इस प्यास को हमने ही बुलाया है

Submitted by RuralWater on Mon, 10/12/2015 - 12:44
दिल्ली के भूजल के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक बना नजफगढ़ नाला कभी जयपुर के जीतगढ़ से निकलकर अलवर, कोटपुतली, रेवाड़ी व रोहतक होते हुए नजफगढ़ झील व वहाँ से दिल्ली में यमुना से मिलने वाली साहिबी या रोहिणी नदी हुआ करती थी। इस नदी के जरिए नजफगढ़ झील का अतिरिक्त पानी यमुना में मिल जाया करता था। सन् 1912 के आसपास दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में बाढ़ आई व अंग्रेजी हुक़ूमत ने नजफगढ़ नाले को गहरा कर उससे पानी निकासी की जुगाड़ की। प्यास से कराह रही दिल्ली व उससे सटे गुडगाँव के लेाग शायद जानते ही नहीं है कि उनके पैरों के नीचे की जमीन असल में उस विशालतम झील की है, जो करोड़ो लोगों की प्यास व हजारों एकड़ खेत सींचने बाद भी लबालब भरी रहने के लिये प्रकृति से आशीर्वाद प्राप्त थी। हमने ज़मीन को सुखाया, उस पर आशियानें बसा लिये लेकिन भूल गए कि जीवन के लिये जरूरी जल के जरिए को तो हम जीम (हड़प) चुके हैं।

दिल्ली का द्वारिका इलाका हो या गुड़गाँव की दमकती सोसाईटियाँ, या फिर नजफगढ़ इलाके में तेजी से बस रहीं अनगिनत कालोनियाँ, भले ही लोगों के लिये सिर ढँकने की छत और अपने सपने का घर हो, लेकिन हकीक़त तो यह है कि किसी भी पर्यावास के लिये अत्यावश्यक पानी यहाँ बेशकीमती भी है। पानी के संकट का विस्तार वसन्त कुंज और उत्तम नगर, जनकपुरी तक भी है।

गौरतलब है कि ये सभी इलाके थोड़ी सी बारिश में पानी से लबालब सड़कों के लिये भी परेशान रहता है। देश की राजधानी के बड़े इलाके में यह बाढ़ अैर सुखाड़ को समाज ने ही बुलाया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यमुना नदी के बाद सबसे बड़े जल क्षेत्र को हमने कुछ ही दशकों में सुखा दिया और उस पर सीमेंट के जंगल रोप दिये, फिर जो लेाग बसे उनके घर व रोज़गार के ठिकानों से निकला गन्दा पानी भी इसमें ही जुड़ता गया।

अब सरकार खुद कहती है कि वह झील या ‘वाटर बॉडी’ थोड़े ही है, वह तो महज बारिश आने पर जमा पानी का गड्ढा है। यह दर्दनाक कथा है कभी दिल्ली ही नहीं देश की सबसे बड़ी झील, जलक्षेत्र और वेटलैंड की। नजफगढ़ झील को कब्जा कर सिकोड़ते हुए दिल्ली का विस्तार करने वाले यह भूल चुके थे कि यहाँ बसने वाली आबादी के कंठ तर करने का रास्ता तो वे खुद ही बन्द कर रहे हैं।

दिल्ली-गुड़गाँव अरावली पर्वतमाला के तले है और अभी सौ साल पहले तक इस पर्वतमाला पर गिरने वाली हर एक बूँद ‘डाबर’ में जमा होती थी। ‘डाबर यानि उत्तरी-पश्चिम दिल्ली का वह निचला इलाक़ा जो कि पहाड़ों से घिरा था। इसमें कई अन्य झीलों व नदियों का पानी आकर भी जुड़ता था।

इस झील का विस्तार एक हजार वर्ग किलोमीटर हुआ करता था जो आज गुडगाँव के सेक्टर 107, 108 से लेकर दिल्ली के नए हवाई अड्डे के पास पप्पनकलां तक था। इसमें कई प्राकृतिक नहरें व सरिता थीं, जो दिल्ली की ज़मीन, आबोहवा और गले को तर रखती थीं।

हरियाणा के झज्जर की सीमा से पाँच मील तक नजफगढ़ झील होती थी जो और आठ मील बुपनिया और बहादुरगढ़ तक फैल जाया करती थी। सांपला को तो यह झील अक्सर डुबोये रखती थी, 15 से 30 फुट तक गहरा पानी इस झील में भर जाया करता था। उधर झज्जर के पश्चिम में जहाजगढ़, तलाव, बेरी, ढ़राणा, मसूदपुर तक के पानी का बहाव भी झज्जर की ओर ही होता था।

आज दिल्ली के भूजल के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक बना नजफगढ़ नाला कभी जयपुर के जीतगढ़ से निकलकर अलवर, कोटपुतली, रेवाड़ी व रोहतक होते हुए नजफगढ़ झील व वहाँ से दिल्ली में यमुना से मिलने वाली साहिबी या रोहिणी नदी हुआ करती थी। इस नदी के जरिए नजफगढ़ झील का अतिरिक्त पानी यमुना में मिल जाया करता था।

सन् 1912 के आसपास दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में बाढ़ आई व अंग्रेजी हुक़ूमत ने नजफगढ़ नाले को गहरा कर उससे पानी निकासी की जुगाड़ की। उस दौर में इसे नाला नहीं बल्कि ‘नजफगढ़ लेक एस्केप’ कहा करते थे। इसके साथ ही नजफगढ़ झील के नाबदान और प्राकृतिक नहर के नाले में बदलने की दुखद कथा शुरू हो गई। सन् 2005 में ही केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नजफगढ़ नाले को देश के सबसे ज्यादा दूषित 12 वेटलैंड में से एक निरूपित किया था।

पहले तो नहर के जरिए तेजी से झील खाली होने के बाद निकली जमीन पर लोगों ने खेती करना शुरू की फिर जैसे-जैसे नई दिल्ली का विकास होता गया, खेत की जमीन मकानों के दरिया में बदल गई। इधर आबाद होने वाली कालेानियों व कारखानों का गन्दा पानी नजफगढ़ नाले में मिलने लगा और यह जाकर यमुना में जहर घोलने लगा।

झील को घेर कर बनाए गए उपनगरों में जब पानी की कमी हुई तो धरती का सीना चीर कर पाली उलीछा गया। आखिर उसकी भी सीमा थी, आज नजफगढ़ व गुड़गाँव में ना केवल भूजल पाताल में पहुँच गया है, बल्कि नजफगढ़ नाले का जहर उस पान में लगातार जज्ब हो रहा है।

प्रकृति के साथ लगातार की जा रही छेड़छाड़ का दुष्परिणाम महज इंसानों ने अपनी प्यास बढ़ाकर ही नहीं चुकाया, इस वेटलैंड में सदियों से बसने वाले कई जानवर, पक्षी और वनस्पति भी इसके शिकार हुए। यह तो सब जानते ही हैं कि जंगल या जल तब तक ही सुरक्षित रहता है जब तक उसमें रहने वाले जीव-जन्तुओं की संख्या सन्तुलन के साथ सुरक्षित रहे।

यही नहीं थोड़ी-सी बारिश में ही निचले इलाके में झील को घेर कर बनी कॉलोनियों में पानी भर जाता है। इससे भी कहीं आगे, नजफगढ़ नाले में पानी बढ़ने और दूसरी ओर यमुना में उफान के हालात में गुड़गाँव के फारूखनगर, दौलताबाद में यमुना के ‘बैक वाटर’ से बाढ़ के हालात बन जाते हैं।

आज भी सामान्य बारिश की हालत में नजफगढ़ झील में 52 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में पानी भरता है। द्वारिका, छावला आदि इलाकों में पर्याप्त दलदली जमीन है जहाँ ग्रेटर फ्लेमिंगो, गडवाल, रफ, कूट, शावलर जैसे दुर्लभ प्रवासी पक्षी पर्याप्त संख्या में आते हैं। यानि यदि अभी भी सम्भल जाएँ तो प्रकृति, पानी और प्यास को काफी कुछ बचाया जा सकता है।

कभी इस झील के रखरखाव के लिये सरकार द्वारा प्राधिकृत इंडियन नेशनल ट्रस्ट फार आर्ट, कल्चर एंड हेरीटेज (इनटेक) हाल ही में इस झील पर आवासीय प्रोजेक्ट स्वीकृत करने के खिलाफ एनजीटी यानि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण गया तो हरियाणा सरकार ने अपने हलफनामें में कहा कि नजफगढ़ झील नहीं है बल्कि बारिश के अतिरिक्त जल के जमा होने का निचला हिस्सा मात्र है। इस पर न्यायाधीश ने सरकार से ही पूछ लिया कि यदि यह झील नहीं है तो आखिर झील किसे कहेंगे।

नजफगढ़ झील और नाले की दुर्गति बानगी है कि हम किस तरह अपने पारम्परिक जल स्रोतों को खुद नष्ट करते हैं और फिर सरकार, येाजनाकार और ना जाने किस-किस को दोष देते हैं। आम नागरिक को अब मकान लेने से पहले यह भी सोचना होगा कि वह जहाँ बसने जा रहा है वह किसी जल-निधि की समाधि पर तो नहीं है, वरना वहाँ जल संकट तो होगा ही, जल भराव का खतरा भी होगा और भूकम्प के हालात में ऐसी जमीनों पर हुए निर्माण सबसे ज्यादा आपदाग्रस्त होते हैं।

यदि आम लोग इस बारे में सोचने लगेंगे तो पानी की ज़मीन पर कब्जे की प्रवृत्ति स्वतः ही कम होगी। इस विशाल प्राकृतिक जल ग्रहण क्षेत्र को बचाने का सबसे बड़ा फायदा होगा कि यमुना का दिल्ली में प्रदूषण 20 फीसदी तक स्वतः ही कम हो जाएगा।

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