जल में जहर

Submitted by Hindi on Wed, 06/01/2011 - 09:31
Source
जनसत्ता, 12 मार्च 2011

यमुना में पिछले कुछ सालों से गंदगी का स्तर इस कदर बढ़ता गया है कि बाहर से आने वाले पानी में मिली मामूली गंदगी भी जलशोधन संयंत्रों के लिए चुनौती साबित होती है। इसलिए संपन्न लोगों ने अपने घरों में अलग से जलशोधन यंत्र लगा रखे हैं। मगर अधिसंख्य लोग जल बोर्ड का पानी सीधे इस्तेमाल करते हैं।

दिल्ली जल बोर्ड के पानी में गंदगी की शिकायतें अक्सर सुनने को मिलती हैं। मगर तमाम वादों के बावजूद पाइप लाइनों को सुधारने और बदलने के कदम नहीं उठाए जाते। इसी का नतीजा है कि ज्यादातर इलाकों में लोग सीवर की गंदगी मिला पानी पीने को मजबूर हैं। खुद दिल्ली नगर निगम के लोक स्वास्थ्य विभाग ने खुलासा किया है कि दिल्ली जल बोर्ड के पानी में अठारह से बीस फीसद तक सीवर की गंदगी मिली होती है। विचित्र है कि जल-जनित बीमारियों से बचाव संबंधी विज्ञापनों में दिल्ली जल बोर्ड अपने पानी के निरापद होने का दावा करता है। दिल्ली सरकार और जल बोर्ड इस तथ्य से अनजान नहीं हैं कि पीने के पानी में गंदगी घुलने की बड़ी वजह यहां की जर्जर और जगह-जगह से फट चुकी पाइप लाइनें हैं। मगर जब भी इन्हें बदलने की बात उठती है, बोर्ड पैसे की कमी का रोना रोकर छिटपुट रूप से कुछ फौरी कदम उठाने के अलावा और कुछ नहीं करता।

दिल्ली में जल आपूर्ति की ज्यादातर पाइप लाइनें सीवर लाइनों के साथ बिछाई गई हैं। ऐसे में जब भी पाइप लाइनों में टूट-फूट होती है, सीवर की गंदगी उनमें आसानी से घुल-मिल जाती है। जल बोर्ड इसके लिए किसी दूसरे महकमे को दोषी बता कर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता, क्योंकि सीवर लाइनों की देखभाल की जिम्मेदारी भी उसी पर है। खुद बोर्ड का कहना है कि दर्जनों इलाकों में पिछले बारह सालों से पाइप लाइनें बदली नहीं गई हैं। हकीकत यह है कि बहुत सारे इलाकों में पाइप लाइनें पचास साल से भी अधिक पुरानी हैं। जंग लगने की वजह से वे इस कदर जर्जर हो चुकी हैं कि पानी का दबाव पड़ते ही उनके जोड़ खुल जाते हैं।

बोर्ड की कार्य-प्रणाली का आलम यह है कि पानी के पाइपों में टूट-फूट की मरम्मत में बोर्ड को कई दिन लग जाते हैं। भारत में सबसे अधिक लोग जल-जनित बीमारियों से पीड़ित हैं। हर साल हजारों लोग पीलिया, आंत्रशोथ, हेपेटाइटिस जैसे रोगों की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं।

इन रोगों पर काबू पाना स्वास्थ्य विभाग के सामने बड़ी चुनौती है। वह पानी को छान और उबाल कर पीने की हिदायत देता रहता है। मगर जब जल बोर्ड के पानी में ही गंदगी घुली हो तो ऐसे एहतियाती उपाय भी कारगर साबित नहीं होते। दिल्ली में जल आपूर्ति मुख्य रूप से यमुना पर निर्भर है। यमुना में पिछले कुछ सालों से गंदगी का स्तर इस कदर बढ़ता गया है कि बाहर से आने वाले पानी में मिली मामूली गंदगी भी जलशोधन संयंत्रों के लिए चुनौती साबित होती है। इसलिए संपन्न लोगों ने अपने घरों में अलग से जलशोधन यंत्र लगा रखे हैं। मगर अधिसंख्य लोग जल बोर्ड का पानी सीधे इस्तेमाल करते हैं। जाहिर है, वे कई तरह की बीमारियां होने के खतरों के बीच जी रहे हैं। हालांकि यातायात आदि के मद्देनजर अनेक इलाकों में पाइप लाइनों को बदलना खासा मुश्किल काम है, मगर इस दलील पर दिल्ली जल बोर्ड को लोगों को दूषित पानी पीने के लिए अभिशप्त छोड़ देने का आधार नहीं मिल जाता।

खुदाई में इस्तेमाल होने वाली अत्याधुनिक मशीनों के जमाने में पाइप लाइनें बदलने को लेकर दिल्ली सरकार और जल बोर्ड को हिचक क्यों होनी चाहिए!

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