चन्द्रकान्त-जल के गुण

Submitted by Hindi on Fri, 01/08/2010 - 16:01
Author
डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित

रक्षो (जो) घ्नं दीपनं हृद्यं मदतापविषापहम्।चन्द्रकान्तोद्भवं वारि पित्तघ्नं विमलं स्मृतम्।।

मतान्तरे-

चन्द्रकान्तमणिस्पृष्टशुभैश्चन्द्रांशुभिर्निशि।यन्मूर्न्धा निर्मितं वारि पानादिष्वमृतोपमम्।।
चन्द्रकान्त मणि का पानी रजो गुण (राक्षसत्व) नष्ट करता है। वह उत्तेजक होता है, रमणीय होता है। मद, ताप और विष को नष्ट करता है। पित्त को नष्ट करने वाला यह जल विमल माना जाता है।

अन्य मत में-
चन्द्रकान्त मणि को जब चन्द्रकिरणें रात में स्पर्श करती हैं तो उसके सिरे से जो पानी बनता है वह पीने में अमृत जैसा होता है।

 

नारियल के पानी के गुण

नारिकेलोदकं स्निग्धं स्वादु वृष्यं हिमं लघु।तृष्णापित्तानिलहरं दीपनं वस्तिशोधनम्।।क्षयोपवासाध्वगमातिभाष्य व्यवायवातातपपीडितानाम्।व्यायमिनां चाल्पकफोत्तराणां यन्नारिकेलादुदकं प्रशस्तम्।।
नारियल का पानी चिकना, स्वादिष्ट, शक्तिप्रद, ठंडा, हल्का, उद्दीपक, पेट और पेडू को स्वच्छा करने वाला तथा प्यास, पित्त और वात दूर करता है।


तपेदिक, उपवास, यात्रा, अधिक बोलना, मैथुन, वात, धूप आदि से पीड़ित परिश्रमियों और जिन्हें कफ थोड़ा होता हो उनके लिए नारियल का पानी उत्तम है।

 

नारियल के छिलके के पानी के गुण

कषायं कफपित्तघ्नं शीतं तच्चर्मसंभवम्।प्रदरे रक्तपित्ते च मूत्रकृच्छोSतिपूजितम्।।
नारियल के छिलके का पानी कसैला, कफ और पित्त विनाशक शीतल होता है। प्रदर, रक्तपित्त और मूत्रपीड़ा में अत्यंत पूज्य या आदरणीय है।

 

नारियल पानी पीने का समय

नारिकेलाम्बुभुक्तात्प्राक् गुल्माग्निसदनादिकृत।अतोपराह्णे पेयं स्यात् सेन्दुवच्छीतलं हितम्।।नारिकेलस्य यत्तोयं पुराणं पित्तवर्धनम्।तस्यैव तरुणं तोयं पित्तघ्नं कृमिनाशनम्।।प्रसूतिकानां प्रवरं बल्यं बृंहणमुच्यते।नारिकेलं गुरु स्निग्धं पित्तघ्नं स्वादु शीतलम्।बल्यं मांसप्रदं हृदद्यं बृंहणंवहिनशोधनम्।।
नारियल का पानी पीने से पहले तिल्ली, अग्नि आदि को नष्ट होता है। इसलिए चन्द्र जैसा यह शीतल दोपहर बाद पीने से लाभदायी होता है। नारियल का जो पानी पुराना होता है वह पित्त बढ़ाता है। उसका ही ताजा पानी पित्त विनाशक और कीटनाशक होता है। प्रसूति वाली नारियों के लिए अत्यंत शक्तिदायक, पोषक कहा जाता है। नारियल भारी, चिकना, पित्तनाशक, स्वादिष्ट, शीतल, बलकारी, माँस (फल के गूदे की शक्ति) देने वाला, मनोहर, पोषक और अग्नि को संतुलित करता है।

 

तीन प्रकार से नारियल के जलपान का गुण

तारुण्यं ज्वरपित्तजित्पवनजिद् वृष्यं हितं मध्यमेश्लेष्मघ्नं चरमे तृषागरहरं तोये च यो चोद्भवम। तत्क्षारं कफशूलनुत्परमहो दन्तामयघ्नं सदापीत्वा स्वीकुरु सर्वरोगशमनं श्रीनारिकेलं नृप।।
नारियल का ताजा पानी बुखार, पित्त और वात को जीत लेता है। यह पोषक और हितकारी होता है। मध्यम स्थिति में कफ नष्ट करता है और अन्त में प्यास, विषय या रोग दूर करता है। पानी में जो खारपन होता है वह तेज कफ एवं दर्द को हटाता है, दाँतों की बीमारी नष्ट करता है। राजन्! नारियल सदा पीना शुरु करो, वह समस्त रोग शान्त कर देता है।

 

नारियल के निषेध का समय

अतिसारे ग्रहिण्यां च मन्दाग्नौ पाण्डुरोगिणि।अजीर्णश्वासखासे च नारियकेलजलं त्यजेत्।।
अतिसार, संग्रहिणी, मन्दाग्नि या अपच, पीलिया, अजीर्ण, साँस, खाँसी या खुजली में नारियल का पानी त्याग दें या न पिएँ।

 

बुखार में नारियल पानी पीने की विधि

तुङ्गद्रुमस्य तरुणस्य फलानि किंचिच्चमपिनीय चतुरानि जलस्य कुम्भे।तत्पादके तदुदके निशि पीतमोतत्एवं जयेज्ज्वरमतीव तृषार्तिवेगान्।।
मतान्तरे-
नारिकेलफलं बालं सत्वयं तु विचक्षणः।द्विद्रोण सलिलं क्षिप्त्वा निर्जलं तु विपाचयेत्।।तस्मात्तत्सजलं पीतं मोचयेन्महतो ज्वरात्।त्रिदिनेन महाघोरं दीर्घं चातुर्थिकं ज्वरम्।।
नारियल के छोटे फल को चतुर जन तत्काल दो प्याले (दोने) पानी फेंककर बिना जल का पका लें। उससे जल सहित पीने से भारी बुखार से मुक्ति मिल जाती है। तीन दिन तक पीने से भयंकर दीर्घकालीन चार दिन में आने वाला ज्वर भी समाप्त हो जाता है।

 

गंग नारियल के पानी का गुण

वृष्यं स्वादु तृषापहं लघुतरं स्निग्धं च तच्छीतलंपाण्डुं कापिलरक्तपित्तमनिलं दाहं हरेल्लेखनम्।कुर्याद्वस्तिविशोधनं प्रदरनुत्कान्तिप्रदं बृंहणंरुच्यं दीपनकारि वारि मधुरं स्यान्नारिकेलोद्भवम्।।
नारियल का पानी शक्ति देने वाला, स्वादिष्ट प्यास बुझाने वाला, हल्का, चिकना, शीतल होता है। वह दुबलापन, पीलिया, रक्त का पीलापन, पित्त, वात, जलन दूर करता है। पेडू या मूत्राशक को स्वच्छ करता है, स्त्रियों का प्रदर रोग दूर करता है, शरीर में कान्ति लाता है। पोषक, रोचक, उत्तेजक, मधुर होता है।

 

विभिन्न ऋतुओं में जल सेवन का गुण

वापीतटाक सम्भूतं हितं हेमन्तशीतयोः।वसन्ते कौपशौडाम्बु शरत्प्रस्त्रवणोद्भवम्।।ग्रीष्पवर्षासु कौपञ्च सर्वं शरदि हास्यते।वस्त्रपूतं च कर्तव्यं क्षुद्रमव्य (?) भिरक्षणम्।।
मतान्तरे-
कौपं प्रस्त्रवणं वसन्तसमये ग्रीष्मे तदेवोचितंकाले चामभिवृष्टिदेशमथवा शौण्डं घनान्ते पुनः।नीहारे सरसीतटाक विषयं सर्वं शरत्सङ्गमेसेव्यं सूर्याशशाङ्करश्मिपवनव्याधूतदोषं पयः।।
बावड़ी और तालाब का पानी हेमन्त और शीत (शिक्षिर) में हितकारी होता है। वसन्त में कुएँ, भाप का खींचा पानी, शरदकाल में झरने का पानी, ग्रीष्म और वर्षा में कुएँ और शरद में सब कुछ, शरदकाल में सब कुछ त्याग देते हैं। पानी थोड़ा भी हो तो उसे वस्त्र से (छानकर) पवित्र कर लेवें।

अन्य मत में-
वसन्त काल में झरने और कुएँ का पानी लेना चाहिए। ग्रीष्म काल में भी वही उचित है। वर्षा अथवा शरद ऋतु में शौण्ड या भाप का (गरम किया) पानी ग्रहण करना चाहिए। शीतकाल में सरोवर (शुद्ध जल वाला) या तड़ाग (तालाब) का और शरद् ऋतु में शीतकाल के सन्धिकाल में सब प्रकार का पानी सेवन योग्य होता है। क्योंकि इस समय पानी सूर्य चन्द्र की किरणों और पवन द्वारा दोष रहित कर दिया जाता है।

 

सेमल-जल का गुण

शुक्लस्त्रोव योनिदोषे प्रमेहे चास्थिस्त्रावे शाल्मलीतोय मिष्टम्।वृष्यं शीतं रक्तपित्तं निहन्यात्कुष्ठं हान्याद् बृंहणं चातुचिन्नम्।।
मतान्तरे-
शाल्मलं जलमसृक्कफापहं शुक्लदं गुरुविसर्पशोभतुत।स्थौल्यवातकरमत्र संविशेत् रक्तपित्तशमनं च भेध (द) नम्।।
सफेद पानी बहना, योनिदोष, प्रेम (मधुमेह), अस्थिस्त्राव या हड्डी गलना आदि में सेमल का पानी लेना चाहिए। वह शक्ति कारक, शीतल, रक्त-पित्त विनाशक, कोढ़ नाश करता है, पोषक है।

अन्य मत में-
सेमल का जल रक्त (विकार) और कफ नष्ट करता है, उजलापन लाता है, भारी खुजली नष्ट करता है।

 

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