्रों में जब विपरीत विशेषताओं वाली वायु राशियाँ मिलती हैं तो उनमें लगभग उध्र्वाधर उत्थान होता है जिससे संवहन की क्रिया होती है। यह संवहन की क्रिया बार-बार वाताग्रों के सहारे होती है। जहाँ संबंधित वायुराशियों का तापमान काफी मिला होता है। वाताग्र के सहारे भाप के मिलने से प्रायः संघनन की क्रिया होती है। जिसके फलस्वरूप वर्षा होती है। जब भिन्न घनत्व और तापमान की दो बड़ी वायु राशियां मिलती हैं तो गर्म आर्द्र वायुराशि ठंडी वायुराशि के ऊपर चढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में गर्म वायुराशि संघनित होकर बादल बनाती हैं जो विस्तृत रूप में वर्षा करते हैं। यह वर्षा बिजली की चमक और गरज के साथ होती है। इस प्रकार की वर्षा को वाताग्री वर्षा भी कहते हैं। यह वर्षा गर्म और शीत दोनों वाताग्रों से होती है (चित्रा 12.5)। वाताग्री वर्षा स्थिर और पूरे दिन या कई दिनों तक होती है।

वर्षा के इन तीनों प्रकारों में आर्द्र वायुराशि का ठंडा होना बहुत जरूरी है। संवहनीय वर्षा में गर्म-आर्द्र वायु के ऊपर उठने के बाद की क्रियाएं पर्वतकृत वर्षा के समान हैं। प्रकृति में ये तीनों विधियां एक साथ कार्य करती हैं। वास्तव में पृथ्वी का ज्यादातर वर्षण या वर्षा किसी एक कारण की अपेक्षा दो या अधिक कारणों का परिणाम होता है।

वर्षण का वितरण

वर्षण का प्रादेशिक वितरण संसार में असमान है। संसार में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 97.5 से.मी. होती है। लेकिन स्थलीय भाग महासागर की अपेक्षा कम वर्षा प्राप्त करते
हैं। स्थलीय भागों में वार्षिक वर्षण में काफी अन्तर देखने को मिलता है। पृथ्वी के धरातल के विभिन्न स्थानों पर भिन्न ऋतुओं में विभिन्न मात्रा में वर्षण होता है। 

वर्षण के वितरण के प्रमुख लक्षणों को भूमण्डलीय दाब व पवन पेटियों, स्थल व जलीय भागों के वितरण तथा स्थलाकृतिक लक्षणों की मदद से स्पष्ट किया जा सकता है। वर्षण के प्रादेशिक व मौसमी अन्तरों के लिए उत्तरदायी कारणों से संबंधित किन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचने से पहले, आइए सबसे पहले इसके प्रादेशिक व मौसमी वितरण के रूपों का अवलोकन करें। 

(क) प्रादेशिक अन्तर

वर्षण की औसत वार्षिक मात्रा के आधार पर संसार में हम निम्न वर्षण प्रदेशों की पहचान कर सकते हैं। (देखिये चित्रा 12.6) 

  • (I) भारी वर्षण के प्रदेश: जिन प्रदेशों में 200 से.मी. से अधिक वार्षिक वर्षण होता है, उन्हें इस वर्ग में सम्मिलित किया जाता है। इनमें विषुवतीय, उष्ण कटिबन्ध के तटीय क्षेत्रा तथा शीतोष्ण कटिबन्ध के पश्चिमी तटीय प्रदेश शामिल हैं।
  • (II) मध्यम वर्षण के प्रदेश: जिन प्रदेशों में 100 से 200 से.मी. वार्षिक वर्षण होता है, वे इस वर्ग में आते हैं। ये प्रदेश अति वर्षण प्रदेशों के साथ लगे हुए प्रदेश हैं। उपोष्ण कटिबन्ध के पूर्वी तटीय प्रदेश तथा गर्म शीतोष्ण कटिबन्ध के तटीय प्रदेश इस वर्ग के प्रदेशों में शामिल हैं।
  • (III) कम वर्षण के प्रदेश: इस वर्ग में वे प्रदेश आते हैं जहाँ वार्षिक वर्षण 50 से.मीसे 100 से.मी. तक होता है। ये प्रदेश उष्ण कटिबन्धों के आन्तरिक भागों तथा शीतोष्ण कटिबन्ध के पूर्वी आन्तरिक भागों में स्थित है।
  • (IV) अति अल्प वर्षण के प्रदेश: वृष्टि छाया क्षेत्रों या पर्वत श्रेणियों के पवन विमुख ढ़ालों पर, महाद्वीपों के आन्तरिक भागों, अयन वृत्तों पर स्थित महाद्वीपों के पश्चिमी सीमान्त क्षेत्रों और उच्च आक्षांशों में वार्षिक वर्षण 50 से.मी. से कम होता है। इन प्रदेशों में, उष्ण, शीतोष्ण तथा शीत कटिबन्धीय मरूस्थल भी सम्मिलित हैं।

आइये अब संसार के मानचित्र में औसत वर्षण के वितरण का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें (देखिये चित्रा 12.6)। आप निम्न निष्कर्षों पर पहुँचेंगे। 

  • (1) विषुवतीय प्रदेशों में सबसे अधिक वर्षण होता है जो ध्रुवों की ओर क्रमशः कम होता जाता है।
  • (2) समुद्र तटीय प्रदेशों में अधिक वर्षण होता है तथा महाद्वीपों के आन्तरिक भागों की ओर क्रमशः कम होता जाता है।
  • (3) विषुवतीय प्रदेश, उष्ण कटिबन्धीय पूर्वी तटीय क्षेत्रा तथा शीतोष्ण कटिबन्धीय पश्चिमी तटीय प्रदेशों में अधिक वर्षण होता है।
  • (4) उच्च भूमियों के पवनाभिमुख ढालों पर भारी वर्षण होता हैः जबकि पवनविमुख ढालों पर बहुत कम। 
  • (5) गर्म धाराओं के समीपवर्ती तटीय भागों की तुलना में ठण्डी धाराओं के समीपवर्ती तटीय भाग अधिक शुष्क होते हैं। 
  • (6) अयनवृत्तों पर स्थित महाद्वीपों के पश्चिमी सीमान्त क्षेत्रों तथा ध्रुवीय प्रदेशों में वर्षण बहुत कम होता हैं। सन्मार्गी पवनों का इन क्षेत्रों में पहुँचते-पहुँचते शुष्क हो जाना तथा धु्रवीय पवनों का ठण्डा व शुष्क होना इसके प्रमुख कारण हैं।

(ख) ऋतुवत् अन्तर
संसार के भिन्न भागों में वर्षण के वितरण में पाये जाने वाले प्रादेशिक अन्तर औसत वार्षिक वर्षण पर आधारित है। इनसे मुख्यतः उन प्रदेशों के वर्षण के स्वरूप का सही
चित्राण नहीं होता जहाँ वर्षण की मात्रा में ऋतुवत अन्तर एक सामान्य लक्षण हैं, उदाहरण के लिए मरूस्थलीय, अर्द्ध मरूस्थलीय या उपार्द्र प्रदेश। अतः संसार में वर्षण
के ऋतुवत् अन्तरों का अध्ययन महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे संबंधित तथ्य इस प्रकार हैं-


(I) विषुवतीय प्रदेशों तथा शीतोष्ण भूमियों के पश्चिमी भागों में वर्षण वर्ष भर होता है। विषुवतीय क्षेत्रों में जहाँ संवहनीय वर्षा होती है और शीतोष्ण प्रदेश में पछुआ पवनों द्वारा चक्रवातीय एवं पर्वतकृत वर्षा होती है।

(II) संसार के लगभग दो प्रतिशत भागों में वर्षण केवल शीतकाल में होता है। इनमें संसार के भूमध्य सागरीय प्रदेश तथा भारत का कोरोमण्डल तट शामिल है। वायुदाब कटिबन्धों तथा भूमण्डलीय पवनों के ऋतु के अनुसार उत्तर-दक्षिण खिसकने से, भूमध्य सागरीय प्रदेशों में उपोष्ण उच्च दाब क्षेत्रा तथा सन्मार्गी पवनों की उपस्थिति के कारण गर्मियों में वर्षा नहीं होती, क्योंकि सन्मार्गी पवनें महाद्वीपों के इन पश्चिमी भागों में पहुँचते-पहुँचते शुष्क हो जाती हैं।

(III) संसार के शेष भागों में वर्षण केवल गर्मियों में होता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि संसार के अधिकांश भागों में वर्षण में ऋतुवत अन्तर स्पष्ट रूप में अनुभव किये जाते हैं। इससे वर्षा जल का कुछ भाग बर्बाद हो जाता है। हमारे देश की भी कुछ ऐसी ही कहानी है।

वर्षण का ऋतुवत् वितरण हमें उसकी प्रभावी क्षमता को आंकने में मदद करता है। उदाहरण के लिये उच्च अक्षांशीय सीमित वर्धन काल वाले प्रदेशों में होने वाला हल्का वर्षण, निम्न अक्षांशीय प्रदेशों में भारी वर्षण की तुलना में अधिक प्रभावी होता है। इसी प्रकार, ओस, धुंध व कोहरे के रूप में होने वाला वर्षण भारत में मध्यवर्तीय भागों तथा
कालाहारी मरूस्थलों में खड़ी हुई फसलों व प्राकृतिक वनस्पति पर प्रशंसनीय प्रभाव डालता है।

(ग) वर्षा के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक

(I) नमी की आपूर्ति: किसी प्रदेश में वर्षा की मात्रा को निर्धारित करने वाला महत्वपूर्ण कारक वायुमंडल को मिलने वाली नमी की मात्रा है। ऊष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण सर्वाधिक होता है। अतः वायुमंडल को इस क्षेत्रा से सबसे ज्यादा नमी की आपूर्ति होती है। तटीय भागों में आन्तरिक भागों की अपेक्षा अधिक नमी मिलती है। धु्रवीय प्रदेशों में वाष्पीकरण बहुत कम है, अतः वहाँ वर्षा भी कम है।

(II) पवनों की दिशा: सन्मार्गी एवं पछुआ पवनों की पेटियों में पवन दिशा महत्वपूर्ण है। समुद्र से स्थल की ओर चलने वाली पवनें वर्षा करती हैं। स्थल से चलने वाली
पवनें शुष्क होती हैं। उच्च अक्षांशों से निम्न अक्षांशों की ओर चलने वाली पवनें गर्म हो जाती हैं, अतः बहुत कम वर्षा करती हैं; जबकि निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर चलने वाली पवनें ठंडी हो जाती हैं और वर्षा करती हैं। उपोष्ण मरूस्थलों में बहुत कम वर्षा होती हैं; क्योंकि वहाँ से पवनें बाहर की ओर चलती हैं।

(III) महासागर धारायें: गर्म धाराओं के ऊपर की वायु गर्म और आर्द्र होती है। अतः यह वर्षा करती है। इसके विपरीत ठंडी धाराओं के ऊपर की वायु ठंडी और शुष्क
होती है। अतः उससे बहुत कम वर्षा होती है।

(IV)पर्वतों की उपस्थिति: आर्द्र पवनों के मार्ग में पर्वतों के आने से पवनाभिमुख ढालों पर अधिक वर्षा और पवन विमुख ढालों पर कम वर्षा होती है।

(V) वायुदाब पेटियाँ: वायुदाब पेटियों का पवन पेटियों के साथ सीधा संबंध है। निम्न वायुदाब क्षेत्रा वर्षा को आकर्षित करते हैं और उच्च वायुदाब क्षेत्र वर्षा विहीन होते
हैं।

 

साभाऱ - राष्ट्रीय विद्यालयी शिक्षा संस्थान 

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