कोविड19 के बाद भी क्या प्रदूषण स्तर कम रहेगा

Submitted by UrbanWater on Sat, 06/27/2020 - 11:29

प्रतीकात्मक फोटो - Deccan herald

कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए फरवरी - मार्च से दुनिया के तमाम देशों में लॉकडाउन शुरू हुआ था। इस दौरान फैक्टरियां बंद रहीं और ट्रैफिक भी पूरी तरह ठप रहा। लोगों के घरों से निकलने पर भी पाबंदियां रहीं। 

 

इसका परिणाम ये निकला कि प्रदूषण के स्तर में खासकर वायु प्रदूषण में भारी गिरावट आई। लोग घरो में बद रहे, तो वन्यजीव शहरों में आ गए। गंगा नदी के पानी में भी प्रदूषण बिल्कुल कम हो गया। कई जानकारों ने ये भी दावा किया कि गंगा का पानी पीने लायक हो गया है।

 

भारत में लॉकडाउन शुरू होने के कुछ दिन बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के विश्लेषण में ग्रीनपीस इंडिया ने पाया था कि देश के 14 सबसे ज्यादा वायु प्रदूषित शहरों में से 10 शहरों में प्रदूषण के स्तर में भारी गिरावट आई है। इनमें गाजियाबाद, दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, ग्रेटर नोएडा, लखनऊ, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, फरीदाबाद शामिल थे। ये विश्लेषण 24 मार्च से 4 अप्रैल 2019 के आंकड़े और इसी अवधि में इस साल के आंकड़ों के आधार पर किया गया था। 

 

विश्लेषण में बताया गया कि गाजियाबाद में इस अवधि में पिछले साल पीएम 2.5 की मात्रा 104.4 माइक्रोग्राम/क्यूबिक मीटर थी, जो इस साल इसी अवधि में घटकर 35.75 पर आ गयी। दिल्ली में पिछले साल पीएम 2.5 की मात्रा 84.40 माइक्रोग्राम/क्यूबिक मीटर थी, जो इस साल घटकर 35.92 पर आ गयी थी। इसी तरह दूसरे शहरों में भी वायु प्रदूषण में 30 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट आयी थी।

 

तो क्या हमें अब ये मान लेना चाहिए कि कोविड-19 महामारी खत्म हो जाएगी, तब भी प्रदूषण का स्तर ऐसा ही रहेगा? शायद ऐसा नहीं होगा, बल्कि जानकारों का तो ये कहना है कि कोविड-19 महामारी खत्म हो जाएगी और जिंदगियां पटरी पर लौटेंगी, तो प्रदूषण का स्तर और भी खराब हो जाएगा।

 

इसके कुछ संकेत तो अभी नजर भी आने लगे हैं। मसलन जब अप्रैल में दुनियाभर के देशों में लॉकडाउन लगा था, तो वैश्विक स्तर कार्बन का उत्सर्जन इसी अवधि में पिछले साल के मुकाबले 17 प्रतिशत कम हो गया था। लेकिन, जून में जब दोबारा अध्ययन किया गया, तो पता चला कि इस महीने पिछले साल के मुकाबले कार्बन का उत्सर्जन महज 5 प्रतिशत कम हुआ। ऐसे में माना जा रहा है कि जब लॉकडाउन पूरी तरह खत्म हो जाएगा और महामारी का प्रकोप न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाएगा, तो प्रदूषण का स्तर पहले के मुकाबले और बढ़ेगा। 

 

जानकार इसके लिए 2007-2008 में दुनियाभर में आए आर्थिक संकट की मिसाल दे रहे हैं। साल 2007-2008 में जब आर्थिक संकट ने दुनिया को जकड़ लिया था, तो उत्पादन ठप हो गया था जिसका असर लोगों की जीवनशैली पर भी पड़ा था और प्रदूषण का स्तर काफी हद तक कम हो गया था। लेकिन, जब अर्थव्यवस्था ने दोबारा रफ्तार पकड़ी, तो फैक्टरियों में पहले की तुलना में ज्यादा उत्पादन होने लगा, जिससे प्रदूषण के स्तर में तेजी आ गई थी।

 

अभी लॉकडाउन के कारण फैक्टरियां बंद हैं, ट्रांसपोर्ट भी काफी हद तक बंद है, लेकिन एक बार लॉकडाउन पूरी तरह खत्म हो जाएगा, तो फैक्टरियां बंदी के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करेंगी। इसी तरह रोड पर ट्रैफिक बढ़ेगा क्योंकि लोग पहले की तरह की ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करेंगे। साथ ही ये भी होगा कि लोग कोरोनावायरस का संक्रमण फैलने की आशंका में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने के बजाय निजी वाहनों का इस्तेमाल करेंगे, जिससे सड़कों पर वाहनों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी, जो अंततः प्रदूषण के स्तर को और बढ़ा देगा।  

 

लॉकडाउन पूरी तरह हटने और सामान्य जनजीवन शुरू होने पर प्रदूषण का स्तर बढ़ सकता है, इसे चीन के उदाहरण से समझा जा सकता है। कोविड-19 का संक्रमण चीन से शुरू हुआ था। वहां दिसंबर से ही लॉकडाउन लगना शुरू हो गया था। 

 

लॉकडाउन के चलते फरवरी में चीन में वायु प्रदूषण का स्तर पिछले साल इसी महीने के मुकाबले काफी कम हो गया था, लेकिन मई में किए अध्ययन में पता चला है कि वहां प्रदूषण का स्तर दोबारा बढ़ने लगा है।  अध्ययन करने वाली संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर का कहना है कि चीन के कोविड-19 संकट से उबरने के चलते वायु प्रदूषण के पुराने स्तर में लौटने के संकेत मिल रहे हैं।

 

ब्रिटेन की ईस्ट अंग्लिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर कोरिने ले क्वेरे एक लेख में कहती हैं, “हमारे पास वही कारें हैं, वही सड़कें हैं, वही फैक्टरियां हैं और वही मकान है। अतः एक बार सभी तरह के प्रतिबंध हटेंगे, तो हम दोबारा वही सब करेंगे, जो पहले कर रहे थे।” वह आगे कहती हैं, “जोखिम ज्यादा है क्योंकि हमने पूर्व में भी ऐसा ही किया है।”

 

ऐसे में कोविड-19 महामारी के खत्म होने के बाद सरकार के सामने दोहरी चुनौती होगी। अव्वल तो अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना होगा और दूसरा ये भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्थिति में नहीं पहुंचे। 

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