हर खेत के लिये पानी : नई उम्मीदों की पहल

Submitted by RuralWater on Fri, 07/24/2015 - 13:57

पुराने जल संचय मॉडलों की मदद से किसी भी गाँव में माँग के अनुरूप पानी को संचित नहीं किया जा सका है। संचित पानी का भी समानता के आधार पर बँटवारा नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त, नदी नालों पर बनाए छोटे-बड़े बाँधों या तालाबों में सकल आवश्यकता का बहुत ही कम पानी एकत्रित हुआ है। जल संचय के दौरान भूजल रीचार्ज की सकल मात्रा का अनुमान नहीं लगाया जा सका है। अधूरे लक्ष्य को पूरा करने के लिये योजना का दूसरा चरण प्रारम्भ नहीं किया जाता। सरकार की ओर से किसानों के लिये अच्छी खबर आई है। खबर से पता चलता है कि भारत सरकार सिंचाई सुविधाओं की बेहतरी तथा जल संचय के मॉडल पर ध्यान देगी। इस काम के लिये अगले पाँच साल में 50 हजार करोड़ की राशि उपलब्ध कराई जाएगी। मौजूदा पहल का ध्येय वाक्य है - हर खेत के लिये पानी।

यह वाक्य बारानी खेती करने वाले किसानों को, जो मानसून की अनिश्चितता, गहराते जल संकट, पानी की विषम होती उपलब्धता, जलवायु परिवर्तन और सूखते जलस्रोतों जैसी अनेकानेक समस्याओं का दंश भोग रहे हैं, के मन में आशा की नई उम्मीद जगाता है। यह पहल सरकार द्वारा ड्राप-मोर क्राप की दिशा में उठाए सार्थक कदम का दूसरा चरण है।

पिछले अनेक सालों से देश में जलग्रहण कार्यक्रम संचालित हैं। इसे कृषि विभाग, ग्रामीण विकास विभाग तथा अनेक देशी-विदेशी संस्थाएँ संचालित करती हैं। नाबार्ड द्वारा भी इस हेतु कर्ज दिया जाता है। इस कार्यक्रम की फिलासफी के अनुसार पानी और मिट्टी के संरक्षण के कामों की शुरुआत ऊँचे इलाकों से की जाकर जलग्रहण इलाके की मुख्य नदी के निकास बिन्दु पर समाप्त की जाती है।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों यथा पानी, मिट्टी और बायोमास को समृद्ध कर अधिकाधिक उत्पादन लेना होता है। इस लक्ष्य को हासिल करने की दृष्टि से उससे जुड़े तकनीकी लोग खेत का पानी खेत में का नारा देते हैं तथा तद्नुसार मिट्टी पानी संरक्षण जैसे अनेक काम करते हैं। पिछले 25 सालों में जलग्रहण कार्यक्रम की मदद देश के बहुत बड़े सूखाग्रस्त इलाकों में काम हुआ है पर अपवादों को छोड़कर, देश के किसी भी गाँव के सौ प्रतिशत खेतों को पानी नहीं मिला है।

जिन गाँवों में उपचार सम्बन्धी काम हुआ है वहाँ परियोजना अधिकारियों ने गाँव की योजना बनाते समय तो बरसाती पानी की उपलब्धता का अनुमान तो लगाया पर माँग के अनुरूप वर्षाजल का संरक्षण नहीं हुआ है। इस कमी के कारण गाँव के बहुत से खेत सूखे रह गए हैं। जलग्रहण कार्यक्रम की दूसरी खामी थी सम्पन्न कार्य के प्रभावों की अस्थायी प्रकृति।

उदाहरण के लिये अल्प समय में स्टापडैम और तालाब मिट्टी और गाद से भर गए। जल संरक्षण स्रोतों में मिट्टी और गाद भरने के कारण वे अप्रभावी हो गए। गाँव के खेत फिर पानी के लिये तरसने लगे। पहाड़ों पर खोदी ट्रेंच फिर मिट्टी से भर गईं। कहा जा सकता है कि सारे मामले के पीछे अधूरे तकनीकी अनुमान हैं।

सरकार की नई पहल में उद्देश्य का फोकस बदल गया है। नया फोकस हर खेत के लिये पानी का वायदा करता है। वह अमीर और गरीब में या छोटे या बड़े किसान में भी अन्तर नहीं करता। वह सबके लिये पानी का वायदा करता है। इस वायदे का अर्थ है हर खेत के लिये उतना पानी जितनी उसमें बोई फसलों की जरूरत है। सम्भव है कुछ इलाकों में बरसात की कमी के कारण तीन फसलों की जगह दो फसलों के लिये लगने वाले पानी का ही इन्तज़ाम सम्भव हो।

कमी की हालत में यह भी हो सकता है कि पानी की उपलब्धता के आधार पर प्रति हेक्टेयर पानी का बँटवारा किया जाए। यह बँटवारा पानी की अमीरी या गरीबी के स्थान पर सामाजिक न्याय तथा समानता पर आधारित हो। यदि ऐसा होता है तो वास्तव में यह एक नई पहल हो सकती है।

मौजूदा पहल में सिंचाई सुविधा तथा जल संचय मॉडल के क्रियान्वयन का काम विकेन्द्रीकृत किया गया है। इस कारण योजनाओं का काम जिला तथा तहसील के स्तर पर किया जाएगा। प्रस्तावित पहल के ध्येय वाक्य (हर खेत के लिये पानी) की सफलता तभी सुनिश्चित हो सकेगी जब प्लानिंग के दौरान ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि हर खेत को इष्टतम पानी उपलब्ध कराने सम्बन्धी उद्देश्य की पूर्ति कैसे होगी।

गौरतलब है कि पुराने जल संचय मॉडलों की मदद से किसी भी गाँव में माँग के अनुरूप पानी को संचित नहीं किया जा सका है। संचित पानी का भी समानता के आधार पर बँटवारा नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त, नदी नालों पर बनाए छोटे-बड़े बाँधों या तालाबों में सकल आवश्यकता का बहुत ही कम पानी एकत्रित हुआ है। जल संचय के दौरान भूजल रीचार्ज की सकल मात्रा का अनुमान नहीं लगाया जा सका है। अधूरे लक्ष्य को पूरा करने के लिये योजना का दूसरा चरण प्रारम्भ नहीं किया जाता।

आकस्मिक खतरों तथा हादसों के लिये पुर्नवास का इन्तज़ाम नहीं होता। उम्मीद है, इस बार नई इबारत लिखी जाएगी। इस प्रयास में नए सोच, नए दृष्टिबोध और नए विकल्पों पर काम किया जाएगा। जिन ग्रामों में बरसाती पानी की कमी है उन ग्रामों में हर खेत को पानी देने की पहल के कारण संचित पानी के समान बँटवारे की नीति पर काम किया जाएगा। तभी घोषित लक्ष्य हासिल होगा।

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