भारत के चाय के बागानों में महिलाओं की दयनीय स्थिति

Submitted by HindiWater on Sat, 08/29/2020 - 14:11
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India Water Portal

(Image Source: Wikimedia Commons)

भारत विश्व में चाय का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। वर्ष 2014 में भारत ने 1.2 मिलियन मीट्रिक टन चाय का उत्पादन किया था। देश में 563.98 हजार हेक्टेयर में चाय के बागान हैं, जिसमें से असम (304.40 हजार हेक्टेयर), पश्चिम बंगाल (140.44 हजार हेक्टेयर), तमिलनाडु (69.62 हजार हेक्टेयर) और केरल (35,000 हजार हेक्टेयर) में चाय उत्पादन होता है। 

चाय कैमेलिया सीनेंसिस नाम के पौधे से आती है, जो अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उगता है। चाय की झाड़ी पांच साल बाद पत्तियों का उत्पादन शुरू करती है। इसके बाद से व्यावसायीकृत होती है और ये सौ सालों तक उत्पादक रहते हैं। 
चाय उद्योग भारत का सबसे बड़ा नियोक्ता है, जिसकी देश में 157504 स्माॅलहोल्डिंग और 1686 संपदाओं से 3.5 मिलियन से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है। असम और पश्चिम बंगाल भारत के दो मुख्य चाय उत्पादक क्षेत्र हैं। चाय के बागानों में महिलाएं प्रमुख कार्यबल के रूप में कार्य करती हैं। दरअसल, पौधारोपण के क्षेत्र में रोजगार औपनिवेशिक प्रथाओं से प्रभावित होकर 19वीं सदी में शुरू हुआ था, जब ब्रिटिश कंपनियों ने मध्य और दक्षिण भारत से निम्न जाति (दलित या अछूत जाति), गरीबी से त्रस्त, भूमिहीन और आदिवासी आबादी को इस काम को करने के लिए मजबूर किया। महिलाओं ने इस प्रक्रिया में श्रमिकों का एक आयात समूह बनाया, जो परिवारों का समर्थन करने और बच्चों की देखभाल करने के अलावा अधिक गुणवत्ता के साथ चुनिंदा कार्यों (जैसे प्लकिंग) को करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

स्वतंत्रता के बाद भी चाय बागानों में श्रमिकों के जीवन को नियंत्रित करने में सरकार की बहुत कम सक्रिय भूमिका थी और चाय बागान इसी तरह संचालित हो रहे थे। जिस कारण श्रमिक भूमिहीन रहे और उनका जीवन हाशिए पर रहा। हालांकि कई अध्ययनों से असम के बागानों में श्रमिकों की खराब स्थिति के बारे में पता चला है, साथ ही महिला श्रमिकों के स्वास्थ्य और कल्याण के बारे में बहुत कम जानकारी है। 

‘हमारे लिए कौन खड़ा होगा ?’ भारत में महिलाओं के चाय बागान श्रमिकों के स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक’’ नाम से एक अध्ययन ‘इंटरनेशनल जर्नल फाॅर इक्विटी इन हेल्थ’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ, जिसमें असम में जोरहाट जिले में तीन चाय के बागानों में काम करने वाली महिलाओं की कार्य-दशा और स्वास्थ्य की जरूरतों और धारणाओं का पता लगाया गया है।

महिलाओं से काम ज्यादा कराते थे और पैसे कम देते थे

महिलाओं का प्राथमिक कार्य चाय की पत्तियों को तोड़ना था। वें सर्दियों के दौरान झाड़ियों को छीलने जैसे मैनुअल काम भी करती थीं। वें चाय की झाड़ियों पर ‘सूखा सफेद पाउडर’ (शायद यूरिया/कीटनाशक) डालती हैं। इन कार्यों को करने में स्थायी और अस्थायी दोनों ही प्रकार के श्रमिक शामिल थे।

सोमवार से शनिवार तक हर दिन महिलाएं काम कर रही थीं, जबकि रविवार को श्रम कार्य जैसे ईंट भट्ठों पर काम, दैनिक भुगतान वाले कृषि कार्य या आसपास के गांवों में घरेलू काम करती थीं। इसके अलावा, महिलाओं को खाना पकाना, सफाई करना, पानी और जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करना, बच्चों को खिलाना आदि घरेलू काम भी करने पड़ते थे। अधिकांश महिलाएं सुबह 4 बजे से रात के 10 बजे तक काम करती थीं और फिर सोने चली जाती थीं। काम के दिनों में सुबह 4 से 7.30 बजे तक वें घर का काम पूरा कर लेती थीं और फिर सुबह 8 बजे काम पर जाते थे। काम के दौरान उन्हें दोपहर 1 बजे से 2 बजे तक एक घंटे का लंच ब्रेक मिलता था, जिसे वे कभी-कभी रोजाना के लक्ष्य को पूरा करने के लिए छोड़ देते थे और शाम चार बजे तक लगातार काम करते थे। 

निजी बागानों में काम करके महिला श्रमिकों को रोजाना 126 रुपये मिलते थे, जबकि सरकारी बागानों में प्रतिदिन की मजदूरी 115 रुपये मिलती थी, जिसमें रोजाना 24 किलो पत्तियों को तोड़ने का लक्ष्य था। यदि वें इस लक्ष्य को पूरा करने में विफल रहते थे, तो 1 से 5 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से मजदूरी में कटौती होती है। अपने काम की जो मजदूरी उन्हें मिलती थी, वो हमेशा उनकी रोजाना की घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त थी। 

समर्थन, अधिकार और सामाजिक सुरक्षा की कमी ने महिलाओं के पीड़ा को और बढ़ा दिया

स्थायी श्रमिकों को आवास सुविधाएं दी गई थी, लेकिन कुछ गैर-स्थायी श्रमिक भी श्रम लाइनों में निवास कर रहे थे क्योंकि उनके पति या परिवार का कोई सदस्य स्थायी श्रमिक था। क्षेत्र में चाय बागान श्रमिकों को दी जाने वाली आवास सुविधाएं बेहद खराब थी। वहां बिजली, पानी और शौचालय की पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं। जिस कारण लोगों को बागान क्षेत्रों में खुले में शौच करने के लिए मजबूर होना पड़ता था।

महिलाओं ने बताया कि बच्चों और उनके के लिए रात में बाहर जाना मुश्किल था। उन्हें मजबूरन कंपाउंड में ही पेशाब और शौच करना पड़ता था, जिसे सुबह उठकर साफ किया जाता था। महिलाओं ने यह भी शिकायत की कि मानसून के दौरान मलमूत्र की अधिक दुर्गंध के कारण चाय की पत्तियों को तोड़ना बेहद कठिन हो जाता है। जिन लोगों के घर में शौचालय थे उन्होंने बताया कि शौचालय के गड्ढों की नियमित रूप से सफाई नहीं की जाती थी, जिस कारण टैंक का मलयुक्त गंदा पानी ओवरफ्लो होकर बाहर बहने लगता था। बागानों में काम करने वाली सभी महिलाओं ने कहा कि मरम्मत और नवीकरण के बारे में उनकी शिकायतें अनुत्तरित हैं।

12 दिनों के कार्य दिवस के बाद सभी श्रमिक 6 किलो राशन - 3 किलो चावल और 3 किलो गेहूं का आटा प्राप्त करने के हकदार थे, जिसमें 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चे भी शामिल थे। लगभग सभी महिलाओं ने कहा कि उन्हें 6 किलो से कम, कभी-कभी 12 कार्य दिवसों के लिए केवल 3 किलोग्राम राशन ही मिलता था, जो कि घर के सभी सदस्यों को खिलाने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसलिए घर चलाने के लिए उन्हें आसपास की दुकानों से राशन खरीदना पड़ता था। 

राशनकार्ड धारक श्रमिक खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के तहत प्रति व्यक्ति 5 किलो चावल पाने के पात्र थे। सरकारी दुकानों से राशन प्राप्त करने वाले गैर-स्थायी श्रमिकों ने शिकायत की कि सरकारी दुकानदार 2-3 किलोग्राम प्रति घर से राशन की कटौती करेंगे। इसके अलावा नियमित रूप से राशन वितरित नहीं किया गया था और बागानों में काम करने वाले कई गैर-स्थायी श्रमिकों के पास राशन कार्ड भी नहीं था। सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से स्थायी महिला श्रमिक तीन महीने के मातृत्व अवकाश की हकदार थीं, लेकिन उन्हें अवकाश नहीं दिया जाता था जिस कारण गैर-स्थायी श्रमिकों को रोजगार छोड़ना पड़ा। हालांकि, मातृत्व अवकाश के दौरान भी स्थायी श्रमिकों को पूर्ण भुगतान नहीं दिया गया था और उनके दैनिक वेतन का आधा हिस्सा काट लिया गया था।

बागानों में काम करने वाले श्रमिको के बच्चों के लिए प्राथमिक विद्यालय को अनुदानित किया गया था, लेकिन स्कूल में शिक्षा के स्तर को बनाए रखने के लिए किसी प्रकार का समर्थन नहीं किया जाता था, जिस कारण कई बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ा और वें अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकें। ऐसे में आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें अपने माता-पिता के साथ ही बागानों में काम करना पड़ता है।

घर और कार्य स्थल पर मूक रहनाः महिलाओं की दुर्दशा

महिलाओं की भूमिका अक्सर चाय के बागानों में काम करने और घरेलू काम तथा बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल तक ही सीमित पाई गई। घरेलू स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में भी महिलाओं को कम ही शामिल किया जाता था। यहां तक कि बागानों में काम के दौरान महिलाओं को अपनी बात रखने और प्रश्न करने में डर लगता था। 

काम के खराब महौल ने महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया था

महिलाओं का काम पूरे वर्ष और सभी मौसमों में जारी रहता था। मानसून के दौरान भी चाय की पत्तियों को तोड़ना बंद नहीं हुआ था। लंच ब्रेक के लिए कोई आश्रय न होने के कारण भी बारिश में समस्या थी और फिसलनभरे रास्ते पर चोट लगने का खतरा भी रहता था। 

जूते और दस्ताने जैसे पर्याप्त सुरक्षात्मक साधनों के अभाव में काम के दौरान कीड़ों द्वारा काटना सामान्य था। इससे बचने के लिए महिलाएं अक्सर सरसों के तेल, चूने और तंबाकू के पत्तों से बने स्थानीय रूप से तैयार इमोलिएंट का उपयोग करती थीं। 

कार्य स्थल में शौचालय नहीं थे और न ही हाथ धोने की सुविधा थी। जिस कारण महिलाओं को चाय के बागानों में ही शौच करने के लिए मजबूर होना पड़ता था। मासिक धर्म के दौरान सेनेटरी पैड/कपड़ा बदलने की भी कोई व्यवस्था नहीं थी। महिलाओं को चाय की झाड़ियों के नीचे ही पैड़/कपड़ा बदलना पड़ता था और इस्तेमाल किए गए पैड़/कपड़े को पॉलिथीन में लपेटकर अपने पास ही रखते थे। फिर इसी कपड़े को धोने के बाद फिर से इस्तेमाल किया जाता था।

महिलाओं की इस गुम आवाज को मजदूर यूनियनों के साथ नोट किया गया। सरकारी बागानों की महिलाओं ने श्रमिक संघों में भाग नहीं लेती थीं, जबकि निजी बागानों की बहुत कम महिलाएं ही श्रमिक यूनियनों में शामिल होती थीं।

अपने मासिक धर्म शोषण कपड़े को बदलने के लिए कुछ महिलाएं निजी चाय के बागनों में दोपहर के भोजन के दौरान घर जाती थीं। चाय के बागानों में डे-केयर सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए, लेकिन महिलाओं द्वारा दर्ज कराई गइ शिकायतों में साफ पानी और चाय की कमी भी शामिल है। केवल एक ही निजी बागान में पूरी तरह कार्यात्मक शिशुगृह था, लेकिन इसके लिए केवल स्थायी श्रमिक बच्चे ही पात्र थे। अस्थायी महिलाओ के लिए ऐसी कोई सुविधा नहीं थी। दो अन्य बागानों में बांस की झोपड़ी को शिशुगृह बनाया गया था, लेकिन यहां किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं थी। हालांकि बागान में एक अस्पताल भी था, लेकिन डाॅक्टरों और दवाओं की कमी के कारण महिलाएं यहां की सेवाओं से संतुष्ट नहीं थीं। बुखार, सिरदर्द, बदनदर्द जैसी बीमारियों के लिए पास के केमिस्ट की दुकानों से ही महिलाएं दवाई खरीदती थीं। गैर-स्थायी श्रमिक बागानों के अस्पतालों से स्वास्थ्य सेवाओं के हकदार थे, लेकिन ये सुविधा उन्हें काम के दौरान ही दी जाती थी। हालांकि, उनके लिए एम्बुलेंस सेवाओं की सुविधा नहीं थी।

इसके विपरीत, राज्य स्वास्थ्य मिशन की एक पहल पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत श्रमिकों को चाय के बागानों के अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित की गई थीं। राज्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा लागू की गई आपातकालीन एम्बुलेटरी सेवा से महिलाएं खुश थीं और उन्होंने बताया कि इससे उच्च स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए रोगियों को ले जाना आसान हो गया। 

आमतौर पर महिलाएं स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अस्पताल जाने में देरी करती थीं, क्योंकि फिर गैर-स्थायी श्रमिकों का एक दिन का और स्थायी श्रमिकों का आधे दिन का वेतन कटता था। कई महिलाएं अपने जख्म और दर्द को कम करने के लिए अक्सर शराब का सेवन करती थीं और वें अक्सर उदास और डिप्रेस्ड पाई गईं।

अध्ययन में महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं -

  • राज्य सरकार और चाय संपत्ति क्षेत्र को वर्तमान उद्योग वास्तविकताओं और लोकतांत्रिक मानदंडों को ध्यान में रखते हुए औपनिवेशिक युग की नीतियों से दूर रहने की जरूरत है और बागान श्रमिकों के स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सामाजिक क्षेत्रों को राज्य के दायरे में लाने के लिए एक न्यायिक बदलाव लाने की आवश्यकता है। श्रमिकों के दैनिक जीवन और कामकाजी हालत में सुधार के लिए प्लांटेशन लेबर एक्ट 1951 में संशोधन करने की जरूरत है।
  • अस्थायी और स्थायी, सार्वजनिक और निजी सभी श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी को अनिवार्य करने की आवश्यकता है। यदि श्रमिक अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाते या छुट्टी लेते हैं तो ऐसे में उनके वेतन में नहीं अनुचित कटौती न की जाए। 
  • सरकारी विभागों जैसे शिक्षा, चाय जनजातियों, राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन और असम कौशल विकास मिशन को एक साथ काम करना चाहिए। बागान श्रमिकों के युवाओं और परिवार के बूढ़ें सदस्यों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाए और श्रमिकों के बच्चों को उच्च शिक्षा छात्रवृत्ति प्रदान करें।
  • कार्यक्षेत्र में कार्यस्थल और सामुदायिक मंचों पर महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व का समर्थन करने की आवश्यकता है।1990 के दशक के उत्तरार्ध से असम में स्वयं सहायता समूह मौजूद हैं, जिन्हें केंद्र द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से पोषित किया जा रहा है। गैर-सरकारी संगठनों की मदद से बागानों के लिए महिला और बाल विकास विभाग और/या सामाज कल्याण विभाग के माध्यम से इन्हें बढ़ाया जाना चाहिए।
  • मौजूदा बागान अस्पतालों को स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों में बदलने की तत्काल आवश्यकता है, जो कि निवारक और प्रचारक स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित हों। साथ ही पोषण सुविधा, शराब बंदी के लिए समर्थन और नुकसान कम करने के कार्यक्रमों के साथ-साथ स्वच्छता और व्यावसायिक सुरक्षा पर जोर देने की आवश्यकता है।

यहां पढ़ें मूल लेख - Think, before you have your cup of tea!
 

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