जल संग्रहण तालाब के निर्माण से भरपूर उत्पादन - एक सफल गाथा 

Submitted by UrbanWater on Thu, 06/18/2020 - 05:54
Source
जल चेतना, खण्ड 7, अंक 2, जुलाई 2018, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की-247667

सिंचाई-तालाब ही कृषिजल का समाधान; फोटो: Needpixसिंचाई-तालाब ही कृषिजल का समाधान, प्रतीकात्मक फोटो: Needpix.com

(तालाब हेतु खोदी हुई मिट्टी का उपयोग श्री चौधरी के खेतों में बने निचले, असमतल क्षेत्रों में भरकर उन्हें एक समतल-आकार देने का प्रयास किया गया। साथ ही अन्य मिट्टी का उपयोग खेतों की पहुंच सड़कों ठीक करने में लिया गया। कड़ी मेहनत के बाद मई माह में तालाब निर्मित हुआ और उसका आकार 1 हेक्टेयर में होकर उसमें लगभग 80000 घन मीटर पानी का संग्रहण किया जा सकता था। चूँकि इस तालाब में प्राकृतिक निकास मार्ग (जो कि मुख्य राजमार्ग से लगा हुआ था) से जल का प्रवेश तालाब में कराया गया था, इस कारण अतिरिक्त निकास द्वार न बनाकर ऐसा प्रयास किया गया कि तालाब भरने के उपरान्त पुनः जल अपवाह अपने प्राकृतिक निकास मार्ग से आगे चला जाए।)

जनवरी 2007 में क्रियात्मक अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत संचालित एक अनुसंधान कार्य के बारे में दूरदर्शन, इंदौर से प्रसारण के उपरांत एक किसान श्री सुरेंद्र चौधरी द्वारा परियोजना के सदस्यों से सम्पर्क साधा गया। उन्होंने उनके गांव मोरधन, तहसील इंदौर में खेतों में जल-संग्रहण संरचना बनाने की संभावनाओं पर तकनीकी सलाह देने का अनुरोध किया था। टीम के सदस्यों द्वारा तुरंत उनके इलाके का भ्रमण किया गया जो कि कृषि महाविद्यालय इंदौर से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है। टीम के सदस्यों द्वारा यह पाया गया कि श्री सुरेंद्र चौधरी के संयुक्त परिवार में कुल 110 बीघा (27 हे.) कृषि भूमि इंदौर-नेमावर राष्ट्रीय राजमार्ग पर मौजूद है। खरीफ में सोयाबीन उत्पादन के अलावा मुख्यतः वे रबी के दौरान गेंहू एवं चने का उत्पादन लेने का प्रयास सन् 1995 से कर रहे थे। इस प्रक्षेत्र में उनके द्वारा कई ट्यूबवेलों का निर्माण किया गया परन्तु उनसे निकलने वाली जल राशि की मात्रा से वे कभी भी संतुष्ट नहीं हो पाते थे। आस-पास के खेतों से भी यह सिद्ध होता था कि यह पूरा इलाक़ा वर्षा आधारित कृषि पद्धति पर ही ज्यादा निर्भर करता है। पर्याप्त वर्षा की मात्रा में अवश्य ही ट्यूबवेल से दिसम्बर, जनवरी माह तक सिंचाई जल प्राप्त हो पाता। कुल मिलाकर श्री सुरेंद्र चौधरी का परिवार 110 बीघा कृषि भूमि होने के उपरांत भी अधिक उत्पादन प्राप्त नहीं कर पा रहा था। 

चूंकि दूरदर्शन पर ‘जल संग्रहण तालाब का निर्माण’ तकनीक पर प्रसारण सीधे डकाच्या गांव के श्री शिवनारायण चौधरी के प्रक्षेत्र पर परियोजना द्वारा निर्मित जल संग्रहण तकनीक से संबंधित था, श्री सुरेंद्र चौधरी भी इस तकनीक का लाभ लेना चाहते थे एवं इस संबंध में उन्हें परियोजना की टीम का मार्गदर्शन अपेक्षित था।

टीम के सदस्यों द्वारा यह आकलन किया गया कि इस प्रक्षेत्र में जल संग्रहण तालाब निर्मित करने की बहुत ही अच्छी संभावना है क्योंकि इस क्षेत्र में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण प्रचूर मात्रा में जल अपवाह होना संभावित है। साथ ही यह भी अनुमान लगाया गया कि चूँकि यह प्रक्षेत्र राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित है, इस मार्ग के अतिरिक्त जल अपवाह को भी उपयोग में लाया जा सकता है। इस प्रकार पूरी परिस्थिति का आकलन करने पर यह पाया गया कि अथाह जल अपवाह एकत्रित करने के लिये एक बड़े जल संग्रहण तालाब का निर्माण श्री चौधरी के प्रक्षेत्र में किया जाना आवश्यक है जिससे कम से कम 100 बीघा में दो या तीन सिंचाई की संभावना हमेशा बनी रहे। 

इस हेतु क्षेत्र के अनुसार तालाब का आकार निर्धारित कर उसकी अनुमानित लागत का अंदाजा लगाया गया है। यह पाया गया कि श्री चौधरी को इस तालाब हेतु लगभग 1 हेक्टेयर क्षेत्र देना होगा साथ ही इसकी लागत हेतु लगभग 10-12 लाख व्यय करने होंगे। सभी संभावनाओं को समझ कर श्री चौधरी सहर्ष अपनी 1 हेक्टेयर कृषि भूमि तालाब हेतु देने को तैयार हुये और पूरी लागत को वहन करने की ज़िम्मेदारी भी ले ली। मार्च 2007 में जेसीबी., पोक-लैंड, डंपर इत्यादि के मध्यम से तालाब निर्माण का कार्य किया गया। तालाब हेतु खोदी हुई मिट्टी का उपयोग श्री चौधरी के कृषि प्रक्षेत्र में खेतों में बने निचले, असमतल क्षेत्रों में भरकर उन्हें समतल आकार देने का प्रयास किया गया। साथ ही मिट्टी के उपयोग से प्रक्षेत्र में सड़कों का निर्माण भी व्यवस्थित ढंग से किया गया। कड़ी मेहनत के बाद मई माह में तालाब निर्मित हुआ और उसका आकार 1 हेक्टेयर में होकर उसमें लगभग 80000 घन मीटर पानी का संग्रहण किया जा सकता था। चूंकि इस तालाब में प्राकृतिक निकास मार्ग (जो कि मुख्य राजमार्ग से लगा हुआ था) से जल का प्रवेश तालाब में कराया गया था, इस कारण अतिरिक्त निकास द्वार न बनाकर ऐसा प्रयास किया गया कि तालाब भरने के उपरान्त पुनः जल अपवाह अपने प्राकृतिक निकास मार्ग से आगे चला जाय। इस प्रकार निकास द्वार न बनाकर लगभग इसमें लगने वाले 50000 रूपये के व्यय को कम किया बल्कि एक तालाब को नुकसान पहुँचाने वाले संभावित कारण को भी रोका गया।

सन् 2007 में श्री चौधरी ने सोयाबीन की फसल के उपरांत लगभग 60 बीघा में गेहूँ की फसल व 40 बीघा में चने की फसल बोने हेतु इस तालाब के पानी का उपयोग पलेवा के रूप में तथा उसके उपरान्त दी जाने वाली सिंचाई के लिए किया। एक आकलन के अनुसार यह पाया गया कि इस तालाब के पानी के उपयोग से पूरे 100 बीघा क्षेत्र में दो भरपूर सिंचाई दी जा सकी, जो कि इस तालाब के निर्माण के पूर्व किसी भी हालत में ट्यूबवेल के पानी से संभव नहीं था। इस तालाब के पानी के उपयोग हेतु किसान द्वारा सबमर्सीबल पम्प तथा डीजल पम्प का इस्तेमाल किया। इससे बिजली होने व न होने की दोनों ही परिस्थितियों में वह 100 बीघा भूमि को क्रमवार सिंचित कर सका। इससे न केवल इस प्रक्षेत्र में लगने वाले समय को लगभग 1/3 किया गया बल्कि पूरी भूमि में खेतों के बतर (खेतों के बोने योग्य स्थिति या नमी) आने पर पूरे प्रक्षेत्र को समय से बोया जा सके।

अक्सर यह देखा गया कि दिसम्बर-जनवरी माह के दौरान इस क्षेत्र के ट्यूबवेल में जल निकास दर काफी कम हो जाती है तथा ट्यूबवेल झटके मार-मार कर पानी प्रदान करता है। इस घटी हुई दर से यदि ट्यूबवेल के पानी को खेतों में उपयोग किया जाए तो पूरे खेत में असमान दर से इसका वितरण होता है और पूरे प्रक्षेत्र में पानी सही ढंग से वितरित नहीं हो पाता है। इस असमानता के कारण फसलों की उत्पादकता भी काफी प्रभावित होती है साथ ही कई बार यह भी देखा गया कि ट्यूबवेल से मिलने वाला जल एकदम से समाप्त हो जाता है और फसलों को सिंचाई जल नहीं मिल पाता। इस कारण इस क्षेत्र के किसान ज्यादातर चने की फसल उगाना पसंद करते हैं क्योंकि इसमें कम पानी की आवश्यकता होती है। परन्तु इस तालाब के निर्माण से श्री सुरेंद्र चौधरी ने न केवल गेंहू का भरपूर उत्पादन लिया बल्कि अतिरिक्त जल से चने की उत्पादकता को भी बढ़ाया। इस प्रकार सन 2007-08 में ही श्री सुरेंद्र चौधरी ने लगभग 900 क्विंटल गेंहू तथा 200 क्विंटल चने की पैदावार प्राप्त की जो कि सामान्य स्थितियों मे लगभग इसकी आधी उपज होती। इस प्रकार एक आकलन में यह ज्ञात हुआ कि इस अतिरिक्त पैदावार से श्री सुरेंद्र चौधरी द्वारा कुल 11 लाख की अतिरिक्त आय प्राप्त की गई। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पहले ही वर्ष में श्री सुरेंद्र चौधरी द्वारा तालाब की पूरी लागत प्राप्त कर ली गई।

सन् 2008 में श्री सुरेंद्र चौधरी द्वारा खरीफ में पूरे प्रक्षेत्र में सोयाबीन की बुवाई की गई थी। इस मौसम में भी अच्छी बारिश के बावजूद अगस्त-सितम्बर में आई हुई वर्षा की स्थिति में खरीफ में भी सोयाबीन की फसल को एक जीवनदायिनी सिंचाई दी गई जिससे सोयाबीन की उत्पादकता अन्य किसानों की तुलना में लगभग 1.5 गुना अधिक प्राप्त की गई। सितम्बर माह के अंत में आई वर्षा से यह तालाब पुनः पुर्णरूपेण भर गया। सन् 2008-09 में ही जल की उपलब्धता बढ़ने के कारण श्री सुरेंद्र चौधरी द्वारा सोयाबीन काटने के उपरान्त लगभग 30 बीघा में आलू की फसल उगाई गई तथा अन्य क्षेत्र में गेंहू और चने को बराबर-बराबर हिस्से में बोया। जनवरी 2009 के प्रथम सप्ताह में आलू की फसल को निकाला गया और तुरंत उसमें गेंहू की फसल को बोया गया। इस प्रकार मात्रा सोयाबीन, गेंहू व चने को पैदा करने वाले श्री सुरेंद्र चौधरी ने नई फसल आलू का भी भरपूर उत्पादन प्राप्त किया।

सन् 2009 के अप्रैल माह में उत्साहित श्री सुरेंद्र चौधरी द्वारा इस तालाब को और गहरा किया गया और इसमें 3 लाख रूपये खर्च कर इस तालाब से निकली हुई मिट्टी को अपने खेत में फैलाकर उनको समतल व समान रूप से बनाने का प्रयास किया इससे न केवल भूमि से बल्कि तालाब की निकली हुई मिट्टी से खेतों की उर्वरता भी बढ़ी।

श्री सुरेंद्र चौधरी के खेत में सन् 2009 से लेकर सन् 2014 तक रबी मौसम के दौरान लगातार तीन फसलों को इस तालाब के पानी के माध्यम से भरपूर मात्रा में उत्पादित किया गया। अत्यंत विश्वास से भरे हुये श्री सुरेंद्र चौधरी के खेतों में आज गेंहू, चने व आलू की कई उन्नत किस्मों को उगाया जा रहा है। सन 2013-14 में अत्यधिक वर्षा के कारण इस क्षेत्र के किसानों के यहां सोयाबीन में जल भराव से अधिक नुकसान हुआ परन्तु श्री सुरेंद्र चौधरी के खेत में जल भराव कम होने से (उत्तम निकास के द्वारा तालाब में जल संग्रहण) कम नुकसान आंका गया। साथ ही रबी के दौरान भी अन्य किसानों के यहां गेहूं एवं चने की फसल में पाला पड़ने व वर्षा एवं ओले गिरने से काफी नुकसान पाया गया। चूंकि सुरेंद्र चौधरी सोयाबीन के उपरान्त आलू की फसल लेकर गेहूं व चने का उत्पादन करते हैं जिससे वे आलूू की फसल निकालकर व उस खेत को पलेवा देकर गेहूं व चने की बोनी क्रमवार करते हैं, उनके खेत में पाला पड़ने व ओला वृष्टि के दौरान गेहूं व चने की फसलें अलग-अलग आयु, वर्ग एवं ऊँचाई की थी। इस कारण इन दोनों का ही प्रभाव इन फसलों पर न्यूनतम रहा। साथ ही 25 मार्च 2014 तक अन्य किसानों के यहां गेंहू की फसल कट चुकी थी। वहीं सुरेंद्र चौधरी के खेत में अभी भी गेंहू के खेत हरियाली से भरे हुये थे और उनमें तालाब के पानी से सिंचाई की जा रही थी। इस प्रकार हम देखते हैं कि जल की उपलब्धता से श्री सुरेंद्र चौधरी द्वारा लगातार व क्रमवार खेतों में अलग-अलग किस्मों की बुवाई कर मौसम की इस मार से फसलों के होने वाले नुकसान को न्यूनतम किया गया है।

श्री सुरेंद्र चौधरी द्वारा पल्टी-हल (रिवर्सिबल प्लाऊ) से हर तीसरे वर्ष गहरी जुताई की जाती है इसके परिणाम स्वरूप उनके यहां खरपतवार की समस्या काफी कम हुई है। इससे न केवल उनकी उत्पादन लागत में कमी आई बल्कि वर्षा के जल को ज़मीन में रिसने का अधिक मौका मिलता है और खेतों से जल अपवाह भी कम होता है तथा खेतों में जल जमाव भी काफी कम होकर फसलों को नुकसान से बचाता है।

वैज्ञानिकों की सलाहनुसार श्री सुरेंद्र चौधरी द्वारा लिहोसीन (क्लोरमिक्वाट क्लोराइड) ग्रोथ रेग्यूलेटर का उपयोग किया गया जिसके कारण गेंहू की फसल में अनावश्यक वानस्पतिक वृद्धि न होकर जड़ों की मज़बूती  प्राप्त की गई। जिससे फसल उत्पादन में वृद्धि हुई है साथ ही अधिक ऊँचाई ना होने के कारण पाला, ओला, भारी वर्षा एवं तेज हवाओं के कारण उनकी गेंहू की फसल ज़मीन पर गिर (स्वकहपदह) नहीं पाई और उनका नुकसान अन्य किसानों की तुलना में काफी कम हुआ। उनके द्वारा गेहूं की एक किस्म में 60 क्विटल प्रति हेक्टेयर के मान से उत्पादन लिया गया जो कि लगभग उस किस्म की अधिकतम क्षमता के अनुरूप पाई गई। जबकि अन्य किसानों के यहां लगभग 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से यही किस्म उत्पादित की गई।

यह न केवल आस-पास के किसानों के लिए कौतुहल का विषय है बल्कि वैज्ञानिकों/अधिकारियों व कृषि विज्ञान के छात्रों के लिए एक वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त करने का साधन बन गया है। आज भी श्री सुरेंद्र चौधरी के आस-पास मौजूद अन्य किसानों की तुलना करने पर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जल उपलब्धता बढ़ने के कारण इनकी फसलों व अन्य किसानों की फसलों में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। यह निश्चित ही सफलता की कहानी है और इस क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

(लेखक डाॅ. दीपक हरि रानडे ‘शुष्क खेती क्रियात्मक अनुसंधान परियोजना’, कृषि महाविद्यालय इन्दौर (मध्यप्रदेश) से जुड़े हुए हैं।) मो.नं. 9826605965 ईमेल: dhranade@rediffmail.com)

 

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