भारत में गिद्धों का संरक्षण

Submitted by UrbanWater on Mon, 07/03/2017 - 16:00
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भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र के सौजन्य से प्रकाशित


गिद्धगिद्धभारत जैवविविधताओं से परिपूर्ण देश है, जहाँ पूरे विश्व का 8% जैवविविधता वाला भाग मौजूद है। सभी प्राणी एक दूसरे से खाद्य शृंखला द्वारा सम्बन्धित है। आज विश्व में कई जंगली प्रजातियों अस्तित्व के संकट का सामना कर रही हैं और कई विलुप्त होने की कगार पर है। इन सबके लिये अवैध शिकार, घटते वन्य क्षेत्र, घरेलू पशुओं द्वारा चराई और अवैध रूप से निर्यात जिम्मेदार है। इन सब में पक्षियों की घटती जनसंख्या सबसे ज्यादा चिन्ताजनक हैं। क्योंकि पक्षी अनेक प्रकार की पारिस्थितिकी सेवाएँ प्रदान करते हैं।

पक्षियों का एक पीड़ित जाति है गिद्ध। जिसे पूर्व काल में जटायू के नाम से जाना जाता है। यद्यपि गिद्ध जाति अवैध शिकार के खतरों से बची रहती है तथापि परोक्ष रूप से मानव जाति के प्रकोप का भाजन होती है। गिद्ध एक मृतोपजीवी पक्षी है जो भोजन के लिये केवल मृत पशुओं के शरीर पर निर्भर रहता है। इस तरह से वह वातावरण के लिये कुशल एवं प्राकृतिक सफाई कर्मी का कार्य करता है। इनका पाचनतंत्र मजबूत होता है जिससे कि यह रोगाणुओं से परिपूर्ण सड़ा गला माँस भी पचा सकते हैं। इस प्रकार गिद्ध वास्तव में अनेक संक्रामक रोगों का विस्तार रोकते हैं।

भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया के उपमहाद्वीपीय क्षेत्रों में पाये जाने वाले गिद्ध पुरानी दुनिया के गिद्ध हैं और ये पतंगे, हॉक और चील आदि से अपेक्षाकृत अधिक समीपवर्ती सम्बन्ध रखते हैं। भारत में नौ गिद्ध प्रजातियाँ पाई जाती है जिनके नाम व वर्तमान स्थिति निम्नानुसार हैं –

 

 

 

आम नाम

जेनेरिक मान

वर्तमान स्थिति

सफेद पीठ वाले गिद्ध

जिप्स बेन्गालेन्सिस

गम्भीर संकटग्रस्त

बेलनाचुंच गिद्ध

जिप्स टन्यूरोस्टस्टरिस

गम्भीर संकटग्रस्त

दीर्घचुंच गिद्ध

जिप्स इंडिकस

गम्भीर संकटग्रस्त

राज गिद्ध

सारकोजिप्स काल्वस

गम्भीर संकटग्रस्त

गोपर गिद्ध

नियोफरान पर्कनोप्टरस

संकटग्रस्त

श्याम गिद्ध

एजिपिथस मोनाकस

समीपवर्ती चेतावनी

यूरेसियन पांडुर गिद्ध

जिप्स फल्वस

कम चिन्ता

पांडुर गिद्ध

जिप्स हिमालऐन्सिस

कम चिन्ता

अरगुल गिद्ध

जिपीटस बारबाटस

कम चिन्ता

 

एशियाई गिद्ध दुर्घटना और वर्तमान स्थिति


1990 के पहले दशक में लगभग 40 लाख गिद्ध भारत में थे, जो लगभग 12 लाख टन मांस को वार्षिक दर से समाप्त किया करते थे। पिछले दस दशकों में डाइक्लोफेनेक नामक दवाई ने भारत से गिद्धों की 99% आबादी को साफ कर दिया है। भारत में सर्वप्रथम गिद्ध की घटती हुई जनसंख्या केलवादेल, घाना नेशनल पार्क (भरतपुर, राजस्थान) में 1980 से 1990 के मध्य दर्ज की गई, जो आगे की गणना के लिये मील का पत्थर साबित हुई। अचानक गिद्धों की घटती हुई संख्या को तब उत्तरी भारत और इससे जुड़े हुए पड़ोसी देशों में भी अवलोकित किया गया। इसी क्रम में गिद्धों की चार प्रजातियाँ (सफेद पीठ वाले गिद्ध, बेलनाचुंच गिद्ध, दीर्घुचुंच गिद्ध और राज गिद्ध), विश्व संरक्षण संघ द्वारा सूचीबद्ध गम्भीर संकटग्रस्ट श्रेणी में आ चुकी है जो कि खतरे के आकलन की उच्चतम श्रेणी है।

यह आकलन सूचित करता है कि गिद्ध प्रजाति विश्व के जंगलों से निकट भविष्य से में समाप्त हो सकती है। आहार शृंखला के सर्वोच्च स्थान में होने के कारण गिद्ध वातावरण में होने वाले परिवर्तन जैसे कि रासायनिक प्रदूषण, भोज्य पदार्थों की कमी, लिंगानुपात में कमी और आवास विनाश के लिये संवेदी होते हैं। गिद्धों की जनसंख्या गिरावट की जाँच के दौरान पाया गया कि मवेशियों के उपचार में प्रयोग किया जाने वाला रसायन डाइक्लोफेनेक इसके लिये उत्तरदाई हो सकता है, जिसका प्रयोग 1980 के प्रारम्भिक वर्षों से प्रचलन में आया। बाद में प्रयोगों में वातावरण में डाइक्लोफेनेक और गिद्धों की मौत के मध्य सम्बन्ध स्थापित हो गया।

यह दवा मवेशियों को दर्द निवारण के लिये दी जाती थी। यदि दवा के उपचार के 72 घंटे के भीतर पशु मर जाता है तो उसके शव में यह दवा उपस्थित रहती है। यदि गिद्ध इस दूषित शव का भोजन करते हैं, तो यही दवा उनके लिये विष का काम करती है। गिद्धों की मौत का मुख्य कारण डाइक्लोफेनेक विषाक्तता के दौरान गुर्दों की विफलता है जो कि कम समय में ही उन जानवरों की लोथ खाने से होती है जिनका कि इलाज कभी इन दर्द निवारक दवा से हुआ होता है। ऐसे मामलों में गिद्धों में 85% आँतों के जख्म देखे गए हैं।

भारत में गिद्धों की सरंक्षण नीति


भारत सरकार ने गिद्धों के पुन: उत्पादन के लिये बहुर्मुखी योजना कार्यान्वित की है : (एक्ससीटू संरक्षण कार्यक्रम) एक्ससीटू संरक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य है कि जंगलों में गिद्धों की जनसंख्या सन 2030 तक स्वत: स्थापित हो जाये। इसके पहले चरण में कैप्टिव ब्रीडिंग (संरक्षित प्रजनन) द्वारा गिद्ध जनसंख्या बढ़ाने का प्रस्ताव है तथा दूसरे चरण में इन गिद्धों को सुरक्षित प्राकृतिक वातावरण में, पुन: स्थापित करने का प्रस्ताव है। वर्तमान में ऐसे प्राकृतिक क्षेत्रों को चिन्हित किया जा रहा है जहाँ गिद्धों की प्राकृतिक आबादी है और नए गिद्ध जन्म ले रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों के आस-पास डाइक्लोफेनेक-मुक्त भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करके उन्हें गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाना है।

दक्षिणी एशिया के विभिन्न स्थानों में जिप्स नामक गिद्ध की तीन प्रजातियों (जोकि ‘गम्भीर संकटग्रस्ट’ हैं) को प्रजनन केन्द्र में संरक्षित रखने के लिये केन्द्रों की स्थापना की जा रही है। इन केन्द्रों में एक्ससीटू संरक्षण बीमार गिद्धों की जाँच के साथ-साथ मवेशियों के शवों का भी विश्लेषण किया जाता है। भारत में तीन जिप्स नस्लों का प्रजनन कार्यक्रम बम्बई प्राकृतिक ऐतिहासिक सभा (बी.एन.एच.एस) मुम्बई, द्वारा तीन केन्द्रों- पिंजौर (हरियाणा), राजभत्खावा (पश्चिम बंगाल) व रानी (असम) में चलाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा पाँच चिड़ियाघरों जो कि जूनागढ़, भोपाल, हैदराबाद, गुवाहाटी और भुवनेश्वर में स्थित हैं, को भी गिद्ध प्रजनन के लिये मान्यता प्रदान की गई है।

प्रजनन केन्द्रों के लिये किशोर पक्षियों को देश के विभिन्न भागों से पकड़ा जाता है और चिन्हित किया जाता है। बी.एन.एच.एस. के पिंजौर प्रजनन केन्द्र में पहला सफेद पीठ वाला गिद्ध चूजा 2007 और पहला बेलनाचुंच गिद्ध चूजा 2009 में पैदा हुआ। 2010 में पहला दीर्घचुंच गिद्ध चूजा कृत्रिम इन्क्यूबेशन से उत्पन्न हुआ और पला। बहुराष्ट्रीय संघ ‘सेव’ द्वारा दूसरे चरण में गिद्धों के संरक्षण की बात की जा रही है। इस संघ में गिद्ध बचाने वाले विशेषज्ञ हैं। वे इस पक्ष के प्रचार प्रसार में लगे हैं और इस काम के लिये फंड जुटाने में भी तत्पर है।

गिद्धों की प्रजनन दर धीमी होती है। ये एक पत्नीत्व के एक अभ्यासी पक्षी हैं। नर गिद्ध और मादा गिद्ध जीवन भर के लिये जोड़ा बनाते हैं और प्राय: पाँच वर्ष की आयु से प्रजनन प्रारम्भ करते हैं। एक वर्ष में एक ही अण्डा देते हैं अत: गिद्धों की प्रजनन दर धीमी होती है। अब इस दर को बढ़ाने के लिये कृत्रिम इन्क्यूबेशन का सहारा लिया जा रहा है। जिप्स नामक प्रजाति का अण्डा सेने का समय अधिकतर 50-55 दिनों के बीच होता है।

पक्षियों के प्रजनन कार्यक्रमों की सफलता में सबसे बड़ी समस्या लिंग की सटीक पहचान है, क्योंकि नर व मादा एकलस्वरूपी होते हैं, सामान्यत: इन्हें देखकर इनमें लिंग विभेद कर पाना सम्भव नहीं है। नर व मादा गिद्धों को प्रजनन केन्द्रों में समान अनुपात में रखा जाना प्रजनन की अधिकाधिक सफलता के लिये सहायक होता है। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान में गिद्धों की जिप्स प्रजातियों में आण्विक विधि से लिंग पहचान करने के लिये तरीका खोजा गया है तथा इसके द्वारा कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम को सहयोग प्रदान किया जा रहा है।

भारत सरकार के साथ-साथ अन्य देशों ने भी जिप्स नामक प्रजाति के गिद्धों की आबादी को बचाने के लिये शुरुआत की है ताकि उन्हें संरक्षित प्रजनन द्वारा और उनकी वृद्धि को निगरानी द्वारा तब तक बचाया जा सके, जब तक कि वे स्वयं को स्थापित न कर लें।

विश्वसनीय जनसंख्या अनुमान का आकलन


बी.एन.एच.एस. द्वारा क्षेत्रीय स्तर पर, राज्य स्तर और देशीय स्तर पर गिद्धों के आवासीय घोंसले, गिद्धों की नई आबादी और आवासीय गिद्धों के बारे में सर्वेक्षण किया जा रहा है। जिससे कि उनकी आबादी स्वत: उत्पादित और स्थापित होने के आँकड़े उपलब्ध हो सकें। साथ-ही-साथ पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनेक दर्द निवारक के प्रतिबन्ध का प्रभाव देखा जा सके। बी.एन.एच.एस. द्वारा की गई 2007 की गणना के अनुसार भारत में 11000 सफेद पीठ वाले गिद्ध, 45000 बेलनाचुंच गिद्ध व 1000 दीर्घचुंच गिद्ध ही बचे हैं।

स्वस्थानी संरक्षण कार्यक्रम


इस कार्यक्रम का उद्देश्य पक्षियों को मुख्यत: सुरक्षित स्थान और विषैली दवाई डाइक्लोफेनेक से मुक्त भोजन उपलब्ध कराना है। भारत सरकार द्वारा चरणबद्ध तरीके से पशुचिकित्सा में प्रयुक्त दवाई डाइक्लोफेनेक के उपयोग को समाप्त करने और इसके विकल्प के रूप में किसी अन्य दवाई को उपयोग करने के लिये कई कदम उठाए गए हैं। 2004 में भारत ने आई.यू.सी.एन. के साथ जिप्स प्रजाति के गिद्धों का संरक्षण के लिये डाइक्लोफेनेक का पशुचिकित्सा में दर्द निवारक के रूप में उपयोग रोकने के लिये संकल्प लिया। पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान, बी.एन.एच.एस. व वन विभाग हरियाणा ने रॉयल सोसाइटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस से तकनीकी जानकारी प्राप्त करके मेलोक्सीकेम नामक दवा का चार चरणों में परीक्षण करके पाया कि यह दवा गिद्ध-सुरक्षित है तथा पशुचिकित्सा में डाइक्लोफेनेक के विकल्प के रूप में प्रयोग हो सकती है।

परिणामस्वरूप भारत सरकार द्वारा 2006 में डाइक्लोफेनेक दवाई को दवा और कास्मेटिक अधिनियम के तहत धारा 10ए और 26ए के अन्तर्गत पशुचिकित्सा के लिये प्रतिबन्धित कर दिया गया। कई अन्य वैकल्पिक दर्द निवारक दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है ताकि पशुचिकित्सा के क्षेत्र में इन दवाओं का गिद्धों व अन्य मृतोपजीवी पक्षियों पर प्रभाव का पता लगाया जा सके। इसी कड़ी में किटोप्रूफेन नामक दवा भी गिद्धों के लिये असुरक्षित पाई है।

मुद्दे की बात यह है, पशुचिकित्सा में प्रतिबन्धित होने के बावजूद डाइक्लोफेनेक मानव चिकित्सा के लिये उपलब्ध है तथा इसका पशुचिकित्सा में भी अवैध प्रयोग सम्भव है। इस सन्दर्भ में मृत मवेशियों के शवों में रसायन के स्तर की निगरानी अति आवश्यक है ताकि खुले वातावरण में बचे खुचे गिद्धों की मृत्यु दर में नियंत्रण के लिये रासायनिक प्रदूषण, निवास संशोधन और बुनियादी ढाँचे के प्रभावों सहित गिद्ध संरक्षण के लिये अन्य सम्भावित खतरों पर विचार एवं अनुसन्धान सुनिश्चित हो सके।

भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान में बी.एन.एच.एस व रॉयल सोसाइटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस के सहयोग से पूरे भारतवर्ष से एकत्रित मृत गाय, भैंस के मृत शरीरों में डाइक्लोफेनेक अवशेषों के स्तर की प्रभावी व व्यापक निगरानी की जा रही है। 2004-05 के सर्वेक्षण में लगभग 11 प्रतिशत शव विषाक्त पाये गए। मेलोक्सीकेम मानक दवा गिद्धों के लिये अपेक्षाकृत सुरक्षित पाई गई, अत: इसके वैकल्पिक उपयोग पर बल दिया जाने लगा।

भारत, नेपाल, पाकिस्तान सहित दक्षिणी-पूर्वी देशों में 2006 में डाइक्लोफेनेक दर्द निवारक दवा का पशु चिकित्सा में उपयोग वर्जित कर दिया गया। 2007-08 के सर्वेक्षण में मवेशियों के लगभग 6 प्रतिशत शवों में डाइक्लोफेनेक के अवशेष मिले। 2008 में इस दवा की बिक्री, प्रचार-प्रसार व उपयोग करने पर कारावास का प्रावधान किया गया है।

हाल के सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि अभी भी लगभग 4 प्रतिशत शव डाइक्लोफेनेक से विषाक्त हैं। विषाक्त शवों की संख्या में कमी तो आई है परन्तु अभी भी यह आँकड़ा 1 प्रतिशत के सुरक्षित स्तर से उपर है। पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनेक के उपयोग को समाप्त करने के उद्देश्य से उठाए गए कोई भी कदम तब तक पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं हो पाएँगे जब तक कि मानव चिकित्सा प्रयोग से डाइक्लोफेनेक समाप्त नहीं किया जाता।

गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि गिद्धों के भोजन से तत्काल विषैले दर्द निवारकों को दूर किया जाये और उनका सामान्य वातावरण के अनुसार समन्वय कराया जाये। इसके लिये पशुचिकित्सकों और पशुओं के मालिकों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है। दोनों को नए मुद्दों से सम्बन्धित जानकारी के लिये उपयुक्त तरीके से सूचित रखा जाना चाहिए।

पशुपालक तो अपने पशु को जल्द-से-जल्द स्वस्थ देखना चाहता है, फिर भले ही इसके लिये कुछ कीमत क्यों न चुकानी पड़े अत: चिकित्सकों व सम्बन्धित कार्यकर्ताओं की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि डाइक्लोफेनेक की जगह मेलोक्सीकेम जैसे परखे हुए गिद्ध-सुरक्षित दर्द निवारक का प्रयोग करें। किसी भी दवा की वर्तमान स्थिति के बारे में झूठी जानकारी भ्रम में डाल सकती है अत: भारत सरकार ने इस विषय में सटीक और सही जानकारी सम्बन्धित लोगों के साथ-साथ आम आदमी को भी देने के लिये व्यापक प्रचार व प्रसार अभियान शुरू करने का निर्णय लिया है।

वन्यजीव संरक्षण, प्रबन्धन और रोग निगरानी केन्द्र, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान, इज्जतनगर बरेली 243122 (उ.प्र.)

 

 

 

 

 

 

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