बड़े बांध और छोटे तालाब

Submitted by Hindi on Fri, 12/07/2012 - 14:21
Source
कादम्बिनी, जून 2012
हमारे पूर्वज जानते थे कि तालाबों से जंगल और जमीन का पोषण होता है। भूमि के कटाव एवं नदियों के तल में मिट्टी के जमाव को रोकने में भी तालाब मददगार हैं, लेकिन बड़े बांधों के निर्माण की होड़ ने हमारी उस महान परंपरा को नष्ट कर दिया।
1950 में भारत के कुल सिंचित क्षेत्र की 17 प्रतिशत सिंचाई तालाबों से की जाती थी। ये तालाब सिंचाई के साथ-साथ भू-गर्भ के जलस्तर को भी बनाए रखते थे, इस बात के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं। सूदूर भूतकाल में तो 8 प्रतिशत से अधिक सिंचाई तालाबों से ही होती थी। तालाबों में पाए गए शिलालेख इसके जीते-जागते प्रमाण हैं। इस स्वावलम्बी सिंचाई योजना का अंग्रेजों ने जानबूझकर खत्म करने का जो षड़यंत्र रचा था, उसे स्वतंत्र भारत के योजनाकारों ने बरकरार रखा है और वर्तमान, जनविरोधी,ग्राम-गुलामी की सिंचाई योजना को तेजी से लागू किया है। किसी भी देश की प्रगति या अवनति में वहां की जल संपदा का काफी महत्व होता है। जल की उपलब्धि या प्रभाव के कारण ही बहुत सी सभ्यताएं एवं संस्कृतियां बनती और बिगड़ी हैं। इसलिए हमारे देश की सांस्कृतिक चेतना में जल का काफी ऊंचा स्थान रहा है। हमारे पूर्वज जानते थे कि तालाबों से जंगल व जमीन का पोषण होता है। भूमि के कटाव एवं नदियों के तल में मिट्टी के जमाव को रोकने में भी तालाब मददगार होते हैं। जल के प्रति एक विशेष प्रकार की चेतना और उपयोग करने की समझ उनकी थी। इस चेतना के कारण ही गांव के संगठन की सूझ-बूझ से गांव के सारे पानी को विधिवत उपयोग में लेने के लिए तालाब बनाए जाते थे। इन तालाबों से अकाल के समय भी पानी मिल जाता था। जैसा कि गांवों की व्यवस्था से संबंधित अन्य बातों में होता था, उसी तरह तालाब के निर्माण व रख-रखाव के लिए भी गाँववासी अपनी ग्राम सभा में सर्वसम्मति से कुछ कानून बनाते थे। ये कानून ‘गंवई दस्तूर’ कहलाते थे। ये दस्तूर ‘गंवई बही’ में लिखे जाते थे, या मौखिक परंपरा के जरिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले जाते थे।

अलवर जिले के इस क्षेत्र में तालाब संबंधी कुछ पुराने गंवई दस्तूरों से ज्ञान हुआ है कि तालाब की ‘आगोर’ में कोई जूता लेकर प्रवेश नहीं करता था। शौचादि के हाथ अलग से पानी लेकर आगोर के बाहर धोए जाते थे। आगोर में किसी गांव सभा की अनुमति के बिना मिट्टी खोदना मना होता था। आगोर से नहीं बल्कि तालाब के जल ग्रहण क्षेत्र तक में शौचादि के लिए जाना मना था। तालाब के जल-ग्रहण क्षेत्र से भूमि कटकर नहीं आए और तालाब में जमा नहीं हो, इसकी व्यवस्था तालाब बनाते समय ही कर दी जाती थी, जिससे लंबे समय तक तालाब उथले नहीं हो पाते थे। जब तालाब की मरम्मत करने की आवश्यकता होती थी, तो पूरा गांव मिल-बैठकर, तय करके यह काम करता था। तालाब से निकलने वाली मिट्टी खेतों में डालने या कुम्हारों के काम में आती थी।

यह परंपरा 1890 तक तो बराबर चली। इसके बाद अंग्रेजों का ध्यान हमारे गंवई संगठनों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा लोगों के अभिक्रम को खत्म करने की तरफ गया। उन्होंने पूरी सक्रियता से इन सब सहज चलने वाली गंवई व्यवस्थाओं को खत्म करने की योजना विभिन्न प्रकार से बनाई-कहीं नहरी सिंचाई योजना तो कहीं बड़े बांध आदि के स्वप्न दिखाकर,तो कहीं हमारी उच्च सांस्कृतिक धरोहर, तालाब के जल की निंदा करके और कहीं हमारे देश की शिक्षापद्धति को प्रदूषित करके हमारे ही देशवासी तथा-कथित शिक्षित कहे जाने वाले लोगों द्वारा हमारी संस्कृति की बुराई कराके, लेकिन समृद्ध तालाबों की संपन्न परंपरा चालू रही। इन तालाबों से सिंचाई भी होती थी। इस तरह तालाब गांव की विकेंद्रित अर्थव्यवस्था का जीते-जागते उदाहरण थे। राजस्थान के जिन क्षेत्रों में केवल दो-चार सेंटीमीटर वर्षा होती थी, उनमें भी इन तालाबों के सहारे लोग व पशु जीवित रहते थे। जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर के महा मरुस्थल क्षेत्र कम वर्षा के बावजूद आज की अपेक्षा ज्यादा विकसित थे। पानी कम होते हुए भी इस क्षेत्र की पुरानी हवेलियां, महल, बड़े-बड़े बाजार, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र यहां की तालाब व्यवस्था के कारण ही संपन्न हुए थे और उसकी उपयोगिता के प्रमाण थे।

1890 तक अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव देश में बढ़ गया था और अंग्रेजों का षडयंत्र सफल होने लगा था। सबसे पहले अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव हमारे यहां के राजाओं, सामंतों, जागीरदारों आदि पर पड़ा। जो पहले अकाल के समय तालाबों के निर्माण पर अधिक ध्यान देते थे, ये अब अपनी राजधानी के शहरों की चहारदीवारी बनाने आदि कामों को महत्व देने लगे। इनके पूर्वजों ने जो तालाब बनाए थे वे बिन देख-रेख के टूटने लगे, और जो एक बार टूट गया उसका पुनः निर्माण नहीं हुआ। इस प्रकार पुराने तालाब खत्म होते गए।

बड़े बांधों से ‘सिंचाई’ का बहाना तो सिर्फ लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए था। अगर सही तथ्य सामने आएं तो वास्तव में बड़े बांधों के कारण कुल मिलाकर सिंचाई पहले की अपेक्षा कम ही हुई है, क्योंकि इन बांधों से नदियों के प्रवाह रुक जाने के कारण इन प्रवाहों के दोनों ओर की लाखों एकड़ जमीन और उसमें स्थित कुएं सूख गए हैं तथा भूगर्भ जल का स्तर पिछले दस-बीस बरसों में पचास से एक सौ फुट तक नीचे चला गया है स्वतंत्रता की लड़ाई में केवल बापू ने अपनी बातचीत और भाषणों में अवश्य गांव के तालाब को प्रतिष्ठित किया था, लेकिन अन्य लोगों का इस तरफ कोई विशेष ध्यान केंद्रित नहीं हुआ। अंग्रेजी शिक्षा और अंग्रेजियत में पले हमारे दूसरे नेता हमारी समाज व्यवस्था की खूबी को समझ नहीं पाए, बल्कि उसे हीन मानकर उसकी निंदा करते रहे। उस समय बापू ने चरखे के साथ-साथ गांव के तालाब-चारागाह के रख-रखाव को भी रचनात्मक कार्यक्रमों से जोड़ा होता तो अच्छा होता, हालांकि उनको खुद को तो इन सब बातों का ध्यान था। आजादी मिलने के समय ही बापू ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ध्यान ग्राम-व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की ओर दिलाया था, लेकिन नेहरू पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित थे। उनकी प्राथमिकता भाखड़ा जैसे बांध बनाने की थी। देशी-विदेशी, निहित-स्वार्थी तत्वों ने इसका खूब फायदा उठाया। इन बड़ी-बड़ी सिंचाई योजनाओं से तालाबों पर सबसे अधिक प्रहार हुआ। बड़े बांध बनाने पर भारत सरकार 2008 तक अरबों-करोड़ों रुपये खर्च कर चुकी है। इन योजनाओं से दो करोड़ हेक्टेयर जमीन सिंचित होने का सरकारी दावा था। वास्तव में कितनी जमीन की सिंचाई ये योजनाएं कर रही हैं, यह कहा नहीं जा सकता, क्योंकि जिस प्रकार इनके आंकड़े इकट्ठे किए जाते हैं, उसके कारण सारी बात शंकास्पद है। इस अरसे में 246 बड़ी योजनाएं शुरू की गई थी, उनमें सिर्फ 65 योजनाएं अभी तक पूरी हुई हैं। इन बड़ी योजनाओं में अब जो घाटे की धारा बह रही है वह चौंकाने वाली है। असल में इन योजनाओं से बड़े-बड़े ठेकेदारों को मुनाफा, इंजीनियरों को घूस और नौकरी तथा नेताओं को लूट में हिस्सा मिलने के साथ वाह-वाही हासिल होती है और गांवों के पानी से बड़े उद्योगपतियों को सस्ती बिजली मिलती है। बड़े देशों की और बड़े कारखानों की बड़ी मशीनें, सीमेंट आदि की बिक्री करना, नहर बनाना, जिसमें गांव के गरीबों की जमीन जाए-इस तरह सारा लाभ चंद बड़े घरानों को मिलता है। यही सब हमारे नीति-निर्धारकों की ‘विकास’ की परिभाषा है।

बड़े बांधों से ‘सिंचाई’ का बहाना तो सिर्फ लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए था। अगर सही तथ्य सामने आएं तो वास्तव में बड़े बांधों के कारण कुल मिलाकर सिंचाई पहले की अपेक्षा कम ही हुई है, क्योंकि इन बांधों से नदियों के प्रवाह रुक जाने के कारण इन प्रवाहों के दोनों ओर की लाखों एकड़ जमीन और उसमें स्थित कुएं सूख गए हैं तथा भूगर्भ जल का स्तर पिछले दस-बीस बरसों में पचास से एक सौ फुट तक नीचे चला गया है। इन बड़े बांधों का असली उद्देश्य तो किसान की स्वावलंबी व्यवस्था को तोड़कर उसे केंद्रित करने और बड़े-बड़े घरानों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ पहुंचाने का था। गांव-गांव में सिंचाई की जो परंपरागत स्वावलंबी व्यवस्था थी उसे समाप्त करके किसान का भाग्य इन लोगों के हाथों में सौंप दिया गया।

इन सीधे-सादे लेकिन असरकारक तालाबों की अब भी उपेक्षा करने की भूल की जा रही है। 1950 में भारत के कुल सिंचित क्षेत्र की 17 प्रतिशत सिंचाई तालाबों से की जाती थी। ये तालाब सिंचाई के साथ-साथ भू-गर्भ के जलस्तर को भी बनाए रखते थे, इस बात के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं। सूदूर भूतकाल में तो 8 प्रतिशत से अधिक सिंचाई तालाबों से ही होती थी। तालाबों में पाए गए शिलालेख इसके जीते-जागते प्रमाण हैं। इस स्वावलम्बी सिंचाई योजना का अंग्रेजों ने जानबूझकर खत्म करने का जो षड़यंत्र रचा था, उसे स्वतंत्र भारत के योजनाकारों ने बरकरार रखा है और वर्तमान, जनविरोधी,ग्राम-गुलामी की सिंचाई योजना को तेजी से लागू किया है।

बड़े बांधों ने परंपरागत तालाब पद्धति को खत्म कर दिया हैबड़े बांधों ने परंपरागत तालाब पद्धति को खत्म कर दिया हैगत वर्षों के भयंकर अकाल ने एक बार फिर तालाबों की याद दिलाई है। इस पर जगह-जगह कुछ लोगों ने अध्ययन किए हैं। इन अध्ययनकर्ताओं में श्री वान ओप्पन तथा सुब्बाराव का मानना है कि तालाबों से सिंचित जमीन असिंचित भूमि की अपेक्षा तीन गुनी अधिक उपज देती है। सूखे इलाकों में खासतौर से तालाब की सिंचाई काफी लाभदायक सिद्ध हुई है। इसी प्रकार अब देश के कोने-कोने में तालाबों के महत्व को समझने वाले अनेक स्वैच्छिक समूह प्रकाश में आए हैं जो इस ओर काफी चिंतित हैं और कुछ-न-कुछ कर रहे हैं।

कुल मिलाकर हमने गत वर्षों में छोटे-बड़े लगभग दस हजार से ऊपर तालाब, जोहड़, छोटे बांध राजस्थान में बनाए या मरम्मत कराए हैं। इनमें कुल दस करोड़ रुपया लगा है, लेकिन इनके लाभ देखें जाएं तो हमें स्वयं को आश्चर्य होता है। उदाहरण के लिए, वर्ष 1986 में गोपालपुरा गांव के सिंचाई के तथा पीने के पानी वाले कुएं सूख गए थे। गांव के जवान लोग मजदूरी के लिए दिल्ली तथा अहमदाबाद चले गए थे। जमीन में कुछ पैदा नहीं हो रहा था। तभी इस गांव में तालाब के निर्माण का कार्य जारी किया गया और सन् 1987 के जून तक गोपालपुरा गांव में तीन बड़े तालाब बनाए। इनके निर्माण कार्य में दस हजार रुपये की कीमत का गेंहू दिया गया। जुलाई 1987 में इस क्षेत्र के अंदर कुल 13 सेंटिमीटर वर्षा हुई। यह सारी वर्षा एक साथ ही 48 घंटे के अंदर हो चुकी थी। इनके पानी से जमीन रिचार्ज यानी पुनः सजल हो गई, और गांव के आसपास के 20 कुओं में जलस्तर ऊपर आ गया।

वर्षा का पानी, जो तालाबों में इकट्ठा हुआ था, वह अपने साथ जंगल व पहाड़ियों से पत्ते, गोबर आदि बहाकर ले आया था, जो तालाबों की तली में बैठ गया। बड़े तालाब खेतों की जमीन पर बने हुए थे। इसलिए नवंबर तक पहुंचते-पहुंचते तालाबों का पानी तो नीचे की जमीन की सिंचाई करने के काम में ले लिया गया और तालाब के पेटे की जमीन में गेंहूं की फसल बो दी। एक फसल में केवल इन तालाबों की जमीन से ही 300 सौ क्विंटल अनाज पैदा हुआ जिसकी कीमत बाजार भाव से करीब पौन लाख होती है। इसके अलावा तालाब में पूरे वर्ष पानी भरा रहा। इसे पशुओं के पीने के पानी के लिए बनाया गया था। इस प्रकार गांव के पशुओं को पूरे वर्ष पीने का पानी सहज उपलब्ध होता रहा। गांव का पीने का पानी वाला कुआं जो सूख गया था वह अब पानी भरा रहता है। कुओं का जल स्तर अब 90 फीट नीचे से उठकर 20 फीट तक पहुंच गया है।

बड़े बांध और नहरों से होने वाली सिंचाई का खर्च चालीस हजार रुपये प्रति हेक्टेयर पहुंच गया है। इसके अलावा तवा, नर्मदा, भांखड़ा आदि से निकलने वाली नहरों का दुष्परिणाम भी लोगों ने देख लिया है। इसे समझकर जगह-जगह इन बांधों का विरोध भी हो रहा है। विरोध करने वाले छोटे बांध या सिंचाई के तालाबों की बात भी सुझा रहे हैं। आशा है जब हमारे योजनाकार ही इस बात को मान जाएंगे और तालाब बनाने को अच्छा काम कहेंगे तथा जो पैसा अभी बड़े बांधों पर खर्च हो रहा है उससे बहुत कम खर्च में तालाबों के जरिये उतना ही काम करने की संस्तुति करेंगे। पीने का पानी लेने के लिए पहले दूर जाना पड़ता था, जिसमें गांव की महिलाओं की बहुत सी समय शक्ति नष्ट होती थी। यह परेशानी अब खत्म हुई है। इसी तरह हर वर्ष गांव से मजदूरी करने लोगों को बाहर जाना पड़ता था, पर अब इन्हें गांव में ही काफी काम मिलने लगा है। नीमी जैसे कई गांव जहां के लोग पहले मजदूरी करने जयपुर जाते थे, अब ये जयपुर के सेठों को रोजगार देने वाले बन गए हैं। सेठों के ट्रक इन गांवों की सब्जियां शहरों में ढोने का काम करते हैं। इस प्रकार इन तालाबों के कारण अनेक लाभ हुए हैं। यह क्षेत्र पहाड़ की तलहटी में और ढालू होने के कारण तेज वर्षा के पानी जमीन को काटकर बहा ले जाता था। जमीन का उपजाऊपन वर्षा के पानी के साथ बाहर चला जाता था, इसलिए जमीन में नमी की कमी रहती थी तथा फसल का बीज ही क्या घास तक नहीं उगती थी। वहां वर्षा कम होती है और जो होती है, वह भी एक साथ और तेज होती है, फिर पूरा साल सूखा पड़ता रहता है। इसलिए इस क्षेत्र में तालाब अत्यंत आवश्यक एवं खास तौर से उपयोगी है। तालाबों से अब भूमि का कटाव भी रुक गया है।

इसी प्रकार किशोरी गांव में एक ‘चेकडैम’ बना है, जिसे बड़ा तालाब कह सकते हैं। यह भी जुलाई 1987 में पूरा तैयार हो चुका था। इसके निर्माण में कुल लागत पचास हजार रुपये आई, जिसमें आधी लागत ग्राम के श्रमदान से जुटाई गई। इस तालाब के भराव क्षेत्र में ही 250 क्विंटल अनाज पैदा हुआ। यह तालाब एक ऐसी तेज धारा को रोकता है,जिसने गत वर्षों में एक सौ एकड़ से अधिक भूमि को बंजर बना दिया था। जमीन में बड़े-बड़े नाले व खड्डे हो गए थे। वह जमीन स्वतः ही समतल होने लगी है। अब वह खेती योग्य हो गई है। कहा जा सकता है कि इस तालाब ने पूरी एक सौ बीघा जमीन खेती के योग्य बना दी है। कुओं का जलस्तर ऊपर आ गया है।

चंबल के गांवों में जो साथी बंदूक लेकर फिरते थे। अब इन्होंने बंदूक छोड़कर फावड़े से तालाब बनाने शुरू किए, तो इनके काम से करौली जिले की सपोटरा तहसील के गांवों के जीवन में सुख और समृद्धि आ गई। डकैत कहलाने वाले भाई सज्जन-किसान और देवता बन गए। अब इनकी महेश्वरा नदी सुद्ध-सदानीरा बनकर बहने लगी। खिजुरा गांव बहुतों को दूध-अनाज देने वाला बन गया है। इन्होंने हजारों को अपने गांव में बुलाकर कुंभ किया। बेपानी से पानीदार बन गए। अब तक 6500 वर्ग किमी क्षेत्रफल में एक हजार अट्ठावन गांवों ने अपने हाथों से दस हजार से ज्यादा तालाब बनाकर सात छोटी-छोटी नदी अरवरी, सरसा, रुपारेल, भगाणी, जहाजवाली, साबी और महेश्वरा नदियों को पुनर्जिवित कर दिया। अब भूजल का स्तर ऊपर आकर नदियों को सदानीरा बना रहा है। अतः तालाब जैसा छोटा स्थानीय काम वैश्विक समस्या-बिगड़ते मौसम के मिजाज और धधकते ब्रह्मांड को संतुलित करने का बढ़िया उपचार है।

उपेक्षा के शिकार होते परंपरागत तालाबउपेक्षा के शिकार होते परंपरागत तालाबहमने अब तक जो दस हजार तालाब बनाए हैं, उनके अनुभव से पूरे अधिकार के साथ कह सकते हैं कि किसी भी तालाब के निर्माण में जितनी रकम खर्च होती है, उसकी पूर्ति, यदि सामान्य वर्षा हो जाए, तो एक वर्ष में हो जाती है। हम आंकड़ों की भाषा नहीं जानते, लेकिन इस काम में लगे श्रम से अधिक आर्थिक लाभ के साथ-साथ गांव की एकता का सुखी आनन्दमय वातावरण तथा बे-सहारा पशु-पक्षियों को तालाब पर किलोलें करते देखकर मन बाग-बाग हो जाता है। इस भौतिक और भावनात्मक लाभ के साथ-साथ इस काम ने आज की शोषणकारी और विकृत व्यवस्था का नंगा चित्र भी सामने ला दिया है। दरअसल राजनेताओं को गांववासियों की बन रही शक्ति पता नहीं क्यों नहीं सुहाती है? प्रशासनिक अधिकारियों तथा तकनीकी लोगों को तो गांववासियों की शक्ति और परंपरागत स्वावलंबन की पद्धति अखरती ही रही है।

बड़े बांध और नहरों से होने वाली सिंचाई का खर्च चालीस हजार रुपये प्रति हेक्टेयर पहुंच गया है। इसके अलावा तवा, नर्मदा, भांखड़ा आदि से निकलने वाली नहरों का दुष्परिणाम भी लोगों ने देख लिया है। इसे समझकर जगह-जगह इन बांधों का विरोध भी हो रहा है। विरोध करने वाले छोटे बांध या सिंचाई के तालाबों की बात भी सुझा रहे हैं। आशा है जब हमारे योजनाकार ही इस बात को मान जाएंगे और तालाब बनाने को अच्छा काम कहेंगे तथा जो पैसा अभी बड़े बांधों पर खर्च हो रहा है उससे बहुत कम खर्च में तालाबों के जरिये उतना ही काम करने की संस्तुति करेंगे। लेकिन वह दिन तभी आएगा जबकि हम सरकार की कोई मजबूरी बनेंगे। अब हमें बड़े बांधों पर रोक लगाने के लिए सरकार की मजबूरी ही खोजनी पड़ेगी। तभी तालाबों को भी संरक्षण मिलेगा।

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