इलेट्रानिकी

Submitted by Hindi on Sat, 07/30/2011 - 10:02
इलेट्रानिकी विज्ञान तथा इंजीनियरी की वह शाखा है जिसके अंतर्गत इलेक्ट्रॉनीय युक्तियों एवं उनके उपयोगों से संबद्ध विषयों का अध्ययन किया जाता है। इलेक्ट्रॉन सिद्धांत तथा प्रथम इलेक्ट्रॉन युक्तियाँ प्रांरभ में भौतिकी के वैज्ञानिकों द्वारा ही विकसित की गई थीं। बाद में अत्यधिक उन्नति हो जाने के कारण इलेक्ट्रॉनिकी अध्ययन का एक पूर्णत: भिन्न विषय हो गई। फिर भी आजकल यह वैद्युत्‌ इंजीनियरी की एक शाखा समझी जाती है। सन्‌ 1887 में हर्ट्‌स ने हर्ट्सियन तरंगों की खोज की तथा 1895 में रंट्जन ने एक्स-रे नली का आविष्कार किया। लगभग 1892 में मारकोनी ने अपने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया कि बिना तार के ही वैद्युत्‌ संचारण संभव है। 1902 में फ्लेमिंग द्वारा दो विद्युदग्रवाले वाल्व का तथा 1906 में डी. फॉरेस्ट द्वारा तीन विद्युदग्रवाले वाल्व का आविष्कार हुआ। इन सब मूल अनुसंधानों ने अन्य बहुत से वैज्ञानिकों के कार्य को उत्साहित किया और इन्हीं सामूहिक आविष्कारों तथा उन्नतियों का फल है कि आज इलेक्ट्रॉनिकी एक महत्वपूर्ण विषय हो गई है।

इलेक्ट्रॉनीय युक्तियाँ वे युक्तियाँ हैं जिनमें निर्वात में, या किसी गैस में, अथवा किसी अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन के चालन का उपयोग किया जाता है। इसके उदाहरण इलेक्ट्रॉन नली तथा ट्रानज़िस्टर हैं। इन इलेक्ट्रॉनीय युक्तियों के अध्ययन में न केवल इलेक्ट्रॉन नलियों तथा अन्य संबद्ध यंत्रों का अध्ययन होता है वरन्‌ इन नलियों से संबद्ध परिपथो का भी अध्ययन किया जाता है।

इलेक्ट्रॉनीय युक्तियों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है: उष्मायनिक तथा प्रकाशविद्युतीय। इस विभाजन का आधार यह है कि इन युक्तियों के लिए इलेक्ट्रॉन धारा किस विधि से प्राप्त होती है। इलेक्ट्रॉन युक्तियों को और भी विभाजित किया जा सकता है, जैसे उच्च-निर्वात-युक्ति तथा गैसमय युक्ति। उच्च-निर्वात्‌-युक्ति वह युक्ति है जिसमें इलेक्ट्रॉन का चालन निर्वात में होता है। गैसमय युक्ति में इलेक्ट्रॉन का चालन अल्पदाब के गैस में होता है। अंत में इलेक्ट्रॉन युक्तियों को उनके उपयोग के आधार पर ही विभाजित किया जा सकता है। इस लेख में इन युक्तियों का क्रमानुसार वर्णन किया जाएगा। गत कुछ वर्षो में इलेक्ट्रॉनिकी इतनी अधिक विस्तृत हो गई है कि वर्तमान लेख में केवल मूल सिद्धांतों तथा प्रमुख उपयोगों का ही वर्णन संभव है।

उष्मायनिक उत्सर्जन- यदि किसी धातु के टुकड़े को उच्च ताप तक तप्त किया जाए तो उसमें से इलेक्ट्रॉन बाहर निकालते हैं। यदि धातु का टुकड़ा (अथवा तार या ततु) निर्वात में रखा हो, जिसमें इलेक्ट्रानों की मुठभेड़ वायु के अणुओं से न हो सके और साथ ही कोई विद्युतीय अथवा चुंबकीय क्षेत्र उपस्थित न हो, तो जब तक इलेक्ट्रॉन किसी दूसरी वस्तु से टकरा न जाएँ वे सीधी रेखा में चलते हैं। यदि एक दूसरा विद्युदग्र (प्लेट) उसी निर्वात में उपस्थित हो और उसे किसी धन विभव पर रखा जाए तो इलेक्ट्रॉन इसी विद्युदग्र पर एकत्र होंगे और यदि तार द्वारा चित्र1 की तरह दोनों विद्युदग्रों में संबंध स्थापित कर दिया जाए तो इस परिपथ में विद्युतधारा का प्रवाह होने लगेगा। इस प्रकार के निर्वातित काँच के लट्टू (बल्ब) को इलेक्ट्रॉन नली कहते हैं। उपर्युक्त नली में केवल दो विद्युदग्र रहते हैं; अतएव उसे द्विविद्युदग्र नली (या डायोड) कहते हैं।

जब तंतु ठंडा होता है तो परिपथ में विद्युतधारा का प्रवाह नहीं होता। जैसे-जैसे तंतु को तप्त किया जाता है वैसे-वैसे धारा की मात्रा बढ़ती है। रिचार्डसन के नियम के अनुसार परिपथ में धारा की मात्रा प्रधानत: तंतु के ताप पर निर्भर रहती है (देखें उष्मायन)। विद्युतधारा कुछ सीमा तक प्लेट विभव पर निर्भर रहती है। यदि प्लेट पर ऋणात्मक विभव लगा दिया जाए तो धारा का प्रवाह नहीं होगा, क्योंकि तब इलेक्ट्रॉन ऋणातमक विद्युत्‌ क्षेत्र के कारण प्रतिकर्षित होकर तंतु की ओर जायँगे; और यदि प्लेट-विभव पर्याप्त धनात्मक न हो तो तंतु से निकले कुछ इलेक्ट्रॉन प्लेट पर न पहुँच सकने के कारण तंतु के चारों ओर एकत्र हो जाते हैं। इस इलेक्ट्रॉन समूह को अवकाशावेश (स्पेस चार्ज) कहते हैं। प्लेट विभव बढ़ाने पर अवकाशावेश कम हो जाता है और पर्याप्त ऊँचे विभव पर प्लेट सारे इलेक्ट्रानों को आकर्षित कर लेता है। इस समय विद्युतधारा संतृप्ति की अवस्था में रहती है। इसके बाद प्लेट-विभव और अधिक बढ़ाने से प्लेट धारा में कोई अंतर नहीं होता।

डायोड- उपर्युक्त उल्लेख से यह स्पष्ट है कि किसी नली में विद्युतधारा का प्रवाह केवल एक दिशा में हीं हो सकता है। इसी से डायोड नली का मुख्य उपयोग ऋजुकारी (रेक्टिफ़ायर) की तरह प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में परिवर्तित करने के लिए होता है। प्रत्यावर्ती धारा के अर्धचक्र में जब प्लेट धनात्मक रहता है तभी नली में धारा का प्रवाह होता है; दूसरे अर्धचक्र में धारा का प्रवाह नहीं होता। एक अन्य डायोड का उपयोग करके प्रत्यावर्ती धारा के दूसरे अर्धचक्र का भी उपयोग किया जा सकता है (पंक्ति 3)। इस प्रकार के परिपथ को पूर्ण-तंरग-ऋजुकारी कहते हैं। लगभग सभी इलेक्ट्रॉनीय उपकरणों में दिष्ट धारा की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ऋजुकारी का प्रयोग होता है।

ग्रिड नियंत्रित इलेक्ट्रॉन नली- सन्‌ 1906 में डी फ़ारेस्ट ने इलेक्ट्रॉन नली में, प्लेट और तंतु के मध्य, जाली के आकार का एक तीसरा विद्युदग्र, जिसे ग्रिड कहते हैं, और रखा। ग्रिड इस आकार का होता है कि इलेक्ट्रॉन इसके भीतर से निकलकर प्लेट पर पहुँच सकते हैं। ग्रिड को कोई विभव देकर प्लेट-धारा को भली भाँति नियंत्रित किया जा सकता है। कुछ लोगों का कथन है कि इस नियंत्रण-ग्रिड के आविष्कार का ही यह फल है कि हम आज इलेक्ट्रॉनिकी को इस विकसित रूप में देखते हैं।

वह नली जिसमें तीन विद्युदग्र होते हैतंतु (ऋणाग्र), ग्रिड और प्लेट (धनाग्र)ट्रायोड कहलाती है। ट्रायोड का यह लाक्षणिक गुण होता है कि ग्रिड-विभव के थोड़े से परिवर्तन से ही प्लेट-धारा में उससे कहीं अधिक परिवर्तन हो सकता है (देखें इलेक्ट्रॉन नली)। यदि ग्रिड तंतु की अपेक्षा अधिक ऋणात्मक हो और प्लेट ऊँचे धन विभव पर न हो, तो धारा का कोई प्रवाह नहीं होगा। ग्रिड विभव को कम ऋणात्मक करके यदि धीरे-धीरे धनात्मक किया जाए तो प्लेट-धारा बढ़ेगी और अंत में संतृप्ति की अवस्था धारण कर लेगी। ट्रायोड के व्यवहार को कई लेखाचित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। तीन चर (वेरियेबुल्स) द्वारा इसके गुण का वर्णन करते हैं, जैसे प्रवर्धन-गुणांक (ऐंप्लिफ़िकेशन फ़ैक्टर), पट्ट-प्रतिरोध (प्लेट रेज़िस्टेंस) तथा अन्योन्य चालकत्व (म्यूचुअल कंडक्टैंस)।

टेट्रोड तथा पेंटोड- कुछ ऐसी भी उष्मायन नलियाँ बनती हैं जिसमें एक के बदले दो या तीन जालियाँ (ग्रिड) होती हैं। ऐसे चार तथा पाँच विद्युदग्रवाली नलियों को क्रमानुसार टेट्रोड और पेंटोड कहते हैं। यदि इन जालियों का विभव ठीक प्रकार से निर्धारित किया जाए तो ये नली के व्यवहार को भिन्न प्रकार से परिवर्तित कर देती हैं। ऐसा होते हुए भी प्रत्येक परिपथ के मूल सिद्धांत वे ही रहते हैं।

ट्रायोड के उपयोग: (1) प्रवर्धक- ट्रायोड नली का मुख्य उपयोग प्रवर्धक परिपथ में होता है। इस परिपथ में आदा (इनपुट) की वोल्टता के थोड़े परिवर्तन से प्रदा (आउटपुट) धारा में अत्यधिक परिर्वतन होता है। प्राय: यह आवश्यक होता है कि एक के बाद एक करके कई प्रवर्धकों का एक साथ प्रयोग किया जाए। दो प्रवर्धकों का संबंध प्रतिरोधक-संधारित्र द्वारा या ट्रांसफार्मर द्वारा किया जाता है।

(2) मूर्च्छक तथा परिचायक- ट्रायोड का उपयोग आरंभ में रेडियो संकेत के परिचायक के ही रूप में था। रेडियो स्टेशन से ऊर्जा का भली भांति विकिरण करने के लिए आवश्यक है कि एरियल को श्रव्य आवृत्ति से कहीं अधिक आवृत्ति का विभव दिया जाए। इसी से संकेत को संचारित करने के लिए उच्च वाहक आवृत्ति की मूर्च्छना (मॉडयुलेशन) श्रव्य आवृत्ति द्वारा कर दी जाती है। मूर्च्छना आयाम-आवृत्ति परिवर्तन अथवा-परिवर्तन द्वारा की जाती है।

संग्राही एरियल द्वारा प्राप्त रेडियो संकेत को फिर से श्रव्य बनाने के लिए श्रव्य आवृत्ति को वाहक आवृत्ति से अलग करना पड़ता है। इस क्रिया को परिचायन कहते हैं।

(3) दोलक- ट्रायोड का अन्य मुख्य उपयोग दोलक परिपथों में है। यदि किसी प्रवर्धक परिपथ के प्रदा का कुछ अंश उसके आदा में लगा दिया जाए, तो बिना किसी प्रत्यावर्ती स्रोत के परिपथ में विद्युतधारा औसत मान से घटती बढ़ती रहेगी। और यदि प्रदा या आदा परिपथ किसी आवृत्ति के लिए संस्वरित हो तो यह परिपथ उसी आवृत्ति पर दोलन करता रहेगा। जिसके दोलन की आवृत्ति प्लेट परिपथ द्वारा निर्धारित होती है। प्लेट धारा ट्रांसर्फामर के पूर्ववर्ती में होकर बहती है। यह परवर्ती में एक विद्युतवाहक बल प्रेरित करती है, जिसके फलस्वरूप सी बैटरी के ग्रिड-अभिनति (बायस) के अतिरिक्त एक अन्य विभव ग्रिड पर लग जाता है। प्रेरकत्व तथा धारित्र के परिमाण द्वारा ही परिपथ के दोलन की मूल आवृत्ति निर्धारित होती है।

इस प्रकार के इलेक्ट्रॉन-नली-दोलकों के नाना प्रकार के उपयोग होते हैं। ये रेडियो प्रेषित्र के मूल अंग होते हैं और वाहक आवृत्ति का उत्पादन करते हैं। दोलक श्रव्य-आवृत्ति के भी बनाए जा सकते हैं।

गैसयुक्त नली- यदि एक नली में कम दाब पर कोई गैस भरी हो और उसके विद्युदग्रों में उचित विभवांतर स्थापित कर दिया जाए, तो नली में उद्दीप्ति-निरावेश स्थापित हो जाता है। ऐसी अवस्था में धारा-घनत्व कम होता है, परंतु उसकी अपेक्षा विभवांतर अधिक होता है। धारा का प्रवाह नली में उपस्थित गैसीय आयनों द्वारा होता है। ऐसी उद्दीप्ति-निरावेश-नली का उपयोग कई प्रकार से किया जा सकता है। इस प्रकार का एक उपयोग शिथिलनदोलक (रिलैक्सेशन ऑसिलेटर) में होता है। यदि दो विद्युदग्रवाली एक गैसीय नली का संबंध चित्र 8 की तरह किया जाए तो संधारित्र का विभव ऐसी आवृत्ति से दोलन करेगा जो संधारित्र के धारित्र और प्रतिरोधक के मान पर निर्भर होगा। इस प्रकार की उद्दीप्ति-निरावेश-नली विद्युदग्रों के एक क्रांतिक विभवांतर, विक (Va), तक पूर्णतया अचालक होती है। तदुपरांत उसमें निरावेश स्थापित हो जाता है। निरावेश फिर तभी लुप्त होता है जब विभवांतर कम होकर विक (Va) से नीचे विभव विख (Vb) पर पहुँच जाता है।

किसी गैसयुक्त नली के एक विद्युदग्र को उष्मायन-ऋणाग्र बना दिया जाए तो इलेक्ट्रॉन धारा की उपस्थिति के कारण निरावेश दूसरी ही प्रकृति का होगा। इसमें बहुत कम विभवांतर पर ही अधिक धारा का प्रवाह हो सकता है। इस प्रकार की नली डायोड अथवा ट्रायोड दोनों ही हो सकती है। डायोड का प्रयोग ऋजुकारी की भाँति होता है और लगभग सभी उच्च क्षमतावाले परिपथों में डायोड गैसयुक्त होता है और उसमें पारद वाष्प भरा रहता है। इस प्रकार की नली की कार्य की कार्यनिष्पति पूर्ण निर्वातनली से कहीं अधिक होती है, क्योंकि इसमें से अधिक धारा का प्रवाह होने पर भी विभव में बहुत कम वोल्ट का अंतर पड़ता है।

गैसयुक्त नली में निरावेश का नियंत्रण बहुत कम सीमा तक ग्रिड द्वारा किया जा सकता है; इस प्रकार की ग्रिड-नियंत्रित, तप्त ऋणाग्रवाली निरावेश नली को ''थायरेट्रान'' कहते हैं। थायरेट्रान में ग्रिड धनाग्र को ऋणाग्र से इस प्रकार परिरक्षित कर लेता है कि जब तक ग्रिड का एक उचित विभव न हो जाए, निरावेश स्थापित नहीं हो सकता। निरावेश स्थापित होते ही विद्युतधारा पर ग्रिड का कोई प्रभाव नहीं होता और ग्रिड विभव कम करने से भी निरावेश नहीं रोका जा सकता। इसके लिए प्लेट विभव कम करने की आवश्यकता होती है।

यदि थायरेट्रान किसी प्रत्यावर्ती-धारा-परिपथ से संबद्ध हो तो यह केवल अर्धचक्र में ही चालक रहेगा, उसके अंत में वह अचालक हो जाएगा। यदि ग्रिड विभव क्रांतिक विभव से कम कर दिया जाए तो भी दूसरे चक्र में निरावेश नहीं स्थापित होगा। इस प्रकार की नली का उपयोग ''नियंत्रण परिपथों'' में अधिक विद्युतधारा को नियंत्रित करने के लिए होता है।

थायरेट्रान गैस डायोड की तरह ''रिलैक्सेशन ऑसिलेटर'' में भी प्रयुक्त किया जा सकता है।

प्रकाशसंवेदी नली एवं युक्तियां- यदि कुछ धातुओं पर बहुत छोटे तरंगधैर्य का प्रकाश पड़े तो उनमें से इलेक्ट्रॉन बाहर निकल आते हैं (देखें प्रकाशविद्युत्‌)। इलेक्ट्रॉन की संख्या प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर रहती है। कुछ ऐसे भी धातु बनाए जा सकते हैं जो दृश्य प्रकाश के लिए भी संवेदी होते हैं। यदि एक प्रकाश-विद्युत्‌ ऋणाग्र तथा एक अन्य विद्युदग्र (धनाग्र) किसी निर्वात नली में रख दिए जाएँ तो इस संयोजन को प्रकाश विद्युन्नली कहते हैं। यदि धनाग्र को धन विभव पर रखा जाए तो ऋणाग्र पर प्रकाश पड़ने से धारा का प्रवाह होने लगेगा।

इस प्रकार के प्रकाश विद्युतधारा की मात्रा बहुत कम होती है। परंतु फोटो-नली में भर देने से धारा की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। फोटो-नली को किसी भी उपयोग में लाने के लिए प्रकाश विद्युतधारा का किसी ट्रायोड इत्यादि द्वारा प्रवर्धन करना अत्यावश्यक होता है। प्रकाश विद्युद्वारा के कारण प्रतिरोधक र (R) में विभवांतर स्थापित हो जाता है जो ट्रायोड द्वारा प्रवर्धित होता है। इस परिपथ की प्रदा वोल्टता का प्रयोग किसी गणक, योजित्र या अन्य किसी युक्ति को चलाने के लिए किया जाता है। प्रकाश नली के कुछ उपयोगों का वर्णन निम्नलिखित है:

(1) योजित्र क्रिया- किसी प्रकाश नली के ऋणाग्र पर पड़ते हुए प्रकाश को नियंत्रित करके योजित्रों और यांत्रिक युक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित किया जा सकता है। इसका उपयोग उद्योग में बनी हुई वस्तुओं की संख्या की गणना करने के लिए बहुत होता है। इसी प्रकार के और भी बहुत से कार्य प्रकाश नली द्वारा लिए जाते हैं।

(2) ध्वनि पुनरुत्पादन- चलचित्र फिल्म पर बने ध्वनिपथ को श्रव्य ध्वनि में परिवर्तित करने के लिए उस पथ पर एक नियत किरणावलि डालते हैं। पारगमित प्रकाश एक प्रकाश नली के ऋणाग्र पर पड़ता है और इसकी तीव्रता में परिवर्तन उसी प्रकार से होते हैं जिस प्रकार से ध्वनिपथ में ध्वनि के परिवर्तन अंकित रहते हैं। इसी कारण प्रकाश-नली-धारा ध्वनि परिवर्तनों के पूर्णतया समान होती है। इस विद्युतधारा से किसी लाउडस्पीकर को चलाने के पहले इसको प्रवर्धित करना आवश्यक होता है।

(3) प्रतिलिपि (फ़ैक्सिमिली) प्रणाली- इस प्रणाली का प्रयोग किसी चित्र अथवा इसी प्रकार की अन्य किसी वस्तु को एक जगह से दूसरी जगह, तार या रेडियो द्वारा, संचारित करने के लिए करते हैं। प्रथम बार सन्‌ 1925 में इसका प्रयोग आरंभ हुआ था। इसमें एक किरणावलि चित्र फिल्म के प्रत्येक भाग से होकर जाती है। पारगमित प्रकाश की तीव्रता फिल्म के घनत्व पर निर्भर रहती है और एक प्रकाश नली पर पड़ने पर उसी प्रकार के विद्युत्‌ आवेगों का प्रवाह होता है। इन आवेगों को तार या रेडियो द्वारा दूर तक के ग्राही केंद्रों को भेज दिया जाता है, जहाँ एक प्रकाश नली द्वारा फिर से चित्र तैयार हो जाता है।

प्रकाश वैद्युत् युक्तियों का उपयोग दूरवीक्षण (टेलीविजन) में भी बहुत होता है।

अन्य इलेक्ट्रॉनीय युक्तियों को तीन मुख्य भागों में विभाजित करके उनका वर्णन नीचे संक्षेप में किया गया है:
(क) इलेक्ट्रॉनीय उपकरणिकाएँ- निर्वात नली, थायरेट्रान तथा प्रकाश नली में इलेक्ट्रॉन के उत्पादन तथा नियंत्रण की सहायता से इलेक्ट्रॉनिकी ने लगभग सभी विषय के वैज्ञानिकों को उनके कार्य के लिए अगणित उपकरणिकाएँ प्रस्तुत की हैं। उनमें से कुछ का वर्णन ऊपर किया जा चुका है। कुछ अन्य प्रमुख उपकरणिकाओं का वर्णन नीचे किया जा रहा है:

(1) दाब प्रमापी 0.05 से लेकर 10-4 सेंटीमीटर तक की दाब नापने के लिए तापीय युग्म प्रमापी का प्रयोग किया जाता है। इस प्रमापी में दो विभिन्न धातुओं के तार की संधि का संबंध एक तंतु से कर दिया जाता है। तंतु को नियत वोल्टता स्रोत से तप्त किया जाता है। इसका ताप आसपास के वातावरण की उष्मीय चालकता पर निर्भर रहता है और उष्मीय चालकता गैस की दाब पर। तापीय युग्म द्वारा उत्पन्न वोल्टता को नापकर गैस की दाब का अनुमान लगाया जा सकता है।

10-4 से 10-7 सेंटीमीटर तक की दाब को नापने के लिए आयनीकरण प्रामापी का प्रयोग किया जाता है। यह एक ट्रायोड होता है, जिसमें तंतु, ग्रिड तथा प्लेट का प्रयोग किया जाता है। तंतु से निकले इलेक्ट्रॉन और गैसअणुओं में मुठभेड़ होने पर, गैस के अणु आयनों में विभाजित हो जाते हैं। धन आयनों के ऋणात्मक प्लेट की ओर जाने के कारण आयन धारा का प्रवाह होता है। यह धारा गैस दाब पर निर्भर रहती है और इसको नापने से दाब का अनुमान किया जाता है।

(2) इलेट्रानीय गणक तथा संगणकबहुत से परिपथ विद्युत्स्पंदों की गणना करने के लिए बनाए गए हैं। ऐसे परिपथों का उपयोग नाभिकीय इंजीनियरी में बहुत होता है। इनका मूल सिद्धांत यह होता है कि परिपथ में आदा में कई स्पंदों को लगाने पर प्रदा में एक स्पंद बनता है।

गणक (कांउडर) का सिद्धांत पारिकलन यंत्र (कैल्क्युलेटर) बनाने के लिए भी प्रयुक्त होता है। ये दो प्रकार के होते हैं: आंकिक (डिजिटल) तथा अनुरूप (ऐनालॉग)। आंकिक संगणक में संख्याओं को साधारण अंकों में रखकर कार्य होता है, परंतु अनुरूप संगणक में संख्याओं को किसी भौतिक मात्रा में रूपांतरित करके कार्य होता है।

(3) इलेक्ट्रॉनीय निमेषमान- मैरीसन के सन्‌ 1927 के आविष्कार के पश्चात्‌ से सूक्ष्मता से समय नापने के लिए इलेक्ट्रॉनीय निमेषमान का प्रयोग होता है। इस यंत्र से समय इतनी सूक्ष्मता से नापा जा सकता है कि एक दिन में 110,00,00,000 भाग से कम का अंतर पड़ता है। इसमें मणिभ (क्रिस्टल) नियंत्रित इलेक्ट्रॉन-नली-दोलक का उपयोग होता है। स्फटिक-मणिभ-पट्ट (क्वार्ट्‌ज़ क्रिस्टल प्लेट) की आवृत्तियों को ताप, वायुदाब तथा आर्द्रता से प्रभावित न होने देने के लिए उसको काँच की नली में बंद करके नियत ताप पर रखा जाता है। आवृत्ति-विभाजन-परिपथ द्वारा अंततोगत्वा 60 चक्र प्रति सेकंड की आवृत्ति उत्पन्न की जाती है और उससे समक्रमिक (सिंक्रोनस) मोटर चलाई जाती है। अंत में इस मोटर द्वारा घड़ी की सुइयाँ चलती हैं।

(4) हाइड्रोजन-आयन-सांद्रण-मापी (पी.एच. मीटर)(क) रसायन शास्त्र में कुछ क्रियाओं के अंतर्गत हाइड्रोजन-आयन-सांद्रण (पी-एच मान) का अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण होता है। किसी घोल का पी-एच मान दो अर्धसेलों का विभवांतर नापने से ज्ञात किया जा सकता है। इस सेल में एक निर्देश विद्युदग्र होता है और दूसरा विद्युदग्र ऐसा होता है जो हाइड्रोजन आयन से प्रभावित होता है (देखें रासायनिक उपकरण)। इन विद्युदग्रों के बीच बहुत ही थोड़ा विभवांतर स्थापित होता है। इस कारण एक प्रवर्धक का भी प्रयोग किया जाता है।

(ख) संचार में इलेक्ट्रॉनिकी- इलेक्ट्रॉनिकी के अंतर्गत हुए पहले प्रयत्नों का बहुत अधिक संबंध संचार के क्षेत्र से था। रेडियो, दूरवीक्षण, राडार इत्यादि इन्हीं आविष्कारों के फल हैं। ये सब आधुनिक मानव जीवन के मूल अंग हो गए हैं।

(1) रेडियो प्रेषी- श्रव्य ध्वनि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक संचारित करने के लिए रेडियोप्रेषी का प्रयोग किया जाता है। ध्वनिपोष द्वारा उत्पन्न श्रव्य आवृत्ति का पहले प्रवर्धन किया जाता है और फिर इससे रेडियो-आवृत्ति-वाहक की मूर्च्छना (मॉड्यूलेशन) करते हैं। मूर्च्छना के पहले रेडियो आवृत्ति का भी प्रवर्धन करना आवश्यक होता है। मूर्च्छना के प्रदा को एरियल द्वारा संचारित कर दिया जाता है। आयाममूर्च्छित रेडियो प्रेषी के अतिरिक्त आवृत्तिमूर्च्छित रेडियो प्रेषी का भी उपयोग किया जाता है।

(2) रेडियो संग्राही- रेडियो प्रेषी द्वारा संचारित संकेतों को फिर से श्रव्य बनाने के लिए रेडियों संग्राही की आवश्यकता होती है। एरियल द्वारा प्राप्त संकेतों को समस्वरित (ट्यूंड) प्रवर्धक से प्रवर्धित करके उसकी वाहक आवृत्ति को एक अन्य अंत:स्थ आवृत्ति में बदल देते हैं। यह कार्य आवृत्ति परिवर्तित्र द्वारा होता है। अंत:स्थ आवृत्तिप्रवर्धन के बाद विसंकालक द्वारा श्रव्य आवृत्ति को वाहक आवृत्ति से अलग कर दिया जाता है। इसे एक बार फिर प्रवर्धित किया जाता है।प्रवर्धक के उत्पाद को लाउडस्पीकर में लगा देने से रेडियो संकेत श्रव्य हो जाता है।

(3) दूरवीक्षण- दूरवीक्षण द्वारा किसी चित्र का संचालन एक स्थान से दूसरे स्थान तक वैद्युत्‌ संकतों के रूप में होता है। इस उपकरण का विशेष उपयोग जनता के मनोरंजन तथा शिक्षा के लिए होता है। चित्र को वैद्युत संकेत में परिवर्तित करने के लिए विशेष प्रकार की प्रकाश नली (जैसे इमेज ऑर्थीकॉन तथा विडीकॉन) का प्रयोग किया जाता है। संग्राही केंद्र पर विद्युत्‌ संकेतों को फिर से संचारित चित्र में बदलने के लिए एक अन्य प्रकार की नली ''काइनॉस्कोप'' का प्रयोग किया जाता है।

(4) राडार- सन्‌ 1922 में टेलर ने यह देखा कि यदि कोई जहाज रेडियो तरंग के पथ में आ जाता है तो ऊर्जा का कुछ अंश परावर्तित होकर रेडियो प्रेषी पर लौट आता है। आधुनिक युग में इस प्रेक्षण का उपयोग राडार के रूप में होता है। किसी वायुयान, पनडुब्बी (सबमैरीन) तथा जलयान की स्थिति का पता लगाने तथा इनके नौतरण में राडार बहुत अधिक सहायता करता है। राडार में एक प्रेषी अत्यंत शक्तिशाली तथा अल्पकालिक स्पंदों को संचारित करता है। किसी पदार्थ से परावर्तित होकर ऊर्जा का कुछ अंश प्रेषी पर वापस आ जाता है। इस प्रतिध्वनि के वापस आने तक के समय के अंतर को नापकर परावर्तन की दूरी का ज्ञान हो सकता है। अनुदिक एरियल का प्रयोग करके परावर्तक की दिशा का भी ज्ञान हो सकता है ।

(ग) उद्योग में इलेक्ट्रॉनिकी- द्र. 'उद्योग में इलेक्ट्रॉनिकी'।
(5) माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी- इलेक्ट्रॉनिकी की एक विशिष्ट शाखा का नाम माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी है। माइक्रो का अर्थ है सूक्ष्म अर्थात्‌ छोटा और इलेक्ट्रॉनिकी अर्थात्‌ विज्ञान की वह शाखा जिसमें इलेक्ट्रॉनों के आचरण का और उनकी नियंत्रित गति का उपयोग करनेवाली युक्तियों का तथा उनके उपयोग का अध्ययन किया जाता है।

आधुनिक विज्ञान और तकनीकी द्वारा उत्पन्न माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी ने एक नए विश्व का दर्शन कराया है। यह नया विश्व अतिसूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों का विश्व है। जिन तारों से उन्हें अन्य पुर्जों के साथ जोड़ा जाता है वे अत्यंत सूक्ष्म होते हैं-मनुष्य के बाल से भी दो या तीन गुना महीन। यह टेलीविजन, संचार, रेडियो और कितने ही घरेलू तथा औद्योगिक उपयोग के क्षेत्रों में मनुष्य के आगे अप्रत्याशित संभावनाओं के द्वार खोल देती है।

पिछले कुछ वर्षों में संसार में अनेकानेक आश्चर्यजनक वस्तुओं का आविष्कार हुआ है। इस नए विज्ञान के द्वारा तकनीकी, उद्योग, कृषि तथा चिकित्सा विज्ञान में प्रेरणादयक तथा बृहत्‌ क्षेत्रों के द्वार खुल गए हैं। माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी की तकनीक की उपयोगिता अंतरिक्ष यात्रा में बेमिसाल साबित हुई है क्योंकि अंतरिक्ष यानों के जटिल यंत्र माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी की ही तकनीकियों पर निर्मित हैं। बहरों के लिए छोटे-छोटे इयर फोन की उपलब्धि इसी विज्ञान के कारण हुई है। छोटे और पोर्टेबल टेलिविजन सेट माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी की तकनीकियों के उपयोग से ही बन सके हैं और टेलीफोन नंबर के व्यस्त होने पर स्वत: बार-बार डायल करनेवाले टेलीफोन भी बन गए हैं।

माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी किसी भी देश के विज्ञान और तकनीकी की क्षमता को आँकने की एक कसौटी है। इस क्षेत्र में प्रगति तभी संभव है जब देश की प्राविधिक क्षमता और वैज्ञानिक स्तर काफी उँचे हों। सोवियत रूस ने माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी के क्षेत्र में सराहनीय उन्नति की है। माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी के एकीकृत परिपथ से बृहदाकार यंत्रों का आकार सौ गुना से भी ज्यादा कम हो गया है।

एकीकृत परिपथ भी एक प्रकार का लघु परिपथ होता है। इसका वास्तविक आकार 1.61.6 मिलीमीटर होता है। यह उन्हीं पुर्जो के तानों बानों से जुड़ा हुआ रेडियो का परिपथ है जिन्हें आप किसी भी रेडियो या ट्रांजिस्टर को खोलकर देख सकते हैं। अंतर केवल इतना ही है कि ये पुर्जे अत्यंत छोटे रूप में हैं, और इतने छोटे हैं कि इन सबको एक में सटा दिया जाए तो वे राई के दाने के बराबर हो जाएँगे। फिर भी इसमें पुरजों की संख्या 47 है। अतएव ऐसे पुरजों के दो या तीन सम्मिश्रण एक टेलीविजन अथवा रेडियो सेट के लिए पर्याप्त होंगे।

माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी के इतने छोटे-छोटे पुरजों को बनाने के लिए बड़ी जटिल युक्तियों और तरीकों को उपयोग में लाया जाता है। इतने छोटे परिपथ में पतले तारों को जोड़ना भी एक समस्या है पर लेसर बीम तथा इलेक्ट्रॉन बीम के द्वारा अब यह संभव हो गया है।

माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी की युक्तियों के आविष्कार से इलेकट्रॉनिक उपकरणों का वजन तथा आकार घटकर इतना छोटा हो गया है कि उन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता भी पड़ने लगी है।

माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी के उपयोग का एक प्रमुख क्षेत्र अभिकलित्र प्रविविधियों में है। सोवियत संघ में ऐसे एकीकृत परिपथों का निर्माण किया गया है कि जिनके मुख्य अवयव सूक्ष्म लेसर है। लेसर सोवियत संघ एवं अमरीका द्वारा निर्मित की गई नई युक्तियाँ हैं, जो प्रकाश की सुई जैसी महीन किरणावली का उत्सर्जन करती हैं। लेसर बीम (लेसर किरणावली) द्वारा परिकलयनयंत्र (कैलक्युलेटर) की गति को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। हमारे देश में भी, विशेषत: भाभा परमाणु अनसंधान केंद्र, ट्रांबे में, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिकी की तकनीक पर तेजी से कार्य हो रहा है एवं निकट भविष्य में ही हम इस तकनीक से लाभान्वित हो सकेंगे, ऐसा लोगों का विश्वास है।

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