एक नदी मैली सी

Submitted by Hindi on Thu, 01/24/2013 - 11:12
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दैनिक देशबंधु, रायपुर, जून 26, 2005, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार
यमुना के तट पर बसे दिल्ली शहर ने यमुना को अपने कचरे से एक काले गंदे नाले में बदल दिया है। यमुना की वर्तमान सफाई-रणनीति तो धराशायी हो चुकी है; आज इस नदी में पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा गंदगी है। समय आ गया है कि इसकी अंतहीन दुर्दशा की रोना रोने के बजाय हम एक ऐसी कार्यनीति की रचना करें जो यमुना को साफ करवाने में कारगर सिद्ध हो।

यमुना एक्शन प्लान (वायएपी) अप्रैल 1993 में यमुना नदी को प्रदूषण-मुक्त कराने हेतु आरंभ की गई थी। इस योजना को उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली –तीनों राज्यों में यमुना किनारे बसे 21 शहरों में लागू किया गया है। इस योजना के आरंभ से अब तक करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गये हैं। इन तीनों राज्यों में इस योजना के पहले चरण में तथा उसके विस्तृत चरण-यानी कि मई 2001 से फरवरी 2003 तक – 732 करोड़ रुपये अनुमोदित किए गए थे। इसके दूसरे चरण (वायएपी-2) में और 573 करोड़ रुपये अनुमोदित किए गए। मार्च 2004 तक, इस योजना पर कुल 674 करोड़ रुपये बहाए जा चुके हैं।

वायएपी के मुख्य लक्ष्य हैं:


1 घरेलू कचरा के उपचार हेतु कचरा उपचार संयंत्र का निर्माण
2 औद्योगिक कचरे के उपचार हेतु सामूहिक कचरा उपचार संयंत्र का निर्माण
3 शहर की नालियों के जल में सुधार कार्य तथा गरीबों व झोपड़पट्टी में रहने वाले लोगों के कचरे को उपचार संयंत्र तक पहुंचाने के लिए कम लगत वाले प्रसाधन केंद्र।

यही नहीं दिल्ली सरकार ने 900 करोड़ से लेकर 1,200 करोड़ रुपये मैले जल को साफ करने वाले संयंत्रों पर व्यय किए हैं। कुल मिलाकर आज तक यमुना पर 1,100 करोड़ से 1,450 करोड़ रुपये लगाए जा चुके हैं। वायएपी के दूसरे चरण के समाप्त होने तक सरकार इस 22 किलोमीटर के छोटे से पानी के टुकड़े को साफ करने के लिए 1,400 करोड़ से 1,900 करोड़ रुपये पानी में डुबो चुकी है।

कागज़ पर तो यह योजना बखूबी काम करती है। लेकिन, यह केवल कागज़ पर ही काम करती है। सरकार की मनपसंद कार्यनीति है कचरा उपचार संयंत्र यानी एसटीपी का निर्माण। इन संयंत्रों बनाने की मारा-मारी सन् 1995 से शुरू हो गई थी। मूल योजना के अनुसार 1997 तक 24 एसटीपी को कार्यरत बनाना था। सन् 2000 के अक्टूबर मास तक, दिल्ली के प्रमुख सचिव ने सर्वोच्च न्यायालय को जानकारी दी कि बनाये जाने वाले 16 संयंत्रों में से केवल 9 संयंत्र ही कार्य कर रहे थे। उनके अनुसार इससे कचरा निष्कासन की समस्या पर काबू पाया जा सकेगा, क्योंकि नदी में जाकर मिलने वाले अनुपचारित मैल की मात्रा सन् 2000 के 63 प्रतिशत से घटकर मार्च 2005 तक मात्र पांच प्रतिशत ही रह जाएगी।

आज दिल्ली के 17 एसटीपी की कुल उपचार क्षमता 2,330 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) है। परंतु समस्या यह है कि कोई नहीं जानता कि दिल्ली शहर कितना गंदगी उत्पन्न करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार सन् 2003-2004 में नदी के प्रवाह के आधार पर अनुमानित 3,853 एमएलडी गंदगी दिल्ली के 22 के करीब नालों से होकर रोज यमुना में जा मिलता था। दूसरी ओर, दिल्ली जल बोर्ड का कहना है कि (उसके द्वारा की गई दैनिक जल-आपूर्ति के आधार पर) 2,934 एमएलडी गंदगी प्रतिदिन नदी में बहाया जाता है। दिल्ली हर दिन कितना गंदा-जल उत्पन्न करती है, इसके बारे में कोई सर्वसम्मति नहीं हो पायी है।

दूसरी समस्या यह है कि दिल्ली की वर्तमान 5,600 किलोमीटर लंबे सीवर-लाइनें, जिसमें 130 किलोमीटर लंबे सीवर शामिल हैं, में या तो गाद भर गई है या फिर वे बैठ गईं हैं। सरकार के अनुसार केवल 15 प्रतिशत सीवर लाइनें ठीक-ठाक काम कर रही हैं। सन् 2000 के अक्टूबर महीने में, प्रमुख सचिव ने सर्वोच्च न्यायालय को जानकारी दी कि दिल्ली की 22 प्रमुख नालियों की पुर्नस्थापना हेतु 155 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है। परंतु इन नालियों की कभी मरम्मत नहीं हुई; हां, पैसा जरूर खर्च हो गया। सन् 2004 में, सरकार ने स्वीकार कर लिया कि केवल 30 किलोमीटर की सीवर लाइनों की पुर्नस्थापना हो पायी है।

सन् 2001 में, राज्य के प्रमुख सचिव ने सर्वोच्च न्यायालय को बतलाया कि दिल्ली शहर में झोपड़ पट्टियों में 6 लाख लोग रहते हैं; जिनमें से करीब 60,000 यमुना के किनारे रहते हैं। और तट पर रहने वाले लोग नदी के प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं। इसलिए पिछले दस सालों से बनी सभी सरकारों ने गरीब लोगों की झोपड़ियों को हटाने की जी-जान से कोशिश की है। परंतु कोई यह जानने की कोशिश नहीं करता है कि इस बात का क्या प्रमाण है कि नदी किनारे बसे लोग ही यमुना को प्रदूषित कर रहे हैं। हो सकता है कि वे इस बात के दोषी न होकर स्वयं उसके शिकार हों।

यही नहीं, दिल्ली की 40 से 50 प्रतिशत आबादी अनाधिकृत आवासों व झोपड़-पट्टियों में वास करती है। और ये सारी झोपड़ियां किसी भी सीवर से नहीं जुड़ी हैं। सरकार ने वादा किया था कि वह 31 मार्च, 2003 तक 490 नियमित अनाधिकृत कॉलोनियों में सीवर की संपूर्ण लाइनें डाल देगी और शेष लाइनें मार्च 31, 2004 तक पूरी कर देगी। खैर, वास्तव में इसने सन् 2004 तक 482 कॉलोनियों में केवल अंदर की सीवर लाइन डाली थीं; शेष सीवर लाइनों को दिल्ली सरकार दिसंबर 2005 तक पूरा करने का वादा करती है। समस्या और भी गहरी है क्योंकि दिल्ली में भारी संख्या में लोग अनियमितिकृत व अनाधिकृत कॉलोनियों में रहते हैं, जहां पर सीवर डालने की सरकार की कोई भी योजना नहीं है। इस बात से उसे कोई सरोकार नहीं है कि इतनी भारी-भरकम आबादी का अधिकतर कचरा और गंदा जल नाली से होता हुआ अनुपचारित रूप में ही यमुना नदी में जा रहा है।

इस योजना का लक्ष्य यह भी है कि नदी किनारे बसे गरीब लोगों को वहां से हटा दिया जाए, ताकि यमुना साफ की जा सके। सन् 2001 में, राज्य के प्रमुख सचिव ने सर्वोच्च न्यायालय को बतलाया कि दिल्ली शहर में झोपड़ पट्टियों में 6 लाख लोग रहते हैं; जिनमें से करीब 60,000 यमुना के किनारे रहते हैं। और तट पर रहने वाले लोग नदी के प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं। इसलिए पिछले दस सालों से बनी सभी सरकारों ने गरीब लोगों की झोपड़ियों को हटाने की जी-जान से कोशिश की है। परंतु कोई यह जानने की कोशिश नहीं करता है कि इस बात का क्या प्रमाण है कि नदी किनारे बसे लोग ही यमुना को प्रदूषित कर रहे हैं। हो सकता है कि वे इस बात के दोषी न होकर स्वयं उसके शिकार हों।

लेकिन, 17 उपचार संयंत्रों, नालियों के जाल, पाइपों, अवैध बसे लोगों के लिए सस्ते प्रसाधन केंद्र तथा नदी साफ करने के नाम पर विस्थापित हजारों लोगों के बावजूद यमुना जस की तस मैली है। इसका सीधा सा जवाब यह है कि मैला उपचार क्षमता, बढ़ती हुई आबादी द्वारा उत्पन्न मैल की मात्रा नहीं झेल पायी। मैला उपचार संयंत्रों के निर्माण तथा नालियों के पुर्नस्थापना में निवेश किया गया पैसा सचमुच पानी में बह गया क्योंकि 17 संयंत्रों में से 13 आधे-अधूरे रूप से कार्य कर रहे हैं, इनमें से एक में तो मल जल पहुंच ही नहीं रहा है। इतने पैसे खर्च करके जो व्यर्थ जल उपचारित किया जाता है उसे अनुपचारित व्यर्थ के साथ मैला कर निष्कासित कर दिया जाता है, जिससे उपचार का सारा प्रभाव व्यर्थ हो जाता है क्योंकि मैल उपचार संयंत्र बनाते समय उपचारित तरल मल-जल के निष्कासन की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी।

साथ ही, इन संयंत्रों का निर्माण मल-जल की उपलब्धता के आधार पर नहीं; अपितु जमीन की उपलब्धता के आधार पर किया गया था। ये संयंत्र ऐसी जगहों पर बने हैं जहां तक मल-जल को ले जाने में काफी समय और पैसा लगता है जिससे कि मल-जल का उपचार बड़ा महँगा सौदा पड़ जाता है।

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