जल संरक्षण एवं प्रबंधन में तालाबों की महत्ता

Submitted by UrbanWater on Sat, 06/20/2020 - 03:09
Source
जल चेतना, खण्ड 7, अंक 2, जुलाई 2018, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की-247667

तालाबों की शृंखला; फोटो : needpix.comतालाबों की शृंखला; फोटो : needpix.com

पानी मानव की ही नहीं, प्रत्येक प्राणी की आवश्यकता है। इसके बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। प्रकृति बड़ी दयालु है जो हर वर्ष वर्षा के मौसम में नदी, नाले, तालाब, झील आदि को पानी से लबालब भर देती है। यदि हम इनमें एकत्र जल को संजोकर रख सकें, तो यह आने वाले जल-संकट से मुक्ति दिला सकता है। 

यदि तालाब सूखे पड़े रहें तो पेयजल का संकट और गहरा सकता है। तालाब से ही भूमिगत जलस्रोतों में पानी की आवक होती है। कुएँ और ट्यूबवेल में तभी तक पानी आता है जब तक तालाब में पानी होता है। एक तालाब अपने आसपास के कई किलोमीटर क्षेत्र में भूमिगत जलस्रोतों का पोषण करता है। इससे पेयजल व्यवस्था सुगम और सुचारू हो सकती है। वर्षा के जल अथवा बहते पानी को रोककर रखे जाने हेतु तालाबों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। अन्यथा वर्षा के दिनों में झरने आदि का पानी व्यर्थ में बह जाता है।

तालाब न केवल इंसान की प्यास बुझाते हैं अपितु पशु-पक्षी भी यहां आकर पानी पीते हैं, इसलिए यह जीवनदायी है। इसके अलावा, किसान अपने खेतों की सिंचाई भी इससे करते हैं। अन्यथा खेत सूखे रह जाएं। तालाबों की बदौलत ही खेत और फसल लहलहा उठती है। आज भी बहुसंख्यक किसान सिंचाई के लिए तालाबों पर ही निर्भर हैं। तालाबों द्वारा सिंचाई करने के कई लाभ हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वर्षा के पानी का उचित उपयोग होता है यानी वह बेकार नहीं जाता। 

तालाब का निर्माण 

तालाब का निर्माण प्राकृतिक रूप से भी होता है अथवा मानव द्वारा भी उसको बनाया जाता है। निचले इलाके की ज़मीन पर पानी भर जाने से वहां तालाब स्वतः निर्मित हो जाते हैं। मानव निर्मित तालाबों को कृत्रिम तालाब कहा जाता है। ये कच्चे और पक्के दोनों प्रकार के हो सकते हैं। आमतौर पर ये सतह से नीचे होते हैं, लेकिन इन्हें सतह के ऊपर भी बनाया जा सकता है। 

रिसन तालाब उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं। जहां कम गहराई की मिट्टी होती है। इसमें वर्षा का जल रिस-रिस कर कुछ ही समय में ज़मीन की निचली स्तरों में चला जाता है। इस तरह के तालाबों से भूमिगत जल भंडार समूह होते हैं।

तालाब दो तरह के बनाए जाते हैं-जल संग्रहण तालाब तथा रिसन तालाब। जलभरण तालाब में पानी अधिक समय तक भरा रहता है जिसका इस्तेमाल सिंचाई, पशुओं के पीने आदि में किया जाता है। ऐसे तालाब चिकनी, अपारगम्य मिट्टी वाले क्षेत्रों में बनाए जा सकते हैं। इसका पानी निचली सतहों में रिसकर जाने की आशंका कम रहती है।

मानव निर्मित तालाब आमतौर पर समतल क्षेत्रों में होते हैं। इसके लिए सबसे निचले हिस्से का चयन किया जाता है। तालाब की सीमा रेखा का निर्धारण करके उसे खोदा जाता है। खुदाई के दौरान निकली मिट्टी को तालाब के चारों तरफ एक मजबूत मेंड़ के रूप में जमाकर रोलर द्वारा ठीक से दबा दिया जाता है।

यदि तालाब का खुली सतह का क्षेत्रफल अधिक है, तो पानी के भाप बनकर उड़ने की संभावना अधिक रहती है। लेकिन उसकी लंबाई, चौड़ाई या गोलाई को कम रखते हुए गहराई बढ़ा दी जाए, तो न केवल जल संग्रहण अधिक मात्रा में होगा अपितु उसके भाप बनकर उड़ने की मात्रा में भी कमी आती है और पानी काफी लंबे समय तक बना रहता है।

तालाब निर्मित करते समय यदि कुछ बातों का ध्यान रखा जाए, तो उसका निर्माण सार्थक होता है अन्यथा लागत तो बहुत आ जाती है साथ ही वांछित परिणाम भी नहीं निकलते। कुछ तकनीकी पहलू ऐसे हैं जिन पर तालाब निर्माण के दौरान ध्यान देना जरूरी है। जिस क्षेत्र में तालाब निर्माण किया जाना हो, उसमें जल संचयन की क्षमता वहां की अधिकतम वर्षा गति और मात्रा से दोगुना रखी जानी चाहिए। इससे तालाब फूटने की आशंका नहीं रहती। इसी प्रकार, तालाब से जल निकास की गति को धीमा करने के लिए तालाब का जल निर्गम मार्ग गोलाई में घुमावदार बनाना चाहिए। कटाव को रोकने के लिए पिचिंग लगाना चाहिए।

नए तालाब बनाते समय उस स्थान को प्राथमिकता देनी चाहिए जो निचले स्तर पर हो तथा पर्याप्त मात्रा में प्राकृतिक रूप से पानी भरता हो। तालाब बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह बीच में गहरा तथा किनारों पर उथला हो। इससे आगम मार्ग में जल की गति धीमी होने से किनारों का कटाव नहीं होता। तालाब की जल संग्रहण की क्षमता में कमी नहीं आए, इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। जैसे तालाब में पानी आने के मार्ग में बालू रेत, गोल बजरी, बारीक गिट्टी, मोटी गिट्टी तथा बोल्डर की परतों को लगा देना चाहिए। इससे तालाब में मिट्टी आने से रोक लगेगी। इसी तरह, पानी के बाहर निकलने के मार्ग पर भी रिवर्स फिल्टर लगा देने चाहिए। 

विस्तार 

वैसे तो तालाबों से सिंचाई संपूर्ण भारत में होती है, लेकिन पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक आदि में यह सिंचाई का प्रमुख साधन है। यदि सपंर्ण देश की बात करें तो कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 5 प्रतिशत तालाबों से ही सींचा जाता है।

समस्या 

वर्षा जल को तालाबों के माध्यम से सहेजने के ठोस प्रयास करने होंगे। अभी जो प्रयास हो रहे हैं वे महज कागजी खानापूर्ति है, इससे अधिक और कुछ नहीं। यही कारण है कि तालाबों में पानी का नामोनिशान नहीं है।

समय की आवश्यकता को देखते हुए न केवल नए तालाब बनाना जरूरी है अपितु पुराने और अनुपयोगी तालाबों का भी सीमांकन, गहरीकरण तथा जीर्णोद्धार करना जरूरी है। पुराने तालाबों का अस्तित्व फिर से लाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में जनभागीदारी समितियों की तालाब निर्माण और रखरखाव में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। पंचायतों में सक्रियता, शासन का सहयोग औेर जनभागीदारी से मृतप्रायः तालाबों का कायाकल्प किया जा सकता है।

जब से लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए तालाबों को पाटना शुरू किया, तालाबों के बुरे दिन शुरू हो गए और वे मैदान बनते चले गए। इसके अलावा, तालाबों के आसपास अतिक्रमण हो रहा है। भ-ू माफिया वहां नई- नई कालोनियां बना रहे हैं तथा तालाबों में पानी की आवक के स्रोतों को बंद कर देते हैं। ऐसे में तालाब पूरी तरह भर नहीं पाता और समय से पूर्व सूख जाता है। यह सब शासन-प्रशासन और प्रभावशाली नेताओं की मिलीभगत से होता है। इंसानी स्वार्थ इतना हावी हो जाता है कि जनहित की बलि दे दी जाती है।

सरकार को चाहिए कि वे नए-नए तालाबों का निर्माण कराए तथा पहले से निर्मित तालाबों का गहरीकरण और चौड़ीकरण कराए। जब तालाब की गहराई और चौड़ाई बढ़ेगी, तो उसमें जल संग्रहण की क्षमता बढ़ेगी। परिणामस्वरूप वर्षभर पानी बना रहेगा। सच तो यह है कि तालाब एक महत्वपूर्ण और मूल्यवान आर्थिक संपत्ति है जिस पर देश की कृषि और आर्थिक विकास निर्भर है। इनसे संपूर्ण जीवमंडलीय पारिस्थितिकी तंत्र नियंत्रित होता है। तालाब का जल न केवल मनुष्यों और अन्य जीवों के लिए आवश्यक है, वरन वनस्पतियों, कृषि, उद्योग, परिवहन एवं ऊर्जा उत्पादन के लिए भी जरूरी है।

तालाबों में प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। तालाबों में जिन स्थानों पर बहता पानी आता है तो वहां की ज़मीन में मिली गंदगी और खनिज भी उसके साथ आ जाते हैं। यदि रास्ते की ज़मीन में आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम तथा पारा होता हो तो वह जल को दूषित कर देता है। इसके अलावा मानव द्वारा तालाब किनारे शौच करना या पशुओं द्वारा मल मूत्र त्यागने से भी तालाब प्रदूषित हो जाते हैं। मानव की विभिन्न गतिविधियों के फलस्वरूप तालाबों में अपशिष्ट पदार्थों के मिलने से भी प्रदूषण होता है। तालाबों का स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त रहना भी जरूरी है। जल-मल के उपचार की समुचित सुविधाएँ सभी छोटे-बड़े शहर और गाँवों में होनी चाहिए ताकि तालाब प्रदूषण मुक्त रहें। पेयजल के लिए बनाए गए तालाबों के चारों ओर दीवार या अन्य व्यवस्था स्थापित कर गंदगी के प्रवेश को रोका जाना चाहिए।

महत्ता

यदि कृषि में तालाबों द्वारा सिंचाई को प्राथमिकता दी जाती है तो इससे न केवल कृषि उत्पादन बढ़ेगा अपितु हम कृषि उपजों का निर्यात भी कर सकेंगे। यही नहीं, अनाज के आयात में कमी भी आएगी। खाद्यान्नों की पूर्ति बढ़ने से देश की खाद्य समस्या भी हल हो सकती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन भी एक मुख्य व्यवसाय के रूप में अपनाया गया है। पशुओं को भी जिंदा रहने के लिए पानी की आवश्यकता होती है। यदि तालाबों में लबालब पानी भरा हो तो पशुओं को राहत मिल सकती है। पशुओं को खाने के लिए चारा चाहिए होता है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में तालाब हों तो उसके आसपास की भूमि में नमी बनी रहती है जिससे चारा उग सकता है और इस तरह चारे की समस्या समाप्त हो सकती है।

भारतीय कृषि आज भी परंपरागत तकनीक से की जा रही है जिसमें तालाबों का अपना महत्व है। परंपरागत खेती में तालाबों से सिंचाई की जाती है। वैसे भी अधिकांश किसान छोटी जोत वाले हैं जिनके पास सिंचाई के अपने निजी स्रोत नहीं हैं। ऐसे में तालाबों पर उनकी निर्भरता बढ़ जाती है। सिंचाई के अभाव में किसान वर्ष में एक ही फसल ले पाता है। यदि तालाबों के माध्यम से सिंचाई की जाए तो एक ही वर्ष में कई फसलें ली जा सकती हैं। ग़ौरतलब है कि भारत में केवल 45 प्रतिशत कृषि भूमि को ही सिंचाई की सुविधाएँ मिल पाती हैं। शेष मानसून पर निर्भर हैं।

तालाबों की महत्ता इसलिए भी है कि देश में वर्षा की अनिश्चितता है। वह अनियमित और असामयिक भी है। इसके अलावा, वर्षा की प्रकृति मौसमी है। जुलाई से सितम्बर के बीच होने वाली वर्षा से खरीफ की फसल तो तैयार हो सकती है, लेकिन बाद की फसलों के लिए तो पानी चाहिए ही, जो तालाबों से आसानी से मिल सकता है। कछु फसलांे में अधिक पानी की जरूरत होती है। ऐसे में तालाबों की उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता है।

तालाब निर्माण में लोगों को रोज़गार भी मिलता है। तालाब को बनाने, उसे चौड़ा या गहरा करने के लिए मज़दूरों की जरूरत होती है, अतः लोगों को अतिरिक्त रोज़गार उपलब्ध हो सकता है। वैसे भी भारतीय कृषि करीब 55 प्रतिशत जनसंख्या को प्रत्यक्ष रूप से तथा इसके अलावा, अप्रत्यक्ष रूप से भी लोगों को रोज़गार प्रदान करती है। जब तालाब निर्माण में मज़दूरों को रोज़गार मिलेगा तो उनकी आमदनी बढ़ेगी और उनका जीवन स्तर भी बढ़ेगा।

तालाब में मछली पालन को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे मछलियों का उत्पादन भी बढ़ेगा। मछुआरे अपना जाल डालकर मछलियाँ पकड़ कर उन्हें बाजार में बेच सकते हैं। यदि शासन या स्थानीय निकाय मछली पालन को ठेके से देता है, तो इससे उसे भी आमदनी होगी। इस तरह से तालाबों का राजस्व में भी योगदान हो सकता है।

गांव हो या शहर यदि बड़े और गहरे तालाब हो तो वे अपनी बस्ती की पेयजल व्यवस्था का समाधान बन सकते हैं। स्थानीय निकायों को तालाब जल प्रबंधन के लिए उचित रणनीति तैयार करनी चाहिए ताकि तालाबों का पानी आमजन को पेयजल के रूप से मुहैया कराया जा सके।

तालाबों का गहरीकरण और चौड़ीकरण आज समय की मांग है क्योंकि जल की आवश्यकता विभिन्न ज़रूरतों के लिए वर्षभर होती है। यदि तालाब सूखे रहेंगे तो कुओं में जल कहां से आएगा? आसपास के खेत मैदान बन जाएंगे। पशु प्यासे मर जाएंगे और इंसान पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार करते नजर आएँगे।

जल के प्रत्येक साधन या स्रोत का अपना महत्व है। पानी के लिए कुओं का इस्तेमाल सदियों से होता आया है। ये कच्चे और पक्के दोनों हो सकते हैं। अधिकांश कुएँ कच्चे हैं। नलकूप या ट्यूबवेल में बिजली या डीजल पंपों से पानी निकाला जाता है। अधिकांश कुएँ किसानों के खेत में ही होते हैं। यदि आसपास तालाब हुआ तो कुओं में पानी की आवक निरंतर बनी रहती है।

 

(किरण बाला 43/2, सुदामानगर, रामटेकरी, मन्दसौर (मप्र) - 458 001, मो. 9826042811 ईमेल: anucomputer@rediffmail.com)

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