जल घोषणापत्र बनाकर करें नये साल का आगाज

Submitted by Hindi on Thu, 01/05/2012 - 15:41

महान गुरु गुरुनानक जी ने जिस नदी के किनारे बैठकर तप किया था, वह ही सूखने के कगार पर है। पंचनद का दंभ टूट चुका है। अपनी प्यास की चिंता छोड़कर कभी गधों को पानी पिलाने वाला प्रदेश अपने पानी को संभालने में असमर्थ साबित हो रहा है। जरूरत पंजाब को कम पानी की खेती व बागवानी की ओर लौटाने की है। पनबिजली परियोजनाओं के नाम पर हुई लूट ने उत्तराखण्ड की नदियों और आबोहवा का देवत्व नष्ट कर दिया है। झरने सूखा दिए हैं। गांव हिला दिए हैं। जंगल के नाम पर लगे इमारती दरख्तों और आगजनी के खेल ने पानी व धरती दोनों के अमरत्व को अम्ल में बदलना शुरु कर दिया है।

यूं तो नये साल का आगाज हो चुका। आपकी जिंदगी में भी दुआओं का आदान-प्रदान हुआ ही होगा। कई को तोहफे भी मिले होगें। किंतु वर्ष-2012 का आगाज होते-होते दिल्ली जलबोर्ड ने जैसा जेबकाटू तोहफा दिल्लीवासियों को दिया है, वैसा शायद किसी और ने नहीं दिया होगा। पहले से ही पानी के बड़े बिल की मार झेल रही दिल्ली में बोर्ड द्वारा जलशुल्क में 10 प्रतिशत वृद्धि की घोषणा कर दी गई है। यह जेबकाटू तोहफा सिर्फ इसी साल के लिए नहीं है। अब से हर वर्ष दिल्ली के जलशुल्क में 10 फीसदी की वृद्धि हो जायेगी। असल में दिल्ली जल बोर्ड का यह नीतिगत फैसला उस निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने की दृष्टि से की गई जुगत का नतीजा है, आगे चलकर जिसे दिल्ली की जलापूर्ति सौंपी जायेगी। इसी तैयारी में जलबोर्ड के मीटर रीडर ढूंढ़ -ढूंढ़कर बंद संपत्तियों के ब्यौरे एकत्र कर रहे हैं। पुराने बकाया की सूची बना रहे हैं। बीते दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा दिल्ली सरकार को दी धमकी के बावजूद यह स्पष्ट संकेत है कि वित्त वर्ष 2011-2012 के बाद दिल्ली की जलापूर्ति निजी कंपनियों को सौंपने का मानस बना लिया गया है। इसे दिल्ली के सौ साल पूरे होने पर दिल्लीवासियों से हर बरस नजराना वसूलने की कवायद भी कह सकते हैं।

21वीं सदी की दिल्ली अपने निजीपन में आसक्त लोगों की दिल्ली है। यह पलायित हवा, पानी, भोजन व इंसानों का शहर है। लोग यहां हैं, लेकिन उनकी जड़ें यहां नहीं हैं। इस मनोवैज्ञानिक कारण से अलबत्ता तो यहां विरोध होता नहीं; होता भी है, तो एक इवेंट भर। वह भी प्रायोजित! अतः मैनेजेबल होता है। लेकिन पूरा देश तो ऐसा नहीं है। पानी के गहराये संकट लोगों की आजीविका तबाह कर रहे हैं। उन्हें उनकी जडों से उखाड़ रहे हैं। निजीकरण पानी पर पब्लिक की पकड़ दूर करने आ ही रहा है। अतः पानी की लूट और कंगाली...दोनो से निजात पाना जरूरी है। पानी पर प्यासों को हकदारी दिलाना जरूरी है। क्या नूतन वर्ष के इन शुरुआती दिनों को हम पानी के मसले पर किसी ऐसी ही खास आगाज के मुबारक मौके में नहीं बदल सकते? अपने-अपने राष्ट्र, प्रांत, जिला, तहसील न सही, तो कम से कम मोहल्ला-गांव को पानीदार बनाने के लिए शासन-प्रशासन-समाज को बाध्य करने की कोई छोटी सी पहल तो हम कर ही सकते हैं।

पानी के उक्त प्रश्नों के बीच मूलभूत प्रश्न यह है कि आखिर वोटर कब तक राजनेता और राजनीतिक दलों के वादों-इरादों पर वोट देता रहेगा? आखिरकार वोटर का भी तो अपना कोई एजेंडा होना चाहिए। दल अपना चुनावी घोषणापत्र बनाते हैं। हमें अपने गांव- मोहल्ले-विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र का जन घोषणापत्र क्यों नहीं बनाना चाहिए? पब्लिक का पब्लिक मैनिफैस्टो। यह क्यों नहीं हो कि आने वाले दलों व प्रत्याशियों के सामने हम अपना घोषणापत्र रखें? उस पर प्रत्याशियों व दलों से लिखित संकल्प लें? मनरेगा में ग्रामसभा को सोशल ऑडिट की हकदारी मिली है, तो क्यों न हम विधायक/सांसद निधि के पब्लिक ऑडिट की हकदारी को पब्लिक मैनिफैस्टों का हिस्सा बनायें? पानी - जीवन व आजीविका की प्राथमिक जरूरत है, तो क्यों न जनघोषणा पत्र में जलघोषणा को प्राथमिकता पर लायें? एक पुख्ता जल घोषणापत्र बनायें! मौका सामने है। भारत के पांच राज्यों में चुनावों की घोषणा हो चुकी है। पंजाब, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, गोवा और मणिपुर। चार मार्च को नतीजे भी आ ही जायेंगे।

टिहरी बांध साइट पर भूस्खलन की वजह से बढ़ती संकटटिहरी बांध साइट पर भूस्खलन की वजह से बढ़ती संकटपंजाब में तेजी से बढ़ते डार्क जोन और गहराते भूजल प्रदूषण की चिंता डराने वाली है। महान गुरु गुरुनानक जी ने जिस नदी के किनारे बैठकर तप किया था, वह ही सूखने के कगार पर है। पंचनद का दंभ टूट चुका है। अपनी प्यास की चिंता छोड़कर कभी गधों को पानी पिलाने वाला प्रदेश अपने पानी को संभालने में असमर्थ साबित हो रहा है। जरूरत पंजाब को कम पानी की खेती व बागवानी की ओर लौटाने की है। जरूरत छोटी-छोटी जलसंरचनाओं को पुनः पानी से भर देने के लिए पर्याप्त मदद देने के शासकीय निर्णयों की भी है। कब होगा? पनबिजली परियोजनाओं के नाम पर हुई लूट ने उत्तराखण्ड की नदियों और आबोहवा का देवत्व नष्ट कर दिया है। झरने सूखा दिए हैं। गांव हिला दिए हैं। जंगल के नाम पर लगे इमारती दरख्तों और आगजनी के खेल ने पानी व धरती दोनों के अमरत्व को अम्ल में बदलना शुरु कर दिया है। पानी पिलाने के नाम पर आये इंडिया मार्का हैंडपम्प भी अब प्यास बुझाने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। इनका असर अब सीधे गढ़वाली-कुमाउंनी खेतिहरों पर पड़ने लगा है। आगे पूरे भारत पर पड़ेगा। उत्तराखण्ड के गांव अब बिजली नहीं... पानी, खेती और पलायित हो रही जवानी को वापस लौटाने की मांग कर रहे हैं। विधानसभा प्रत्याशियों से पूछिए- दे सकेंगे?

उत्तर प्रदेश के एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश की जमीन और पानी के लूटेरे साबित हो रहे हैं। पहले एक “पटवारी का लरिका जुल्म करे” वाले जुमले का गीत बजता था, अब जाने किनके-किनके लड़के जुल्म कर रहे हैं। गंगा-यमुना किनारे जेपी के लड़कों से लेकर आमी, सई, गोमती, हिंडन पर भवानी-बजाज-त्रिवेणी के लड़कों तक। यहां पानी पर जुल्म के लिए कोई रोक नहीं है। क्या पूछना नहीं चाहिए कि यह रोक कब लगेगी? गोवा में समंदर है। झरने हैं। तालाब हैं। पक्की पालें हैं। तालाबों में केला-सुपारी-नारियल की फसलें हैं। इन सबके किनारे ही गोवा का विकास है। उत्सव हैं। जिंदगी है। आजीविका है। सब समझते हैं। बावजूद इसके गोल्फकोर्स को मर्सोला का सारा पानी पीने की इजाजत है। सोनसोहा कचराघर में तब्दील हो रहा है; साथ में सोनसोहा के तालाब भी। सालमोला, सालिंग और मारकेश जैसे सुंदर प्राकृतिक झरनों को प्रदूषित करने की मौन स्वीकृति है ही। यही दस्तूर रहा, तो कल गोवा की माण्डवी नदी का भी यही हाल होगा। तब? आखिर इस दस्तूर पर प्रश्न चिन्ह लगाने का काम कोई तो करेगा। कौन?

मणिपुर में पानी है; फिर भी पानी का संकट हैं। पानी नीचे है। लोग पहाड़ों पर बसते हैं। पहाड़ का पानी किसने सुखाया? यदि समाज पहाड़ का पानी वापस लौटाने की जुगत करे भी, तो अनेक कानूनी अवरोध हैं। उन्हे कौन दूर करेगा? भारत के सभी हिमालयी प्रदेशों को विकास की अलग नीति, योजना व बजट की जरूरत है; या कहिए कि जरूरत केंद्रीय स्तर पर एक अलग विभाग की ही। यह प्रश्न कौन उठायेगा? मैं अपने गांव का जल घोषणापत्र बनाकर प्रत्याशी से क्यों नहीं पूछ सकता कि मेरे गांवों के सातों तालाब कब कब्जामुक्त होंगे? मेरी विधानसभा की इकलौती नहर में खेती की जरूरत पर पानी आने की गारंटी कब मिलेगी? मैं या मेरी बेटी मेरी प्रादेशिक नदी की कालिमा को नीलिमा में बदलते कब देख सकेंगे? मैं क्यों नहीं पूछ सकता कि मेरे नगर के नल में पीलिया के प्रवाह की बजाय सेहत की धारा कब बहेगी? बताइए क्यों नहीं??

कोई मुझे बताये कि हर गांव.. हर शहर को क्यों नहीं बनाना चाहिए अपना जल और जन घोषणापत्र???

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