डांग के पानी की कहानी

Submitted by admin on Thu, 03/13/2014 - 12:27
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तरुण भारत संघ
‘महेश्वरा नदी’ को सदानीरा बनाने का काम यहां के समाज के सदाचार और श्रम से ही संभव हो सका है। यह एक अद्भुत काम है; जिसे यहां के लोगों ने सहजता, सरलता व श्रमनिष्ठा के भाव से निर्विघ्न सम्पन्न किया है। उम्मीद है कि ‘महेश्वरा नदी’ के इस सामाजिक साझे श्रम के अभिक्रम को देख कर अब दूसरे क्षेत्र के लोग भी इससे अच्छी सीख ले सकेंगे। ‘महेश्वरा नदी’ राजस्थान की उन सात नदियों में से एक है; जिन्हें समाज के साझे श्रम ने पुनर्जीवित कर सदानीरा बनाया। लेकिन अगर आप यहां के सिंचाई विभाग के किसी सरकारी अधिकारी, इंजीनियर अथवा जिला कलेक्टर तक से भी पूछेंगे तो वह आपको ‘महेश्वरा नदी’ के बारे में कुछ भी नहीं बता सकेगा; कारण कि इस इलाके के किसी भी सरकारी नक्शे में महेश्वरा नाम की कोई नदी दर्ज ही नहीं है।

लेकिन सपोटरा की डांग में बसने वाला हर बाशिंदा आपको ‘महेश्वरा नदी’ के बारे में तथा इसके पुनः लौटे जीवन के बारे में सहर्ष विस्तृत जानकारी दे देगा। क्योंकि प्राकृतिक रूप से बने यहां के ‘पंच-शिंवलिंग’ को, यहां के लोग सदियों से एक तीर्थ के रूप में पूजते आ रहे हैं। फिर आज जब उसी स्थान पर वे अपने ही साझे श्रम से पुनर्जीवित हुई निर्मल नदी को देखते हैं तो उसे कैसे भूल सकते हैं?

महेश्वरा नदी की कहानी खिजूरा गांव से शुरू होती है। पानी के काम से पूर्व यहां के लोग पानी के अभाव में गांव-छोड़ कर बाहर जाने को मजबूर हो गए थे। गांव बेपानी हो कर उजड़ता जा रहा था। गांव में बचे हुए लोगों ने भी पानी की अभाव में खेती करना छोड़ दिया था। उन पर दोहरी मार थी – एक तरफ जहां उन्हें लाचारी, बेकारी और बीमारी से दो-चार होना पड़ रहा था; वहीं दूसरी तरफ जंगलात विभाग की मार तथा डंडे भी उन्हें खाने पड़ते थे। रोटी के बदले डंडे खाना उनकी नियति थी।

उन्हीं दिनों मैं, जब पहली बार उस गांव में गया तो रात को गांव में ही रुका। वहां पर लोगों से बात करने पर तथा प्रत्यक्ष भी लोगों के रूखे चेहरे और सूखे खेत देख कर, एक दुःखद अहसास हुआ। अन्न व जल की अपर्याप्त उपलब्धि में भी जैसे-तैसे वे अपने आप को जिंदा रखे हुए थे। जिंदा रह पाने का आधार शायद वहां पर दिखाई दे रही मरियल-सी गायें व कमजोर-सी बकरियां ही रही होंगी।

डांग में चारों तरफ नंगे पहाड़ व नंगी धरती देख कर ऐसा लगता था, जैसे धरती को बुखार चढ़ रहा हो। बुखार के कारण जब धरती मां स्वयं बीमार हो जाए तो वहां वनस्पति व घास कैसे उग सकती है? इसलिए हरियाली भी वहां नहीं बची थी। लोगों में हताशा व निराशा छा गई थी। उन्हें वहां कोई भी अपना हितैषी। नहीं दिखाई दे रहा था। इंसान को जब कोई अपना दिखाई नहीं देता, तब वह दूसरों से जिस प्रकार का व्यवहार करता है, वैसा ही व्यवहार वे हमसे भी कर रहे थे।

यह व्यवहार यहां के लोगों की सादगी, सरलता व सहजता के बीच दूरियाँ और द्वंद पैदा करता था। ऐसी निराशा में भी इन्हें जीने की आशा तो थी; लेकिन यहां की वीरान व बेपानी जमीन किसी का भी पेट पालने में सक्षम नहीं थी। लोगों को अपना पेट पालने के लिए पलायन कर के बाहर जाना ही पड़ता था। कुछ लोग जो यहां बचे हुए थे, वे भी शरीर व मन से बीमार ही थे। नंगी धरती, नंगे पहाड़ व खुश्क पत्थरों से टक्कर लेने वाले ये बहादुर लोग कुपोषण का शिकार हो गए थे।

पानी की बेहद कमी देखकर मैंने जब गांव के लोगों को कहा कि आप और हम लोग मिलकर सामूहिक श्रम से गांव में पीने व जीने के लिए पानी लाने का काम कर सकते हैं; तो किसी को भी मेरी बात पर भरोसा नहीं हुआ। पर जब मैंने कुरेद-कुरेद कर लोगों से उनके मन की पीड़ा जानने की कोशिश की, तो वहां के देवनारायण बाबा, रूप सिंह सरपंच व अन्य लोगों ने कहा – “साहब! हमारे गांव में पानी की बड़ी विकट समस्या है। यहां यदि एक अच्छा-सा बांध बन जाए तो हमारा गांव फिर से हरा-भरा व खुशहाल हो सकता है।” उनकी बात सुन कर मुझे निराशा के बीच भी एक आशा की किरण दिखाई दी। मैंने उनसे कहा कि आप गांव के सभी स्त्री-पुरुषों को बुला लाओ, तब हम गांव में पानी की स्थाई व्यवस्था करने के बारे में विचार-विमर्श करेंगे।

रूपसिंह ने कहा कि महिलाएं तो यहां आ नहीं सकतीं, पर पुरुषों को मैं अभी बुला कर लाता हूं। यह कहते हुए वह बड़े ही उत्साह से उठा और घर-घर जा कर केवल सात मिनट में सब लोगों को बुला कर ले आया। लगभग 15 बुजुर्गों व दो-तीन नौजवानों की उस छोटी-सी बैठक में मैंने उन्हें लोगों की सहभागिता से अलवर जिले में किए गए जल-संरक्षण कार्यों का हवाला दिया। मैंने अपना भी परिचय देते हुए बताया कि हमारी संस्था (तरुण भारत संघ) ने अलवर जिले के सैकड़ों बेपानी गांवों को पानीदार बनाया है।

इस काम में एक तिहाई काम तो लोगों ने स्वयं अपने श्रमदान से पूरा किया है; बाकी दो-तिहाई काम के बदले संस्था ने केवल उनके खाने भर के अनाज का ही कुछ प्रबंध किया है। मैंने उन्हें बताया कि हम आपके गांव में भी खाने-पीने का कुछ इंतजाम कर सकते हैं, पर पानी के लिए काम, आपको ही करना पड़ेगा। सीधे-सादे और सरल स्वभाव के इन लोगों ने सहजता से कहा कि जब हमें खाने को ही मिल जाएगा तो हम पानी प्रबंधन का काम क्यों नहीं करेंगे?

मुझे यह लिखते हुए बड़ा ही सुखद अनुभव हो रहा है कि उस दिन की हमारी इस सीधी-सी बातचीत ने सचमुच इस गांव की कायापलट ही कर दी। गांव के सभी स्त्री-पुरुष व लड़के-लड़कियां बड़े उत्साह से पानी के काम में जुट गए। उन्हें काम पर लगा कर मैं आसपास के अन्य गाँवों में भी गया। वहां भी काम की पूरी जानकारी मिल जाने के बाद लोगों ने पानी के कई काम शुरू किए। पानी के काम पूरे होने के बाद जब पहली बार पोखरों व पगारों में पानी भरा तो ‘महेश्वरा नदी’ अपने उद्गम स्थलों से लेकर नीचे की तरफ के क्षेत्र तक सदानीरा हो कर बहने लगी। काम से पूर्व मुझे सपने में भी यह आशा नहीं थी कि ‘महेश्वरा नदी’ फिर से बहने लग जाएगी, पर अब इसे बहते हुए देख कर मन खुशी से बाग-बाग हो जाता है।

यद्यपि ‘महेश्वरा’ नदी के जलागम क्षेत्र में हमने पानी का काम 1999 में ही शुरू कर दिया था, फिर भी इस क्षेत्र में पानी के काम की काफी साइटें छूट रही थीं। इन खाली जगहों व गैप्स को हमने 2011-12 के वर्ष में पूरा कर दिया। इस वर्ष लगभग 20-22 जल संरक्षण संरचनाएं इस क्षेत्र में बनीं। इसका परिणाम यह हुआ कि ‘महेश्वरा नदी’ अब ऊपर के हिस्से में भी जलमय हो गई है।

नदी में जब से पानी बहना शुरू हुआ, तभी से यहां के लोगों के तन, मन और आंखों में भी पानी आ गया है। यहां के बेपानी लोग अब पानीदार बन गए। अब इस इलाके में सदाचारीय सत्कर्म पुनः प्रतिष्ठित हो गया है; जो कि बीच के दौर में हताशा के कारण डगमगा गया था। अब यहां के पानी के कामों को देख-देख कर गांव के सब लोग आनन्दित होते हैं।

लोगों को लगता है कि वे अब सदैव पानीदार बने रहेंगे। इसी आशा व विश्वास के साथ इन्होंने अब अपने खेतों की मिट्टी का कटान रोक कर मिट्टी की नमी व वर्षाजल को सहेजने का काम तथा उसमें सजीव खेती करने का अभिक्रम शुरू कर दिया है। ‘महेश्वरा नदी’ में जल आ जाने के साथ-साथ लोगों के लिए धन-धान्य; गाय-भैंसों के लिए चारा और महिलाओं के हाथ में पैसा; यह सब आने लगा है। पहले महिलाएं पानी, ईंधन व चारा लाने में ही दिन-रात लगी रहती थी; पर अब तो गांव में ही पीने का पानी, अपने ही खेतों से ईंधन तथा गांव के ही जंगल से चारे की पूर्ति होने लगी है। गांव के लड़के और लड़कियां अब निश्चिंत हो कर स्कूल जाने लगे हैं और पढ़ने में रुचि भी लेने लगे हैं। मरम्दा गांव की स्कूल के बच्चे अपने स्कूल में व्यायाम करते हुए कितने खुश नजर आ रहे हैं।

एक जमाना था जब डांग के गाँवों में नीचे के गाँवों के लोग अपनी लड़की देना पसंद नहीं करते थे; लेकिन आज इस गांव का कोई भी बालिग लड़का कुंआरा नहीं है। महिलाओं को भी पहले अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में ही अपना पूरा समय लगाना पड़ता था; पर पानी हो जाने से अब उन महिलाओं का समय गांव की साझी भलाई के कामों में भी लगने लगा है। वे अब गांव के प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की चर्चा के साथ-साथ सब की भलाई की बातचीत करने में भी समय देने लगी हैं।

अब यहां की औरतें, पुरुषों से ज्यादा सशक्त और समझदार हो गई हैं। वे अब पुरुषों से अधिक, सत्कार व सम्मान भी पाने लगी हैं। अब इस क्षेत्र में ‘नदी, नीर व नारी’ का संबंध और अधिक प्रगाढ़ हुआ है। इनका पारस्परिक संबंध और सम्मान सब को एक अद्भुत आनंद का अहसास कराता है। इस क्षेत्र का जल-बोध, जो बीच के दौर में धूमिल हो गया था, अब पुनः स्मृत हो जाने से, इस क्षेत्र को पानीदार बनाने में सफल हुआ है। अब यहां के श्रमनिष्ठ समाज ने खेती, पशु-पालन व जल-जंगल-जमीन के संरक्षण से अपने आपको सुखी और समृद्ध बना लिया है।

इस काम से सभी को सीख लेनी चाहिए। आज जरूरत है कि भारत सरकार व राज्य सरकारों के इंजीनियर इस क्षेत्र में आ-आकर यहां के लोगों की श्रम-शक्ति से हुए कार्यों को देखें और देख कर ‘मनरेगा’ जैसे कानून के तहत दूसरी नदियों को भी इसी तरह से पुनर्जीवित करने में जी-जान से जुटें।

‘महेश्वरा नदी’ पर बनाए गए जोहड़, बांध, ताल, पोखरे व पगारे पहले तो वर्षा-जल से धरती का पेट भरते हैं और फिर झरने के रूप में अनवरत बहते रहते हैं। फिर वे ही बहते हुए झरने खेतों में अच्छी फसल पैदा करने का सबब भी बनते हैं। वर्षा-जल को रोक कर धरती के पेट में डाल देने से सूरज उसकी चोरी नहीं कर पाता। महेश्वरा नदी जलागम क्षेत्र के लोगों को धरती के पेट का अच्छा ज्ञान है; इसीलिए तो वे धरती के पेट की अंदरूनी धाराओं को समझ कर पानी-प्रबंधन का कार्य अच्छा कर लेते हैं।

यहां के काम की यही विशेषता है कि यहां के लोगों ने वर्षाजल को उड़ने से बचा कर अधो भूजल के पुनर्भरण का अच्छा काम किया है। वर्षाजल से धरती का पेट भर जाने पर वही जल, अब स्वयंमेव धरती के ऊपर आकर अनवरत बहने लगा है। इसीलिए तो यह नदी अब पुनःशुद्ध और सदानीरा बन कर बहने लगी है और कुओं का जल-स्तर भी ऊपर आ गया है।

‘महेश्वरा नदी’ को सदानीरा बनाने का काम यहां के समाज के सदाचार और श्रम से ही संभव हो सका है। यह एक अद्भुत काम है; जिसे यहां के लोगों ने सहजता, सरलता व श्रमनिष्ठा के भाव से निर्विघ्न सम्पन्न किया है। उम्मीद है कि ‘महेश्वरा नदी’ के इस सामाजिक साझे श्रम के अभिक्रम को देख कर अब दूसरे क्षेत्र के लोग भी इससे अच्छी सीख ले सकेंगे।

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