खेतों में बचेगी बारिश की हर बूंद

Submitted by HindiWater on Sat, 06/27/2020 - 09:30

गांव में 300 बीघा खेत में बनाई मेड़. फोटो - NBT

देश में जल संकट गहराता जा रहा है। पीने से लेकर खेती तक के लिए लोगों को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। वैसे जल संकट की ये समस्या देश के किसी एक हिस्से में नहीं है, बल्कि लगभग हर राज्य जल संकट का सामना कर रहा है। सबसे ज्यादा संकट उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली, झारखंड़, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि में है। ये समस्या गर्मी बढ़ने के साथ ही और बढ़ जाती है। कई इलाकों में तो किसान पानी के लिए बरसात की राह ताकते रहते हैं, लेकिन पर्याप्त बारिश न होने पर उनके हाथ मायूसी लगती है और उन्हें खेती में नुकसान उठाना पड़ता है। हालांकि भारत लगभग 90 प्रतिशत भूजल का उपयोग सिंचाई के लिए करता है, जो कि बेहद गलत है। ये जल संकट को बढ़ावा दे रहा है। बरसात के पानी का उचित उपयोग खेतों में शायद ठीक से नहीं किया जाता है। ये सीधे तौर पर जागरुकता का अभाव और कृषि तकनीकों की उपलब्धता का अभाव है, लेकिन उत्तर प्रदेश के बांदा के लोगों/किसानों ने जल संरक्षण का पारंपरिक तरीका अपनाया है, जो जलसंरक्षण के साथ ही फसल उत्पादन में सहायक साबित होगा।

उत्तर प्रदेश के बांदा में हर साल भीषण गर्मी और पानी की कमी से जूझता है। पानी की समस्या यहां इतनी बढ़ जाती है कि लोगों को पीने और खेती के लिए बूंद बूंद पानी के लिए मोहताज होना पड़ता है। लेकिन इस बार बांदा में जल संरक्षण के लिए अनूठे प्रयोग किए जा रहे हैं। जल संचयन के लिए पानी चौपाल लगाई जा रही है। नियमित रूप से तालाबों की साफ-सफाई की जाती है। गाद को तालाब से बाहर निकाला जाता है। तो वहीं जल संरक्षण का ये कार्य सुनियोजित ढंग से करने के लिए जल सेवकों का गठन किया गया है। 

नव भारत टाइम्स की खबर के मुताबिक जिले के बबेरू ब्लॉक में पड़ने वाले गांव अंधाव में ‘खेत का पानी खेत में- गांव का पानी गांव में’ अभियान के तहत जल संरक्षण के लिए नया प्रयोग शुरू किया गया है। गांव में 300 बीघे खेतों में मेड बनाई है। मेड़ों के माध्यम से बरसात के पानी को संग्रहित किया जाएगा। हालांकि गांव में पहले ऐसा नहीं होता था। पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने वाले रामबाबू तिवारी ने 7 हजार रुपये खर्च करके अपने खेत में मेड़ चढ़ाया। यहीं से उन्होंने पहली बार इस कार्य की शुरुआत की। उन्होंने अपने इस कार्य के साथ गांव के लोगों को जोड़ने की सोची। गांव के युवाओं के साथ बातचीत की और योजना को लागू करने के लिए रणनीति बनाई। गांव के अन्य लोगों को इस बारे में बताया तो वें सहमत हो गए। सहमत होना लाज़मी भी था, क्योंकि भीषण जल संकट के बीच गांव में फसल उत्पादन समस्या बन गया था। इसके बाद अन्य लोगों/किसानों ने भी अपने खेतों में मेड़ बनाई। इस अभियान को लोग बिना की समस्या के स्वीकार करते गए और अब तक 300 बीघा खेत में मेड़ बनाई जा चुकी है। 

इस इलाके के खेतों में पहले बरसात का पानी रुकता नहीं था। बारिश में जो पानी बरसाता भी था, वो बहता हुआ नालों के माध्यम से यमुना में चला जाता था। जिस कारण गांव के लोग धान नहीं बो पाते थे। योजना के फायदे के बारे में बताते हुए ग्रामीणों ने कहा कि खेत में बरसात का पानी भर जाने के बाद वे लोग धान की खेती कर सकेंगे। मेड़ चढ़वाने से अब खेतों में बरसात का पानी रुकेगा। ग्रामीणों का कहना है कि खेतों में रुके पानी की वजह से जमीन में नमी रहेगी। यह नमी बनाए रखने के लिए मेड़ों पर पेड़ लगाने की भी योजना है।


 

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