कैसे रुकेगी बाढ़

Submitted by RuralWater on Sat, 09/10/2016 - 10:41


बाढ़बाढ़बारिश पहले भी होती थी, ज्यादा होती थी, पर बहुत ज्यादा होती थी तभी बाढ़ आती थी। लेकिन अब तो थोड़ी भी बारिश हुई तो बाढ़ आ जाती है। एक तो कारण अब कुछ पर्यावरणविद और जानकार बताने लगे हैं कि जो बाँध पहले बाढ़ नियंत्रण के उपाय बताए जाते थे, अब वही बाढ़ के कारण बन रहे हैं। जैसा अभी गंगा के बाढ़ में हुआ। पर्यावरणविद हिमांशु ठक्कर ने इसे बाँध के प्रबन्धन की कमी बताया है। ऐसा पहले ओड़िशा में महानदी की बाढ़ और मध्य प्रदेश में नर्मदा की बाढ़ में भी हो चुका है।

लेकिन बाढ़ के कारण और भी हैं। जैसे रेत खनन, जंगल की कटाई, नदियों के आसपास की जमीन पर कब्जा होना, नदियों के रास्ते मोड़ना या रास्ता बदल देना और पानी के परम्परागत ढाँचों की उपेक्षा।

रेत पानी को स्पंज की तरह जज्ब करके रखती है। रेत खनन का बड़े पैमाने पर हो रहा है। रेत ही नहीं रहेगी तो पानी कैसे रुकेगा, नदी कैसे बहेगी, कैसे बचेगी। अगर रेत रहेगी तो नदी रहेगी। लेकिन जैसे ही बारिश ज्यादा होती है, वेग से पानी बहता है, उसे ठहरने की कोई जगह नहीं रहती।

जंगल और पेड़ भी बारिश के पानी को रोकते हैं। वह पानी को बहुत देर तो नहीं थाम सकते लेकिन पानी के वेग को कम करते हैं। स्पीड ब्रेकर का काम करते हैं। लेकिन पेड़ नहीं रहेंगे तो बहुत गति से पानी नदियों में आएगा और बर्बादी करेगा।

कई बाँध व बड़े जलाशयों में नदियों को मोड़ दिया जाता है, उससे नदी ही मर जाती है। निचले हिस्से में लोग समझते हैं, नदी ही नहीं तो वे उसकी जमीन पर खेती करने लगते हैं या कोई और उपयोग, तो जब बारिश ज्यादा होती है तो पानी को निकलने का रास्ता नहीं मिलता। इससे बाढ़ से बर्बादी होती है।

शहरों में तो यह समस्या बड़ी है। पानी निकलने का रास्ता ही नहीं है। जैसे कुछ साल पहले मुम्बई की बाढ़ का किस्सा सामने आया था। वहाँ मीठी नदी ही गायब हो गई और जब पानी आया तो शहर जलमग्न हो गया। ऐसी हालत ज्यादातर शहरों की हो जाती है।

पहले नदियों के आसपास पड़ती जमीन होती थी, नदी-नाले होते थे, लम्बे लम्बे चारागाह होते थे, उनमें पानी थम जाता था। नदियों के अतिरिक्त पानी की ठेल ऐसी जगह होती थी। बड़ी नदियों का ज्यादा पानी छोटे नदी नालों में भर जाता था। लेकिन अब उस जगह पर भी या तो खेती होने लगी है या अतिक्रमण हो गया है।

इसके अलावा पानी के परम्परागत ढाँचों की भी भारी उपेक्षा हुई है। ताल-तलैया, खेतों में मेड़ बन्धान आदि से भी पानी रुकता है। लेकिन आज कल इन पर ध्यान न देकर भूजल के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है। अगर ऐसे विकल्पों पर काम किया जाये तो इससे बारिश के पानी को भी संजोया जा सकता है, जिसकी बहुत जरूरत है और इससे बाढ़ नियंत्रण भी हो सकेगा।

अगर हम ऐसे समन्वित प्रयास करें तो निश्चित ही बाढ़ नियंत्रण भी कर पाएँगे और बारिश के पानी का संरक्षण भी कर सकेंगे। नदियों को भी बचा सकेंगे।
 

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