बिहार में हर साल क्यों आती है बाढ़

Submitted by HindiWater on Thu, 06/25/2020 - 08:34

प्रतीकात्मक फोटो - India TV

बिहार हर साल बाढ़ का दंश झेलता है। करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं। सैंकड़ों की संख्या में लोग और मवेशी मरते हैं। कई लापता हो जाते हैं, जिनका आज तक कुछ पता नहीं चला है। करोड़ों रुपये की फसल जलमग्न हो जाती है। एक प्रकार से बाढ़ बिहार में सालाना त्रासदी बन चुकी है, जो हर साल आती ही है। यही कारण है कि बिहार देश का सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित इलाका है। उत्तर बिहार की लगभग 76 प्रतिशत आबादी हर साल बाढ़ से प्र्रभावित होती है। देश के कुल बाढ़ प्रभावित इलाकों में 16.5 प्रतिशत इलाका बिहार का है। बाढ़ से प्रभावित होने वाली देश की कुल आबादी में 22.1 प्रतिशत आबादी बिहार की है। इससे बिहार में बाढ़ से होने वाली विभीषिका का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन बिहार को अभी तक बाढ़ से निजात नहीं मिल पाई है। हालांकि बिहार में बाढ़ आने के कई कारण हैं, लेकिन मुख्य कारण बिहार की भौगोलिक परिस्थितियों को माना जाता है।

बिहार के उत्तर में नेपाल का पहाड़ी क्षेत्र है, जहाँ वर्षा होने पर पानी नारायणी, बागमती और कोसी जैसी नदियों में जाता है। ये नदियाँ बिहार से होकर गुजरती हैं। नेपाल की बाढ़ भारत में भी बाढ़ का कारण बनती है। यह बाढ़ पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में होती है। सन 2008, 2011, 2013, 2015, 2017 और 2019 वे वर्ष हैं, जब नेपाल और भारत दोनों देशों में भीषण बाढ़ दर्ज की गई है। कोसी, नारायणी, कर्णाली, राप्ती, महाकाली वे नदियाँ हैं जो नेपाल के बाद भारत में बहती हैं। जब नेपाल के ऊपरी हिस्से में भारी वर्षा होती है तो तराई के मैदानी भागों और निचले भू-भाग में बाढ़ की स्थिति बनती है। एक बड़ी खामी यह है कि नेपाल के ऊपरी इलाकों में भारी वर्षा की सूचना भारत में देर से मिलती है। समय से सूचना मिलने पर बचाव के काम पहले से किए जा सकते हैं। कई बार अफवाहें भी हालात को बिगाड़ती हैं, इसलिए विश्वसनीय सूचना नेटवर्क को विकसित करने की जरुरत है।

भारत व नेपाल की सरकारों ने एक-दूसरे को बाढ़-सूचना देने की व्यवस्था विकसित की, पर इसमें आमतौर पर 48 घंटे का समय लगता है, लेकिन बिहार में बाढ़ का स्थाई समाधान क्या है ? राज्य के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने कहा है कि जब तक नेपाल में कोसी नदी पर प्रस्तावित उच्च बाँध नहीं बन जाता बिहार को बाढ़ से मुक्ति नहीं मिलेगी। उत्तर बिहार को बाढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए 1897 से भारत और नेपाल की सरकारों के बीच सप्तकोसी नदी पर बाँध बनाने की बात चल रही है। सन् 1991 में दोनों देशों के बीच इसे लेकर एक समझौता भी हुआ था। इस परियोजना के साथ बड़ी संख्या में लोगों के पुनर्वास की समस्या भी जुड़ी है, साथ ही नेपाल के लिए इसमें कोई बड़ा आकर्षण नही है। इस बाँध से सिर्फ कोसी क्षेत्र में बाढ़ से राहत मिलेगीा। उत्तर बिहार में कोसी के अलावा गंडक, बागमती, कमला, बलान और महानंदा नदी में भी अक्सर बाढ़ आती है। कोसी इलाके में यों भी बाढ़ का प्रकोप अब कम हो गया है। 

Climate Change, Landscape, Floods & Food Prosperity पुस्तक में लिखा है कि नेपाल में सात बड़ी नदियां कोसी में मिलती हैं, इसलिये नेपाल में इसे सप्त कोसी कहा जाता है। अपने स्रोत से चलकर गंगा में मिलने तक कोसी 729 किलोमीटर की दूरी तय करती है। इसमें से 260 किलोमीटर का इलाका भारत में है। कोसी में पानी का औसत प्रवाह 1,564 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड है। बाढ़ के समय यह प्रवाह 18 गुना बढ़ जाता है। उपलब्ध आँकड़ों के मुताबिक कोसी में सबसे भयंकर बाढ़ अगस्त 1968 में आई थी, जब जल प्रवाह 25,878 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच गया था। इसके पहले एक और भयंकर बाढ़ अगस्त 1954 में आई, जब इसमें 24,200 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड का जल प्रवाह देखने को मिला था। दरअसल, कोसी की विभिन्न धाराओं के नक्शे 18वीं सदी के प्रारम्भ से उपलब्ध हैं। 15 अलग-अलग धाराओं में बहने वाली इस नदी के एक धारा से दूसरी धारा में बहने का कारण उसमें आने वाली गाद थी। ऐसी नदी को एक धारा में बहाने का दुस्साहस 1950 के दशक में हमारे राजनीतिज्ञों और इंजीनियरों ने किया। जिस नदी का पानी और उसकी गाद 15 धाराओं में किसी न किसी मात्रा में बहती थी वह एक धारा में सीमित हो गई।

कोसी में हर साल बरसात में पानी बढ़ता है। जून से सितम्बर तक मानसून के मौसम में कोसी के जल ग्रहण क्षेत्र में तेज बारिश होती है, हालांकि यहाँ हर साल एक जैसी हालत नहीं रहती। कोसी जल ग्रहण इलाके में बादल फटने की घटनाएं आम हैं, जिस दौरान एक दिन में 500 मिलीमीटर तक बारिश हो सकती है। जानकारों के मुताबिक जल ग्रहण क्षेत्र में दिखने वाला यह रुझान कोसी के अनोखे और खतरनाक व्यवहार का एक कारण है।

जानकारों का सुझाव है कि बाढ़ नियंत्रण के कार्यक्रम बनाते वक्त इन बातों पर जरूर गौर किया जाना चाहिए : 1- बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक हो, 2 - इस पर जितनी लागत आये उसकी तुलना में उससे लाभ ज्यादा हो, और 3 - बाढ़ नियंत्रण के प्रतिकूल प्रभावों से बचा जाए। बाढ़ नियंत्रण के प्रतिकूल प्रभावों से मतलब वैसे असर से है, जो इन कार्यक्रमों की वजह से देखने को मिलते हैं। मसलन, नदी के रास्ते में बदलाव, किसी इलाके में पानी जमा होना, और बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में बढ़ोतरी। इसके अलावा गाद नदियों की एक बड़ी समस्या बन गई है।

ज्यादातर गाद अपस्ट्रीम बेसिन इलाके से आती है। इसकी वजह से नदी का जल मार्ग भरने लगता है और नदी में पानी इकट्ठा होने की क्षमता घट जाती है। जाहिर है, गाद बाढ़ की एक बड़ी वजह है जानकारों का कहना है कि अगर नदी बेसिन इलाके में पेड़ लगा कर वाटरशेड मैनेजमेंट किया जाए तो नदी में गाद जमा होने की प्रक्रिया बढ़ सकती है, जिससे अंततः बाढ़ का खतरा घटेगा। अब सहायक नदियों के द्वार पर तथा नदी बेसिन इलाके में छोटे जलाशय और चेक डैम बनाने को बाढ़ रोकने का प्रभावी उपाय माना जा रहा है इससे सहायक नदियों से आने वाले पानी को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे मुख्य नदी में बाढ़ आने का खतरा घटेगा। चेक डैम छोटे आकार के होते हैं इसलिये इनसे पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता, साथ ही इन पर लागत भी कम आती हैं। सुझाए जा रहे कुछ अन्य उपाय इस प्रकार हैं- अतिरिक्त पानी को नहरों से दूसरी जगहों तक पहुँचाना, नदी के अपस्ट्रीम में जलाशय बनाना, नदी बेसिन इलाके में पानी जमा कर रखने के उपाय करना, कृत्रिम रूप से जमीन से नीचे के पानी को निकालना ताकि बाढ़ से आने वाले पानी को जमीन सोख ले, वगैरह।


 

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