चिपको की तर्ज पर बचाया तांतरी का जंगल

Submitted by RuralWater on Wed, 02/19/2020 - 10:49
Source
अमर उजाला, 19 फरवरी, 2020

कलावती देवी रावत कलावती देवी रावत मैंने जिंदगी का सबसे अहम पाठ सीख लिया है कि कभी हार मत मानो और अपनी बातों का अनुसरण करते रहो। मैं उत्तराखंड के चमोली की रहने वाली हूं। मेरा जन्म आर्थिक रूप से विपन्न परिवार में हुआ। बचपन से मैंने देखा कि गाँव के पास जंगल में लकड़ी माफिया का बोलबाला था। पर कोई उनके खिलाफ आवाज नहीं उठा रहा था। जब मेरा विवाह हुआ, उस समय मेरी उम्र करीब सत्रह साल थी। विवाह के बाद जब मैं अपने ससुराल चमोली जिले के बाचर गांव में आई, तो समझ आया कि बिजली की समस्या ने सुदूर पहाड़ों पर बसे गांवो के जीवन को कठिन बना रखा है। ससुराल आने के बाद चिपको आन्दोलन के नेता चंडी प्रसाद भट्ट से प्रेरणा लेते हुए मैंने जिला मुख्यालय पर सरकारी अधिकारियों से मिलने के लिए गांव की महिलाओं के एक समूह का नेतृत्व किया। समूह ने बिजली की कमी के कारण आने वाली कठिनाइयों के बारे में बताया और मांग की कि उनके गांव का विद्युतीकरण किया जाए, पर अधिकारी बेपरवाह थे। एक दिन, कुछ महिलाओं व गांव के सरपंच के साथ करीब 25 किलोमीटर की ट्रैकिंग करके हम चंडी प्रसाद भट्ट से उनके निवास पर मिले और अपनी समस्या को लेकर उनके साथ हमने चर्चा की।

वह हमें सम्बन्धित अधिकारी के पास ले गए और बातचीत की। लौटते समय हमें रास्ते में कुछ बिजली के खंभे व तार दिखाई दिए, जो अधिकारिक कार्यक्रमों में बिजली पहुंचाने के लिए प्रयोग किए जाते थे। मैंने महिलाओं से बात की और उन खंभों व तारों का गांव में ले जाने के लिए राजी कर लिया। यह बात का पता चलते ही अधिकारी परेशान हो उठे। उन्होंने हमारे खिलाफ अपराधइक मामला दर्ज करने की धमकी दी।

जब सारी महिलाओं ने एकजुटता दिखाई, तो अधिकारियों के तेवर नरम पड़े। चूंकि गांव एक बिजली ग्रिड से जुड़ा था, इसलिए कुछ ही दिनों में पूरे गांव में बिजली पहुंच गई। इस तरह के अनुभव ने वास्तव में हमें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया।

गांव में बिजली तो आ गई थी, पर जंगल में अवैध कटाई का सिलसिला थम नहीं रहा था। एक सुबह जब मैं कई महिलाओं के साथ चारा लाने तांतरी के जंगल में पहुंचीं, तो चौंक गई। वहां दर्जनों कटे पेड़ पड़े थे, जबकि कई पेड़ों पर कटाई के लिए निशान बनाए गए थे।

मेरे साथ मौजूद महिलाओं ने कटाई का विरोध करना शुरू कर दिया। सभी महिलाएं चिपको आंदोलन की तर्ज पर पेड़ों से चिपक गईं। वनकर्मियों ने हमें समझाने की कोशिशें की, तो लकड़ी माफिया ने हमें रिश्वत देने की कोशिश की और मना करने पर हमें जान से मारने की धमकी भी दी। लेकिन हमने अपने कदम पीछे लेने से मना कर दिया। मामला बढ़ने पर जिला प्रशासन मौके पर पहुंच गया। इसके बाद उसने घोषणा की कि तांतरी जंगल में पेड़ नहीं काटे जाएंगे।

लेकिन वन माफिया और बाचर गांव के शराबियों के बीच साठगांठ परेशानी का सबब बन रही थी। कई कोशिशों के बाद भी इस सांठगांठ को तोड़ा नहीं जा सका। अंततः मैंने गांव की वन पंचायत के मुखिया का चुनाव लड़ने का फैसला किया।

हालांकि यह उतना आसान नहीं था, जितना मैंने सोचा। अधिकारी इस बात पर सहमत नहीं हो रहे थे, पर जब मैंने तर्क दिया की महिलाओं को पंचायत चुनाव लड़ने के लिए कानूनी रूप से सशक्त बनाया गया है, तब उप-मंडल मजिस्ट्रेट ने मुझे पंचायत चुनाव लड़ने की अनुमति दी। मैंने चुनाव में जीत दर्ज की। इसके बाद गांव में एख महिला मंगल दल का गठन किया गया, जो शराबियों व लकड़ी माफिया के खिलाफ अभियान चलाने के साथ गांव के अन्य तबकों में जागरूकता फैलाता है।

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