कहाँ गए बुन्देलखण्ड के चन्देल

Submitted by Hindi on Mon, 02/08/2016 - 12:18
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'आल्हा-ऊदल और बुन्देलखण्ड' पुस्तक से साभार

एक वक्त ऐसा था कि बुन्देलखण्ड की सरजमीं चन्देलों से आबाद थी। सातवीं सदी से लेकर 16वीं शदी तक चन्देलों ने बुन्देलखण्ड और उसके बाहर भी राज किया। कन्नौज, बनारस और इलाहाबाद में मिले महलों के अवशेष इसकी पुष्टि करते हैं। लेकिन चन्देल आज बुन्देलखण्ड में कहीं नहीं हैं।

एक वक्त ऐसा था कि बुन्देलखण्ड की सरजमीं चन्देलों से आबाद थी। सातवीं सदी से लेकर 16वीं शदी तक चन्देलों ने बुन्देलखण्ड और उसके बाहर भी राज किया। कन्नौज, बनारस और इलाहाबाद में मिले महलों के अवशेष इसकी पुष्टि करते हैं। लेकिन चन्देल आज बुन्देलखण्ड में कहीं नहीं हैं। अगर हैं तो उनकी गणना केवल उँगलियों पर की जा सकती है। जो चन्देल बुन्देलखण्ड में आबाद हैं वो भी अपने आपको बाहर से आया हुआ बताते हैं। उनके अनुसार वो बुन्देलखण्ड से अन्यत्र गए और फिर वापस बुन्देलखण्ड में आबाद हुए। इसकी वजह क्या है?

दरअसल चन्देलों की समृद्धि उनकी सबसे बड़ी दुश्मन बनकर उभरी। यहाँ पर चौहानों, मुगलों और अफगानों के भयानक आक्रमण हुए। चौहानों के आक्रमण में तो यहाँ तक उल्लेख मिलता है कि पूरी चन्देल आबादी ही कत्ल कर दी गई। बचे-खुचे चन्देल कालान्तर में मुगलों, अफगानों के हत्थे चढ़ते रहे। धन लोभी ब्राह्मणों को एक बढ़िया हथियार मिला। उन्होंने चन्देलों की झूठी कुण्डली बनाकर यह अफवाह फैला दी की यदि कोई चन्देल बुन्देलखण्ड में रहेगा तो वह वंशहीन होकर मरेगा। चन्देल इसे प्रत्यक्ष देख भी रहे थे। उनके गाँव-के-गाँव हमलों में साफ हो रहे थे। चन्देल लोभी ब्राह्मणों की यह कुटिल वृत्ति समझ नहीं पाये और भाग खड़े हुए। जाते समय उन्होंने अपनी समस्त जमीन-जायदाद पंडों पुरोहितों को दे दी। इन जमीनों पर आज भी पंडे-पुरोहित भोग-विलास कर रहे हैं।

वीर वर्मन के समय से ही चन्देल साम्राज्य विघटित होना शुरू हो गया था। चन्देलों की दो शाखाएँ मुख्य रूप से जानी गई- एक सोनभद्र जनपद का अगोर बड़हर राज्य और दूसरा विजयगढ़ का राज्य। भोजवर्मनदेव के समय बिरदी राज्य की स्थापना हुई जो चन्देल साम्राज्य का पूर्वी सिरा था और वर्तमान बघेलखण्ड में पड़ता था। यहाँ कालिंजर की उपराजधानी बनीं। यहाँ वीर विक्रम शासक था।

चन्देलों के जुझौती छोड़ने के बाद जो छोटे-बड़े राज्य अन्यत्र स्थापित हुए उनमें झारखण्ड के देवघर जनपद का गिद्धौर सर्वप्रमुख है। इस क्षेत्र में चन्देलों के आने के पूर्व यहाँ किरात वंश का शासन था। इस वंश के राजाओं ने गृद्धावती नगरी बसाकर वहाँ राजधानी बनाई। इस वंश का प्रथम शासक हरेवा था। उसका गढ़ हरेवा आज भी विद्यमान है। जब चन्देल सामन्त वीर विक्रम ने गिद्धौर पर आक्रमण किया तो वहाँ निगौरिया राजा था। उससे प्रजा असन्तुष्ट थी। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि चन्देल यहाँ आसानी से कब्जा करने में सफल रहे। विक्रम वर्मा के बाद शुक्रदेव वर्मन राजा हुए। उन्होंने चन्देल राज्य की सीमा में 25 किमी की वृद्धि की। उसने गृद्धकूट पर्वत के कामेश्वर नामक स्थान पर शिव के 108 मन्दिरों का निर्माण कराया। इस वंश में आगे क्रमश: देववर्मन, रामनारायण सिंह, राज सिंह, दर्पनारायण सिंह व रघुनाथ सिंह हुए।

अकबर के समय उसके सेनापति मानसिंह ने गिद्धौर पर आक्रमण किया। इस समय यहाँ पर पूरन सिंह चन्देल शासक था। उससे प्रभावित होकर मानसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह पूरन सिंह से किया। जब मुगलों का उत्तराधिकार युद्ध हुआ तो गिद्धौर के चन्देल शासक दलन सिंह ने औरंगजेब के विरुद्ध दाराशिकोह की सहायता की। दारा ने व्यक्तिगत रूप से दलन सिंह की तारीफ करते हुए उसे धन्यवाद ज्ञापित किया था।

बक्सर के युद्ध में चन्देल शासक अमर सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया। अमर सिंह के स्वर्गवासी होने के उपरान्त कम्पनी ने उसका राज्य जब्त कर लिया। उस समय अमर सिंह के पुत्र गोपाल सिंह अल्पवयस्क थे। बालिग होने पर उन्होंने तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंगस के समक्ष अपनी ऐतिहासिकता और उत्तराधिकार का प्रमाण प्रस्तुत किया, फलत: उन्हें कुछ शर्तों के साथ राज्य वापस मिला। 1857 की बगावत में गिद्धौर के चन्देलों ने अंग्रेजों का साथ दिया क्योंकि वो उनके साथ सन्धियों से बँधे थे। इसके लिये चन्देल शासक जयमंगल सिंह को 1877 में गवर्नर जनरल ने केसीएसआई की उपाधि प्रदान की, जिसे प्राप्त करने वाले वो बिहार के प्रथम नागरिक थे।

मिर्जापुर गजेटियर के अनुसार महोबा से पलायित कुछ चन्देल परिवार सोनभद्र जनपद में आये। इस क्षेत्र में सोन नदी का पूरा दक्षिणी भाग, पूरब में कैमूर घाटी, पश्चिम में घोरावल के आगे तक का क्षेत्र आता था। यहाँ पर उस समय बलन्दों का शासन था जो खरवारों की शाखा थे। बारीमल और पारीमल नामक दो सरदार यहाँ शरण लेने आये। उस समय बलन्द राजा मदन था। बारीमल और पारीमल जल्द ही उसके विश्वस्त सहायक बन गए। एक दिन मृत्युशय्या पर पड़े राजा मदन ने चन्देलों को अपने शस्त्रागार और खजाने का रहस्य बता दिया। चन्देलों ने शस्त्रागार और कोषागार पर कब्जा करके पूरा राज्य हथिया लिया।

1290 के आसपास समय चक्र घूमा। बलन्दों ने राजा मदन के वंशज घटम के नेतृत्व में अचानक आक्रमण किया। बलन्दों ने अगोरी के चन्देल नरेश सहित समस्त चन्देलों का चाहे वह बूढ़ा अथवा बच्चा ही क्यों न हो, सबका निर्ममता से वध किया। किन्तु भाग्यवश एक गर्भवती रानी बच गई। उसने शीघ्र ही एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम ओड़नदेव रखा गया। ओड़नदेव ने वयस्क होने पर कंतित के गढ़वाल राजा की सहायता से अगोरी बड़हर का खोया हुआ राज्य पुन: हस्तगत कर लिया।

चन्देलों की कानपुर शाखा भी महत्त्वपूर्ण है। शिवरतन सिंह की ‘‘चन्देल चन्द्रिका’’ के अनुसार परमाल के पुत्र सभाजीत ने कन्नौज में राज्य कायम किया जिनके वंशज क्रमश: ज्ञासदेव, घनश्याम देव, जयराज देव हुए। जयराज देव के तीन पुत्र शिवराज देव, लघु देव, श्रीपति देव हुए जो क्रमश: शिवराजपुर, सपई और पचोर की रियासतें स्थापित करने में सफल रहे। शिवराज देव की 12वीं पीढ़ी में रामशाह के बारे में ज्ञात होता है कि उन्हें 95 गाँवों की सनद मिली थी। इनके पुत्र अर्जुनदेव ने 1772 के मीरनपुर कटरा के रुहेला-नवाब युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। उनके उत्तराधिकारी सती प्रसाद सिंह थे, जिनका राज्य क्रान्तिकारियों का साथ देने के कारण जब्त कर लिया गया।

बेनउर में हरसिंह के वंश में कई पीढ़ी बाद यादवराय का नाम आता है, जो परम्परा से 18 सरकार कहे जाते थे। इनके पुत्रों में प्रताप सिंह ने नवाब से तालमेल कर वेनउर, पनकी, गंगागंज व चचेड़ी में अपने पुत्रों को स्थापित किया। यादवराय के अन्य पुत्रों के वंश कटारा, रैपालपुर, सोमा में विद्यमान हैं।

विक्रम या वीरवर्मा द्वितीय के वंशज ही मुख्यत: बिहार व पूर्वी उ.प्र. में फैले। परम्परा के अनुसार बिरदी के राजा मदन सिंह के प्रपौत्र अभयराय जौनपुर जनपद में आये। खराइचगढ़, ढविलागढ़, मधिन्दागढ़, नया गाँव, महुली में मदन सिंह के वंशज जगमोहन सिंह चन्देलों के उत्तराधिकारी बने। मुंगेर में भी इसी की एक शाखा गई। खैरागढ़ में राजा विश्वम्भर सिंह चन्देल का राज्य था जिसके वंशज बरियापुर, पतनपुर, नीमा, सोनएँ, उझड़ी, मणिअड्डा, सिकहरिया, धमना गाँवों में फैले हैं। इटा नगर में राजा किशन सिंह के वंशज फैले हैं। इसी शाखा के राजा जसवंत सिंह के वंशज शाहआलम नगर, दामोदरपुर, तुलसीपुर, जिगरिया में जमे हैं। इसकी एक शाखा सिंहकुण्ड भागलपुर गई, जिनके वंशज मरवा, नगरपारा, दयालपुर, मणुकरचक, पुनामा, प्रतापनगर, तिरासी गाँवों में फैले हैं। जो शाखा वैशाली गई उस शाखा के लोग राघोपुर, फतेहपुर, जुड़ावनपुर, जगदीशपुर आदि 26 गाँवों में बसे हैं। यहाँ के लोग मानते हैं कि 13वीं सदी में महाबल सिंह व गोवर्द्धन सिंह महोबा से आये और वे लोग ही उनके पूर्वज हैं।

अभयराज अपने भाई के साथ जौनपुर जनपद में आये और फत्तूपुर गाँव में बसे। दरभंगा की गनरहटा रियासत भी चन्देलों की है। सीवान में स्थापित बिसवनियाँ शाखा भी महत्त्वपूर्ण है। आजमगढ़ के चन्देल विजयगढ़, सोनभद्र से आए। बनारस और चन्दौली के चन्देल बिरदी से ही 16वीं-17वीं सदी में आये, वहीं से गाजीपुर में भी फैले। ग्राम पलियादिलदारनगर, गाजीपुर में जो लोग बसे हैं, उनके मूल पुरुष गोपाल सिंह थे।

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