जल

Submitted by admin on Tue, 02/16/2010 - 08:15
Author
जगदीश प्रसाद रावत
पृथ्वी पर पहला जीव जल में ही उत्पन्न हुआ था। जल इस युग में अनमोल है। ऐसा नहीं है कि इसी युग में पानी की अत्यधिक महत्ता प्रतिपादित की गई है, वरन हर युग में पानी का अपना महत्व रहा है। तभी तो रहीम का यह पानीदार दोहा हर एक की जुबान पर आज तक जीवित है-

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।

हमारा देश कृषि प्रधान देश है जहाँ खास तौर से ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका एवं अर्थव्यवस्था का एकमात्र साधन कृषि ही है। कृषि सिंचाई पर निर्भर करती है और सिंचाई का प्रमुख प्राकृतिक स्रोत नदियाँ ही होती है। प्रदेश में नदियों का जाल जैसा बिछा हुआ है। समुद्री जल विश्व में उपलब्ध समस्त जल स्रोतों का 97 प्रतिशत है जो उपयोग योग्य नहीं है। उपयोग के लिए केवल 3 प्रतिशत जल ही उपलब्ध है जिसका विश्व की इतनी विशाल जनसंख्या इस्तेमाल करती है। संसार की सभी वस्तुओं में जल सर्वोत्तम है। ऐसी यूनानी मान्यता है। जल को इसीलिए जीवन का पर्याय माना गया है। उपयोग योग्य तीन प्रतिशत जल बढ़ती हुई जनसंख्या की प्यास बुझाने और अन्य उपयोग की आपूर्ति करने में पर्याप्त नहीं है।

रंगहीन, पारदर्शी एवं गंधहीन यह तरल पदार्थ जिसे जल कहा है इसकी रासायनिक संरचना H2O है, जो आक्सीजन और हाइड्रोजन से मिलकर बनता है। जल के जीवन स्रोत नदियाँ, तालाब, झील कुआँ, नहरें, जलकूप, नाले एवं अन्य हैं।

भारतीय वाङ्गमय में अनादिकाल से ही वन प्रांतरो, पर्वतों और नदियों की महिमा का बखान किया गया है। नदियाँ केवल सिंचाई की सुविधा ही नहीं देतीं, वह केवल पानी ही उपलब्ध नहीं करातीं, बल्कि आधुनिक युग की महत्त्वपूर्ण जरूरत बिजली भी उत्पन्न कराती हैं। इस प्रकार नदियाँ हमारे देश-प्रदेश के शहर और ग्रमीण अंचलों में अर्थव्यवस्था और किसानों की रोजी रोटी का महत्वपूर्ण साधन हैं। पेयजल की आपूर्ति की नैसर्गिक स्रोत हैं और बहुत कुछ अंशों में स्थानीय रोजगार भी उपलब्ध कराता है।

मध्यप्रदेश में यमुना और नर्मदा सिंचाई के मामले में महत्वपुर्ण भूमिका निभाती हैं। क्योंकि इनके विशाल बेसिन के अन्तर्गत आने वाला क्षेत्र कृषि योग्य एवं जल की पर्याप्त मात्रा से भरपूर है। यदि हम यमुना और नर्मदा बेसिन की तुलना करें तो पाएंगे कि तुलनात्मक दृष्टि से यमुना बेसिन में खेती करने लायक भूमि कम एवं नर्मदा बेसिन में अधिक है। परन्तु वर्षा का औसत कम है। जबकि नर्मदा बेसिन में खेती के योग्य भूमि कम है परन्तु वार्षिक औसत एवं वर्षा की स्थिति यहाँ अच्छी है। अतः जहाँ औसत वर्षा ठीक है वहाँ यदि सिंचाई के साधन विकसित किये जायें तो धरती खेती से लहलहा उठेगी।

जल से ही जीवन की सृष्टि एवं समष्टि की उत्पत्ति और जल प्लावन से ही सृष्टि का विनाश बताया गया है। जल से जीवन का प्रारंभ है तो जीवन के महाप्रलय के बाद अंत भी जल ही है। अतः जीवन मरण और भरण-पोषण का द्योतक जल ही है।

मध्य प्रदेश में जल के समुचित प्रबंधन के लिए एक जल नीति बनाई गई है। इसमें जल संसाधनों के समुचित उपयोग, वाटर हार्वेस्टिंग, नदियों को जोड़ने और जल के उपयोग की प्राथमिकता के साथ ही जन भागीदारी से जल संरक्षण की प्रभावी रणनीति तैयार की गई है। जल नीति के क्रियान्वयन के लिए एक कार्ययोजना भी बनाई गई है।

जल नीति में उपलब्ध जल का विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोग, प्रोजेक्ट प्लानिंग, रखरखाव तथा संस्थाओं की सहभागिता जल क्षेत्र (जोन) का निर्माण एवं जलग्रहण प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण तथा प्रबंधन, अभावग्रस्त क्षेत्रों की व्यवस्था और जल संसाधन की कुशल व्यवस्था के लिए विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी को शामिल किया गया है।

पानी से सम्बन्धित कुछ कहावतें हैं-
-गुरु कीजौ जान के, पानी पीजौ छान कें

-पांच कोस पै पानी बदलै, सात कोस पै बानी।

-जल से पतला कौन है, कौन भूमि से भारी?
-कौन अगन से तेज है, कौन काजल से कारी?
-जल से पतला ज्ञान है, पाप भूमि से भारी,
-क्रोध अगन से तेज है, कलंक काजल से कारी।

-जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ,
-मैं बपुरी खोजन गई, रही किनारे बैठ।

-जल कंपै, जल कौ बेला कंपै,
चोर आवै, कोउ ले न सकै। (पहेली-उत्तर-जुंदइया)

विश्व का 70 प्रतिशत भू-भाग जल से आपूरित है। जिसमें पीने योग्य जल मात्र 3 प्रतिशत ही है। मीठे जल का 52 प्रतिशत झीलों और तालाबों का 38 प्रतिशत, मृदनाम 8 प्रतिशत, वाष्प 1 प्रतिशत, नदियों और 1 प्रतिशत वनस्पतियों में निहित है। मानव शरीर में 70 प्रतिशत जल है। पृथ्वी का 2/3 भाग जल ही है।

पानी जहाँ गिरे वहाँ का पानी वहीं जज्ब कर देना चाहिए। कहा भी गया है कि-

खेत का पानी खेत में, मेड़ का पानी मेड़ में, हार का पानी हार में।

जापान के क्योटो शहर में सम्पन्न विश्व जल फोरम की बैठक में जल समस्या के हल हेतु लगभग 100 संकल्प पारित किये गये। जिसमें 182 देशों के लगभग 24,000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। 351 सत्रों में जल सम्बन्धी विषयों पर व्यापक चर्चा की गई थी।

गुजरात की ऐतिहासिक सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों में जल संग्रहण एवं विकास प्रणाली के अवशेष मिले हैं।

देश की औसत वर्षा 1170 मिमी. जल की आधी मात्रा भी प्रत्येक गाँव की 1.12 हेक्टेयर भूमि में एकत्रित कर ली जाय तो संग्रहित 6.57 मिलियन लीटर वर्षा जल ग्रामीणों के खाने-पीने की जरूरत की आपूर्ति कर सकता है।

20 वर्षों में देश में जल की माँग 50 प्रतिशत बढ़ जाएगी। 1947 में देश में मीठे जल की उपलब्धता 6000 घन मीटर थी जो घटकर सन् 2000 में मात्र 2300 घन मीटर रह गयी है। 2025 तक 16000 घन मीटर हो जाने का अनुमान है। भारत में वर्षा के जल का मात्र 15 प्रतिशत जल ही उपयोग होता है, शेष बहकर समुद्र में चला जाता है।

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