जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव एवं खाद्य सुरक्षा-एक चुनौती

Submitted by RuralWater on Thu, 03/05/2020 - 14:30
Source
पर्यावरण विज्ञान एवं जलवायु-समुत्थानशील कृषि केंद्र, भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली

सारांश

गत वर्ष भारत सरकार ने किसानें की आय को दोगुना करने का एक महत्त्वपूर्ण संकल्प लिया है। जिसके अंतर्गत सभी प्रकार के किसानों की आय को बढ़ाने हेतु विभिन्न प्रकार के निर्णय लिए गए हैं जैसे कि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाना, सब्सिडी द्वारा किसानों के खातों में न्यूनतम राशि जमा करना एवं कृषि सम्बंधित उपकरणों को रियायती दरों पर उपलब्ध कराना आदि शामिल है। परन्तु सही-मायने में किसानों कि उन्नति का मार्ग कृषि उत्पादकता में वृद्धि द्वारा ही प्रशस्त हो सकता है। आज के युग में अधिक उपज वाली किस्में, पर्याप्त मात्रा में रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता तथा दक्ष व उन्नत कृषि वैज्ञानिक पद्दतियों का उपयोग कर, देश ने खाद्यानों की उत्पादकता में आत्म निर्भर होने का आयाम प्राप्त कर लिया है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ लगातार बढती आबादी, सीमित भूमि संसाधन व अधिक से अधिक जल की आवश्यकता, इस निरंतर वृद्धि में अवरोध पैदा करते जा रहें हैं। हालांकि पिछले वर्षों में भारत देश खाद्यानों के उत्पादन में वृद्धि दर्ज कर रहा हैं परन्तु खाद्यानों की उत्पादकता में बढ़त बनाए रखना एक चुनौतिपूर्ण कार्य है विशेषकर जब जल संसाधनों की उपलब्धता निरंतर घटती जा रही हो।

इस संदर्भ में उपलब्ध आंकड़ों व जानकारी के आधार पर एक विश्लेषण किया गया है जो यह दर्शाता है कि भारत की जनसंख्या विश्व जनसंख्या का लगभग 17 प्रतिशत है जबकि भूमि क्षेत्रफल में भारत विश्व क्षेत्रफल का केवल 2.4 प्रतिशत ही है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 1950-51 से अब तक, भारत में खाद्यानों का उत्पादन व सिंचित प्रतिशत क्षेत्रफल में समानुपातिक सम्बन्ध पाया गया है। अतः खाद्यानों के उत्पादन में जल संसाधनों की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ) के अनुसार विश्व में कुल जल प्रयोग का 70 प्रतिशत ही कृषि के लिए उपयोग में लाया जाता है परन्तु भारत में यह आंकड़ा 1990 में 87 प्रतिशत व 2010 में 85 प्रतिशत है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर कम होते जा रहे हैं अतः सिंचाई हेतु सतही जल का विस्तार लगभग नगण्य है। ऐसी परिस्थिति में, विशाल क्षेत्रफल को सिंचित करने के लिए भूजल दोहन ही एक मात्र विकल्प बच जाता है जिसके फलस्वरूप देश के अधिकतर हिस्सों में भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है। वर्षा की अनियमितता, इस समस्या को और प्रज्ज्वलित कर रही है अतः सिंचाई की लिए अधिक ऊर्जा व धन का व्यय होना निश्चित है। प्रायः जन समुदाय में यह धारणा रहती है कि जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है जिसके फलस्वरूप इस संसाधन का बहुत दुरुपयोग हुआ है। भूजल के अति दोहन से ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि भूजल स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। वह दिन दूर नहीं जब जल के अभाव में खाद्यानों के उत्पादन क¨ लेकर एक विकट समस्या पैदा हो जाएगी, ऐसी विकट स्थिति से बचने की लिए उपलब्ध जल संसाधनों का प्रबंधन अति आवश्यक है। इस विषय में कुछ सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं जिनको कार्यान्वित कर खाद्यानों के उत्पादन में स्थिरता कायम रह सकती है।

Abstract

Recently, the Government of India has resolved to double the income of farmers andhas taken several important decisions such as raising the minimum support price of crops, microloans to farmers, depositing certain amount in the accounts of farmers in form of subsidy, making agriculture related equipments available at concessional rates, timely availability of fertilizers and ensuring quality of agrochemicals etc. But in the true sense, the path of progress of farmers can be enhanced only by increasing the agricultural productivity which can be achieved by using high yielding varieties, adequately judicious use of chemical and biological nutrients and using efficient agronomic and farm management practices. However, the progress on this front can be restricted by challenges of climate change, continuously increasing population, limited land resources andincreasingly water requirement. Thus, despite of registering increase in food grains production over the past years, it is important to maintain and sustain an increase in the productivity of food grains, especially when the availability of water resources is continuously declining.According to the data, from 1950-51 till now, a proportional correlation has been shown in food grain production and irrigated percentage area which signifies the role of water resources in the production of food grains. According to the Food and Agriculture Organization (FAO), 70 percent of the total water use in the world is used for agriculture, but in India this figure hovered around 87 percent in 1990 and 85 percent in 2010. Glaciers are shrinking due to climate change, hence the expansion of surface water for irrigation is almost negligible. In such a situation, the only option left before us is to exploit the ground water to irrigate our cultivable lands, which has already resulted in decline of ground water level in most parts of the country. The irregularity of rainfall is further igniting this problem with significantly higher expenditurein the energy sector, thus leaving lesser resources for irrigation/water management. Often, there is a belief in the public community that water is available in sufficient quantity, due to which this resource has been often and almost always misused and uncared. However, the day is not far when scarcity of water for crop cultivation will severely impact the production of food grains. It is thus important to manage the available water resources under challenged environments to avoid such a grave agrarian crisis. Some implementable suggestions have been made in this paper, which can help in maintaining stability in the production of food grains even under conditions of limited water availability.

जनसंख्या वृद्धि की चुनौती

जनसंख्या वृद्धि व खाद्यानों की आवश्यकता समानुपातिक होती हैं। जनगणना आकड़ों के अनुसार, सन 2011 में, भारत की जनसंख्या 1.21 अरब हो चुकी है (चित्र-1)। जो कि विश्व जनसंख्या का 17.31 प्रतिशत थी। जब कि भूमि क्षेत्रफल के हिसाब से भारत विश्व क्षेत्रफल का केवल 2.4 प्रतिशत है। हांलाकि पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी दर्ज की गई है । फिर भी, एक अनुमान के अनुसार, सन 2024 में भारत विश्व स्तर पर जनसंख्या के क्षेत्र मंच प्रथम स्थान प्राप्त कर लेगा। भारत में तीव्र जनसंख्या वृद्धि के विभिन्न कारण है। जिसमें गरीबी, निरक्षरता व उच्च प्रजनन दर आदि मुख्य हैं । सन 1950-51 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल बुआई क्षेत्रफल 118.75 मिलियन हेक्टेयर था जो कि सन 2010-11 में 141.56 मिलियन हेक्टेयर हो गया था। इस प्रकार से 60 वर्षों में, बुआई क्षेत्रफल में लगभग 19.21 प्रतिशत कि वृद्धि दर्ज हुई है। जब कि इसी दौरान, जनसंख्या के क्षेत्र में यह वृद्धि 235 प्रतिशत आंकी गई है। अतः बुआई क्षेत्रफल वृद्धि दर व जनसंख्या वृद्धि दर में बहुत अधिक अंतर है। जिसके फलस्वरूप, जलवायु परिवर्तन व अन्य विपरीत परस्थितियों के साथ साथ जनसंख्या वृद्धि, खाद्यानों की आपूर्ति पर लगातार दबाव बनाए रखती है।

 चित्र 1 भारत में जनसंख्या वृद्धि चित्र 1 भारत में जनसंख्या वृद्धि

खाद्यानों के उत्पादन में जल संसाधनों की भूमिका

सन 2016-17 में भारत ने 275.11 मिलियन टन खाद्यानों का उत्पादन कर एक नई उपलब्धि हासिल की है। जो कि सन 1950-51 के आंकड़ों के आधार पर 441 प्रतिशत अधिक है (चित्र-2)। भारत में खाद्यानों कि सूची में गेहूं, चावल, दालें व को रस अनाज जैसे ज्वार, मक्का व बाजरा आदि मुख्य हैं। 1980 व 1990 के दशकों में खाद्यानों के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई है। जिसके लिए अधिक उपजाऊ बीज, प्रभावी उर्वरकों द्वारा फसलों का पोषण व उपयुक्त मात्रा में सिंचाई जल की उपलब्धता मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। चित्र-2 स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारत में जैसे जैसे सिंचाई क्षेत्रफल में वृद्धि होती गई वैसे वैसे ही खाद्यानों के उत्पादन में भी वृद्धि होती गई। अतः खाद्यानों के उत्पादन व सिंचाई क्षेत्रफल में सामानांतर वृद्धि से यह सिद्ध होता है कि खाद्यानों के उत्पादन में जल संसाधनों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। खाद्यानों के उत्पादन में जल संसाधनों की भूमिका को इस प्रकार भी दर्शाया जा सकता है कि सिंचाई क्षेत्रफल में निरंतर वृद्धि की कारण खाद्यानों की उत्पादन दर में भी निरंतर वृद्धि दर्ज कि गई है। आंकड़ों की अनुसार 1950-51 से 2016-17 तक खाद्यानों की उत्पादन दर में 522 से 2129 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर तक का सुधार दर्ज किया गया है। अतः खाद्यानों के उत्पादन में जल संसाधनों की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

 चित्र 2 भारत में खाद्यान्नों का उत्पादन व सिंचित प्रतिशत क्षेत्रफल चित्र 2 भारत में खाद्यान्नों का उत्पादन व सिंचित प्रतिशत क्षेत्रफल

जलवायु परिवर्तन का जल संसाधनों पर प्रभाव

हाल के कुछ वर्षो में यह पाया गया है कि भारत वर्ष ही नहीं अपितु पूरे विश्व में पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ रहा है। इस जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण मानवीय प्रक्रियाएं समझी जा रही है जैसे फॉसिल ईंधन का अत्याधिक उपयोग, कार्बन डाई ऑक्साइड व ग्रीन हॉउस गैसों का उत्सर्जन तथा वनों की कटाई आदि। वैज्ञानिकों का यह मानना है कि इस प्रकार जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि व जल संसाधनों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन के साथ अनावृष्टि (सूखा), जंगलों में आग व जल की गुणवत्ता में गिरावट की प्रबल सम्भावनाएं रहती हैं। पिछले कुछ दशकों से भारत में वर्षा जल की मात्रा में गिरावट दर्ज की गई है (चित्र-3)। जिसके कारण भूजल संभरण में कमी व कृषि पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। साथ ही यह भी देखा गया है कि भारी वर्षा की आवृत्ति निरंतर बढ़ती जा रही है जिसके फलस्वरूप अचानक बाढ़ आना व फसलों का नुकसान संभावित है। यदि वर्ष 2019 का ही उदारण ले लिया जाए तो यह प्रतीत होता है कि इस वर्ष सामान्य से बहुत अधिक वर्षा हुई है। परन्तु आंकड़ों के आधार पर यह सामान्य से केवल 5 प्रतिशत अधिक है (चित्र-4)। यदि वर्षा जल वितरण का विस्तार से विश्लेषण किया जाए तो देश भर में अति वर्षा जल क्षेत्र, सामान्य वर्षा जल क्षेत्र व न्यून वर्षा जल क्षेत्र से अधिक है। इस वर्ष सामान्य से अधिक वर्षा ह¨ने के बावजूद भी देश में कृषि उत्पादन का अनुमान कम आंका गया है। क्योंकि अधिक वर्षा व कम वर्षा क्षेत्रों में फसलों कि उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।888 जलवायु परिवर्तन के कारण आहिस्ता-आहिस्ता ग्लेशियरों द्वारा जल की आपूर्ति में भी कमी आती जा रही है। जिसके फलस्वरूप नदियों में जल स्तर प्राय कम होता चला जा रहा है। निरंतर जनसंख्या वृद्धि के कारण जल की अधिकाधिक मांगवश ज्यादातर रीवर बेसिनों में उपलब्ध जल की मात्रा में कमी आती जा रही है। अतः जलवायु परिवर्तन से जल संसाधनों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है जिसके फलस्वरूप किसानों की आय पर अनिश्चितताओं का संकट गहरा हो रहा है।

 चित्र 3 2001 से 2017 तक वार्षिक वर्षा जल वितरण चित्र 3 2001 से 2017 तक वार्षिक वर्षा जल वितरण  चित्र 4 2011 में वार्षिक वर्षा जल वितरण मानचित्र चित्र 4 2011 में वार्षिक वर्षा जल वितरण मानचित्र

भूजल स्तर में गिरावट के परिणाम स्वरूप महंगी सिंचाई

कृषि में सिंचाई जल का बहुत बड़ा महत्व है। किसानों में प्राय यह भ्रान्ति रहती है कि भूजल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। जिसके फलस्वरूप भूजल का अधिक से अधिक दोहन होना स्वाभाविक है। सिंचाई के लिए विभिन्न जल प्रयोग का विवरण चित्र-5 में विस्तृत रूप से दिया गया है। भूजल अति दोहन प्रक्रिया के कारण भारत के विभिन्न क्षेत्रों के भूजल स्तर में काफी गिरावट दर्ज की गई है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार भूजल उपयोग का पैटर्न राष्ट्रीय स्तर पर विषम आंका गया है। जिसके कारण देश के कुछ क्षेत्रों में भूजल स्ट्रेस कंडीसन महसूस किया गया है। देश भर में केंद्रीय भूजल बोर्ड के 6584 आंकलन यूनिट्स के आंकलन के आधार पर 1034 अति द¨हन वर्ग में 253 विकट, 681 अर्ध विकट व 4520 सुरक्षित वर्ग में पाएं गए हैं। देश के उत्तरी पश्चिमी राज्यों में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पश्चिमी राज्यों में राजस्थान व गुजरात तथा दक्षिणी राज्यों में कर्नाटक, तमिलनाडु व तेलंगाना के अधिकतर भागों में अत्यधिक दोहन के कारण भूजल स्तर में निरंतर गिरावट होती जा रही है। अतः इन क्षेत्रों में नलकूप लगवाना मात्र ही काफी खर्च का सौदा बन गया है। पिछले कुछ दशकों के तुलना में भारत में छोटे किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है। अतः इस प्रकार के खर्च की भरपाई भी उनके लिए कष्टकारी होती है। आज भी भारत के हर क्षेत्र के किसानों को बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में किसानों को डीजल द्वारा चालित उपकरणों का प्रयोग करना पड़ता है चूंकि डीजल के दामों में निरंतर वृद्धि होती जा रही है व भूजल स्तर में भी निरंतर गिरावट दर्ज हो रही है। अतः ऐसी स्थिति में फसलों की सिंचाई पर व्यय और अधिक बढ़ जाता है जल संसाधन मंत्रालय के एक आकलन के अनुसार यदि भूजल का स्तर 1 मीटर ऊपर उठता है तो प्रति घंटा 0.4 किलो वाट ऊर्जा की बचत हो जाती है। यदि भूजल स्तर में निरंतर गिरावट होती है तो गिरावट के अनुसार उतनी ही अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी। गत वर्षों में भारत के अधिकतर क्षेत्रों के भूजल के स्तर में गिरावट दर्ज की गई है। जिसके फलस्वरूप सिंचाई के लिए अधिक ऊर्जा अर्थात अधिक धन का व्यय होना निश्चित है।

 चित्र 5 नहरों व भूजल से सिंचित क्षेत्रफल चित्र 5 नहरों व भूजल से सिंचित क्षेत्रफल

दक्ष जल उपयोग तकनीकों की आवश्यकता

अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विश्व में कुल जल प्रयोग का 70 प्रतिशत कृषि के लिए उपयोग में लाया जाता है। परन्तु भारत इस अंतरराष्ट्रीय चलन का पालन न कर कृषि क्षेत्र में बहुत अधिक जल का प्रयोग कर रहा है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार सन 2000 से 2010 तक भारत में कृषि के लिए लगभग 85 प्रतिशत जल का प्रयोग किया है (तालिका -1)।

तालिका-1 भारत व चीन देशों का वार्षिक जल उपयोग व आवश्यकता (बीसीएम-बिलियन क्यूबिक मीटर)

 

भारत

चीन

जल उपयोग (बीसीएम)

1990

2000

2010

2030

1980

1993

1997

2005

2030

कुल

502

634

813

1498

444

519

557

563

818

कृषि उपयोग

437

541

688

1198

370

383

392

358

417

उपयोग प्रतिशत

87

85

85

80

83

74

70

64

51

कृषि क्षेत्र में जल उपयोग दक्षता का अमल में लाना जल संसाधन प्रबंधन के लिए अति आवश्यक है। इस प्रक्रिया को अपनाकर बहुत से देशों ने अधिक उत्पादन के साथ-साथ जल संस्थानों का भी संरक्षण कर लिया है। उपरोक्त तालिका में चीन द्वारा जल उपयोग दक्षता को अपनाकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस प्रकार की उपलब्धियां कृषि क्षेत्र में जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के विभिन्न उपायों को कार्यान्वित कर ही प्राप्त की जा सकती हैं।888 उपरोक्त विश्लेषण यह दर्शाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। कृषि व कृषि से सम्बंधित व्यवसाय काफी हद तक जलवायु पर निर्भर करते हैं। अर्थात चरम जलवायु परिस्थितयों जैसे असामयिक तापमान में वृद्धि, बहुत अधिक या बहुत कम जल वर्षा (बाढ़/सूखा) कृषि उत्पाद पर विपरीत प्रभाव डालती हैं। भारत में हिमालय व संलग्न क्षेत्र अपने ग्लेशियर के कारण नदियों जैसे गंगा, यमुना व ब्रह्मपुत्र आदि का मुख्य जल स्रोत होता है परन्तु निरंतर जलवायु परिवर्तन के करण ग्लेशियर का क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। जिसके फलस्वरूप सतही जल कि उपलब्धता निरंतर कम होती जा रही है अतः कृषि उत्पादकता बनाए रखने के लिए सिंचाई हेतु अन्य संसाधन जैसे भूजल का अधिक निष्कर्षण किया जाना स्वाभाविक है। परन्तु भूजल स्तर में निरंतर गिरावट होने के कारण किसानों व खाद्य सुरक्षा के लिए निरंतर एक चुनौती बनी रहती है।

जलवायु परिवर्तन व निरंतर बढ़ती जनसंख्या उपलब्ध संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहें है। अतः खाद्यानों के उत्पादन में वृद्धि के लिए अधिक उपज वाली किस्में व बेहतर सस्य वैज्ञानिक पद्दतियों के अलावा जल संसाधनों के उचित प्रबंधन की भी अति आवश्यकता है। जल संसाधन प्रबंधन द्वारा उन क्षेत्रों में सिंचाई जल उपलब्ध कराने के प्रयास करने चाहिए जहां फसलों के लिए जल की उपलब्धता नहीं है। कम वर्षा क्षेत्रों में असामयिक अति वर्षा की घटनाओं को देखते हुए उन क्षेत्रों में जल संचयन के लिए तालाबों व झीलों का निर्माण किया जाना चाहिए। देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में जल उपलब्धता के आधार पर ही फसलों की बुआई का समय व फसलों के प्रकार का चयन आवश्यकतानुसार करना चाहिए इस प्रकार के सामजस्य से जलवायु परिवर्तन व जल आभाव की स्थिति के विपरीत प्रभाव को भी कम किया जा सकता है। अतः जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए जल संसाधन प्रबंधन के प्रभावी व दक्ष समाधान की आवश्यकता है। इस प्रकार की योजनाएं सिंचाई जल उपयोग दक्षता, कम जल अपव्यय व जल की गुणवत्ता के संरक्षण को केंद्रित कर सुनियोजित व प्रभावी ढंग से कार्यान्वित किया जाना चाहिए। व योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए जन भागीदारी का होना अति आवश्यक है जिसके फलस्वरूप भारत के किसानों की आय में बढ़ोतरी के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम कर खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य भली-भांति प्राप्त किया जा सकता है।

Disqus Comment