एक नदी की व्यथा-कथा

Submitted by Hindi on Mon, 10/10/2016 - 14:56
Source
दैनिक जागरण, 09 अक्टूबर, 2016

दिल्ली और यमुना का नाता बहुत पुराना है। पौराणिक नदी यमुना ने जिस दिल्ली को जन्म दिया, उसके ही बाशिंदों ने यमुना को बदहाली की कगार पर पहुँचा दिया है। पूजा मेहरोत्रा की यह पुस्तक यमुना के दर्द को शिद्दत से बयाँ करती है…

दिल्ली में प्रदूषित यमुनाजिस नदी के किनारे श्रीकृष्ण ने बाल गोपालों के साथ बाललीला की, गोपियों के संग रासलीला की, जिस नदी के प्रति लोगों के मन में श्रद्धा है, वही पौराणिक नदी यमुना आज सिसक रही है। इसके प्रदूषण का स्तर खतरनाक तरीके से बढ़ गया है। जिस नदी में कालिया नाग के होने की मिथकीय कथा है, उसमें मछलियों समेत तमाम जल-जीवों का अस्तित्व संकट में है। पौराणिक मान्यताओं में जिस नदी में आचमन मात्र कर लेने से सारे पाप धुल जाने का उल्लेख है, अब आलम यह है कि उसी नदी की गन्दगी को धोने की आवश्यकता है। नाले में तब्दील होती जा रही यमुना के दर्द को शिद्दत से महसूस किया है पत्रकार पूजा मेहरोत्रा ने। उन्होंने पर्याप्त शोध करके यमुना की गाथा को प्रस्तुत किया है पुस्तक ‘मैं यमुना हूँ मैं जीना चाहती हूँ’ में। श्रद्धालुओं की अन्ध-आस्था को भी पूजा ने निशाना बनाया है। उन्होंने कहा है कि यमुना से गुजरते हुए हम उसकी तरफ सिक्के उछाल देते हैं, उसमें फूल और अन्य कचरा डाल देते हैं, जबकि यमुना को पैसों या अन्ध-श्रद्धा की जरूरत नहीं, उसे स्वच्छ रखने की इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

लेखिका ने प्रारम्भ के कुछ पृष्ठों में यमुना की पीड़ा उसकी जुबानी लिखी है। वे लिखती हैं, ‘त्यौहारों के आस-पास मेरी स्थिति और भी खराब हो जाती है। दुर्गा पूजा, दीवाली, गणेश चतुर्थी के मूर्ति विसर्जन के समय तो मुझमें प्रदूषण काफी बढ़ जाता है। इस पूजा के दौरान सैकड़ों की तादाद में हर वर्ष मूर्तियों को और पूजा का सामान विसर्जित किया जाता है। प्लास्टर ऑफ पेरिस और विभिन्न रासायनिक तत्वों से बनाई गई इन मूर्तियों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है और इसके साथ ही बढ़ रहा है मुझमें प्रदूषण। यह जानते हुए कि मैं अब नदी न रहकर प्रदूषित नाला रह गई हूँ, फिर भी पूजा समितियाँ और उनसे जुड़े लोग मूर्ति और पूजन सामग्री के विसर्जन की कोई नई योजना नहीं बना रहे हैं, बल्कि मूर्तियों की संख्या हर साल दोगुनी जरूर हो रही है और मुझे अत्यधिक प्रदूषित कर रही हैं। अपनी धार्मिक भावनाओं के प्रति सतर्क इन लोगों के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही है। नदी को तो पूजनीय कहते हैं और यमुना मैया की जय के नारे लगाते हुए ही पूजा की सामग्री को नदी में प्रवाहित करते हैं, लेकिन जब इनकी यही सामग्री मुझमें सड़ती है, तो मैं नाला हो जाती हूँ।’

पूजा मेहरोत्रा ने यमुना का पौराणिक और ऐतिहासिक वृत्तान्त भी प्रस्तुत किया है। वैदिक युग से लेकर आज तक के परिवर्तनों की साक्षी रही यमुना की कहानी को सार-संक्षेप में पूजा ने समेटा है, किन्तु उनका इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य लोगों के मन में यमुना की हो रही दुर्दशा के प्रति लोगों को जागरूक कर जमीनी स्तर पर उसकी स्वच्छता के लिये प्रयास करने का है। लेखिका भूमिका में लिखती हैं, यह पुस्तक यमुना नदी की बेचैनी की कहानी कहती है। पुस्तक का उद्देश्य देशवासियों, खासकर दिल्ली वासियों और युवाओं को यमुना की ओर मोड़ना है। अगर आज हम यमुना के लिये एकत्रित नहीं हुए, तो हम इसे खो देंगे। सरकार के झूठे वादों पर निर्भर रहकर हम अपनी संस्कृति-सभ्यता को बलि पर नहीं चढ़ा सकते हैं। इसके लिये हमें एकजुट होना होगा। वह सरकार, जो इसे साफ करने के लिये हर दिन नई योजनाएँ लाने का झूठा वादा करती है, वही सरकार शहर की सफाई के नाम पर सारी गन्दगी यमुना में डाल रही है। अब समय आ गया है कि हम सिर्फ आवाज ही न उठाएँ, बल्कि जीवनदायिनी को जीवन दें। जिस तरह हमारे पूर्वजों ने हमें नदी, नदी के रूप में सौंपी थी, हम भी अपनी आने वाली पीढ़ी को नदी ही सौंपें।

यमुना‘मैं यमुना हूँ और जीना चाहती हूँ’ में भले ही यमुना की पूरी यात्रा और अन्तर्कथा हो, लेकिन दिल्ली में हुई यमुना की दुर्दशा को केन्द्र में रखा गया है। जो नगर यमुना के कारण बसा, उस नगर ने अपनी जन्मप्रदात्री यमुना के साथ क्या किया? पूजा लिखती हैं, दिल्ली को जन्म देने वाली यमुना ही है। इतिहास गवाह है कि जब-जब शहर बसाए गए तो राजा-महाराजाओं ने यह ध्यान रखा कि जिन्दगी की सबसे बड़ी जरूरत पानी वहाँ मौजूद हो और दिल्ली में हर वह खूबी थी। एक तो दिल्ली में यमुना थी और दूसरा यह कि यह एक और अरावली की पहाड़ी से घिरी थी। ऐसे में कभी चाँदनी चौक से होकर गुजरने वाली यमुना नहर के किनारे ही दिल्ली की संस्कृति और सभ्यता फलती-फूलती रही है। यह नहर और गन्दे नाले में तब्दील हमारी यमुना आज की पुरानी दिल्ली का प्रतीक थी। इस नहर से होकर जाने वाला पानी लाल किले के अन्दर जाता था और उसकी खूबसूरती को चार चाँद लगाता था।

दरअसल यमुना की दुर्दशा आम लोगों की जागरूकता की कमी के कारण हुई, लेकिन उसकी स्वच्छता पर करोड़ों रुपए लगाने के बाद भी वह क्यों नहीं स्वच्छ हो पा रही, इस पर किताब में न सिर्फ सवाल उठाया गया है, बल्कि जवाब भी दिया है- यमुना की सफाई के नाम पर किया गया खर्च अब तक देश के सबसे महँगे खर्चों में से एक है। यमुना की साफ-सफाई के लिये यमुना एक्शन प्लान के साथ कई और भी योजनाएँ लागू की गई हैं। कई शोध कराए गए। कई देशी-विदेशी एजेंसियों ने यमुना सफाई के लिये तरह-तरह की योजनाएँ बनाईं, इन योजनाओं के शोध पर भी कई सौ करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं, लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला है। लेखिका ने यह भी बताया है कि इन योजनाओं के बावजूद परिणाम क्यों नहीं निकला, इसके कारण थे और वास्तव में क्या किया जाए, ताकि यमुना का उद्धार हो सके। वह फिर से जीवनदायिनी नदी बन सके। उन्होंने उदाहरण देकर बताया है कि न सिर्फ विदेशों में, बल्कि अपने देश में भी नदियों को साफ किया गया है, फिर हम क्यों नहीं यमुना को उसका जीवन लौटा सकते।

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