कोरोना के बीच सरकारी वादे और जल संकट

Submitted by HindiWater on Tue, 06/30/2020 - 16:05

फोटो - Getty Image

पूरी दुनिया इस समय कोरोना वायरस की चपेट में है। तीन लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हैं, जबकि 15 हजार से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। चीन, इटली, यूएसए, स्पेन आदि विकसित देश कोरोना के प्रकोप से बूरी तरह प्रभावित हैं। इटली ने लगभग हार ही मान ली है। तो वहीं पाकिस्तान में भी अब कोरोना के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। भारत में भी कोरोना अपने पैर जमा चुका है। यहां 500 से ज्यादा लोग संक्रमित हैं, जबकि 10 लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीमारी के प्रभाव को कम करने के लिए डाॅक्टर नियमित तौर पर स्वच्छता बनाए रखने के लिए कह रहे हैं। हर किसी का जोर मास्क पहनने, घर के अंदर रहने और हाथ धोने पर है। हाथों को भी पांच चरणों में धोने की जनता से लगातार अपील की जा रही है। कहा जा रही है सेनिटाइजर का उपयोग करें और हाथों को कम से कम बीस सेंकड तक धोएं। मीडिया के विभिन्न माध्यमों में विज्ञापन से लोगों को इस बारे में जागरुक भी किया जा रहा है। हांलाकि ये प्रयास स्वागतयोग्य है, लेकिन यहां भी लोग जागरुकता के अभाव में जरूरत से ज्यादा पानी का उपयोग कर रहे हैं। ऐसे मे कोरोना तो निकट समय में खत्म हो जाएगा, लेकिन एक भीषण जल संकट दुनिया भर में जरूर खड़ा होने की संभावना है। इससे पहले से ही पानी की किल्लत का सामना कर रहे भारत को ज्यादा समस्या हो सकती है। विभिन्न राज्यों की सरकारों सहित केंद्र सरकार और प्रशासन ने पानी की समस्या न होने का वादा किया था। लेकिन सरकार के वादों और घोषणाएं धरातल पर ज्यादा दिखाई नहीं दे रही हैं। देश के विभिन्न स्थानों पर जल संकट गहराने लगा है। लोग बूंद बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। यहां देश के कुछ इलाकों के जलसंकट की जानकारी दी गई है।

पत्रिका की खबर के मुताबिक जैसलमेर के धोलिया गांव में जाजूदा मोहल्ले में स्थित पानी की टंकी व पशुखेली में गत छरू माह से पेयजल आपूर्ति ठप होने से टंकी से जुड़े विभिन्न मौहल्ले वासियों को पेयजल संकट से रूबरू होना पड़ रहा हैं। वहीं पशुओं को पानी की तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। मौहल्लेवासियों द्वारा बार-बार जलदाय विभाग के कर्मचारियों को अवगत कराने के बाद भी समस्या जस की तस पड़ी हैं। जाजूदा मौहल्ले में एकमात्र पानी की टंकी जिससे जाजूदा मौहल्ले सहित आसपास के मौहल्लों में जलापूर्ति होती है। इस टंकी में पिछले छरूमाह से जलापूर्ति ठप पड़ी है। जिससे इस टंकी से जुड़े सभी मौहल्लेवासियों को पानी की समस्या से जूझना पड़ रहा है। वहीं मौहल्लेवासियों को पानी महंगे दामों में टैंकरों से मंगवाना पड़ रहा है तथा पशुओं को इधर-उधर पानी के अभाव में भटकना पड़ रहा हैं। गर्मी के मौसम में गहराए पेयजल संकट से आमजन को परेशानी हो रही है। 

जोधपुर बोयल ग्राम के बांकलिया मार्ग पर स्थिति 45 ढाणियों की 250 से अधिक आबादी पिछले छह महीने से पानी की एक एक बून्द को तरस रहे हैं। ग्रामवासियों द्वार पानी की समस्या कलेक्टर, अधीक्षण अभियंता, उपखंड अधिकारी सहित विभिन्न अधिकारियों तक पहुंचाई लेकिन सभी जगह पर शिकायत के बाद भी ग्रामीण को एक बूंद नसीब नहीं हुआ। नईमु रहमान ने बताया कि पिछले लगभग 20 वर्षों से पीएचईडी विभाग द्वारा पानी की पाइपलाइन से पानी सप्लाई दी जा रही थी। इस लाइन से हमारे नियमानुसार पानी कनेक्शन लिए होने से बिल भी आ रहे थे, लेकिन पास ही ईबुखां की ढाणी आई हुई है। ईबुखां ढाणी में पानी की अवैध पाइपलाइन डालने से यह समस्या आ गई। ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय नेताओं के दबाव में हमारी ढाणी की पाइप लाइन को काटकर बंद कर दिया। वहीं बुधवार को ग्रामवासियों ने उपखंड अधिकारी कार्यालय में ज्ञापन सौंपा। 

स्योट तहसील क्षेत्र के गांव बलशामा में सोमवार को पानी की समस्या को लेकर गांववासियों ने जम्मू-पुंछ हाईवे को जाम बंद कर जलशक्ति विभाग के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की अगुआई कर रही प्रीति शर्मा ने कहा कि गांव में पिछले एक महीने से लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। उन्होंने कहा कि गर्मी बढ़ते ही जिलेभर में पेयजल के लिए हाहाकार मची हुई है। प्रदर्शनकारियों ने जलशक्ति विभाग के खिलाफ जोरदार नारे लगाते हुए हाईवे पर धरना-प्रदर्शन किया। लोगों ने पीएचई विभाग के अधिकारियों पर आरोप लगाते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में पीएचई विभाग का ढांचा पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है, क्योंकि अधिकतर क्षेत्रों में लगे विभाग के कर्मचारी अपने काम की तरफ कोई ध्यान नहीं देते, जिससे क्षेत्र में पीएचई विभाग की पेयजल व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो चुकी है। कहीं पेयजल आपूर्ति स्टेशनों पर लगे उपकरण खराब पड़े हैं तो कहीं लोगों को लो वोल्टेज की वजह से आपूर्ति स्टेशन क्षमता के मुताबिक जलापूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। इससे भीषण गर्मी में लोगों को पेयजल को लेकर मारामारी करनी पड़ रही है। लोगों ने कहा कि विभागीय उदासीनता और लापरवाही के कारण भीषण गर्मी में पेयजल के लिए गांववासियों को कई प्रकार की परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। क्षेत्र में पीएचई विभाग की चल रही अधिकतर स्कीमें अंतिम दौर में पहुंचकर दम तोड़ रही हैं।

महाराष्ट्र एक तरफ जानलेवा कोरोना वायरस की सबसे ज्यादा मार झेल रहा है। दूसरी ओर मुंबई में अब जल संकट भी पैदा हो गया है। मुंबई को पीने के पानी की सप्लाई करने वाले सात झीलों और बांधों में अब सिर्फ 42 दिनों का पानी बचा रह गया है। मॉनसून (डवदेववद) के पहले महीने में ही अपेक्षाकृत कम बारिश होने के कारण झीलों का पानी बढ़ा नहीं है। ऐसे में साफ है कि आने वाले दिनों में पानी की किल्लत होगी।

जयपुर की कृष्णा काॅलोनी और मोदी काॅलोनी के लोगों को पिछले एक महीने से भीषण जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक यहां रोजाना 10 से 15 मिनट ही पानी की सप्लाई की जा रही है। इस दौरान पानी का प्रेशर इतना कम है कि 15 मिनट में एक बाल्टी तक नहीं भर पाती है। अपनी पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए यहां के निवासियों को खुद के खर्च पर टैंकर मंगवाना पड़ रहा है। ऐसे में कोरोना के दौरान लोगों की जेब पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

महामारी के दौरान जयपुर पहले से ही कोरोना से जूझ रहा है। दफ्तर खुलते ही लोग काम पर जा रहे हैं। संक्रमण से बचने के लिए दफ्तर जाने से पहले और घर आने के बाद अधिकांश लोग नहाते हैं। रोजाना कपड़ों को धोया जाता है, लेकिन इसके लिए फिलहाल उनके घरों में पानी नहीं आ रहा है। लोगों को कहना है कि ऐसे समय में जल संकट से निपटे या कोरोना से। समस्या को कम करने के लिए 300 रुपये प्रति टैंकर के हिसाब से पानी मंगवा रहे हैं। एक स्थानीय निवासी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि थोड़ी दूर पब्लिक पार्क में पानी का नल है। उसमें पानी आ रहा है। टैंकर का पैसा बचाने के लिए बर्तन लेकर पार्क में जाते हैं। ऐसे में थोड़ा बहुत पानी तो मिल जाता है, लेकिन कोरोना बढ़ने का खतरा बना हुआ है। लोगों का कहना है कि कई बार पीएचईडी को लिखित शिकायत की है, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं हुआ। अब तो अधिकारियों ने फोन तक उठाना बंद कर दिया है। 

एएनआई के रिपोर्ट के मुताबिक अमरावती के मेलघाट और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में भीषण जल संकट गहरा गया है। पानी लाने के लिए लोगों को चट्टानी इलाकों में रोजाना मीलों चलना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि ‘‘कुएं से पानी लाने के लिए हम तीन दिन में एक बार जाते हैं। इसके बावजूद भी राजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें पानी नहीं मिल पाता है। चट्टानों से पानी लाते वक्त चोट लगने का डर अलग से लगा रहता है। जान जोखिम में डालकर पानी लाते भी हैं, तो भी स्वास्थ्य को खतरा रहता है। क्योंकि वहां पानी काफी प्रदूषित है।’’ एक तरह से लोगों पर दोहरी मार पड़ रही है। पानी लाने के लिए बच्चे भी जा रहे हैं।

जम्मू और कश्मीर के कठुआ जिले के बसोहली ब्लाॅक के ड्रामन पंचायत में जल संकट खड़ा हो गया है। पानी भरने के लिए लोग रोज नुल्लाह (एक प्रकार पानी का स्रोत) तक मीलों चलते हैं। इतना चलने के बाद यहां जो पानी मिलता भी है, तो वो गंदा पानी है, लेकिन कोई विकल्प न होने के कारण ग्रामीण इसी पानी को भरते हैं और दो दिन तक उपयोग करते हैं। दो दिन बाद फिर से इसी गंदे पानी को भरने के लिए जाते हैं। लंबे समय से गंदे पानी का सेवन करने से लोग बीमार पड़ने लगे हैं, लेकिन समस्या सुधरने के बजाए साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। इस समस्या की जानकारी किसी ने एएनआई को दी। एएनआई ने मामले की पड़ताल की तो पता चला कि यहां जल संकट वास्तव में काफी विकराल है। ग्रामीणों ने एएनआई को बताया कि ‘‘दस लोग रोजाना पानी लेने के लिए जाते हैं। हमारे पास न तो पीने के लिए पानी है और न ही पशुओं को खिलाने के लिए चारा। कई बार प्रशासन से गुहार लगाने के बाद भी पानी की समस्या का समाधान नहीं हुआ। ऐसे में अब हम 3-4 गांव के लोग मिलकर नहर अपने ही दम पर नहर बना रहे हैं।’’

सीसीएल गिरिडीह कोलियरी अंतर्गत कोलीमारण चानक में लगा मोटर पंप खराब हो जाने करीब दो हजार की आबादी जलसंकट से जूझ रही है। हालांकि, सीसीएल ने वैकल्पिक व्यवस्था की है, लेकिन स्थानीय लोग इसे नाकाफी बता रहे हैं। कोलीमारण चानक से महुआटांड़, कोल्हरिया, बालोडिंगा, कोलीमारण व महेशलुंडी क्षेत्र में जलापूर्ति की जाती है। पांच माह से मोटर पंप खराब रहने के कारण इस चानक से जलापूर्ति नहीं हो पा रही है। इस चानक से जलापूर्ति ठप हने के कारण स्थानीय लोग बालोडिंगा चानक से होने वाले पानी आपूर्ति पर निर्भर हैं। कई लोगों को भूतनाथ इलाके में जाकर पानी का जुगाड़ करना पड़ता है। जिप उपाध्यक्ष कामेश्वर पासवान ने कहा कि कोलीमारण चानक में लगे मोटर पंप में बार-बार खराबी होने से स्थानीय लोगों को जलसंकट से जूझना पड़ रहा है। कहा कि संवेदक द्वारा लोकल स्तर का बुश लगा देने से यह परेशानी हो रही है। कहा कि इसे लेकर कई बार-बार आंदोलन भी किया जा चुका है। जब आंदोलन होता है तो मोटर पंप लगा दिया जाता है, अन्यथा इसमें कोताही बरती जाती है। सदर प्रखंड अंतर्गत महेशलुंडी पंचायत के महुआटांड़ के ग्रामीण पानी के लिए कोलीमारण चानक पर निर्भर हैं। पंप खराब रहने पर यहां के लोग फिलहाल इधर-उधर से पीने के लिए तो पानी का जुगाड़ कर लेते हैं, लेकिन नहाने व कपड़ा धोने के लिए इन लोगों को नाला के गंदा पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। यहां के लोग प्रतिदिन नाला के गंदे पानी में नहाते देखे जा सकते हैं। इस नाला में ओपेनकास्ट माइंस का पानी आता है। उपखंड मुख्यालय पर जलदाय विभाग के अभियंताओं की अनदेखी के चलते तेज गर्मी में जल वितरण व्यवस्था पूरी तरह लड़खड़ा गई है। अभियंताओं द्वारा ठेकेदार को समय पर खराब मोटर बदलने के लिए कार्रवाई नहीं किए जाने से पिछले 1 सप्ताह से कई मोहल्लों में जल संकट छाया हुआ है तथा लोगों को पीने के पानी के लिए भी परेशान होना पड़ रहा है। इस मामले को लेकर लोगों ने एसडीएम से लेकर विधायक को भी अवगत कराया है, लेकिन अभी भी जल वितरण व्यवस्था सुचारू नहीं हो पाई है।

छतरपूर का पतापुर गांव बुंदेलखंड में पड़ता है। यहां सुबह होते ही लोग बर्तन उठाकर मीलों दूर पैदल ही पहाड़ियों का रुख करते हैं। बच्चे, बड़े व बूढ़ें सभी, पथरीले और कंटीले रास्तों से होते हुए वे पहाड़ी के प्राकृतिक स्रोत तक जाते हैं। ये पूरा मामला तब सुर्खियों में आया जब एएनआई ने पूरी न्यूज को कवर किया। ग्रामीण हर दिन उबड़-खाबड़ पहाड़ियों से पानी लाने के लिए सफर तय करते हैं। पथरीली पहाड़ियों के करीब ही गहरी खाई है। रास्ता काफी दुर्गम है। पानी लाने के दौरान छोटी-सी चूक हो जाने पर भारी पड़ सकती है। ग्रामीण बड़ेलाल ने एनएनआई को बताया कि प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी लाने के लिए हम पथरीली पहाड़ियों तक मीलों दूर तक पैदल जाते हैं। वहां कोई रास्ता नहीं है। रास्ता काफी खतरनाक है। पानी की व्यवस्था करने के लिए प्रशासन से अपील की है। वें कहते हैं कि जब से गांव बना है, गांव के लोग पानी की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं, लेकिन समाधान के तौर पर अभी तक कुछ नहीं होता दिख रहा है। 

ड़ीसा के जाजपुर जिले में लोगों को प्रदूषित पानी पीने पर मजबूर होना पड़ रहा है। सुकिंडा शहर में रह रहे ग्रामीण, विशेषकर कंसा, कालियापानी, रानसोन जैसे पहाड़ी इलाकों और पिंपुडिया में लोग प्रदूषित पानी का उपयोग करने के लिए मजबूर हैं। वहीं, अनियमित खनन ने यहां पानी की समस्या को और बढ़ा दिया है। दरअसल, इस इलाके में कई तालाब और ब्राह्मणी नदी है। आधुनिकीकरण के साथ साथ इलाके में तेजी से औद्योगिकरण हुआ, जिससे उद्योगों से निकलने वाले कचरे को सीधे तौर तालाबों और नदी सहित विभिन्न जलस्रोतों में फेंका जाने लगा। इससे तालाब और नदी का पानी प्रदूषित हो गया। इन इलाकों में पीने के पानी का कोई और इंतजाम या विकल्प न होने के कारण लोग तालाबों और नदी का गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं।  दि न्यू लीम में प्रकाशित न्यूज के अनुसार, ‘‘पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रशासन टैंकरों से पानी की सप्लाई करवाता है।’’

हरियाणा में भू-जल स्तर रिकॉर्ड 81 मीटर (265.748 फुट) से नीचे चला गया ‌है। पिछले एक दशक में लगभग दो गुना संकट बढ़ा है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल के मुताबिक 10 साल पहले यहां का भू-जल 40 से 50 मीटर नीचे मिला करता था। जाहिर है कि अत्यधिक दोहन से ऐसे हालात पैदा हुए हैं। माना जा रहा है कि सबसे ज्यादा पानी का दोहन यहां कृषि क्षेत्र में हुआ ह। क्योंकि यह प्रदेश टॉप टेन धान उत्पादकों में शामिल है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक एक किलोग्राम चावल पैदा करने में 5000 लीटर तक पानी की जरूरत होती है। ऐसे में अब सरकार ने धान से तौबा करने की नीति बनाई है। जलसंकट से बचाने का दारोमदार अन्नदाता पर है।

भागलपुर में गर्मी बढ़ने के साथ ही जल संकट गहराने लगा है। भूजल स्तर नीचे जा चुका है। कई चापाकलों के हलक सूख गए हैं। ऐसे में वाटर व‌र्क्स और डीप बोरिग से जलापूर्ति ही विकल्प रह गया है, लेकिन नगर निगम ने अब भी शहर के कई मुहल्लों में यह सुविधा उपलब्ध नहीं कराई है। इस स्थिति में खासकर दक्षिणी क्षेत्र के लोगों की परेशानी बढ़ सकती है। यहां वार्ड 43 में 20 हजार की आबादी को इस गर्मी में चार प्याऊ पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।

दैनिक जागरण की खबर के मुताबिक हल्द्वानी के देवलचैड़ बंदोबस्ती का नलकूप खराब होने से दो हजार परिवार पेयजल के लिए परेशान हैं। जलसंस्थान टैंकर से नाममात्र लोगों को पानी दे पा रहा है। वहीं, पेयजल योजनाओं के अंतिम छोर के इलाकों के साथ दमुवाढूंगा व पनियाली में भी संकट बना हुआ है। देवलचैड़ बंदोबस्ती का नलकूप खराब हुए चार दिन बीत चुके हैं। जलसंस्थान ने इस नलकूप से जुड़े बड़े इलाके में जलापूद्दत के लिए मात्र एक टैंकर लगाया है, जो चुनिंदा घरों तक पानी पहुंचा पा रहा है। वहीं, कुसुमखेड़ा पेयजल योजना के मेहरा गाव, सैनिक कॉलोनी, संगम विहार, भगवानपुर के एकता विहार, ओम विहार, सुरभि कॉलोनी, त्रिमूृद्दत कॉलोनी, सत्या विहार, पनियाली की साईं मंदिर कॉलोनी, दमुवाढूंगा की कुमाऊं कॉलोनी, भोटिया फार्म, टिनशेड, मल्ला प्लाट, जमरानी कॉलोनी में भी पानी का संकट गहराया है। 

बिहार के  मुजफ्फरपुर  में  इस वर्ष मानसून से पूर्व ही हुई अच्छी बारिश के बावजूद जिले के 59 पंचायतों में जल संकट गहराने की आशंका है। चार प्रखंडों के इन 59 पंचायतों में जलस्तर 20 से 30 फीट के बीच है। अगले कुछ दिनों में बारिश नहीं होती है और जलस्तर में सुधार नहीं होता है, तो इन पंचायतों में पेयजल के लिए पिछले वर्ष की तरह वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। पिछले वर्ष जिले में पैदा हुए जल संकट का दौर इस वर्ष भी जारी रहने की आशंका है। पीएचईडी विभाग लगातार जिले के प्रत्येक पंचायत में जलस्तर की मॉनिटरिंग कर रहा है। अब तक जो रीडिंग आई है, वह उत्साह जनक नहीं है। रीडिंग में जिले के बंदरा, मुरौल, सकरा व मुशहरी प्रखंड के कई पंचायतों में जलस्तर काफी नीचे चला गया है। फिलहाल यह 20 से 30 फीट के बीच है, इससे एक फीट भी जलस्तर अधिक गिरा तो इन पंचायतों के चापाक जवाब दे जायेंगे। पीएचईडी ने जलस्तर की सतत निगरानी के लिए पांच लेबल तय किये हैं। इनमें एक लेबल में यानी 50 फीट नीचे जलस्तर वाले एक भी पंचायत नहीं हैं। वहीं बी लेबल यानी 40 से 50 फीट व सी लेबल यानी 30 से 40 फीट नीचे के जलस्तर वर्ग में भी कोई पंचायत नहीं है। लेकिन डी लेबल यानी 20 से 30 फीट नीचे वाले जलस्तर के वर्ग में 59 पंचायतें आ गई हैं। वहीं ई लेबल यानी 20 फीट नीचे जलस्तर वाले वर्ग में जिले के शेष 326 पंचायत आई हैं, जहां पानी का कोई संकट नहीं दिख रहा है। सकरा के पांच पंचायत मझौलिया, मिश्रौलिया, डिहुली इशहाक, दुबहां बुजुर्ग व हरलोचनपुर मुड़ा की स्थिति चिंताजनक है। इन पंचायतों में पिछले साल भी वाटर टैंक से पानी की सप्लाई करनी पड़ी थी। पीएचईडी विभाग ने इस रिपोर्ट से मुख्यालय को अवगत करा दिया है, ताकि समय रहते मामले में कार्रवाई की जा सके।

आगरा के थाना एत्माद्दौला में यमुना पार क्षेत्र में व्याप्त जल संकट को लेकर आम आदमी पार्टी एससी एसटी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजकुमार भारती के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा टेढ़ी बगिया क्षेत्र में विधायक रामप्रताप चैहान के खिलाफ प्रदर्शन किया गया। आप कार्यकर्ताओं ने विधायक राम प्रताप चैहान के पुतले को जल संकट व्याप्त क्षेत्रों में भ्रमण कराया और पुतला फूंककर अपना आक्रोश व्यक्त किया। जल संकट की समस्या से परेशान लोगों ने क्षेत्रीय विधायक रामप्रताप चैहान को चुल्लू भर पानी भेंट किया और अपनी पीड़ा व्यक्त की।

उपमंडल कांगड़ा के चंगर क्षेत्रों में पेयजल समस्या गहरा गई है। छह पंचायतों के करीब 20 हजार से अधिक लोग पेयजल के लिए परेशान है। हालात ये हो गए हैं कि पेयजल योजना जल्द शुरू न हुई तो लोग सड़क पर उतरने के लिए मजबूर हो जाएंगे। दौलतपुर, धमेड़, कुल्थी, जनयानकड़, तकीपुर और जलाड़ी पंचायतों में पानी की किल्लत एक सप्ताह से जारी है। इन पंचायतों के लिए दौलतपुर हार जलाड़ी पेयजल योजना से पानी की आपूर्ति की जाती है पर योजना की मेन पंप मशीन एक सप्ताह से खराब है। मजबूरी में लोग बावड़ियों का पानी पीने के लिए मजबूर हैं। बताया जा रहा है कि पंप मशीन खराब होने के संबंध में पंचायत प्रतिनिधियों ने विभाग को लिखित तौर पर अवगत करवाया है लेकिन आजतक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। हैरानी की बात है कि गत शनिवार को विभाग की ओर से लगाई गई नई पंप मशीन भी खराब निकली है। जनियानकड़ के प्रधान गुलशन कुमार ने बताया कि एक माह पहले भी दौलतपुर हार जलाड़ी पेयजल योजना बंद हो गई थी और इसे दुरुस्त करने में विभाग ने 20 दिन लगा दिए थे और अब फिर से पेयजल योजना ठप हो गई है।

बिहारीगढ़ (सहारनपुर) कस्बे में फोन लेन निर्माण के दौरान सड़क किनारे खड़े हैंडपंपों और पेयजल पाइप लाइनों को उखाड़ने के कारण ग्रामीण पेयजल को तरस गए हैं। दो साल बाद भी उखाड़े हैंडपंपों को न लगाने और पाइप लाइन ठीक न होने के कारण ग्रामीणों में आक्रोश है। दो वर्ष पूर्व कस्बे के मध्य से गुजर रहे फोर लेन हाईवे निर्माण के दौरान कस्बे में सड़क किनारे लगे पीने के पानी के सात सरकारी हैंडपंपों और पेयजल पाइप लाइनों को उखाड़ा। इसकी जगह नये हैंडपंप नहीं लगाए जा सके हैं। दूसरी तरफ जल निगम के नलकूप की पेयजल सप्लाई भी बंद पड़ी है। इससे कस्बे में पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया है। कस्बा निवासी कुंवर सिंह सिद्धू, मदन पाल, राजेश, संजय कुमार, डॉ. अमरीश, नगेंद्र कुमार आदि ने बताया जब भी पानी की आपूर्ति के लिए जल निगम के अधिकारियों से बात करते हैं तो वह हैंडपंप उखाड़ने के लिए फोर लेन हाईवे के कंपनी के अधिकारियों की जिम्मेदारी बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। उन्होंने कहा उनके घरों में लगे हैंडपंप 15 से बीस फुट की गहराई में लगे हैं जो दूषित पानी दे रहे हैं। इस पानी से यदि कपड़ों की भी धुलाई की जाती है तो वह भी पीले पड़ जाते हैं। ग्रामीणों ने जल्द ही पेयजल की व्यवस्था न करने पर आंदोलन की चेतावनी दी।

पांवटा उपमंडल की ग्राम पंचायत मिश्रवाला में सैकड़ों परिवार पेयजल संकट से जूझ रहे है। वर्ष 2019 में खराब पड़ी पेयजल योजना को ठीक नहीं किया जा रहा। मंजूरी को भेजी हैंडपंप लगाने की फाइल धूल फांक रही है। कुछ जो हैंडपंप लगे हैं, उनसे सभी को पानी नहीं मिल रहा। पिछले 10 दिनों में समस्या ज्यादा विकराल हो गई है। पंचायत के तीन वार्डों में तो बीडीसी सदस्य और समाजसेवी पानी के टैंकरों से पानी का इंतजाम करवा रहे हैं। मिश्रवाला क्षेत्र के बीडीसी सदस्य फरीज खान, पूर्व वार्ड सदस्य लियाकत अली, मतलूब अली, इरफान और फकरुकीन का कहना है कि मिश्रवाला ग्राम पंचायत के 150 से अधिक परिवारों को पेयजल किल्लत का सामना करना पड़ रहा है।

गौचर के जल संस्थान की लापरवाही के चलते आए दिन पालिका क्षेत्र कर्णप्रयाग व गौचर में उपभोक्ताओं को पेयजल किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। नगर क्षेत्र कर्णप्रयाग के मुख्य बाजार, पुजारीगांव सहित शक्तिनगर वार्ड के कई आवासीय भवनों में पेयजल संकट से उपभोक्ता परेशान हैं। उपभोक्ता राजेन्द्र सिंह ने कहा कि नौ करोड़ की लागत से कर्णप्रयाग की 10 हजार की आबादी के लिए कालेश्वर लिफ्ट पेयजल योजना का निर्माण यह कह कर किया गया कि इसके बन जाने से दिनभर पानी मिल सकेगा और इसके लिए बकायदा राजनगर में 500 केएल का टैंक भी निर्मित किया गया लेकिन एक वर्ष बाद भी पानी का संकट बरकरार है। वहीं जलसंस्थान अधिकारियों की माने तो ऑलवेदर कटिंग के दौरान एनएचआइडीसीएल ने बिना सूचना के मुख्य पाइप लाइन पर जेसीबी चढ़ा दी जिससे पानी की आपूर्ति बाधित हुई है जिसे ठीक कर व्यवस्था बहाल कर दी गई है। 

देश में गहराता जल संकट चिंता का विषय है। तो वहीं तेजी से बढ़ते कोरोना के मामले भी देश में चिंता बढ़ा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही उठता है कि जब सरकार के वादों के बाद भी पानी के लिए जनता को तरसना पड़ रहा है, तो वहीं एक समस्या ये भी है कि बिना पानी के लोग कैसे स्वच्छता अपनाएंगे या फिर अपना रहे हैं।  फिलहाल एकमात्र इलाज जो सभी अपना रहे हैं, वो है, खुद का बचाव। सोशल डिस्टेंस बनाकर। साथ ही बचने के लिए नियमित तौर पर बीस सेकंड तक हाथों को धोना भी एक स्वागतयोग्य उपाए हैं, लेकिन जिन आदिवासी इलाकों और कस्बों को साफ पानी हीं नहीं मिलता, वे मलयुक्त दूषित पानी से हाथ धोते है और अन्य उपयोग में भी लाते हैं। ऐसे में दूषित पानी से हाथ धोकर कोरोना से कैसे बचा जा सकेगा। विभिन्न राज्यों की सरकारों को सबसे पहले इन लोगों को साफ पानी उपलब्ध कराना है। वरना ऐसे ही बड़ी समस्या खड़ी होती रहेगी और हम हर साल 22 मार्च को विश्व जल दिवस के अवसर पर जल संरक्षण की शपथ लेते रहेंगे।


 

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