भारत के पर्वत

Submitted by Hindi on Sat, 09/10/2011 - 15:30

हसन जावेद खान


भारत में अनेक पर्वत श्रृंखलाएं हैं। पर्वत भौगोलिक विविधता के साथ-साथ अतुलनीय जैव विविधता के भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं। भारत विश्व के 12 महा वंशाणु केन्द्र का हिस्सा तो है ही, इसके अलावा संसार के जैव विविधता के 25 महत्वपूर्ण स्थानों में से 2 अति महत्वपूर्ण स्थान भारत में ही हैं जैसे ‘पूर्वी हिमालय तथा पश्चिमी घाट’। भारत के पर्वत औषधीय पेड़-पौधों व खनिजों की असीमित मात्रा के भंडार हैं। इसके अतिरिक्त यह पर्वत देश की जलवायु को भी निर्धारित करते हैं।

भारत में उत्तरी सिरे पर दो पर्वत श्रृंखलाएं हैं, काराकोरम पर्वत श्रृंखलाएं और हिमालय। भारत के मध्य भाग में विध्यांचल की पहाडि़यां हैं जिन्होंने भारत को दो भागों में विभाजित किया है। भारत के दक्षिणी तट पर दो पर्वत श्रृंखलाएं है जिन्हें भारत के पूर्वी घाट व पश्चिमी घाट कहते हैं।

हिमालय


हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की विशालता उसे एक तंत्रा के रूप पहचान देती है। यह संसार का विशाल तंत्रा है जो कि 160-320 किलोमीटर तक चैड़ा व 2,400 किलोमीटर लम्बाई में भारत की उत्तरी सीमा से पूर्वी सीमा तक फैला हुआ है। उत्तरी सीमा पर हिमालय बहुत विशाल क्षेत्र समेटे हुए है और उसके अंतर्गत पश्चिम से पूर्व की ओर 5 मुख्य प्रदेश आते हैं जैसे कि जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश।

हिमालय पर्वत भारत को एशिया के अधिकांश भाग व चीन से अलग करता है। यह मध्य एशिया से आती ठंडी हवाओं को रोकता है तथा भारत की जलवायु को प्रभावित करता है। यह पर्वत श्रृंखलाएं मानसूनी वर्षा को मुख्य रूप से प्रभावित करती हैं।

हिमालय के पर्वत संसार में सबसे ऊंचे पर्वत हैं। भारत में सबसे ऊंचा पर्वत शिखर कंचनजंघा (28,208 फीट) है। नंगा पर्वत (26,657 फीट), नन्दा देवी (25,646 फीट), राका पोशी (25,551 फीट) व कमित (25,446 फीट) कुछ प्रमुख पर्वत चोटियां हैं। हिमालय की 3 मुख्य समान्तर श्रृंखलाएं हैं :

1. विशाल हिमालय
2. मध्य हिमालय
3. अधोहिमालय प्रदेश

विशाल हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं की ऊंची चोटियां बर्फ से ढकी रहती हैं और उनकी औसत ऊंचाई 20,000 फीट (6,100 मी.) होती है। दक्षिण की ओर यह विशाल श्रृंखलाएं अनियमित रूप से विभाजित होकर मध्य हिमालय श्रृंखलाओं का निर्माण करती हैं। विशाल हिमालय की नेपाल तथा सिक्किम क्षेत्र में अनेक ऊंची चोटियां है। विशाल हिमालय के उत्तर में अनेक श्रृंखलाएं हैं जैसे जंस्कार, लद्दाख व कैलाश। विशाल हिमालय के तिब्बत की ओर काराकोरम श्रृंखलाएं अपना मस्तक ऊंचा किए खड़ी है।

विशाल हिमालय के दक्षिण में मध्य हिमालय है जिसकी कुछ महत्वपूर्ण श्रृंखलाएं नाग टिबा, धौलाधार और पीर पंजाल हैं। मध्य हिमालय श्रृंखलाओं की लगभग एक समान ऊंचाई है जो कि 6,000-10,000 फीट तक है।

अधो हिमालय में मुख्य रूप से शिवालिक पर्वत श्रृंखलाएं, तराई क्षेत्र व डुमार पीडमॉट (पर्वत के नीचे का समतल भूभाग) आते हैं। अधो हिमालय क्षेत्र की विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत अनेक लम्बी व समतल घाटियां होती है जिनके तल पर रेतीली मिट्टी, कंकड़ व बजरी की भारी मात्रा मिलती है।

शिवालिक, विशाल हिमालय के दक्षिणी सिरे पर लेकिन समान्तर श्रृंखलाएं हैं जो भूगर्भ विज्ञान के अनुसार सबसे कम उम्र की है। इसकी ऊंचाई लगभग 5000-6500 फीट होती है और यह श्रृंखलाएं सिक्किम की तिस्टा नदी से नेपाल तक उत्तराखंड होती हुई जम्मू कशमीर तक फैली हुई है।

शिवालिक के उत्तर में ‘महाभारत लेख’ पर्वत श्रृंखलाएं है जिन्हें कि ‘लेसर हिमालय’ भी कहते हैं। कहीं-कहीं पर तो शिवालिक व महाभारत लेख को 10-20 किलोमीटर चैड़ी घाटियां एक दूसरे को अलग करती हैं। वन घाटियों को दून कहते हैं और सम्भवतः इसी कारण देहरादून शहर का नामकरण हुआ।

हिमालय की उत्पत्ति


हिमालय की संरचना लगभग 4.5 करोड़ वर्ष पहले हुई थी और निश्चय ही यह प्रकृति की एक अनूठी रचना है जिसके कारण मानव तथा असंख्य जीव-जन्तु तथा वनस्पतियों को जीवनयापन का अवसर मिला। भारत तथा यूरेशिया नामक दो विशाल भूभागों के टकराने से हिमालय का जन्म हुआ। इन दो विशाल भूभागों के टकराने के बाद यह भूभाग अनियंत्रित हो गए और वापस पुरानी तथा स्थिति में आना असंभव पाकर ऊपर को उठते चले गए और इस प्रक्रिया ने हिमालय को जन्म दिया।

लगभग 8 करोड़ वर्ष पहले भारत एशिया महाद्वीप से 6,400 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण में स्थित था तथा धीरे-धीरे (100 वर्ष में 9 मीटर की दर से) उत्तर की ओर खिसक रहा था। जब भारत एशिया से टकराया तो उसका उत्तर की ओर खिसकना लगभग आधा रह गया और साथ ही विवर्तनिक प्लेटों की गति भी मंद हो गई। फलस्वरुप टकराव ने ऊंचाई प्राप्त कर ली जो हिमालय की ऊंची उठती पर्वत श्रृंखलाओं का कारण बना।

भूगर्भशास्त्र के अनुसार हिमालय का जन्म बहुत पुराना नहीं है। निश्चय ही यह बहुत तीव्रता से हुआ है। 5 करोड़ वर्षों में माउंट एवरेस्ट जैसी चोटियां 9 किलोमीटर से भी ज्यादा की ऊंचाई तक उठ र्गइं। श्रृंखलाएं ऊंची हैं क्योंकि अभी वे बहुत पुरानी नहीं हुई हैं। भूक्षरण/मृदा अपरदन अथवा भूस्खलन जैसी प्रक्रियाएं नहीं के बराबर हुईं जो पर्वतों की ऊंचाई को कम कर सकती थीं।

भारत निरंतर एशियन महाद्वीप पर दबाव डालता रहता है और परिणामस्वरुप हिमालय की ऊंचाई भी बढ़ती रहती है (1 वर्ष में 1 सेंटीमीटर की दर से) जो अनुमान के अनुसार 10 लाख वर्षों में 10 किलोमीटर हुई। यह निरन्तर दबाव की प्रक्रिया धरती के अन्दर भी उथल-पुथल करती रहती है जो भूकम्प के रूप में यदा-कदा उजागर हो जाती है। संसार के अनेक विनाशकारी भूकम्पों की उत्पत्ति भारत तथा यूरेशियन महाद्वीप के 5 करोड़ वर्ष पहले टकराव के कारण हुई समझी जाती है।

अन्य पर्वत श्रृंखलाएं


अनेक छोटी पर्वत श्रृंखलाएं व पहाडि़यां भी हैं जो कि देश के अनेक भागों में बिखरी हुई हैं।

अरावली श्रृंखलाएं
यह श्रृंखलाएं पश्चिम भारत में स्थित हैं और अनुमानतः बड़े भ्रंश खंड आकार के पर्वतों के विघटन से उत्पन्न हुई हैं। यह श्रृंखलाएं राजस्थान के उत्तर-पूर्व तथा दक्षिण-पश्चिमी किनारे पर लगभग 480 किलोमीटर की दूरी तक फैली हुई हैं। इनका उत्तरी किनारा छोटी-मोटी पथरीली पहाडि़यों के रुप में हरियाणा तथा दिल्ली क्षेत्र में स्थित है। सबसे ऊंची चोटी ‘गुरु शिखर’ माउंट आबू में स्थित है।

विंध्य पर्वत श्रृंखलाएं


यह श्रृंखलाएं मध्य भारत में स्थित हैं जो भारत को उत्तरी तथा दक्षिणी क्षेत्र में विभाजित करती हैं। इन श्रृंखलाओं का पश्चिमी किनारा पूर्वी गुजरात में मध्य प्रदेश की सीमा के साथ स्थित है। इन पर्वतों के दक्षिण स्थित ढलानों पर नर्मदा नदी बहती है जो कि विंध्य पर्वत और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच से गुजर कर अरब सागर में जा मिलती हैं। इन पर्वत श्रृंखलाओं के उत्तरी भाग में गंगा नदी बहती है।

सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाएं


सतपुड़ा पर्वत विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं के लगभग समान्तर चलते हैं जो पूर्वी गुजरात के अरब सागर के तट से शुरु होकर पूर्व में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ तक फैली हुई हैं। किसी समय इन पर्वतों पर घने वन थे लेकिन अब अधिकांश क्षेत्रों में वनों का उन्मूलन हो चुका है। लेकिन फिर भी बचे हुए जंगली क्षेत्रों में वन्य जीवन सुरक्षित है और बाघ, गौड़, जंगली कुत्ते, काले हिरन तथा जंगली सूअर आदि विचरण करते हैं।

पश्चिमी घाट


गुजरात तथा महाराष्ट्र की सीमा के पास ताप्ती नदी के दक्षिण से लेकर महाराषट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल के मालाबार क्षेत्र तमिलनाडु तथा कन्याकुमारी तक 1,600 किलोमीटर क्षेत्र में यह श्रृंखलाएं फैली हुई हैं। इन पर्वतों की सामान्य ऊंचाई 1500 फीट है। इन पर्वत श्रृंखलाओं को महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में ‘सहयाद्री पर्वत’ भी कहते हैं।

पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखलाएं पश्चिमी मानसून को अपने पश्चिमी भागों में भारी वर्षा के लिए सक्रिय करती हैं। इन पर्वतों पर घने वन भी वर्षा को लाने में सहायक होते हैं।

इसके अतिरिक्त छोटी-छोटी श्रृंखलाएं जैसे कि उत्तर-पश्चिम तमिलनाडू की नीलगिरी पर्वत तथा कर्नाटक के मैसूर से दक्षिण पूर्व स्थित बिलगिरिरगंन श्रृंखलाएं, सविरायन तथ त्रिमुला पहाडि़यों से मिलकर पश्चिमी घाट तथा पूर्वी घाट की श्रृंखलाओं को जोड़ती हैं। इन छोटी श्रृंखलाओं पर वन्य जीवन सुरक्षित है तथा हाथी जैसे बड़े जानवर अलग-अलग मौसम में एक पहाड़ी से दूसरी की ओर जा सकने में समर्थ होते हैं।

पूर्वी घाट


यह पर्वत श्रृंखलाएं भारत में पूर्वी समुद्र तट के किनारे उत्तर में दक्षिण बंगाल से लेकर उड़ीसा, आंध्रप्रदेश तथा दक्षिण में केरल क्षेत्र तक फैली हुई हैं। अपनी दक्षिणी सीमा पर यह श्रृंखलाएं अनेक छोटी-छोटी पहाडि़यों में विभक्त हैं। तमिलनाडु में सिरुमलाई व करंथमलाई पर्वत पूर्वी घाट शृंखला का ही दक्षिणीविस्तार है। कालीमलाई, पाचीमलाई, सर्वारोयन, कालरायन, छितेरी, पालामलाई तथा मैसूर पहाडि़यां जो उत्तरी तमिलनाडु में स्थित हैं, पूर्वी घाट का ही विस्तार है। बिलगिरी पहाडि़यां जो कावेरी नदी से पूर्व से पश्चिमी घाट की ओर जाती हैं। यह पहाडि़यां पूर्वी व पश्चिमी घाट के बीच में वनों का एक शानदार गलियारा बनाती हैं जिसमें जंगली हाथी विचरते हैं।

नीलगिरी पर्वत


इन पर्वतों को नीले पर्वत भी कहते हैं। यह तमिलनाडु से केरल तक फैली हुई श्रृंखलाएं हैं। नीलगिरी पर्वत वास्तव में पश्चिमी घाट श्रृंखलाओं का वह भाग है जो दक्षिण के पठार का पश्चिमी किनारा बनते हैं। इन पर्वतों की सबसे ऊंची चोटी की ऊंचाई 2,637 मीटर है और उसे ‘डोडाबेटा’ कहते हैं।

अनामलाई पर्वत


यह पहाडि़यां पश्चिम घाट तथा पूर्वी घाट के पर्वतों को जोड़ती हैं तथा केरल और तमिलनाडु में स्थित हैं। सबसे ऊंची चोटी की ऊंचाई करीब 4,377 फीट है और उसे ‘अनई’ कहते हैं। यह केरल के ईडुक्की जिलें में स्थित है।

काडिमोम पहाडि़यां


यह पहाडि़या दक्षिण-मध्य केरल में स्थित हैं। उनका नामकरण वहां की ठंडे भागों में इलायची की उपज के कारण हुआ है। इन पहाडि़यों पर काली मिर्च तथा कॉफी की भी पैदावार होती है।

गारोखासी पहाडि़यां


यह मेघालय में स्थित है और इन पर मुख्य रूप से मेघालय की जनजातियां निवास करती हैं। पर्वतों के साथ ही घने उष्णकटिबन्धीय वन भी हैं। चेरापूंजी जो संसार में सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्र के रूप में जाना जाता रहा है, यहीं पर स्थित है।

नागा पहाडि़यां


भारत तथा म्यांमार की सीमाओं पर नागा पर्वत की पहाडि़यां स्थित हैं जिनकी सबसे ऊंची चोटी करीब 6,120 फीट की है। इन पर्वत श्रृंखलाओं का वह भाग जो नागालेंड में स्थित है, उसे नागा पर्वत कहते हैं।

विघटित होती पर्वतीय तंत्र


संसार के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों की ही भांति भारत के पर्वतों का पर्यावरण भी निरन्तर बिगड़ रहा है और बढ़ती जनसंख्या के साथ आर्थिक व सामाजिक बदलाव भारत के पर्वतों के पारिस्थितिकी पर भी समुचित प्रभाव डाल रहे हैं। पर्वतों के पर्यावरण की निरंतर विघटित होती प्रक्रिया निश्चय ही चिन्ता का विषय है और यदि समय रहते इसे रोका न गया तो न केवल पर्वतीय स्थानीय लोगों के लिये अपितु उन सब के लिये भी हानिकारक है जो कहीं न कहीं पर्वतों पर आश्रित हैं।

अंधाधुंध वनोन्मूलन


किसी समय अधो हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के अनेक क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय जंगल थे और पूरा क्षेत्र आर्द्र पतझड़ी वनों से पटा हुआ था, जिनमें प्रतिवर्ष पतझड़ हुआ करता था। लेकिन इनमें से अनेक क्षेत्रों का जंगल कृषि भूमि के लिये अथवा अन्य व्यावसायिक निर्माण कार्य हेतु साफ हो चुका है। मध्य हिमालय क्षेत्र में भी पाइन, देवदार, पोपलर, अखरोट, ओक, पलाश आदि के वृक्ष वनोन्मूलन की भेंट चढ़ चुके हैं। अनेक वनस्पतियां पशुओं का आहार बन लुप्त हो चुकी हैं।

वनोन्मूलन विशेष रूप से पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में चिंता का विषय है क्योंकि उन क्षेत्रों में बढ़ती हुई ईंधन की मांग, पशु आहार की मांग जंगलों के सीमा क्षेत्रों में निकट सड़कों का बढ़ता जाल, भूस्खलन आदि पर्वत वातावरण पर गहरा अघात करते हैं।

वनोन्मूलन ने नीलगिरी तथा पश्चिमी घाट की पर्वत श्रृंखलाओं की विभिन्न वनस्पतियों तथा जीव-जन्तुओं का भी विनाश किया है। वनोन्मूलन के कारण शोल घास भी विलुप्त हो रही है जो कि उष्णकटिबंधीय वनों को सदैव हरा-भरा रखती है। अनेक स्थानों पर शोल घास के क्षेत्रों को साफ कर वृक्ष लगा दिये गए हैं। शोल घास के मैदानी क्षेत्र पश्चिमी पर्वत श्रृंखलाओं को एक विशेष पारिस्थितिकी प्रदान करते हैं।

विशेष रूप से मेघालय क्षेत्र में वनों पर एक दूसरा संकट ‘झूम खेती’ के रूप में पैदा हुआ है। झूम खेती अथवा पैदावार करने हेतु धरती को बदलते रहने के अनुसार वहां के लोग अल्पकाल के लिये धरती के किसी साफ करके फसल लेते हैं और जब उस भाग की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है तो दूसरे स्थान साफ करके फिर से फसल लेने की प्रक्रिया शुरु कर देतें हैं। इस क्रम में निरन्तर वनोन्मूलन होता रहता है और यह मेघालय की पहाडि़यों के वनोन्मूलन का मुख्य कारण है। ‘झूम खेती’ तब लाभकारी हुआ करती थी जब जनसंख्या का दबाव कम था तथा इस प्रक्रिया का चक्र 20-25 वर्षों में पूरा होता था। लेकिन आज की परिस्थतियों में यह चक्र केवल 5-6 वर्षों का ही होता है और धरती की उर्वरता पाने के लिये 25-30 वर्षों का समय अवश्य ही चाहिए। इस कारण मेघालय के वन विलुप्त होने के कगार पर हैं। इसी प्रकार से शिवालिक पर्वतों पर भी भारी पशुपालन उद्योग तथा जनजातियों का दूरस्थ क्षेत्रों में बस जाने से वहां भी वनों का उन्मूलन हो रहा है।

विलुप्त होता वन्य जीवन


वनोन्मूलन से हुई अनेक क्षतियों में वन्य जीवन पर संकट भी विशेष महत्व रखता है। अधो हिमालय के तर्राइ के वनों से अनके पशु जैसे बाघ, तेंदुए , गैंडा़ आरै अनके प्रकार के हिरन जो भारत के वनों की संपदा होते थे, धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। यह पशुओं की विशेष जाति एक स्थान पर ही रहती है। इस प्रकार मध्य हिमालय के क्षेत्र से भी वनोन्मूलन के कारण इन जंगली जानवरों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है। हिमालय की विशाल पर्वत श्रृंखलाओं में अब भी जंगली बकरे, भेड़, कस्तूरी मृग, हिम तेंदुए व भेडि़ए बहुतायत से मिलतेहैं लेकिन शिकारियों के इन जानवरों के शरीर के विभिन्न अंगों को पाने के लालच ने इन जानवरों के अस्तित्व को भारी संकट में पहुंचा दिया है।

‘नीलगिरी टाहर’ पश्चिमी घाट क्षेत्र का दुर्लभ जंगली बकरा है, लेकिन शिकारियों की अनैतिक उद्दंडता के कारण बकरे की इस दुर्लभ प्रजाति का भी अस्तित्व संकट में पड़ गया है।

सामाजिक व सांस्कृतिक संकट


यातायात व संचार व्यवस्था में भारी पैमाने पर सुधार ने निश्चय ही पर्वतों का जनजीवन सुविधाजनक बनाया है किन्तु इसके साथ ही यह सुविधाएं वहां की परम्परागत जीवन शैली तथा संस्कृति को भी क्षति पहुंचा रही हैं। हिमालय क्षेत्र में आर्थिक विकास की दर बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुपात में सदैव कम रही है, जिसके कारण प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय उत्पादन क्षमता भी प्रभावित हो रही है। जनसंख्या के अनुपात में खाद्य सामग्री का उत्पादन स्पष्ट रूप से काफी कम है। इसी कारण अधिकतर पर्वतीय क्षेत्रों में लोग कुपोषण से ग्रस्त हैं, उनके पीने के शुद्ध जल का आभाव है, स्वास्थ्य तथा शिक्षा संबंधी सुविधाएं भी सीमित है।

पर्वतीय पर्यटन


हिमालय क्षेत्र में पर्यटन का विकास तेजी से हुआ है। लगभग 10 लाख व्यक्ति प्रतिवर्ष इस क्षेत्र में वन्य जीवन की झलक पाने, ट्रैकिंग, पर्वतारोहण अथवा तीर्थ स्थान की यात्रा करने आते हैं। इस संदर्भ में यह जानना आवश्यक है कि भारत में हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक मंदिर हैं जो बड़ी संख्या में लोगों को आमंत्रित करती हैं। पिछले कुछ वर्षों से बर्फ पर ट्रेकिंग व खेल कूद की उत्कृष्ट व्यवस्था और नियमित रास्ते बनाए गए हैं, जिसके फलस्वरूप विदेशी सैलानियों को भी हिमालय की यात्राएं आकर्षित करती हैं। निःसंदेह पर्यटन से स्थानीय लोगों को आर्थिक रूप से लाभ मिला है। उनका जीवन स्तर भी कुछ सीमा तक सुधरा है किन्तु पर्यटकों का अत्यधिक जमावड़ा स्थानीय लोगों को अनेक क्षेत्रों में हानि भी पहुंचाता है।

पर्यावरणीय मुद्दे


वनोन्मूलन तथा पशु आहार के रूप में अतिरिक्त दबाव के कारण भूक्षरण, भूस्खलन जैसी क्षतियां तो हुई हैं। साथ ही बढ़ती जनसंख्या ने प्रदूषण भी बढ़ाया है तथा जल के मुख्य स्रोत जैसे झरने, झील आदि को कूडे़-करकट व अन्य गंदगी से प्रदूषित किया है। कश्मीर की डल झील तथा नैनीताल की नैनी झील का जल वहां के स्थानीय लोगों की जल आपूर्ति करता रहा है। किंतु प्रदूषण के कारण इस जल को पीने से लोगों को दस्त, हैजा, तथा टायफायड जैसे रोगों का सामना करना पड़ रहा है।

पर्वतों पर चूने की खुली हुई खानें तथा कोयले की खदानों से निरंतर निकासी ने परिस्थितिकी विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है। मेघालय में चूने के अरबों टन का भंडार सीमेंट कारखानों में काम आता है। प्रदेश में दक्षिणी सीमा पर लगभग 200 किलोमीटर लंबी उत्तम चूने की खानें हैं जिनसे भारी मात्रा में निकासी हो रही है। इसी प्रकार कोयले की खदानें भी पर्वतों के पर्यावरण तथा सुरक्षा को आघात पहुंचाती हैं।

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अन्य स्रोतों से




संदर्भ
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बाहरी कड़ियाँ
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