इटली

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इटली यूरोप के दक्षिणवर्ती तीन बड़े प्रायद्वीपों में बीच का प्रायद्वीप है जो भूमध्यसागर के मध्य में स्थित है। प्रायद्वीप के पश्चिम, दक्षिण तथा पूर्व में क्रमश: तिरहेनियन, आयोनियन तथा ऐड्रियाटिक सागर हैं और उत्तर में आल्प्स पहाड़ की श्रैणियाँ फैली हुई हैं। इटली ४७७उ. से ३६३८उ.अ. एवं ६३७पू. से १८३२ पू.दे. के बीच स्थित है। सिसली, सार्डीनिया तथा कॉर्सिका (जो फ्रांस के अधिकार में हैं), ये तीन बड़े द्वीप तथा लिग्यूरियन सागर में स्थित अन्य टापुओं के समुदाय वस्तुत: इटली से संबद्ध हैं। प्रायद्वीप का आकार एक बड़े बूट (जूते) के समान है जो उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व को चौड़ाई ८० मील से १५० मील तक है। सुदूर दक्षिण में चौड़ाई ३५ मील से २० मील तक है।

प्राकृतिक दशाइटली पर्वतीय देश है जिसके उत्तर में आल्प्स पहाड़ तथा मध्य में रीढ़ की भाँति अपेनाइन पर्वत की श्रृंखलाएँ फैली हुई हैं (द्र. अपेनाइंस)। अपेनाइन पहाड़ जेलोआ तथा नीस नगरों के मध्य से प्रारंभ होकर दक्षिण पूर्व दिशा में एड्रियाटिक समुद्रतट तक चला गया है और मध्य तथा दक्षिणी इटली में रीढ़ की भाँति दक्षिण की तरफ फैला हुआ है।

प्राकृतिक भूरचना की दृष्टि से इटली निम्नलिखित चार भागों में बाँटा जा सकता है :

(१) आल्प्‌स की दक्षिणी ढाल, जो इटली के उत्तर में स्थित है।
(२) पो तथा वेनिस का मैदान, जो पो आदि नदियों की लाई हुई मिट्टी से बना है।
(३) इटली प्रायद्वीप का दक्षिणी भाग, जिसमें सिसली भी सम्मिलित है। इस संपूर्ण भाग में अपेनाइन पर्वतश्रेणी अतिप्रमुख हैं।
(४) सार्डीनिया, कॉर्सिका तथा अन्य द्वीपसमूह।

किंतु वनस्पति, जलवायु तथा प्राकृतिक दृष्टि से यह प्रायद्वीप तीन भागों में बाँटा जा सकता है-१. उत्तरी इटली, २. मध्य इटली तथा ३. दक्षिणी इटली।

उत्तरी इटलीयह इटली का सबसे घना बसा हुआ मैदानी भाग है जो तुरीय काल में समुद्र था, बाद में नदियों की लाई हुई मिट्टी से बना। यह मैदान देश की १७ प्रतिशत भूमि घेरे हुए है जिसमें चावल, शहतूत तथा पशुओं के लिए चारा बहुतायत से पैदा होता है। उत्तर में आल्प्स पहाड़ की ढाल तथा पहाड़ियाँ हैं जिनपर चरागाह, जंगल तथा सीढ़ीनुमा खेत हैं। पर्वतीय भाग की प्राकृतिक शोभा कुछ झीलों तथा नदियों से बहुत बढ़ गई है। उत्तरी इटली का भौगोलिक वर्णन पो नदी के माध्यम ये ही किया जा सकता है। पो नदी एक पहाड़ी सोते के रूप में माउंट वीज़ो पहाड़ (ऊँचाई ६,००० फुट) से निकलकर २० मील बहने के बाद सैलुजा के मैदान में प्रवेश करती है। सोसिया नदी के संगम से ३३७ मील तक इस नदी में नौपरिवहन होता है। समुद्र में गिरने के पहले नदी दो शाखाओं (पो डोल मेस्ट्रा तथा पो डि गोरो) में विभक्त हो जाती है। पो के मुहाने पर २० मील चौड़ा डेल्टा है। नदी की कुल लंबाई ४२० मील है तथा यह २९,००० वर्ग मील भूमि के जल की निकासी करती है। आल्प्स पहाड़ तथा अपेनाइंस से निकलनेवाली पो की मुख्य सहायक नदियाँ क्रमानुसार टिसिनो, अद्दा, ओगलियो और मिन्सिओ तथा टेनारो, टेविया, टारो, सेचिया और पनारो हैं। टाइबर (२४४ मील) तथा एड्रिज (२२० मील) इटली की दूसरी तथा तीसरी सबसे बड़ी नदियाँ हैं। ये प्रारंभ में सँकरी तथा पहाड़ी हैं किंतु मैदानी भाग में इनका विस्तार बढ़ जाता है और बाढ़ आती है। ये सभी नदियाँ सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन की दृष्टि से परम उपयोगी हैं, किंतु यातायात के लिए अनुपयुक्त। आल्प्स,अपेनाइंस तथा एड्रियाटिक सागर के मध्य में स्थित एक सँकरा समुद्रतटीय मैदान है। उत्तरी भाग में पर्वतीय ढालों पर मूल्यवान फल, जैसे जैतून, अंगूर तथा नारंगी बहुत पैदा होती है। उपजाऊ घाटी तथा मैदानों में घनी बस्ती है। इनमें अनेक गाँव तथा शहर बसे हुए हैं। अधिक ऊँचाइयों पर जंगल हैं।

मध्य इटलीमध्य इटली के बीच में अपनाइंस पहाड़ उत्तर-उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की दिशा में एड्रियाटिक समुद्रतट के समांतर फैला हुआ है। अपेनाइंस का सबसे ऊँचा भाग ग्रैनसासोडी इटैलिया (९,५६० फुट) इसी भाग में है। यहाँ पर्वतश्रेणियों का जाल बिछा हुआ है, जिनमें अधिकांश नवंबर से मई तक बर्फ से ढकी रहती हैं। यहाँ पर कुछ विस्तृत, बहुत सुंदर तथा उपजाऊ घाटियाँ हैं, जैसे एटरनो की घाटी (२,३८० फुट)। मध्य इटली की प्राकृतिक रचना के कारण यहाँ एक ओर अधिक ठंढा, उच्च पर्वतीय भाग है तथा दूसरी ओर गर्म तथा शीतोष्ण जलवायुवाली ढाल तथा घाटियाँ हैं। पश्चिमी ढाल एक पहाड़ी ऊबड़ खाबड़ भाग है। दक्षिण में टस्कनी तथा टाइबर के बीच का भाग ज्वालामुखी पहाड़ों की देन है, अत: यहाँ शंक्वाकार पहाड़ियाँ तथा झीलें हैं। इस पर्वतीय भाग तथा समुद्र के बीच में काली मिट्टीवाला एक उपजाऊ मैदानी भाग है जिसे कांपान्या कहते हैं। मध्य इटली के पूर्वी तट की तरफ श्रेणियाँ समुद्र के बहुत निकट तक फैली हुई हैं, अत: एड्रियाटिक सागर में गिरनेवाली नदियों का महत्व बहुत कम है। यह विषम भाग फलों के उद्यानों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। यहाँ जैतून तथा अंगूर की खेती होती है। यहाँ बड़े शहरों तथा बड़े गाँवों का अभाव है; अधिकांश लोग छोटे छोटे कस्बों तथा गाँवों में रहते हैं। खनिज संपत्ति के अभाव के कारण यह भाग औद्योगिक विकास की दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। फुसिनस, ट्रेसिमेनो तथा चिडसी यहाँ की प्रसिद्ध झीलें हैं। पश्चिमी भाग की झीलें ज्वालामुखी पहाड़ों की देन हैं।

दक्षिणी इटली : यह संपूर्ण भाग पहाड़ी है जिसके बीच में अपेनाइंस रीढ़ की भाँति फैला हुआ है तथा दोनों ओर नीची पहाड़ियाँ हैं। इस भाग की औसत चौड़ाई ५० मील से लेकर ६० मील तक है। पश्चिमी तट पर एक सँकरा 'तेरा डी लेवोरो' नाम का तथा पूर्व में आपूलिया का चौड़ा मैदान है। इन दो मैदानों के अतिरिक्त सारा भाग पहाड़ी है और अपेनाइंस की ऊँची नीची श्रंखलाओं से ढका हुआ है। पोटेंजा की पहाड़ी दक्षिणी इटली की अंतिम सबसे ऊँची पहाड़ी (पोलिनो की पहाड़ी) से मिलती है। सुदूर दक्षिण में ग्रेनाइट तथा चूने के पत्थर की, जंगलों से ढकी हुई पहाड़ियाँ तट तक चली गई हैं। लीरी तथा गेटा आदि एड्रियाटिक सागर में गिरनेवाली नदियाँ पश्चिमी ढाल पर बहनेवाली नदियों से अधिक लंबी हैं। ड्रिनगो से दक्षिण की ओर गिरनेवाली विफरनो, फोरटोरे, सेरवारो, आंटों तथा ब्रैडानो मुख्य नदियाँ हैं। दक्षिणी इटली में पहाड़ों के बीच स्थित लैगोडेल-मोटेसी झील है।

इटली के समीप स्थित सिसली, सार्डीनिया तथा कॉर्सिका के अतिरिक्त एल्वा, कैप्रिया, गारगोना, पायनोसा, मांटीक्रिस्टो, जिग्लिको आदि मुख्य मुख्य द्वीप हैं। इन द्वीपों में इस्चिया, प्रोसिदा तथा पोंजा, जो नेपुल्स की खाड़ी के पास हैं, ज्वालामुखी पहाड़ों की देन हैं। एड्रियाटिक तट पर केवल ड्रिमिटी द्वीप है।

जलवायु तथा वनस्पति : देश की प्राकृतिक रचना, अक्षांशीय विस्तार (१०२९) तथा भूमध्यसागरीय स्थिति ही जलवायु की प्रधान नियामक है। तीन ओर समुद्र तथा उत्तर में उच्च आल्प्स से घिरे होने के कारण यहाँ की जलवायु की विविधता पर्याप्त बढ़ जाती है। यूरोप के सबसे अधिक गर्म देश इटली में जाड़े में अपेक्षाकृत अधिक गर्मी तथा गर्मी में साधारण गर्मी पड़ती है। यह प्रभाव समुद्र से दूरी बढ़ने पर घटता है। आल्प्स के कारण यहाँ उत्तरी ठंढी हवाओं का प्रभाव नहीं पड़ता है। किंतु पूर्वी भाग में ठंढी तथा तेज बोरा नामक हवाएँ चला करती हैं। अपेनाइंस पहाड़ के कारण अंध महासागर से आनेवाली हवाओं का प्रभाव तिर हीनियन समुद्रतट तक ही सीमित रहता है।

उत्तरी तथा दक्षिणी इटली के ताप में पर्याप्त अंतर पाया जाता है। ताप का उतार चढ़ाव ५२फा. से ६६फा. तक होता है। दिसंबर तथा जनवरी सबसे अधिक ठंढे तथा जुलाई और अगस्त सबसे अधिक गर्म महीने हैं। पो नदी के मैदन का औसत ताप ५५फा. तथा ५०० मील दूर स्थित सिसली का औसत ताप ६४फा. है। उत्तर के आल्प्स के पहाड़ी क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा ८०होती है। अपेनाइंस के ऊँचे पश्चिमी भाग में भी पर्याप्त वर्षा होती है। पूर्वी लोंबार्डी के दक्षिण पश्चिमी भाग में वार्षिक वर्षा २४होती है, किंतु उत्तरी भाग में उसका औसत ५०होता है तथा गर्मी शुष्क रहती है। आल्प्स के मध्यवर्ती भाग में गर्मी में वर्षा होती है तथा जाड़े में बर्फ गिरती है। पो नदी की द्रोणी में गर्मी में अधिक वर्षा होती है। स्थानीय कारणों के अतिरिक्त इटली की जलवायु भूमध्यसागरीय है जहाँ जाड़े में वर्षा होती है तथा गर्मी शुष्क रहती है।

जलवायु की विषमता के कारण यहाँ की बनस्पतियाँ भी एक सी नहीं हैं। मनुष्य के सतत प्रयत्नों से प्राकृतिक वनस्पतियाँ केवल उच्च पहाड़ों पर ही देखने को मिलती हैं। जहाँ नुकीली पत्तीवाले जंगल पाए जाते हैं। इनमें सरो, देवदारु, चीड़ तथा फर के वृक्ष मुख्य हैं। उत्तर के पर्वतीय ठंढे भागों में अधिक ठंडक सहन करनेवाले पौधे पाए जाते हैं। तटीय तथा अन्य निचले मैदानों में जैतून, नारंगी, नीबू आदि फलों के उद्यान लगे हुए हैं। मध्य इटली में अपेनाइंस पर्वत की ऊँची श्रेणियों को छोड़कर प्राकृतिक वनस्पति अन्यत्र नहीं है। यहाँ जैतून तथा अंगूर की खेती होती है। दक्षिणी इटली में तिरहीनियन तटपर जैतून, नारंगी, नीबू, शहतूत, अंजीर आदि फलों के उद्यान हैं। इस भाग में कंदों से उगाए जानेवाले फूल भी होते हैं। यहाँ ऊँचाई पर तथा सदाबहार जंगल पाए जाते हैं। अत: यह स्पष्ट है कि पूरे इटली को आधुनिक किसानों ने फलों, तरकारियों तथा अन्य फसलों से भर दिया है, केवल पहाड़ों पर ही जंगली पेड़ तथा झाड़ियाँ पाई जाती हैं।

जनसंख्या : पूर्व ऐतिहासिक काल में यहाँ की जनसंख्या बहुत कम थी। जनवृद्धि का अनुपात द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले पर्याप्त ऊँचा था (१९३१ ई. में वार्षिक वृद्धि ०.८७ प्रति शत थी), किंतु अब यह दर घट रही है। १९६१ ई. में यहाँ की जनसंख्या ५,०६,२३,५६९ थी।

पर्वतीय भूमि तथा सीमित औद्योगिक विकास के कारण जनसंख्या का घनत्व अन्य यूरोपिय देशों की अपेक्षा बहुत कम है। अधिकांश लोग गाँवों में रहते हैं। देश में ५०,००० से ऊपर जनसंख्यावाले नगरों की संख्या ७० है। यहाँ अधिकांश लोग रोमन कैथोलिक धर्म माननेवाले हैं। १९३१ ई. की जनगणना के अनुसार ९९.६ प्रतिशत लोग कैथोलिक थे, ०.३४ प्रतिशत लोग दूसरे धर्म के थे तथा .०६ प्रतिशत ऐसे लोग थे जिनका कोई विशेष धर्म नहीं था। शिक्षा तथा कला की दृष्टि से इटली प्रचीन काल से अग्रणी रहा है। रोम की सभ्यता तथा कला इतिहासकाल में अपनी चरम सीमा तक पहुँच गई थी (द्र. 'रोम')। यहाँ के कलाकार और चित्रकार विश्वविख्यात थे। आज भी यहाँ शिक्षा का स्तर बहुत ऊँचा है। निरक्षरता नाम मात्र की भी नहीं है। देश में ७० दैनिक पत्र प्रकाशित होते हैं। छविगृहों की संख्या लगभग ९,७७० है (१९६९ ई.)।

खनिज तथा उद्योग धंधेइटली में खनिज पदार्थ अपर्याप्त हैं, केवल पारा ही यहाँ से निर्यात किया जाता है। यहाँ सिसली (काल्टानिसेटा), टस्कनी (अरेंजो, फ्लोरेंस तथा ग्रासेटो), सार्डीनिया (कैगलिआरी, ससारी तथा इंग्लेसियास) एवं पिडमांट क्षेत्रों में ही खनिज तथा औद्योगिक विकास भली भाँति हुआ है। १९६९ ई. में कोयला २२,३५,८९५ मीट्रिक टन, खनिज तैल १५,१९,९१४ मी. टन, खनिज लौह १४,७४,६८८ मी. टन, मैंगनीज ५२,९६६ मी. टन ; राँगा ६०,६२६ मी. टन और जस्ता २,९४,२२१ मी. टन उत्पन्न हुआ था।

देश का प्रमुख उद्योग कपड़ा बनाने का है। यहाँ १९६९ ई. में सूती कपड़े बनाने के ९४५ कारखाने थे। रेशम का व्यवसाय पूरे इटली में होता है, किंतु लोंबार्डी, पिडमांट तथा वेनेशिया मुख्य सिल्क उत्पादक क्षेत्र हैं। १९६९ में गृहउद्योग को छोड़कर रेशमी कपड़े बनाने के २४ तथा ऊनी कपड़े बनाने के ३४८ कारखाने थे। रासायनिक वस्तु बनाने के तथा चीनी बनाने के भी पर्याप्त कारखाने हैं। देश में मोटर, मोटर साइकिल तथा साइकिल बनाने का बहुत बड़ा उद्योग है। १९६९ ई. में १५,९५,९५१ मोटरें बनाई गई थीं जिनमें से ६,३०,०७६ मोटरें निर्यात की गई थीं। अन्य मशीनें तथा औजार बनाने के भी बहुत से कारखाने हैं। जलविद्युत्‌ पैदा करने का बहुत बड़ा धंधा यहाँ होता है। यहाँ १५,८८,०३१ कारखाने हैं, जिनमें ६८,००,६७३ व्यक्ति काम करते हैं। इटली का व्यापारिक संबंध यूरोप के सभी देशों से तथा अर्जेंटीना, संयुक्त राज्य (अमरीका)एवं कैनाडा से है। मुख्य आयात की वस्तुएँ कपास, ऊन, कोयला और रासायनिक पदार्थ हैं तथा निर्यात की वस्तुएँ फल, सूत, कपड़े, मशीनें, मोटर, मोटरसाइकिल एवं रासायनिक पदार्थ हैं। इटली का आयात निर्यात से अधिक होता है।

नगर : संपूर्ण देश १९ क्षेत्रों तथा ९२ प्रांतों में बँटा हुआ है। १९वीं शताब्दी के मध्य से नगरों की संख्या काफी बढ़ी है। अत: प्रांतीय राजधानियों का महत्व बढ़ा तथा लोगों का झुकाव नगरों की तरफ हुआ। देश में एक लाख के ऊपर जनसंख्या के कुल २६ नगर हैं। सन्‌ १९६९ में ५,००,००० से अधिक जनसंख्या के नगर रोम (इटली की राजधानी, जनसंख्या २७,३१,३९७), मिलान (१७,०१,६१२), नेपुल्स (१२,७६,८५४), तूरिन (११,७७,०३९) तथा जेनेवा (८,४१,८४१) हैं।

इटली यूनान के बाद यूरोप का दूसरा का दूसरा प्राचीनतम राष्ट्र है। रोम की सभ्यता तथा इटली का इतिहास देश के प्राचीन वैभव तथा विकास का प्रतीक है। आधुनिक इटली १८६१ ई. में राज्य के रूप में गठित हुआ था। देश की धीमी प्रगति, सामाजिक संगठन तथा राजनितिक उथल-पुथल इटली के २,५०० वर्ष के इतिहास से संबद्ध है। देश में पूर्वकाल में राजतंत्र था जिसका अंतिम राजघराना सेवाय था। जून, सन्‌ १९४६ से देश एक जनतांत्रिक राज्य में परिवर्तित हो गया।

इतालवी साहित्य


इटली में मध्ययुग में जिस सयम मोंतेकास्सीनो जैसे केंद्रों में लातीनी में अलंकृत शैली में पत्र लिखने, अलंकृत गद्य लिखने (आर्तेस दिक्तांदी, अर्थात्‌ रचनाकला) की शिक्षा दी जा रही थी उस समय विशेष रूप से फ्रांस में तथा इटली में भी नवीन भाषा में कविता की रचना होने लगी थी। अलंकृत लययुक्त मध्ययुगीन लातीनी का प्रयोग धार्मिक क्षेत्र तथा राजदरबारों तक ही सीमित था, किंतु रोमांस बोलियों में रचित कविता लोक में प्रचलित थी। चार्ल्स मान्य तथा आर्थर की वीरगाथाओं को लेकर फ्रांस दक्षिणी भाग (प्रोवेंसाल) में १२वीं सदी में प्रोवेंसाल बोली में पर्याप्त काव्यरचना हो चुकी थी। प्रोवेंसाल बोली में रचना करनेवाले दरबारी कवि (त्रोवातोरी) एक स्थान से दूसरे स्थान पर आश्रयदाताओं की खोज में घूमा करते थे और दरबारों में अन्य राजाओं का यश, यात्रा के अनुभव, युद्धों के वर्णन, प्रेम की कथाएँ आदि नाना विषयों पर कविताएँ रचकर यश, धन एवं सम्मान की आशा में राजा रईसों के यहाँ उन्हें सुनाया करते थे। इतालवी राजदरबार से संबंध रखनेवाला पहला दरबारी कवि (त्रोवातोरे) रामवाल्दो दे वाकेइरास कहा जा सकता है जो प्रावेंसा (फ्रांस) से आया था। इस प्रकार के कवियों के समान उसकी कविता में भी प्रेम, हर्ष, वसंत तथा हरे भरे खेतों और मैदानों का चित्रण है तथा भाषा मिश्रित है। सावोइया, मोंफेर्रातो, मालास्पीना, एस्ते और रावेन्ना के रईसों के दरबारों में ऐसे कवियों ने आकर आश्रय ग्रहण किया था। इटली के कवियों ने भी प्रावेंसाल शैली में इस प्रकार की काव्यरचना की। सोरदेल्लो दी गोइतो (मूत्यु १२७० ई.), लफ्राोंको क्वीगाला, पेरचेवाल दोरिया जैसे अनेक इतालवी त्रोवातोरी कवि हुए। दी गोइतो का तो दांते ने भी स्मरण किया है। इतालवी काव्य का आरंभिक रूप त्रोवातोरी कवियों की रचनाओं में मिलता है।

धार्मिक, नैतिक तथा हास्यप्रधान लोकगीतइतालवी साहित्य के प्राचीनतम उदाहरण पद्यबद्ध ही मिलते हैं। १२वीं १३वीं सदी की धार्मिक पद्यबद्ध रचनाएँ तत्कालीन लोकरुचि की परिचायक हैं। धार्मिक आंदोलनों में आसीसी के संत फ्रांचेस्को (११८२-१२२६) के व्यक्तित्व ने जनसामान्य के हृदय का स्पर्श किया था। ऊंब्रिया की बोली में रचित उनका सरल भावुकतापूर्ण गीत इल-कांतीको दी फ्राते सोले (सूर्य का गीत) तथा उनके अनुयायी ज्याकोमीको दा वेरोना की पद्यरचना दे जेरूसलेम चेलेस्ती (स्वर्गीय जेरूसलेम) तथा १३वीं सदी में रचित लाउदे (धार्मिक नाटकीय संवाद) इन सबमें लोकरुचि की धार्मिक भावना से युक्त कविता का स्वरूप मिलता है। उत्तरी इटली के ऊगोच्योने दा लोदी की धार्मिक नैतिक कृति ल्व्राो (पुस्तक), गेरारदो पेतेग का सुभाषित संग्रह (नोइए), वोनवेसीन देल्ला रोवा (मृत्यु १३१३ ई. के लगभग) का नैतिक पद्यसंग्रह क्रोंत्रास्ती (विषमताएँ), त्रात्तातो देई मेसी (महीनों का परिचय-बारहमासा जैसा), ल्व्री देल्ले त्रे स्क्रीतूरे (तीन लेखों की पुस्तक) प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। इतालवी साहित्य को लययक्त पद्य इसी धारा ने प्रदान किया। इस काल में लोकगीत तथा मसखरों की पद्यबद्ध हल्के हास्य से युक्त रचनाएँ भी इतालवी साहित्य के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। विवाहदि विभिन्न अवसरों पर गाए जानेवाले लोकनृत्य नाट्य का अच्छा उदाहरण बोलोन का अवावील का गीत है। लोक में प्रचलित इस काव्यधारा ने शिष्ट कवियों के लिए काव्य के नमूने प्रस्तुत किए। इसी प्रकार का एक रूप ज्यूल्लारी राजा रईसों के दरबारों में घूमा करते थे और स्वरचित तथा दूसरों की हास्यप्रधान रचनाओं को सुनाकर मनोरंजन किया करते थे। ऐसी रचनाओं में तोस्काना का साल्वा लो वेस्कोवो सेनातो (१२वीं सदी, पीसा के आर्चबिशप की प्रशंसा) इतालवी साहित्य के प्राचीनतम उदाहरणों में से माना जाता है। सिएना के मसखरे (भाँड़) रूज्येरी अपूलिएसे (१३वीं सदी का पूर्वार्ध) की रचनाएँ वांतो (अभिमान), व्यंग्यकविता पास्स्योने उल्लेखनीय हैं। लोककाव्य और शिष्ट साहित्यिक कविता के बीच की कड़ी मसखरों की कविताएँ तथा धार्मिक नैतिक पद्यबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत करती हैं। किंतु इतालवी साहित्य का वास्तविक आरंभ सिसिली के सम्राट् फेदेरीको द्वितीय के राजदरबार के कवियों से हुआ।

सिचिलीय (सिसिलीय) और तोस्कन काव्यधाराफेदेरीको द्वितीय (११९४-१२५०) तथा मानफ्रेदी (मूत्यु १२६६ ई.) के राजदरबारों में कवियों तथा विद्धानों का अच्छा समागम था। उनके दरबारों में इटली के विभिन्न प्रांतों से आए हुए अनेक कवि, दार्शनिक, संगीतज्ञ तथा नाना शास्त्रविशारद थे। इन कवियों के सामने प्रावेंसाल भाषा तथा त्रोवातोरी कवियों के नमूने थे। उन्हीं आदर्शों को सामने रखकर इन कवियों ने सिसली की तत्कालीन भाषा में रचनाएँ कीं। विषय, व्यक्त करने का ढंग, प्रवृत्तियों आदि अनेक की समानताएँ इन कवियों की कविताओं में मिलती हैं। इनमें से पिएर देल्ला विन्या, आर्रीगो तेस्ता द'अक्वीनो (जेनोवा निवासी), ज्याकोमो दा लेंतीनो तथा सम्राट् के पुत्र एँजो के नाम प्रसिद्ध हैं। इन्होंने साहित्यिक भाषा को एकरूपता दी। वेनवेंतो के युद्ध (१२६६ ई.) के पश्चात्‌ सिसिली से साहित्यिक केंद्र उठकर तोस्काना पहुँचा। फ्लोरेंस का राजनीतिक महत्व भी इसके लिए उत्तरदायी था। वहाँ प्रेमपूर्ण विषयों के गीतिकाव्य की रचना पहले से ही प्रचलित थी। त्रोवातोरी कवियों का प्रभाव पड़ा चुका था। फ्लोरेंस की काव्यधारा में सबसे प्रधान कवि गुइत्तोने द'आरेज्जो (१२२५-९४) है। इसने अनेक कवियों को प्रभावित किया। वोनाज्यूतां दा लूका, क्यारो दावांजाती आदि इस धारा के कवियों ने फ्लोरेंस में काव्य की ऐसी भूमि तैयार की जिसपर आगे चलकर सुंदर काव्यधारा प्रवाहित हुई। इस युग की रुचि पर प्रभाव डालनेवाला लेखक ब्रूनेत्तो लातीनी (१२२०-१२९३) था जिसका स्मरण दांते ने अपनी कृति में किया है। उनकी रूपक काव्यकृति तेसोरेत्तो (खजाना) में अनेक विषयों पर विचार किया गया है।

प्रेम की भावना से प्रेरित होकर कोमल पदावली में लिखने वाले कवियों की काव्यधारा का दांते ने 'दोल्चे स्तील नुओवो' (मीठी नई शैली) नाम दिया। इस काव्यधारा का प्रभाव आगे की कई पीढ़ियों के कवियों पर पड़ता रहा। इस नई काव्यधारा के प्रवर्तक बोलोन के गुइदो गुइनीचेल्ली (१२३०-१२७६) माने जाते हैं। गूइदो कावाल्कांती (१२५२-१३००) का गीत दोन्ना में प्रेगा पेर्के इओ वोल्या दीरे (महिला मेरी प्रार्थना क्यों करती है, मैं कहना चाहता हूँ) इस काव्यधारा का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। कावालवांती वास्तव में प्रेम-काव्य-धारा का दांते के पूर्व सबसे बड़ा प्रतिनिधि कवि है। लायो ज्यान्नी, ज्यान्नी आल्फानी, चीनो दा पिस्ताइया (१२७०-१३३६), दीनो फ्रेस्कोवाल्दी (मृत्यु १३१६ ई.) इस धारा के अन्य कवि हैं।

१३वीं सदी में कविता की प्रधानता रही। गद्य अपेक्षाकृत कम लिखा गया। सिएना के हिसाबखातों में प्रयुक्त गद्य के उदाहरण तथा कुछ व्यापारिक पत्रों के अतिरक्त मार्को पोलो की यात्राओं का विवरण इल मिलियोवे, कहानीसंग्रह नोवेल्लीनो तथा धार्मिक और नेतिक विषयों पर लिखे गए पत्रों-ले लैत्तेरे-का संग्रह, कथासंग्रह ल्व्रीाोदेई सेत्ते सावी आदि उल्लेखनीय गद्यरचनाएँ हैं। इन रचनाओं में लोक में प्रचलित सहज गद्य तथा कृत्रिम गद्यशैली दोनों रूप मिलते हैं।

नई मीठी शैली काव्यधारा के साथ ही एक और धारा प्रवाहित हो रही थी जिसमें साधारण श्रेणी के लोगों के मनोरंजन की विशेष सामग्री थी। खेलों, नृत्यों, साधारण रीति रिवाजों को ध्यान में रखकर ये कविताएँ लिखी जाती थीं। फोल्गोरे दा सान जिमीनियानो (दरबारी कवि) ने दिनों, महीनों, उत्सवों को लक्ष्य करके कई सॉनेट लिखे हैं। ऐसा ही कवि चेक्को ऑजियोलिएरी है, इसका प्रसिद्ध सॉनेट है-स'२--' फोस्से फोको, अरदेरेइ ल' मोंदो (अगर मैं आग होता तो संसार को जला देता)। इसी धारा में बुद्धिवादी उपदेशक कवि वोनवेसीन दा रीवा आदि रखे जा सकते हैं। धार्मिक साहित्य की दृष्टि से याकोपोने दा तोदी भी स्मरणीय हैं।

दांते, पेत्रार्का, बोक्याच्यामीठी नई शैली का पूर्णतम विकास तथा इतालवी साहित्य का बहुमुखी विकास इन तीन महान्‌ साहित्यकारों की कृतियों में मिलता है। इतालवी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं दांते अलिघिएरी (१२६५-१३२१)। दांते की प्रतिभा अपने समकालीन साहित्यकारों में नहीं, विश्वसाहित्य के सब समय के काव्यों में बहुत ऊँची है। समकालीन संस्कृति को आत्मसात्‌ करके उन्होंने एक नया मोड़ दिया। उनका जीवन काफी घटनापूर्ण रहा। उनकी कविता का प्रेरणास्रोत उनकी प्रेमिका बेआत्रीचे थी। वीता नोवा (नया जीवन) के अनेक गीत प्रेमविषयक हैं। यह प्रेम आदर्शवादी प्रेम है। बेआत्रीचे की मृत्यु के बाद दांते का प्रेम जैसे एक नवीन कल्पना और सौंदर्य से युक्त हो गया था। वीता नोवा के गीतों में कल्पना, संगीत, आश्चर्य सबका सुंदर समन्वय है। इसी के समान अप्रौढ़ कृति इल कोंवीवियो (सहपान) है जिसमें इतालवी गद्य का प्रथम सुंदर उदाहरण मिलता है। इस कृति में दांते ने कुछ गीतों का व्याख्या की है, वे अलग भी ले रीमे में मिलते हैं। इतालवी भाषा पर लातीनी में दांते की कृति दे वुल्गारी एलोक्वेंतिया है। दांते की राजनीतिक विचारधारा का परिचय उनकी लातीनी कृति मोनार्किया में मिलता है। इन छोटी कृतियों के साथ ही उनके पत्रों-ले एपोस्तोले-आदि का भी उल्लेख किया जा सकता है। किंतु दांते और इतालवी साहित्य की सबसे श्रेष्ठ कृति कोम्मेदिया (प्रहसन) है। कृति के इन्फेर्नो (नरक), पुरगातोरिओ (शुद्धिलाक) और पारादीसो (स्वर्ग), तीन खंडों में १०० कांती (गीत) हैं। कोम्मेदिया एक प्रकार से शाश्वत मानव भावों के इतिहास का महाकाव्य है। दांते ने अपना परिचित सारा ऐतिहासिक, धार्मिक, दार्शनिक जगत्‌ उसमें रख दिया है। इतिहास, कल्पना, धर्म आदि क्षेत्रों में व्यक्त कोम्मेदिया में मिलते हैं। कोमल, पुरुष, करुण, नम्र, भयानक, गर्व, अभिमान, दर्प, हास्य, हर्ष, विषाद आदि सभी भाव कोम्मेदिया में मिलते हैं और साथी अत्यंत उत्कृष्ट काव्य। मानव संस्कृति का यह एक अत्यंत उच्च शिखर है। इतालवी भाषा का इस कृति के द्वारा दांते ने रूप स्थिर कर दिया। कृति के प्रति श्रद्धा के कारण उसके साथ दिवीना (दिव्य) नाम जोड़ दिया गया। दिवीना कोम्मेदिया का प्रभाव इतालीय जीवन पर अभी भी बहुत है।

फ्रांचेस्को पेत्रार्का (१३०४-१३७५) को इटली का पहला मानवतावादी तथा नवीन धारा का पहला गीतिकवि कहा जा सकता है। प्राचीन लातीनी साहित्य का उसने गंभीर अध्ययन और यूरोप के अनेक देशों का भ्रमण किया था। अपने समय के अनेक प्रसिद्ध व्यक्तियों से उसका परिचय था। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जिस प्रकार पेत्रार्का प्राचीनता का पक्षपाती था, राजनीति के क्षेत्र में भी प्राचीन राम के वैभव का वह प्रशंसक था। प्राचीन लातीनी कवियों की शैली पर पेत्रार्का ने अनेक ग्रंथ लातीनी में लिखे-ल'आफ्रीका लातीनी में लिखा प्रधान काव्य है। लातीनी गद्य में भी पेत्रार्का ने प्रसिद्ध पुरुषों की जीवनियाँ-दे वीरीस इलुस्त्रीवुस, धार्मिक प्रवचन-इल सेक्रेतुम तथा अन्य अनेक ग्रंथ लिखे। पेत्रार्का की इतालवी भाषा में लिखित गीति ले रीमे, कॉजोंनिएरे तथा ई त्रियोंफी है। लाउरा नामक एक युवती पेत्रार्का की प्रेयसी थी। इस प्रेम ने पेत्रार्का को अनेक गीत लिखने की प्रेरणा प्रदान की। कांजोनिएरे को पेत्रार्का के प्रेम का इतिहास कहा जा सकता है। रीमे में प्रेम, राजनीति, मित्रों तथा प्रशंसकों के विषय में कविताएँ हैं। त्रियोंफी रूपक काव्य है जिसे पेत्रार्का अंतिम रूप नहीं दे सका। प्रेम, मृत्यु, यश, काल, शाश्वतता जैसे विषयों पर रचनाएँ की गई हैं। पेत्रार्का की रचनाओं में सतर्क कलाकार के दर्शन होते हैं। बाह्म रूप को सजाकर रखने में वह अद्वितीय कवि है। उसकी समस्त गीतिरचनाएँ अपनी आत्मा से ही जैसे बातचीत का रूप हों। वास्तविकता या वर्णनात्मकता का उनमें प्राय: अभाव है। भाषा का रूप ऐसा सजाकर रखा है कि उनकी भाषा आधुनिक प्रतीत होती है।

ज्योवान्नी बोक्काच्यो (१३१३-१३७५) भी प्राचीनता का प्रशंसक और लातीनी का अच्छा ज्ञाता था। पेत्रार्का को बोक्काच्यो बड़ी श्रद्धा और प्रेम से देखता था। दोनों बड़े मित्र थे किंतु पेत्रार्का के समान विद्वान्‌ तथा गंभीर विचारक बोक्काच्यो नहीं था। उसने गद्य पद्य दोनों में अच्छी रचना की। इतालवी गद्य साहित्य की प्रथम गद्यकथा फीलोकोलो में स्पेन के राजकुमार फ्लोरिओ और व्यांचीफियोरे की प्रेमकथा है। फीलोस्त्रातो (प्रेम की विजय) पद्यबद्ध कथाकृति है। तेसेइदा पहली इतावली पद्यबद्ध प्रेमकथा है जिसमें प्रेम के साथ युद्धवर्णन भी है। निन्फाले द' अमेतो गद्यकाव्य है जिसमें बीच बीच में पद्य भी हैं। इसमें पशुचारक अमेतो की कल्पित प्रेमकहानी है जिसे रूपक का रूप दे दिया गया है। इसे पहली इतालवी पशुचारक प्रेमकथा कहा जा सकता है। फियामेता भी एक छोटी प्रेमकथा है जिसमें नायिका उत्तम पुरुष में अपनी प्रेम कथा कहती है। इस गद्यकृति में बोक्काच्यो ने प्रेम की वेदना का बड़ा सूक्ष्म चित्रण किया है। लघु कृतियों में निन्फाले फिएसोलानो सुंदर काव्यकृति है। बोक्काच्यो की सर्वप्रसिद्ध तथा प्रौढ़ कृति देकारमेरोन (दस दिन) है। कृति में सौ कहानियाँ हैं, जो दस दिनों में कही गई हैं। फ्लारेंस की महामारी के कारण सात युवतियाँ और तीन युवक शहर से दूर एक भग्न प्रासाद में ठहरते हैं और इन कहानियों को कहते सुनते हैं। ये कहानियाँ बड़े ही कलात्मक ढंग से एक दूसरी से जुड़ी हुई हैं। कृति में सुदंर वर्णन है। प्रत्येक कहानी कला का सुंदर नमूना कही जा सकती है। कुद कहानियाँ बहुत श्रृंगारपूर्ण हैं। भाषा, वर्णन, कला आदि की दृष्टि से देकामेरोन्‌ अत्यंत उत्कृष्ट कृति हैं। इतालवी साहित्य में बहुत दिनों तक दिवीना कोम्मेदिया तथा देकामेरान्‌ के अनुकरण पर कृतियाँ लिखी जाती रहीं। बोक्काच्यो ने लातीनी में भी अनेक कृतियाँ लिखी हैं तथा वह इटली का पहला इतिहासलेखक कहा जा सकता है। दांते का वह बड़ा प्रशंसक था; दांते की प्रशंसा में लिखी कृति त्रात्तातेल्लो इन लाउदे दी दांते (दांते की प्रशंसा में प्रबंध) तथा इल कोमेंते (टीका) दांते को समझने के लिए अच्छी कृतियाँ हैं।

१४वीं सदी के अन्य साहित्याकारों में राजनीति से संबंधित पद्यरचयिता तथा गीतिकार फाज्यो देल्यी ऊवेरती अपने प्रबंधात्मक काव्य दीत्तामोंदो (संसारनिर्देश) के लिए प्रसिद्ध हैं। प्रेमादि भावों को लेकर कविता करनेवाले अंतोनियो बेक्कारी, सीमोने सेरदीनी, फ्रांक्रो साक्केत्ती (१३३०-१४००), धार्मिक धारा में किसी अज्ञात लेखक की कृति ई फियोरेत्ती दी सान फ्रांचेस्को (संत फ्रांसिस की पुष्पिकाएँ) तथा याकोपो पासावांती की कृतियाँ, सांता कातेरिना का सीएन्न (१३४७-१३८०) के धार्मिक पत्र उल्लेखनीय हैं। समसामयिक परिस्थिति पर प्रकाश डालनेवाले विवरणों के लेखकों में दीनों कांपायी (१२५५-१३२४) तथा ज्योवान्नी विल्लानी (मृत्यु १३४८ ई.) प्रसिद्ध हैं। विल्लानी ने अपने समय की अनेक रोचक सूचनाएँ दी हैं।

१५वीं सदी में मानववाद के प्रभाव के कारण इतालवी साहित्य के स्वच्छंद विकास में बाधा पड़ गई। पेत्रार्का के पहले ही प्राचीन युग के अध्येता अल्बेरतीनो मूस्सातो मानववाद की नींव डाल चुके थे। इनका मत था कि मानव आत्मा के सबसे अधिकारी अध्येता प्राचीन थे, उन प्राचीनों की कृतियों का अध्ययन मानववाद है। इस परंपरा के कारण प्राचीन लातीनी रचनाओं, इतिहास आदि का अध्ययन, भाषाओं का अध्ययन तो हुआ, लेकिन इतालवी के स्थान पर लातीनी में रचनाएँ होने लगीं जिनमें मौलिकता बहुत कम रह गई। सभी लेखक प्राचीन मूल साहित्य की ओर मुड़ गए और उसकी शैली की नकल करने लगे। पेत्रार्का से प्रभावित कोलूच्यो सालूताती, ग्रीक और लातीनी रचनाओं के अध्येता, संग्रहकर्ता नीक्कोलो निक्कोली, दार्शनिक प्रबंध और पत्रलेखक पोज्यो ब्राच्यलीनी भाषा, दर्शन, इतिहास पर लिखनेवाले लोरेंजो वाल्ला आदि प्रमुख लेखक हैं। इटली से यह नई धारा यूरोप के अन्य देशों में भी पहुँची और देशानुकूल इसमें परिवर्तन भी हुए। साहित्य के नए आदर्शो का भी मानववादियों ने प्रचार किया। फ्रांचेस्को फीलेल्फो (१३९८-१४८१) इस नए साहित्यिक समाज का १५वीं सदी का अच्छा प्रतिनिधि कहा जा सकता है। मानववादी धारा के कवियों का आदर्श प्राचीन कवियों की की रचनाएँ ही थीं, प्रकृति या समसामयिक समाज का इनके लिए कोई महत्व नहीं था, किंतु १५वीं सदी के उत्तरार्ध में अनेक साहित्यिक व्यक्तित्व हुए जिनमें से जीरोलामो सावोनारोला (१४५२-१४९८) कवि, लूइजी पुलची (१४३२-१४८४) सामान्य श्रेणी के हैं। पुलची का नाम उनकी वीरगाथात्मक कृति मोर्गाते के कारण अमर हैं। पुलची की कृति के समान ही मांतेओ मारिआ बोइयार्दो (१४४१-१४९४) की कृति ओरलांदो इन्नयोरातो (आसक्त ओरलांदो ) हैं। यद्यपि कृति में प्राचीनता की जगह जगह छाप है, तथापि उसमें पर्याप्त प्रवाह और सजीवता है। अपनी सदी का यह सबसे उत्तम प्रेमगीति-काव्य है। कार्लोमान्यो (चार्लीमैग्ना) से संबंधित कथाप्रवादों से कृति का विषय लिया गया है। कृति अधूरी रह गई थी जिसे आरिओस्तो ने पूरा किया। ओरलांदो और रिनाल्दो दो वीर योद्धा थे जो कार्लोमान्यो की सेना में थे। वे दोनों आंजेलिका नामक सुंदरी पर अनुरक्त हो जाते हैं। यही प्रेमकथा नाना अन्य प्रसंगों के साथ कृति का विषय हैं। फ्लोरेंस का रईस लोरेंजो दे' मेदीची उपनाम इल मान्यीफिको (भव्य) (१४४९-१४९२) इस आधी सदी का महत्वपूर्ण व्यक्तित्व है। राजनीति तथा साहित्यजगत्‌ दोनों में ही उसने सक्रिय भाग लिया। उसने स्वयं अनेक कृतियाँ लिखीं तथा अनेक साहित्यकों को आश्रय दिया। उनकी कृतियों में गद्य में लिखी प्रेमकथा कोतेंतो, पद्यबद्ध प्रेमकथाएँ-सेल्वे द' अमोरे (प्रेम का वन), आंब्रा, आखेटविषयक कविता काच्चा कोल फाल्कोने (गीध के साथ शिकार), आमोरी दी वेनेरे ए दी मारते (वेनस तथा मार्स का प्रेम) तथा बेओनी काव्यप्रसिद्ध कृतियाँ हैं। मान्यीफिको की प्रतिभा बहुमुखी थी। आंजेलो आंब्रोजीनी उपनाम पोलीत्सियानो (१४५४-१४९४) ने ग्रीक और लातीनी में भी रचनाएँ कीं। इतालवी रचनाओं में स्तांजे पेर ला ज्योस्त्रा (फ्लोरेंस के ज्योस्त्रा उत्सव की कविताएँ), संगीत-नाटच-कृति ओरफेओ तथा कुछ कविताएँ प्रधान हैं। पोलित्सियानो की सभी कृतियों का वातावरण प्राचीनता की याद दिलाता है। गद्यलेखकों में लेओन बातीस्ना आल्वेरती, लेओनारदो द' विंची (१४५२-१५१९), वेस्पासियानो द' विस्तीच्ची, मांतेओ पाल्मिएरी तथा गद्यकाव्य के क्षेत्र में याकोपो सान्नाज्जारो प्रधान हैं। उसकी कृति आर्कादिया की प्रसिद्धि सारे यूरोप में फैल गई थी। इस सदी में बुद्धिवादी आंदोलन के फलस्वरूप इटली में फ्लोरेंस, रोम, नेपल्स में अकादमियों की स्थापना हुई। मानववादी धारा के ही फलस्वरूप वास्तव में पुनर्जागरण (रिनेशाँ) का विकास इटली में हुआ। अरस्तू के पोएटिक्स के अध्ययन के कारण साहित्य और कला के प्रति दृष्टिकोण कुछ कुछ बदला।

१६वीं सदी में इटली की स्वाधीनता चली गई, किंतु साहित्य और संस्कृति की दृष्टि से यह सदी पुनर्जागरण के नाम से विख्यात है। लातीनी और ग्रीक तथा प्राचीन साहित्य एवं इतिहास की खोज और अध्ययन करनेवाले पिएर, वेत्तारी, विंचेलो बोरघीनी, ओनोफ्रयो पानवीनियो जैसे अनेक विद्वान विभिन्न केंद्रो में कार्य कर रहे थे। लातीनी में साहित्य रचना भी इस सदी के पूर्वार्ध में होती रही, किंतु उसका वेग कम हो गया था। भाषा का स्वरूप भी बेंबो, कास्तील्योने, माक्यावेल्ली आदि ने फिर स्थिर कर दिया था। कविता, राजनीति, कला, इतिहास, विज्ञान सभी क्षेत्रों में एक नवीन स्फूर्ति १६वीं सदी में मिलती है। सदी के उत्तरार्ध में कुछ ्ह्रास के चिह्न अवश्य दिखने लगते हैं। पुनर्जागरण की प्रवृत्तियों की सबसे अच्छी अभिव्यक्ति लुदोविको आरिओस्तो (१४७४-१५३३) की कृति ओरलांदो फूरिओसी में हुई है। युद्धों और प्रणय का अद्भुत एवं आकर्षक ढंग से कृति में निर्वाह किया गया है। ओरलांदो का आंजेलिका के लिए प्रेम, उसका पागलपन और फिर शांति का जैसा वर्णन इस कृति में मिलता है वैसा शायद ही किसी अन्य इतालवी कवि ने किया हो। मध्ययुगीन वीरगाथाओं से कवि ने कथावस्तु ली होगी। कल्पना और कविता का बहुत ही सुंदर समन्वय इस कृति में मिलता है। सातीरे (व्यंग्य) आदि छोटी कृतियाँ आरिओस्तो की कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं हैं। जिस प्रकार १६वीं सदी के काव्य का प्रतिनिधि ओरलांदो फूरिओसो है उसी प्रकार पुनर्जागरण युग की मौलिक, स्वतंत्र खुली तथा मानव प्रकृति के यथार्थ चित्रण से युक्त विचारधारा नीक्कोलो माक्यावेल्ली (१४६७-१५२७) की कृतियों में मिलती है। नवीन राजनीतिविज्ञान की स्थापना माक्यावेल्ली ने 'प्रिंचीपे' (युवराज) तथा 'दिस्कोर्सी' (प्रवचन) कृतियों द्वारा की। बहुत ही स्पष्टतापूर्वक तार्किक पद्धति से इन कृतियों में व्यवहारवादी राजनीतिक आदर्शो का विवेचन किया गया है। इन दो कृतियों में जिन सिद्धांतों का माक्यावेल्ली ने प्रतिपादन किया है उन्हीं की एक प्रकार से व्याख्या अन्य कृतियों में की है। 'देल्लार्ते देल्ला ग्वेर्रा' (युद्ध की कला) में प्राय: उन्हीं सामरिक सैनिक बातों की विस्तार से चर्चा है जिनका पहली दो कृतियों में संकेत किया जा चुका है। 'ला वीता दी कास्त्रूच्यो (कास्त्रूच्यो का जीवन) भी ऐतिहासिक चरित्र है, जैसा 'प्रिचीपे' में राजा का आदर्श बताया गया है। इस्तोरिए फियोरेंतीने (फ्लोरेंस का इतिहास) में इटली तथा फ्लोरेंस का इतिहास है। माक्यावेल्ली की विशुद्ध साहित्यिक कृतियों की भाषा तथा शैली भिन्न है। रूपककविता असीनो द' ओरो (सोने का गधा), कहानी बेल्फागोर तथा प्रसिद्ध नाटयकृति मांद्रागोला की शैली साहित्यिक है। मांद्रोगोला पाँच अंकों में समाप्त १६ वीं सदी की प्रसिद्धतम (कोमेदी) नाटक कृति है और लेखक की महत्वपूर्ण रचना है। माक्यावेल्ली के सिद्धांतो को सामने रखकर यूरोप में बहुत चर्चा हुई। इतालवी में इतिहास और राजनीति के उन सिद्धांतों के आधार बनाकर इतिहास लिखनेवालों में सर्वश्रेष्ठ फ्रांचेस्को ग्विच्यार्दीनी (१४९३-१५४०) हैं। उन्होंने तटस्थता और यथार्थ, सुक्ष्म पर्यवेक्षदृष्टि का अपनी कृतियों--स्तोरिया द इतालिया तथा ई रिकोर्दी (संस्मरण)में ऐसा परिचय दिया है कि इस काल के वे श्रेष्ठतम इतिहासलेखक माने जाते हैं। ई रिकोर्दी में उनके विस्तृत और गहन अनुभव का परिचय मिलता है। लेखक ने अनेक व्यक्तियों पर निर्णय तथा अनेक घटनाओं पर अपना मत दिया है। इसी तरह स्तोरिया द' इतालिया में पुनर्जागरणकाल की इटली की विचारधारा की सबसे परिपक्व अभिव्यक्ति मिलती है। ग्विच्यार्दीनी सक्रिय राजदूत, कूटनीतिज्ञ और शासक थे। अपने जीवन से संबंधित दियारियो देल वियाज्जे इन स्पान्या (स्पेन यात्रा की डायरी), रेलत्सियोने दी स्पान्या (स्पेन का विवरण) जैसी अनेक कृतियाँ लिखी हैं। उल्लेख योग्य इतिहास और राजनीति विषयक अन्य साहित्य रचयिताओं में इस्तोरिए फियोरेंतीने (फ्लोरेंस का इतिहास) का लेखक बेर्नोर्दो सेन्यी, स्तोरिया द' एउरोपा (यूरोप का इतिहास) का लेखक ज्यांबूल्लारी हैं। प्रसिद्ध कलाकारों की जीवनी लिखनेवालों में ज्योर्ज्यो वासारी (१५११-१५७४) का स्थान महत्वपूर्ण है। अत्यंत सुंदर आत्मकथात्मक ग्रंथ लिखनेवालों में वेनवेनूतो चेल्लीनी का स्थान श्रेष्ठ है। इस सदी की प्रतिनिधि कृति बाल्दास्सार कास्तील्योने (१४७८-१५२९) की कोर्तेज्यानो (दरबारी) भी है जिसमें तत्कालीन आदर्श दरबारी जीवन तथा रईसी का चित्रण है। उच्च समाज में भद्रतापूर्ण व्यवहार की शिक्षा देनेवाली ज्योवान्नी देल्ला कासा की कृति गालातेओ भी सुंदर है। पिएतरो अरेतीनो (१४९२-१५५६) अपनी अश्लील शृंगाररचना राजिओनांमेंसी के कारण इस सदी के बदनाम लेखक हैं। स्त्रियों के आदर्श सौंदर्य का वर्णन अन्योले फीरेंजुओला (१४९३-१५४३) ने देल्ले वेल्लेज्जे देल्ले दोन्ने (स्त्रियों के सौंदर्य के विषय में) किया है।

पुनर्जागरणकाल में इस प्रकार सभी के आदर्श रूपों के प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ। काव्य, विशेषकर गीतिकाव्य का मौलिक रूप बहुत कम कवियों में मिलता है। ज्योवान्नी देल्ला काता, पिएतरो, प्रसिद्ध कलाकार माकेलांजेलो बुओनार्रोती (१४७५-१५६४), लुइजी लांसी'ल्लो (१५१०-१५६८) की गीतिरचनाओं में इस काल की विशेषताएँ मिलती हैं। व्यंग्यपूर्ण तथा आत्मपरिचयात्मक कविता के प्रसंग में फ्रांचेस्को बेरनी (१४९८-१५३५), कथा और वर्णनकाव्यों के प्रसंग में आन्नीवाल कारो तथा नाटककारों में ज्यांबातीस्ता जीराल्दी, पिएतरो अरेतीनो तथा कथासाहित्य के क्षेत्र में आंयोलो फारेंजुओला, फोलेन्गो (१४९१-१५४४), उल्लेखनीय साहित्यिक हैं। पुनर्जागरणकाल की अंतिम महान्‌ साहित्यिक विभूति तोरक्‌वातो तास्सो (१५४४-१५९५) हैं। तास्सो की प्रारंभिक कृतियों में १२ सर्गो का प्रेम-वीर-काव्य रिनाल्दो, चरवाहे अमिता और अप्सरा सिल्विया की प्रेमकथा से संबंधित काव्य, अमिता तथा विभिन्न विषयों से संबंधित पद्य 'रीमे' हैं। तास्सो को महत्व प्रदान करनेवाली उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति 'जेरूसलेम्मे लीबेराता' (मुक्त जेरूसलेम) है। कृति में गफ्रोेदो दी बूल्योने के सेनापतित्व में ईसाई सेना द्वारा जेरूसलेम को विजय करने की कथा है। यह एक प्रकार का धार्मिक भावना लिए हुए वीरकाव्य है। ताल्सो की लघुकृतियों 'दियालोगी' (कथोपकथन) तथा लैतेरे (पत्र) में से पहली में नाना विषयों पर तर्कपूर्ण शैली में विचार किया गया है तथा दूसरी में लगभग १,७०० पत्रों में दार्शनिक और साहित्यिक विषयों पर विचार किया गया है। अंतिम कृतियों में जेरूसलेमे कोंक्विस्ताता, तोरितिमोंदो (दु:खांत नाटक) तथा काव्यकृति मोंदोक्रेआतो हैं।

इस काल के उत्तरार्ध में प्रसिद्ध दार्शनिक लेखक ज्योर्दानो ब्रूनो (१५४८-१६७०), तोमास्सो कांपानेल्ला, प्रसिद्ध वैज्ञानिक गालीलेओ गालीलेई (१५६४-१६४२) वैज्ञानिक गद्य के लिए तथा राजनीति इतिहास को नया दृष्टिकोण प्रदान करने की दृष्टि से पाओलो सारपी उल्लेखनीय हैं।

१७वीं सदी इतालीय साहित्य का ह्रासकाल है। १६वीं सदी के अंत में ही काव्य में ह्रास के लक्षण दिखने लगे थे। नैतिक पतन तथा उत्साहहीनता ने उस सदी में इटली को आक्रांत कर रखा था। इस काल को बारोक्को काल कहते हैं। तर्कशास्त्र में प्रयुक्त यह शब्द साहित्य और शिल्प के क्षेत्र में अति सामान्य, भद्दी रुचि का प्रतीक है। इस युग में साहित्य के बाह्म रूप पर ही विशेष ध्यान दिया जाता था, ग्रीक रोमन कृतियों का भद्दा अनुकरण हो रहा था, कविता में मस्तिष्क् की प्रधानता हो गई थीं, अलंकारों के भार से वह बोझिल हो गई थी, एक प्रकार का शब्दों का खिलवाड़ ही प्रधान अंग हो गया था एवं कहने के ढंग ने ही प्रधान स्थान ले लिया था। इस काल के कवियों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा ज्यांबातीस्ता मारोनो (१५६९-१६२५) का; इसी कारण इस धारा के अनेक कवियों को मारोनिस्ती तथा काव्यधारा को कभी कभी मारीनिज्म कहा जाता है। मारीनो ने प्राचीन काव्य से बिल्कुल संबंध नहीं रखा, प्राचीन परंपरा से संबंध एकदम तोड़ दिया और ग्वारीनी तथा तास्सो जैसे कवियों से प्रेरणा प्राप्त की । कविता को मारोनो बौद्धिक खेल समझता था। मारीनो की कृतियों में विविध विषयों से संबंधित कविताओं का संग्रह लीरा तथा बारोक युग का प्रतिनिध काव्य आदोने है। यह कृति लंबे लंबे २० सर्गो में समाप्त हुई हैं। कृति में वेनेरे और चीनीरो की अलंकृत शैली में प्रेमकथा कही गई है। समसामयिकों ने इसे अदोने की कला का अद्भूत नमूना कहकर स्वागत किया और अनेक कवियों को इस कृति ने प्रभावित किया। कवियों में गाब्रिएल्लो-क्याबरेरा (१५५२-१६३८) फुलियो नेस्ती, फ्रांचेस्को ब्राच्योो लीनी (१५६६-१५४५) तथा कथासाहित्य और नाट्यसाहित्य के क्षेत्र में फेदेरीक़ो देल्ला वाल्ले (मृत्यु १६२८), ज्योवान्नी देल्फीनो (मृत्यु १६१९) आदि मुख्य हैं। इस सदी में बोलियों में भी काव्यरचना हुई। रोमानो में ज्यसेघे बेरनेरी आदि ने तथा हास्य-व्यंग्य-काव्य की ज्यांबातीस्ता बासीले (१५७५-१६३२) ने अच्छी रचनाएँ की। १७वीं सदी के अंतिम वर्षों तथा १८वीं के आरंभिक वर्षों में इटली की सांस्कृतिक विचारधारा में परिवर्तन हुआ, उसपर यूरोप की विचारधारा का प्रभाव पड़ा। किंतु इस विचारधारा के साथ इतालवी विचारकों की अपनी मौलिकता भी साथ में थी। १७वीं सदी के साहित्यिक ्ह्रास के प्रति इटली के विचारक स्वयं सतर्क थे। अत: नवीन विचाधारा को लेकर काफी वाद विवाद चला। काव्यरुचि को लेकर ज्यूसेफे ओरसी, आंतोन मारिया साल्वीनी, एयूस्ताकियो मफ्रोंदी आदि ने नवीन रुचि की स्थापना का प्रयत्न किया। ज्यान विंचेसो ग्रावीना (१६६४-१७१८), लूदोविको आंतोनियो मूरालोरी, आंतोनियो कोंती (१६७०-१७४९) आदि ने काव्यसमीक्षा पर ग्रंथ लिखकर नवीन मोड़ देने का प्रयत्न किया। इन्होंने यूरोप की तत्कालीन विचारधारा को इतालवी प्राचीन परंपरा के साथ समन्वित करने का प्रयत्न किया। इसी प्रकार इतिहास का भी नवीन दृष्टि से अध्ययन किया गया। साहित्य, इतिहास और काव्यसमीक्षा को नया मोड़ देनेवालों में इस सदी के सबसे प्रमुख विचारक ज्याँ बातीस्ता वीको (१६६८-१७४४) हैं। उनकी बेजोड़ कृति प्रिंचिपी दी शिएँजा नोवा (नए विज्ञान के सिद्धांत) में उनके गूढ़ विचार और गहन अध्ययन, चिंतन के परिणाम व्यक्त हुए हैं। कविता के लिए कल्पना आदि जिन आवश्यक तत्वों की उन्होंने चर्चा की उनका काव्यसमीक्षा तथा कवियों पर काफी प्रभाव पड़ा।

१७वीं सदी की कुरुचि को दूर करने के लिए रोम में कुछ लेखक और विद्वानों ने मिलकर 'आर्कादिया (ग्रीस के रमणीय स्थान आर्कादिया के नाम पर) नामक एक अकादमी की सन्‌ १६९० में स्थापना की। आर्कादिया धीरे धीरे इटली की बहुत प्रसिद्ध

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इटली


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