प्रदूषित काली नदी

Submitted by UrbanWater on Mon, 06/22/2020 - 14:09
Source
जल चेतना, खण्ड 7, अंक 2, जुलाई 2018, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की-247667

काली नदी, फोटो : downtoearth.org.inकाली नदी, फोटो : downtoearth.org.in

काली नदी के प्रदूषण से मेरठ और उसके आसपास के गांव त्रस्त हैं। प्रचंड विषधारी काली नदी ‘काली नागिन’ के नाम से मशहूर हो चुकी है। इसमें मछलियों व मेंढकों सहित सभी जलीय जीव खत्म हो चुके हैं। औद्योगिक कचरा का भार ढोती यह नदी भूजल को भी ज़हरीली बना रही है। भारी तत्वों में लेड और पारा सर्वाधिक जानलेवा है। काली नदी के किनारे स्थित दर्जनों गांव काली नदी के प्रदूषण से मेरठ और उसके आसपास के गांव त्रस्त हैं। प्रचंड विषधारी काली नदी ‘काली नागिन’ के नाम से मशहूर हो चुकी है। इसमें मछलियों व मेंढकों सहित सभी जलीय जीव खत्म हो चुके हैं। औद्योगिक कचरा का भार ढोती यह नदी भूजल को भी जहरीला बना रही है। भारी तत्वों में लेड और पारा सर्वाधिक जानलेवा है। काली नदी के किनारे स्थित दर्जनों गांवों में भूजल में इन तत्वों की उपस्थिति मिली है, जिस कारण नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सभी प्रदूषित जल उगलने वाले हैंडपंपों को लाल रंग करने के आदेश दे दिए थे और सरकार से पीने के पानी की व्यवस्था करने को कहा था।

गंगा -यमुना का दोआब (दो नदियों के बीच की भूमि) अपनी हरियाली और खुशहाली के लिए जाना जाता है। गंगा-यमुना के बीच से हिंडन नदी, काली (पूर्वी) नदी, काली (पश्चिमी) नदी, कृष्णी नदी, बूढ़ी गंगा जैसी छोटी नदियां बहती हैं। भूजल, नदियों के जल, और मिट्टी के निरंतर दोहन के कारण आज गंगा-यमुना दोआब की हालत दयनीय है। गंगा-यमुना और समस्त छोटी नदियां प्रदूषण से कराह रही हैं। समस्त छोटी नदियां बड़ी नदियों में जाकर मिलती हैं। अतः छोटी नदियों का सारा प्रदूषण बड़ी नदियों में पहुंच जाता है। बड़ी नदियों को साफ करने की योजनाएं इसीलिए परवान नहीं चढ़ पाई क्योंकि छोटी नदियाँ बेहद प्रदूषित हैं। 

हमें प्रत्येक नदी को गंगा, यमुना की तरह महत्त्वपूर्ण मानना होगा। स्थानीय लोगों के लिए अपने क्षेत्र की छोटी नदी का महत्व किसी तरह भी गंगा यमुना से कम नहीं होना चाहिए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नदियों में से एक काली नदी भारत की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक है। काली नदी (पूर्वी) और काली नदी (पश्चिमी) यह दोनों ही नदियां औद्योगिक कचरे से बजबजा रही हैं। काली नदी (पूर्वी) मुज़फ़्फरनगर के अंतवाडा जिले से निकलती है। मेरठ, गाज़ियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, एटा, फर्रूखाबाद और कन्नौज जिलों से गुजरती हुई गंगा में मिल जाती है। यह 300 किलोमीटर लंबी है। इसके किनारे सैंकड़ों गांव स्थित हैं। एक समय इसके जल का उपयोग सिंचाई, घरेलू कार्यों व पशुपालन में होता था लेकिन विभिन्न रासायनिक संयंत्रों, चीनी मिलों, बूचड़खानों, चर्म शोधन इकाइयों, बैटरी उद्योगों, पेपरमिलों व वस्त्र उद्योगों से निकला भारी मात्रा में जहरीला रसायन युक्त कचरा प्रतिदिन इसमें मिलाते रहने से आज इस नदी में पानी कम जहर ज्यादा है।

काली नदी (पश्चिमी) सहारनपुर के गंगनोली गांव से निकलकर मुज़फ़्फरनगर होते हुए मेरठ और बागपत जिलों से गुजरती हुई बागपत में बरनावा के पास हिडं न नदी में मिलती है। बरनावा का पुराना नाम वर्णाव्रत था। यह महाभारत कालीन स्थल है। यहां लाख से बने घर लाक्षा गृह में दुर्योधन ने पांडवों को ठहराया था। काली नदी (पश्चिमी) लगभग 100 किलोमीटर लंबी नदी है। मेरठ की जयभीम नगर काॅलोनी इसी के किनारे स्थित है। यहां के निवासी नदी के प्रदूषण के कारण हानेे वाली बीमारियों से पीड़ित हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आद्यौगिक विकास का नया सूरज उगा तो नदियों व भूजल का भरपूर दोहन हुआ और औद्योगिक कचरे वाले गंदे पानी को बिना शोधित किए नदी में डाल दिया जाता रहा। रही-सही कसर घर-घर लगे सबमर्सिबल पंपों ने पूरी कर दी। नतीजा ये हुआ कि उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिले ‘डार्क जोन’ में आ गए। नदियां विषैली हो गई।

काली नदी के प्रदूषण से मेरठ और उसके आसपास के गांव त्रस्त हैं। प्रचंड विषधारी काली नदी ‘काली नागिन’ के नाम से मशहूर हो चुकी है। इसमें मछलियों व मेंढकों सहित सभी जलीय जीव खत्म हो चुके हैं। औद्योगिक कचरा का भार ढोती यह नदी भूजल को भी जहरीला बना रही है। भारी तत्वों में लेड और पारा सर्वाधिक जानलेवा है। काली नदी के किनारे स्थित दर्जनों गांवों में भूजल में इन तत्वों की उपस्थिति मिली है, जिस कारण नेशनल ग्रीन टिंब्यूनल (एनजीटी) ने सभी प्रदूषित जल उगलने वाले हैंडपंपों को लाल रंग करने के आदेश दे दिए थे और सरकार से पीने के पानी की व्यवस्था करने को कहा था। लेकिन अब हजारों हैंडपम्पों को उखाड़ने के आदेश दिए गए हैं। जब सरकार के लोग हैंडपंपो को उखाड़ने गांव में पहुंचे तो लोगों ने इसका विरोध किया और कहा कि हम यह जल नहीं पीएँगे तो क्या हमारे पशु भी नहीं पीएँगे, हमारे पास पीने के पानी की और कोई व्यवस्था नहीं है ऐसे में हम अपने पशुओं के लिए पानी कहां से लाएंगे।

शहर के गंदे नाले भी काली नदी में गिरते हैं। नदी के आस-पास उगाई गई सब्जियों में भी लेड की बहुत अधिक मात्रा मिली है। हमारा शरीर सब्जियों को तो पचा लेता है लेकिन लेड आदि भारी तत्व शरीर के नाज़ुक अंगों में एकत्रित होते रहते हैं, जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं। आज इस नदी के आस-पास बसे हजारों लोग जल जनित बीमारियों से ग्रसित हैं। नदी के आस-पास पलने वाली जैव-विविधता नष्ट हो चुकी है और पानी का रंग काला व ऑक्सीजन रहित हो चुका है। ऑक्सीजन के बिना नदी में किसी प्रकार का भी जलीय जीवन नहीं पनप सकता। बदबूदार, गंदे काले पानी से भरी काली नदी को देखना अत्यंत दुखदायी है। आज इसके किनारे बसे गाँवों में लोगों को शुद्ध पानी लाने के लिए प्रतिदिन कई किलोमीटर चलना पड़ता है।

लोगों की तकलीफों में बढ़ोतरी करती है काली नदी में मिलती बूचड़खानों (स्लाॅटर हाउस) से निकली गंदगी। इस गंदगी में मांस के टुकड़े होने के कारण नदी के आस-पास के आवारा कुत्ते उस ओर आते हैं। उन्हें खाने के कारण वह इतने खूंखार हो चुके हैं कि छोटे बच्चों को नोच कर मार देते हैं और खा जाते हैं। अब तो हालात यह है कि बड़ी उम्र के आदमी पर भी हमला करने से नहीं चूकते। दशकों से यह बूचड़खाना हटाने के प्रयास हो रहे हैं जो निरंतर विफल हो रहे हैं। मेरठ शहर ऐसी घटनाओं और जल प्रदूषण के चलते विभिन्न बीमारियों के कारण सुर्खियों में रहता है।

एक समय मेरठ के कई गांवों में सिंचाई व पीने का पानी उपलब्ध कराने वाली काली नदी पवित्र व शुद्ध थी। इसका जल काली खांसी को ठीक करता था। काली नदी के मृत हो जाने पर अब प्रशासन जागा है। काली नदी को सिंचाई योग्य बनाने के प्रयास शुरू हुए हैं, उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जीवन रेखा बनाने का सपना देखना शुरू हुआ है। इसके लिए इस नदी का नाम ‘नमामि गंगे’ योजना में शामिल किया गया है। इस नदी में ऐसे बैक्टीरिया छोड़ने की बात है जो जल को प्रदूषण मुक्त बना सकते हैं। नदी में प्रवाह बढ़ाने के प्रयास भी हो रहे हैं, जिनमें गंगनहर की एक धारा छोड़ने की बात है। गंग-नहर गंगा के पानी की नहर है। खेती-बाड़ी में कीटनाशकों का प्रयोग घटाने के साथ-साथ नदी की सफाई की भी योजना है। नदी के तटबंधों को भी सुरक्षित किया जाएगा। नदी के किनारे विषाक्त पदार्थ सोखने वाले पेड़ लगाए जाएंगे। नदियों के किनारे के गाँवों में जैविक खेती शुरू करने की योजना पर भी विचार हो रहा है।

नदियों को इस दुर्दशा तक लाने में जन साधारण ही दोषी है। हम अपनी नदियों, झरनों, तालाबों एवं अन्य परंपरागत जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिए सजग नहीं रहे हैं। आम जनता की उपेक्षा का भाव, सरकारों की उदासीनता, अनियोजित विकास व अतिक्रमण का शिकार हमारी नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं। 

एक समय था जब नदियों, नहरों का पानी इतना शुद्ध था कि लोग उसे पीते थे। आज नदियों में विषैले रसायन बह रहे हैं। स्वच्छ पानी खरीदने के लिए  प्रतिदिन रूपए खर्च करने पड़ रहे हैं।  कई शहरों में प्रतिदिन लोग पीने के पानी के कैम्फर खरीदते हैं। सुबह-सुबह पानी के कैम्फरों को ले जाते वाहन सड़क पर भागते दिखाई देते हैं। धरती का तापमान बढ़ रहा है, जनसंख्या बढ़ रही है और साथ ही पानी की जरूरत भी। अब भी हमने अपने पारंपरिक जल स्रोत नहीं बचाएँ, वर्षा का जल नहीं सहेजा और पानी को व्यर्थ बहाने की मानसिकता नहीं बदली तो पानी को घंटो लाइन में लगकर खरीदना पड़ेगा। आज पानी प्रदूषित हो चुका है, हवा ज़हरीली हो रही है और मिट्टी की गुणवत्ता गिर चुकी है। वह दिन दूर नहीं जब हम पानी की तरह शुद्ध वायु के सिलेंडर भी प्रतिदिन खरीदने लगेंगे। अब समस्त लोगों को मिलकर ही पर्यावरण को स्वच्छ करना होगा। अपना कुछ समय इस सामाजिक कार्य के लिए देना होगा। शुद्ध हवा, पानी और मिट्टी हमारा अधिकार है। इस अधिकार के लिए हमें ही प्रयास करना होगा। जब नदी, तालाब व अन्य जल स्रोत सुरक्षित रहेंगे तभी हमारी वन संपदा भी सुरक्षित रह सकेगी और हमें हमारा अधिकार प्राप्त होगा। प्रचुर मात्रा में मिले पानी की कीमत हमने नहीं समझी इसीलिए आज पानी अपनी कीमत वसूल रहा है।


(अपर्णा अग्रवाल, मकान नं. 4561, बी-5/6 निकट-स्टडी स्टेप स्कूल, वसंत कुंज, नई दिल्ली-110 070 मो.नं. 09873110444, arpanaagarwal.2009@ gmail.com)

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