देवबंद (सहारनपुर) उत्तर प्रदेश में नगरीय ठोस कचरे का प्रबन्धन

Submitted by HindiWater on Fri, 04/03/2020 - 16:07
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान रूड़की

सारांश

नगरीय ठोस कचरा अवांछित पदार्थ है। यह मुख्य तथा घरेलू कचरा होता है। नगरीय ठोस कचरा मुख्यन्नवसायिक गतिविधियों से उत्पव्य कस्टिप्ला, भोजन, कागज, फलों के छिलके जिससे रसोई से संबंधित कचरा जैसे कि सब्जी आदि होता है। हमारे देश में रोजाना लाखों टन कचरा उत्पन्न होता है। हमारे देश में कचरे को खुले में फैंक देना आम बात है। अभी भी शहरों में कचरे के प्रबंधन पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। शहरों में कचरे के ढेर बहुतायत में मिलते हैं। यह पर्यावरण और मानव शरीर के लिए बहुत घातक है। आज भी लैन्डफिल स्थल उपलब्ध नहीं होने के कारण बनी हुई है। इस लेख में संसाधनो की कमी के कारण यह समस्या, प्रबंधन अपर्याप्त न किया गया है तथा उत्तर प्रदेश में ठोस कचरे के प्रबंधन का अध्यउत्त (सहारनपुर) देवबन्द ठोस कचरे के निपटारे हेतु अभियांत्रिकी लैन्डफिल स्थल का डिजाइन भी किया गया है।

Abstract

Municipal solid waste is an unwanted material. This generally produced from residential areas, industries and commercial activities. Municipal solid waste is mainly domestic waste such as kitchen waste, vegetable and fruit waste, paper, food and plastic etc. In our country, lac of ton waste is generated daily. Dumping of solid waste in open place is very common in our country. Still today, in cities there is no proper management system of solid waste. In cities waste piles are found in a large number. This is very harmful for human being and environment. Nowadays, this problem is in its existence due to not availability of land fill, improper management and due to lack of resources. In this paper, a study is carried out on the management of SWM in Deoband town. Design of land fill is also carried out for the disposal of solid waste.

परिचय

तीव्र शहरीकरण एवं ओद्योगिकीकरण के कारण, भारत को कई प्रकार की समस्याओं जैसे कि पर्यावरण प्रदूषण, बढ़ती जल मांग, जल संसाधनों का अति-उपभोग, गुणवत्ता एवं मात्रा के अनुसार प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में कमी, का सामना करना पड रहा है। प्रतिदिन बहुत सारा प्रदूषित जल नदियों में जाकर मिलता है तथा उन्हे प्रदूषित करता है। इसके अतिरिक्त नगरीय ठोस अपशिष्ठ का प्रबंधन एवं निस्तारण भी एक बहुत बड़ी समस्या है। नगरीय ठोस अपशिष्ठ घरो, औद्योगिक एवं व्यवसायिक इकाइयों द्वारा जनित अवांछित ठोस पदार्थ हैं। नगरीय ठोस अपशिष्ठ में सामान्यतः स्वाभाविक रूप से गलने-सड्ने वाले पदार्थ (विशेष रूप से रसोईघर से निकले पदार्थ) तथा पुनः चक्रित किए जाने योग्य पदार्थ (कागज एवं प्लास्टिक) आदि होते हैं। ठोस अपशिष्ठ में रासायनिक एवं औषधीय संयंत्रों द्वारा जनित खतरनाक ठोस अपशिष्ठ भी शामिल होता है। घरेलू एवं अन्य गतिविधियों के कारण प्रतिदिन बड़ी मात्रा में पैदा किए गए नगरीय ठोस अपशिष्ठ के प्रबंधन एवं निस्तारण की आवश्यकता है। वर्तमान में, ठोस अपशिष्ठ का निस्तारण कूड़ा कर्कट डालने वाले स्थानो पर एकत्र कर मिट्टी द्वारा ढक कर किया जाता है। इस प्रकार की विधि पर्यावरण एवं मानव जाति के लिए कम हानिकारक है। परंतु उचित अपशिष्ठ उपचार की विधियों की कमी, सीमित व्रित्त संसाधनों तथा ठोस अपशिष्ठ के प्रबंधन एवं निस्तारण हेतु उचित स्थान के नहीं मिलने के कारण, पर्यावरणविद तथा वैज्ञानिकों के लिए, अपशिष्ठ का प्रबंधन एवं निस्तारण एक चुनोती है। खुले स्थानो पर कूड़ा कर्कट डालने के कारण उस स्थान से रिसकर जाने वाला जल, भूजल से मिलकर उसे प्रदूषित करता है। सतही जल के प्रदूषण के कारण जलीय तंत्र भी गडबड़ा जाता है। ठोस अपशिष्ठ का उचित प्रबंधन पर्यावरण एवं मानव स्वास्थय पर पड़ने वाले प्रभाव क¨ काफी हद तक कम कर सकता है। इस शोध पत्र में नगरीय ठोस अपशिष्ठ के चिरस्थायी प्रबंधन एवं निस्तारण का अध्धयन किया गया है।

ठोस कचरे का सही प्रबन्धन अत्यन्त आवश्यक है। के-शशिकुमार (2005) के शब्दों में कहा जाये, तो कचरा वह पदार्थ है जिसका निपटारा अत्यन्त आवश्यक है। कचरा ऐसा पदार्थ है जिसको एकत्र करने की बजाय फेंकना उचित और सस्ता है। ठोस कचरा पर्यावरण के लिए गम्भीर चुनौती है। अतः इसका उचित समय पर प्रबन्ध आवश्यक है। आमतौर पर कचरे को या तो जला दिया जाता है अथवा किसी भी स्थान पर फेंक दिया जाता है। पर्यावरण और मनुष्य के स्वास्थय पर इसका गलत प्रभाव न पड़े उसके लिय निपटारा करने से पहले इसका उपचार किया जाना चाहियें। उचित उपचार के द्वारा एक तरफ जहाँ पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है वहीं दूसरी ओर मनुष्य को होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है इस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का भी संरक्षण होता है।

किसी भी वस्तु के निर्माण से लेकर उसके उपयोग तक के दौरान ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन होता है। ये गैसें जलवायु परिवर्तन परविपरीत प्रभाव डालती हैं। जब आर्गेनिक कचरे को बिना किसी उपचार के भूमि भराव में डाल दिया जाता है तो इससे मीथेन जैसी गैस उत्पन्न होती है। कचरे के सही प्रबन्धन द्वारा का फीहद तक इन खतरों से बचा जा सकता है। उचित प्रबन्धन द्वारा ठोस कचरे का विभिन्न तरह से उपचार किया जाता है। आज के दौर में उचित प्रबन्धन की व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं बल्कि ग्लोबल स्तर पर नितान्त आवश्कता है। चित्र-1 द्वारा इसे आसानी से समझाया जा सकता है।

कचरे के प्रकार (खान और अहसान 2012)

1-आवासीय और व्यवसायिक कचरा

2-संस्थान से सम्बंधित कचरा

3-औद्योगिक कचरा

4-भवन निर्माण और मकान निर्माण के उपरान्त प्राप्त कचरा

5-नगरीय ठोस कचरा

6-कृषि कचरा

7-उपचारसंयन्त्रकचरा

8-अन्य कचरा

नगरीय ठोस कचरा-इसके अन्तर्गत वह कचरा आता है जो हमें नगरपालिका व्यवसायिक क्षेत्र सरकारी/गैरसरकारी संस्थान, भवन निर्माण के दौरान प्राप्त होता है। अर्थात आमतौर पर औद्योगिक कचरे के अतिरिक्त जो भी ठोस कचरा होता है उसे इसके अन्तर्गत माना जाता है। यह खतरनाक और गैर खतरनाक दोनों तरह का हो सकता है। खतरनाक (Hazardous) कचरा ज्वलनशील संक्षराक (corrosive), क्रियाशील अथवा विषैला (Toxic) होता है जैसेकि बैटरी, पैन्ट आदि। खतरनाक (Hazardous) कचरे का सावधानीपूर्वक निपटारा करना चाहिए।

नगरीय: ठोस कचरा चाहे वह स्वाभाविक तरीके से सड़नशील हो अथवा ना हो उसे खतरनाक (Hazardous) नहीं माना जाता है। बशर्ते कि वह संधारक (नाशक), विषैला (toxic), ज्वलनशील अथवा क्रियाशील ना हो।

नगरीय ठोस कचरे का प्रसंस्करण

कुल ठोस कचरे में विभिन्न प्रकार के कचरों का प्रतिशत भार नगरीय ठोस कचरे का संघटक कहलाता है। उपचार और निपटारा करने के विधि इसी के आधार पर तय की जाती है। जैसे यदि ठोस कचरे में भेज्य पदार्थों और अहाते के कचरे की मात्रा बहुत ज्यादा है तो वह कचरा कम्पोस्टिंग के लिए उपयुक्त रहता है। नगरीय ठोस कचरे में मुख्यतः भोज्य पदार्थ, कागज, प्लास्टिक, कार्ड बोर्ड आदि की मात्रा होती है-(आई.एस.इ.एम-2000)

कचरा प्रबन्ध का अनुक्रम

कचरा प्रबन्धन अनुक्रम एक प्रकार की व्यवस्था है। जिसे निम्न चित्र-2द्वारा समझा जा सकता है।

कचरा निपटाना (निस्तारण)

नगरीय ठोस कचरे की समस्या से बचने का सबसे प्रभावी तरीका यही है कि इसकी उत्पत्ति कम से कम हो। इसके बाद ठोस कचरे के रूप में प्राप्त पदार्थों को (यदि संभव हो) तो पुनः प्रयोग करना। यदि ठोस कचरे को पुनः चक्रित करके कोई पदार्थ प्राप्त किया जा सकता है। इस पर भी विचार करना चाहिए। जैसे कागज को आसानी से पुनः चक्रित किया जा सकता है। अन्त में इस कचरे का निस्तारण कचरा भराव क्षेत्र में अभियान्त्रिकी के माध्यम से करना चाहिए। जिन क्षेत्रों में अथवा जिन स्थानों में जमीनों का अभाव है वहां पर यह तरीका प्रभावी नहीं है।

ठोस कचरे के निपटान के तरीके

1. कचरा न्यूनीकरण-सबसे अच्छा तरीका तो वही है कि कचरा कम से कम उत्पन्न हो। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि किसी पदार्थ को बनाने में कम से कम पदार्थ का प्रयोग हों। पैकिंग के दौरान भी पैकिंग पदार्थों का प्रयोग कम से कम किया जाना चाहिए। पुनः चक्रित पदार्थों का प्रयोग हो सकता है तो प्रयोग करे। इससे पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होगा।

2. पुनः चक्रित करना-इस प्रक्रिया में कचरे से प्राप्त कुछ पदार्थों को पुनः चक्रित करके नए पदार्थ प्राप्त किये जाते हैं। इससे एक तरफ जहां ऊर्जा की बचत होती है वहीं कच्चे माल का प्रयोग भी कम होता है। पुनः चक्रित करने से कई फायदे है जैसे कि ऊर्जा की बचत, कम लागत, कम कचरा, भूमि भराव की आवश्यकता, प्रदूषण में कमी, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण। कागज, प्लास्टिक, कांच, एल्यूमिनियम आदि ऐसे पदार्थ है, जिनको पुनः चक्रित करके पुनः काम में लाया जा सकता है। डेविस मोरे के अनुसार पुनः चक्रित के माध्यम से धन की बचत होती है और प्रदूषण कम होता है। इसके द्वारा कचरे को भूमि भराव में निस्तारण अथवा जलाने की अपेक्षा लोगों को रोजगार भी मिलता है।

कुछ ठोस कचरे में विषैले पदार्थ होते हैं अतः उनका निस्तरण सावधानी पूर्वक करना चाहिए। कई देशों में कचरे का निस्तरण करने से पहले पुनः चक्रित किया जाता है।

3. कम्पोस्ट (खाद)-जैविक कचरे से खाद बनाना भी एक रीसाइक्लिंग प्रक्रिया है। यह एक आसान और प्राकृतिक जैव-क्षरण की प्रक्रिया है। इस विधि में, जैविक कचरा पोषक तत्वों से भरपूर पदार्थ के रूप में बदल जाता है, जिसे हूमस कहते हैं। यह जैविक खेती के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके फलस्वरूप रसायनिक खाद की जरूरत कम पड़ती है। यह एक धीमी प्रक्रिया है और काफी स्थान घेरती है। यह प्रक्रिया निम्न कारकोंसे प्रभावित होती है।

• कचरे के कण का आकार

• नामी की मात्रा

• कार्बन/नाइट्रोजन अनुपात

• पीएच का मान

• तापमान

• सम्मिश्रण और सीडिंग

• हवा की मात्रा

• मिश्रण और टर्निंग

• पैथोजन

• गंध

4. कृमि विधि-इस विधि में जैविक कचरे (कार्बनिक उपशिष्ट) को एक विशेष केंचुआ की मदद से विघटित किया जाता है। जैविक कचरे को केंचुआ भोजन के रूप में प्रयोग करता है। तत्पश्चात केंचुआ के मल के रूप में पदार्थ प्राप्त होता है जिसे वर्मिकास्ट कहते हैं। यह विधि बहुत सरल, सस्ती और उचित जैव प्रोद्योगिकी है। वर्मिकास्ट खाद के रूप में बहुत उपयोगी है।

5. कचरे से ऊर्जा बनाना-इस विधि में विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा पुनः चक्रित न किए जाने वाले कचरे से ऊष्मा, बिजली और इंधन प्राप्त किया जाता है। यह एक प्रकार से अक्षय ऊर्जा का स्रोत हैं।

6. अभियांत्रिकी भूमि भराव-आमतौर पर कचरे को खुले स्थान पर डाल दिया जाता है। जिसके कारण भूजल प्रदूषित हो जाता है और वहां की मिट्टी भी खराब हो जाती है। ऐसे स्थान पर चूहे, कीड़े मकोड़े आदि पैदा हो जाते हैं। कभी-कभी कचरे में आग भी लग जाती है। अतः भूमि भराव (चित्र-3) का डिज़ाइन, निर्माण और प्रबंधन उचित प्रकार से करना चाहिए। कचरे के प्रबंधन में अभियांत्रिकी भूमि भराव का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन स्थान अभाव के कारण इसका प्रयोग दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है। यही कारण है कि जापान और स्विट्ज़रलैंड में कचरे को अक्सर जलाया जाता है।

अभियांत्रिकी भूमि भराव के प्रकार

1) खाई भूमि भराव

2) धरातल भूमि भराव

3) ढलान भूमि भराव

अभियांत्रिकी भूमि भराव के घटक

प्रकोष्ठ-आमतौर पर रोजाना जितना कचरा भूमि भराव में एकत्र किया जाता है अर्थात कचरे द्वारा घेरे गए स्थान को प्रकोष्ठ कहते हैं। इसका आकार रोजाना एकत्र किये जाने वाले कचरे पर निर्भर करता है।

दैनिक आवरण-कचरे को अंत में 15-30 सेमी मोटी मिट्टी की परत से ढक दिया जाता है। इसकी वजह से बारिश का पानी कचरे के अंदर प्रवेश नहीं कर पाता। अन्यथा लीचेट बनने की संभावना बनी रहती है।

लिफ्ट-एक प्रकोष्ठकी ऊंचाई (लगभग 2-4 मीटर) को लिफ़्ट कहा जाता है।

बेंच-जब जमीन के ऊपर जमा कचरे की ऊंचाई 10-20 मीटर से ज्यादा हो जाती है, ऐसी स्थिति में बेंच का प्रयोग करते हैं।

लीचेट संग्रह प्रणाली-लीचेट से भूजल प्रदूषित होता है। इस प्रणाली द्वारा लीचेट को एकत्र करके पहले उपचार करते हैं।तत्पश्चात उपचारित लीचेट को जमीन पर अथवा सीवेज में डाल दिया जाता है।

परत-यह आमतौर पर चिकनी मिट्टी की एक परत होती है। जिसे भूमि भराव के नीचे और साइड में लगाते हें ताकि लीचेट भूजल को प्रदूषित ना कर दे।

गैस संग्रह प्रणाली-इस विधि में कचरे के सड़ने से मीथेन जैसी गैस उत्पन्न ह¨ती हैं, जो एक ग्रीन हाउस गैस है। यह पर्यावरण के लिए बहुत खतरनाक होती है। इससे वातावरण में दुर्गन्ध पैदा होती है और कभी-कभी भयानक आग भी लग जाती है।इसका प्रयोग ऊर्जा पैदा करने के लिये किया जाता है। इससे एक तरफ तो ऊर्जा मिलती है, दूसरी तरफ पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होता।

अंतिम आवरण-जब भूमि भराव की क्षमता के अनुसार उसमें कचरा भर दिया जाता है तो अंत में अंतिम आवरण के द्वारा भूमि भराव को ढक दिया जाता है। इस आवरण को भलीभांति डिज़ाइन किया जाता है। डिज़ाइन करते समय गैस संग्रह परत, जल निकासी परत, अभेद्य परत और बागवानी के लिए भी एक परत बनाई जाती है।

केस स्टडी

ठोस कचरा प्रबंधन अध्ययन देवबंद टाउन में किया गया है जो दिल्ली से लगभग 170 किलोमीटर दूर और रूड़की से लगभग 40 किलोमीटर दूर है। यह शहर एक महत्वपूर्ण इस्लामिक शिक्षा केंद्र है और यहां एशिया का सबसे बड़ा इस्लामिक विश्वविद्यालय है जिसका नाम दारूल उलूम देवबंद है और यह दुनिया भर में ज्यादातर मुस्लिम आबादी के बीच प्रसिद्ध है। देवबंद शहर को 25 वार्डों में विभाजित किया गया है। देवबंद नगर पालिका परिषद की जनसंख्या 97,037 है, जिसमें 53,538 पुरूष हैं, जबकि 43,499 महिलाएं हैं (2011)। 0-6 आयु वर्ग के बच्चों की जनसंख्या 12200 है जो देवबंद (एनपीपी) की कुल जनसंख्या का 12.57% है। देवबंद में बाल लिंग अनुपात 902 के उत्तर प्रदेश राज्य औसत की तुलना में लगभग 917 है। देवबंद शहर की साक्षरता दर राज्य के औसत 67.68% से 75.23% अधिक है। देवबंद 29.70N 77.680E पर स्थित है। शहर की नगर पालिका के पास कोई उचित निपटान स्थल नहीं है और वे सड़कों के किनारे खुले सार्वजनिक क्षेत्रों में कचरे को डंप कर रहे हैं, जिससे भविष्य में गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। शहर में कचरे का उत्पादन 3.15 टन प्रतिदिन अर्थात 1150 टन वर्ष हो जाता है।

देवबंद कस्बे में ठोस कचरा निपटान की वर्तमान स्थिति

नीचे दिये चित्रों (ओपन डंपिंग साइट्स) से स्पष्ट है कि इंजीनियरिंग लैंडफिल का बनाना अत्यंत आवश्यक है

देवबंद में ठोस कचरा इक्ट्ठा करने हेतु व्यवस्था

नीचे दी गई सारणी से कचरा एकत्र करने की स्थिति को समझा जा सकता है। कुछ वाहनों के चित्र नीचे दिये गए है।

इंजीनियरिंग लैंडफिल का प्रस्तावित डिजाइन

अपशिष्ट उत्पादन प्रतिदिन त्र 3.15 टन

वर्तमान अपशिष्ट उत्पादन प्रति वर्ष (W) = 1150 टन (लगभग)

अपशिष्ट उत्पादन की वृद्धि प्रति वर्ष = 1.3% (माना)

लैंडफिल का प्रस्तावित जीवन (वर्षों में) 10 वर्ष

10 वर्षों बाद अपशिष्ट उत्पादन, (Wn) = (1- x/100) n = 1308.56 टन

nवर्षों में कुल अपशिष्ट उत्पादन, (T) टन में = n(Wn + W)/2 = 12,292.8

nवर्षों में कचरे का कुल आयतन (VW) (T/.85m3) = 14,462.11 m3 माना कचरे का घनत्व = 0.85 t/cm.m.

nवर्षों में दैनिक कवर का कुल आयतन (Vdc) = 0.1 V w(M3) = 1,446.21 m3 माना 15 सेमी मिट्टी के कवर के लिये लिफ्ट ऊंचाई 1.5 - 2 मीटर

लाइनर प्रणाली के घटकों और आवरण प्रणाली के लिए आवश्यक कुल मात्रा (संग्रह परत सहित) Vc = k Vw = 3,615.53 m3 (k = 0.25 मीटर 10 मीटर ऊंची लैंडफिल के लिए, 20 मीटर ऊंची लैंडफिल के लिए 0.125 और 30 मीटर लैंडफिल के लिए 0.08।

10 वर्षों के दौरान सम्बन्धित आयतन Vs = m Vw = 1,446.21 m3 (m = 0.10 बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए; आसंसाधित निष्क्रिय कचरे के लिए 0.05 से कम लैंडफिल क्षमता का पहला अनुमान (Ci) = Vw + Vd + Vc - Vs = 18,077.44 m3 (आयताकार लैंडफिल लंबाई: चैड़ाई: 2: 1)

संभावित अधिकतम औसतन लैंडफिल Hi = 10 m

आवश्यक क्षेत्रफल Ai = C1/(m2) = 1807.74 (m2)

अनुमानित माप = 60 मीटर = X 30 मीटर कुल क्षेत्रफल की आवश्यकता (ढांचागत सुविधाओं सहित),

Ai 1.15Ai = 2078.9 (m2)

References

• Asib Ahmed, et al, 2011 “Environmental Aspects of Solid Waste Management” A Case Study of Narayanganj City, ASA University Review, Vol. 5 No. 1, January–June, 2011.

• (Vipin Upadhyay, et al, 2012) Solid Waste Collection and Segregation: A Case Study of MNIT Campus, Jaipur, International Journal of Engineering and Innovative Technology (IJEIT) Volume 1, Issue 3, March 2012.

• Abhilash Krishna, et al, Department of Electrical and Electronics Engineering, Amrita School of Engineering, Coimbatore, “Case Study of Solid Waste Management at a College Campus, India”. http://www.ripublication.com/ijaer.htm

• Combined Treatment of Landfill Leachate by Biological and Membrane FiltrationTechnology, Zhanjiang Li et al, Environmental Engineering Science Volume 24, Number 9, 2007

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