छत्तीसगढ़ में बिकती नदियां

Submitted by Hindi on Thu, 04/07/2011 - 11:49
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डिसास्टर मैनेजमेंट एंड डेवलपमेंट पत्रिका , 06 अप्रैल 2011

कार्टूनकार्टून छत्तीसगढ़ की रमन सरकार भी कांग्रेस के नक्शे कदम पर चलने लगी है। छत्तीसगढ़ जब अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था तब वर्ष 1998 में पहली बार मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम ने राजनांदगांव के एक व्यापारी कैलाश सोनी को शिवनाथ नदी का पानी बेचने की अनुमति दी थी। मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद जब राज्य की सत्ता रायपुर जिले में लंबे समय तक कलेक्टर रहे अजीत प्रमोद कुमार जोगी के हाथों में आई तो उन्होंने भी वही किया जो पूर्ववर्ती सरकारें कर रही थी। निजीकरण के पक्ष में उनकी खुली सहमति से एक कमरे में संचालित होने वाले सैकड़ों विश्वविद्यालयों का आगमन हुआ तो पानी को बेचे जाने की प्रक्रिया भी जारी रही। जोगी के सत्ता में हटने के साथ ही रमन सरकार ने भी निजीकरण को बढ़ावा देने का खेल जारी रखा है। छत्तीसगढ़ को ऊर्जा हब बनाने के लिए कई निजी कंपनियों से अनुबंध किया गया है। सरकार ने हाल के दिनों में रोगदा बांध, महानदी और हसदेव नदी के पानी को निजी कंपनियों को सौंपने का जो फैसला किया है उसका विरोध भी देखने को मिल रहा है।

जांजगीर-चांपा के अकलतरा विकासखंड में रोगदा बांध का निर्माण वर्ष 1961 में 76 लाख की लागत से किया था। इस बांध को बनाने की जरूरत इसलिए पड़ी थी क्योंकि इलाके के एक बड़े हिस्से में अक्सर सूखा पड़ता था। बांध के निर्मित हो जाने से यहां के किसान खुशहाल भी रहने लगे लेकिन कुछ दिनों पहले ही सरकार ने 48 साल पुराने बांध की एक सौ 31 एकड़ जमीन केएसके पावर नाम की एक कंपनी को सौंप दी है। इस बारे में जल संसाधन विभाग के ईएनसी बीएल राय का कहना है कि हसदेव बांगो बांध की नहर से अकलतरा शाखा नहर को जोड़ने के बाद रोगदा बांध का उपयोग काफी कम हो गया था फलस्वरूप इसे निजी कंपनी को सौंप दिया गया है। अब इस बांध के पानी का उपयोग कंपनी बिजली बनाने के लिए करने वाली है। इस बांध को बेचने के साथ ही सरकार ने छत्तीसगढ़ हृदयरेखा समझी जाने वाली महानदी के पानी को बेचने की योजना भी बना डाली है। जांजगीर-चांपा, रायगढ़ और रायपुर जिले के एक बड़े भू-भाग से होकर गुजरने वाली महानदी पर सात बैराज का निर्माण प्रस्तावित किया गया है। इसके लिए राज्य सरकार ने एक हजार 467 करोड़ रूपए की मंजूरी भी दे दी है। फिलहाल जिन बैराजों का निर्माण किया जाना है उनमें शिवरीनारायण बैराज का पानी सांसद नवीन जिंदल के रायगढ़ में स्थापित किए उद्योग को दिया जाना प्रस्तावित किया गया है। बंसतपुर बैराज से इस्पात इंडस्ट्रीज लिमिटेड, सोना पावर लिमिटेड, जिंदल इंडिया लिमिटेड, टोरेंटो पावर लिमिटेड, वर्धा पावर भूषण एनर्जी को पानी दिए जाने की तैयारी है।

मिरौनी बैराज से सरकार ने अथेना पावर लिमिटेड, भूषण पावर, मोजर वियर लिमिटेड, एस्सार लिमिटेड, एनटीपीसी लारा, जैन एनर्जी लिमिटेड, श्याम सेंचुरी को पानी बेचने की योजना बनाई गई है। कुदरी बैराज की जल संग्रहण क्षमता 1560 मिलियन घनमीटर आंकी गई है. इस बैराज से सीएसईबी मड़वा, छत्तीसगढ़ पावर लिमिटेड अमझर, मेसर्स प्रकाश इंडस्ट्रीज चांपा, मेसर्स लाडर्स पावर लिमिटेड मुड़ापार को पानी देना तय किया गया है। साराडीह बैराज से भास्कर समूह के डीबी पावर लिमिटेड, भारत लिमिटेड, बीईसी पावर लिमिटेड, एस्सार पावर सहित कुल 11 औद्योगिक संस्थानों को पानी का विक्रय तय किया गया है। समोदा और कुदुरमाल बैराज से जीएमआर एनर्जी लिमिटेड बेगलुर और लेंको अमरकंटक को पानी बेचा जाएगा। सरकार ने उक्त सभी स्थानों पर बनाए जाने वाले बैराजों से हर साल एक हजार करोड़ रुपए कमाने की योजना बनाई है। प्रदेश सरकार हसदेव नदी पर भी एनीकट बनाने जा रही है। इस नदी के कुदुरमाल एनीकट को तो पहले से ही मंजूरी मिल चुकी है जबकि सर्वेश्वरी, जोगीपाली और सर्वमंगला एनीकट के प्रस्ताव को अब तब में मंजूरी दिए जाने की तैयारी चल रही है।

यहां बनाए जाने वाले एनीकटों से धीरू पावर जेन, वंदना एनर्जी लिमिटेड सहित अन्य कंपनियों को पानी बेचने की योजना को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। उद्योगों को नदियों और बांधों का पानी बेचने के मामले में कांग्रेस ने सरकार को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू का कहना है कि बिलासपुर जिले में एनटीपीसी ने जो संयंत्र स्थापित किया था उसकी राखड़ के रिसाव से ही लगभग एक सौ पचास एकड़ खेती योग्य जमीन दलदल में तब्दील हो गई है. साहू ने महानदी पर सात बैराजों के बनाए जाने का भी विरोध किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने बैराज बनाए जाने के पहले केंद्रीय जल आयोग को भी जानकारी नहीं दी थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चितरंजन बख्शी ने रायपुर, जांजगीर और रायगढ़ जिले में बैराज बनाए जाने का विरोध किया है। उन्होंने भाजपा की रमन सरकार को उद्योगों पर खास तरह से मेहरबान रहने वाली सरकार बताया। बख्शी ने कहा कि बस्तर की शबरी नदी का पानी टाटा और एस्सार जैसे उद्योगों के पास पहले ही नीलाम किया जा चुका है, पता नहीं सरकार अब कितनी नदियों के पानी को बेचना चाहती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह ने महानदी पर बैराज बनाए जाने की बात तो स्वीकारी लेकिन उन्होंने नदियों को बेचे जाने की बात को एक सिरे से खारिज भी किया. मुख्यमंत्री ने कहा कि बैराज का निर्माण इसलिए नहीं किया जा रहा है कि इससे सिर्फ उद्योगों को ही पानी दिया जाएगा बल्कि इसके पानी का उपयोग किसान भी कर पाएंगे।

 

 

बेचा गया था शिवनाथ का पानी भी


दुर्ग जिले की जीवनदायिनी नदी शिवनाथ का पानी भी बोरई में स्थापित एक उद्योग के लिए ओन आपरेट एंड ट्रांसफर ( बूट) पद्धति पर कैलाश सोनी नाम के व्यापारी को बेचा गया था। मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम ने वर्ष 1998 में कैलाश सोनी की कंपनी रेडियस वाटर को शिवनाथ नदी पर एक स्टापडेम बनाने की अनुमति दी थी। वैसे मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम भी नदी पर एनीकट का निर्माण कर सकता था, लेकिन निगम ने धन की कमी का बहाना बनाकर जिस व्यापारी को एनीकट बनाने का जिम्मा सौंपा था, उसने एनीकट बन जाने के बाद गांववालों के मछली मारने और नदी के पानी के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था।

इस प्रतिबंध के बाद पानी के निजीकरण के इस मामले की गूंज देश-विदेश में देखने-सुनने को मिली थी। जोगी के सत्ता में रहने के दौरान ही सरकार ने रायपुर की जल प्रदाय योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए प्राइस वाटर कूपर्स नाम की एक कंपनी से भी अनुबंध किया था। इस कंसलटेंट कंपनी ने वर्ष 2031 तक रायपुर शहर की जनता को जल प्रदान करने के लिए 397.42 करोड़ रूपए की आवश्यकता भी बताई थी। सरकार को सौंपी गई रपट में कंपनी ने यह माना था कि प्रदेश के सभी शहरों में जल प्रदाय योजनाओं के लिए लंबे समय तक सरकारी बजट पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। वाटर कूपर्स ने जल प्रदाय योजनाओं का काम निजी क्षेत्रों को सौंपने की वकालत भी की थी।

 

 

 

 

चल रहा है अच्छा-खासा मजाक


पानी के नाम पर छत्तीसगढ़ में अच्छा-खासा मजाक देखने को मिल रहा है। अभी कुछ दिनों पहले ही प्रदेश के पीएचई विभाग ने हैंडपंपों के पानी को पीने योग्य बनाने के लिए उसमें आयरन की मात्रा खत्म करने के लिए दिल्ली की एक कंपनी को मशीनों की सप्लाई का ठेका दे दिया था। हालांकि मशीनों की सप्लाई का काम रूका रहा लेकिन इस मामले का सबसे मजेदार पक्ष यह है कि पीएचई विभाग ने अपनी पहली रपट में स्वीकारा था कि कंपनी एक हैंडपंप से अधिकतम दो हजार लीटर पानी निकाल सकती है तो दूसरी रपट में विभाग ने यह भी बताया कि कंपनी एक हैंडपंप से 24 हजार लीटर पानी भी निकाल सकती है। दोनों में से कौन सी बात सही थी इसका परीक्षण चल रहा है। इधर छत्तीसगढ़ में उद्योगों व अन्य व्यावसायिक उपयोग से भू-जल स्तर में लगातार गिरावट देखी जा रही है।

गर्मी के दिनों में प्रदेश के हर शहरी हिस्सों में सिर फुटौव्वल का नजारा देखने को मिलता है।प्रदेश की राजधानी रायपुर में तो हर साल विपक्ष से जुड़े लोग खाली मटकों के साथ प्रदर्शन करते हैं. अमूमन सभी बड़े शहरों के निगम झुग्गी बस्तियों में टैकरों के भरोसे ही पानी की सप्लाई का काम करता है लेकिन यह भी पर्याप्त नहीं होता. कोई इसे माने या न माने लेकिन यह सत्य है कि पानी की कमी की चलते गर्मी के दिनों में प्याऊ घर भी प्यासे ही रहते हैं. हाल ही में पानी की कमी के चलते सरकार के नगरीय निकाय विभाग ने नगर निगमों में पटाए जाने वाले पानी के टैक्स में बढ़ोतरी कर दी है। आम नागरिक को पहले हर महीने जलकर के रूप में 60 रुपए यानि सात सौ 20 रुपए अदा करने होते थे लेकिन अब उसे हर साल 24 सौ रुपए पटाने का फरमान जारी कर दिया गया है. इधर पानी महंगा होने के मुद्दे पर प्रदेश में जबरदस्त ढंग से राजनीति भी शुरू हो गई है. पानी के मुद्दे पर कांग्रेस आंदोलन कर रही है. इस मामले में नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत का कहना है कि पानी के लिए हर बार सभी बड़े शहर के निगम करोड़ो रुपए खर्च करते हैं लेकिन जलकर वसूलने के मामले में वह फिसड्डी ही साबित होता है।

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