बंजारों ने बनाया था इसे

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अनसुना मत करो इस कहानी को (परम्परागत जल प्रबन्धन), 1 जुलाई 1997

अकेले घटेरा में ही नहीं, जहाँ-जहाँ तालाब नष्ट किये गए हैं, वहाँ-वहाँ उन पर निर्भर भोइयों की जिन्दगी नरक बन चुकी है। पानी अब उनसे कोई भरवाता नहीं, डोलियों का चलन जमाने पहले खत्म हो चुका। नदियों की रेत समेट ली गई, सो अब उनमें बंगा, चीमरी, तरबूज करने की गुंजाईश नहीं रही। भोई अब गाँवों में भूमिहीन मजदूर बन गए हैं या फिर शहरों में रिक्शा चालक।

बंजारों टांडे आते थे। सैकड़ों-हजारों बैलों पर लदा नमक और दूसरे देहात की जरूरत का सामान लेकर। वे बाबाजी के घटेरा में डेरा डालते और यहीं से अपनी बोड़ी (बैल पर लदा समान) लेकर आसपास के गाँवों में व्यापार करने निकल जाते। घटेरा के आसपास चरने को तो खूब था, पर पानी की किल्लत थी और जब गर्मियों में फसल आने के बाद बंजारों के माल की खरीद-फरोख्त पूरी तेजी पर होती थी तब आसपास के नदी-नालों का पानी छौंटने लगता। जनश्रुति के अनुसार, बंजारों ने अपनी व्यापारिक सहूलियत के लिये घटेरा का तालाब बनवाया था। इसी तालाब के पाल पर निराकार ईश्वर की उपासना करने वाले एक छोटे-से सम्प्रदाय की गुरुगादी बन जाने के बाद इसे नाम मिल गया, ‘बाबाजी का घटेरा’। तालाब बन जाने के बाद आसपास के जंगलों में चरने को तो खूब था ही, भारवाहक पशुओं को पानी भी भरपूर हो गया। बंजारे उस इलाके के थे, जहाँ पानी की अक्सर कमी रहती थी, सो तालाब बनाने-बनवाने की भरपूर समझ थी उनमें। उन्होंने घटेरा के दक्षिण-पूर्व की ओर लकडया पहाड़ से बहकर उत्तर की ओर फ़ालतू बह जाने वाले पानी को पहले छोटे तालाब फुरतला में रोका, फिर उसके पानी को लकडया पहाड़ के पश्चिम में बने बड़े तालाब में पहुँचाया।

उन बंजारों ने बड़े तालाब की सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था भी की, ताकि पानी ज्यादा होने पर पाल फूटने न पाये। सैंकड़ों साल पहले बने इस तालाब की पाल के अन्दर ऐसी पक्की नालियाँ बनाई गई हैं कि पानी एक निश्चित सतह पर पहुँचने के बाद उनमें होकर अन्दर-ही-अन्दर बहने लगता था। बहुत चौड़ी पाल के भीतर ये नालियाँ आज भी काम कर रही हैं।

बाद में, मरम्मत के अभाव में, तालाब सूखने लगा। एक बार भण्डारे के वक्त, जब पानी की कमी समझ आई, तो गुरुगादी के महन्त ने तालाब के बीच में खुदाई करवाई। अभी भी गर्मियों में सिर्फ उसी जगह पानी बचता है। गाँव वाले उसे मदागन कहते हैं।

कुछ बरस पहले तक तालाब में सर्दियों के दिनों में पुरैन फूलती थी। महीनों ताल-चिरैयाँ तालाब में डेरा डाले रहती थीं, किनारे के सभी सातों कुओं में भरपूर पानी रहता था। जब से सिंचाई के लिये इस तालाब का पानी खाली किया जाने लगा है, मदागन को छोड़कर पूरा तालाब सूख जाता है। पुरैन की जगह तालाब में अब बेशरम का घना जंगल खड़ा हो गया है। किनारे के बड़, इमली और महुए के पेड़ अब पाल पर नहीं हैं और नतीजा? अब तालाब के बीच बने कुएँ और पाल से सटे रामसागर और गंगाजली नामक कुओं को छोड़कर बस्ती के सारे कुएँ सूख जाते हैं। पानी कई किलोमीटर दूर से बैलगाड़ी या ट्रेक्टरों पर टंकियों से आता है। रामसागर में भी सिर्फ नाम को ही पानी बचता है। कुएँ में ‘चौ’ आ जाती है। अब तो हर साल गर्मियों में कई ग्रामीण परिवार गाँव छोड़ उन खेतों में डेरा डाल देते हैं, जहाँ उनके कुएँ हैं। खाना बनाना, खाना, नहाना-धोना सब खेतों के कुओं पर होता है, वहीं उनका पशुधन रहता है। ये परिवार घटेरा के अपने घरों में बस रात को सोने के लिये आते हैं।

माना जाता था कि इस तालाब से निकली ज़मीन में जो ‘नास’ (लोहे का हल) चलाएगा, उसका नाश हो जाएगा। एक बार, कभी किसी गाँव वाले ने तालाब की ज़मीन को आबाद करने की कोशिश की तो उसका लड़का संयोग से साँप के काटने से मर गया। जब तक लोगों मे यह भय रहा, इस तालाब पर अतिक्रमण करने का साहस किसी ने नहीं किया, पर अब हर साल उथले होते जा रहे तालाब में अतिक्रमण की होड़ शुरू हो गई है, सो अब हैरत भी क्या, जो पास के कुएँ रीते ही रह जाते हैं।

मोड़ा-मौड़ी के खुल गए भाग, बीद गई जल मच्छी


भोइयों के ऐसे गीत अब घटेरा में सुनाई नहीं देते। ढिमरयाई (भोइयों के परम्परागत नृत्य और गीत) भी अब जब कभी ही होती है। जब तालाब का पानी ही हिलोरें नहीं ले रहा, तो मन में हिलोर कैसे उठे। अब न मच्छी रही, न सिंघाड़ी तालाब के बूते कभी आत्मनिर्भर रहे भोई। अब खदान मज़दूर बन चुके हैं।

जब तालाब भरा पूरा था, तो उसमें दस-पन्द्रह किलो तक की मछलियाँ मिल जाती थीं। सामल, बाम, पड़ीन, कुरसा, करोंट, कमा, छिंगने, सभी तरह की अच्छी-बुरी, छोटी-बड़ी मछलियाँ घटेरा तालाब में होती थीं। इनसे खूब गुज़र हो जाती थी, गाँव के भोइयों को। यदि कुछ कसर रह जाती तो फिर सिंघाड़ी से पूर पड़ जाती थी।

बैशाख का महीना आते ही भोई बाँस गाड़कर बनाए पानी के खेतों की तली में सिंघाड़ी की बेलें खुरस देते। बरसात में तालाब का पानी बढ़ता, तो बेलें भी बढ़ती जाती। सिंघाड़ी फूलती, फिर बड़े-बड़े पत्तों के नीचे सिंघाड़ियों के गुच्छे लगते। भोई दिन-भर छोटे-छोटे डोंगों में बैठकर सिंघाड़ी तोड़ते और फिर पटूरों (मिट्टी के बड़े-बड़े काले मटके) में भरकर भट्टियों पर चढ़ा देते। सिंघाड़ी बदरंग न दिखे, इसलिये ऊपर से चांचों के गटा (कंद) डाल देते। इनसे सिंघाड़ी काली और सुन्दर दिखने लगती। चांचे भी तालाब में ही होती थी। तालाब में मनों सिंघाड़ी होती और गाँव-गाँव, बाजार-बाजार बिकने जाती।

मच्छी और सिंघाड़ी, भोइयों के जीवन का बड़ा सहारा थी। लेकिन अब ये गुज़रे जमाने की बातें हैं। जब तक तालाब में मच्छियाँ और सिंघाड़ी होती रहीं, ढिमरयाई भी खूब होती रही। अब तालाब का पानी नहीं सूखता, भोइयों के जीवन का रस सूख जाता है। तालाब खत्म, मच्छी और सिंघाड़ी खत्म, सो, ढिमरयाई भी खत्म।

अकेले घटेरा में ही नहीं, जहाँ-जहाँ तालाब नष्ट किये गए हैं, वहाँ-वहाँ उन पर निर्भर भोइयों की जिन्दगी नरक बन चुकी है। पानी अब उनसे कोई भरवाता नहीं, डोलियों का चलन जमाने पहले खत्म हो चुका। नदियों की रेत समेट ली गई, सो अब उनमें बंगा, चीमरी, तरबूज करने की गुंजाईश नहीं रही। भोई अब गाँवों में भूमिहीन मजदूर बन गए हैं या फिर शहरों में रिक्शा चालक।

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