क्षेत्रीय विकास की अवधारणा एवं उत्तराखंड

Submitted by Hindi on Sat, 05/17/2014 - 08:47
Source
सिद्ध, 2001
अंततः मैं ये कहना चाहूंगा कि उत्तराखंड को किसी भी विकास की पद्धति से अपने-आप ही जोड़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि मूल्यांकन की जरूरत है। मेरे ख्याल से यह तभी संभव है जब हम अपने योजना के माॅडल में विकेन्द्रीकरण को बहुत ज्यादा महत्व नहीं देंगे। सबसे पहले हमें क्षेत्रीय विकास की अवधारणा को समझना चाहिए, क्योंकि हम उत्तराखंड के विकास की गतिविधियों को पूरे हिंदुस्तान के विकास की गतिविधियों से अलग करके नहीं देख सकते। क्षेत्रीय विकास का विद्यार्थी होने के नाते मैं समझता हूं कि उत्तराखंड राज्य की स्थापना के बाद, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जो आर्थिक विकास की प्रक्रिया हो उसको न सिर्फ सैद्धांतिक रूप में ही स्वीकार करें बल्कि व्यवहारिक रूप में भी उसको मान्यता देने की कोशिश करें।

पिछले दो दशको में पूरे शैक्षणिक और राजनैतिक दायरे में जहां कहीं भी निर्णय लेने वाले संस्थान हैं, वहां पर इस बात को लेकर बहस होती रही हैं कि एक जो हममें से अधिकतर की ‘सोच’ रही है, जिसमें हम स्थिर विकास, राष्ट्रीय स्तर के संसाधन और उत्पादकता के मुद्दों की बात करते रहे हैं। यह कहां तक सही रहेगा? इससे अलग होकर देखने की जरूरत है या नहीं? यानी निम्न स्तर से उच्च स्तर के बजाय ये जो उच्च स्तर से निम्न स्तर की प्रक्रिया थी, इसमें जितने भी क्षेत्र शामिल थे, समाज के विभिन्न अंग शामिल थे उनको हमने केवल इस तरह से जोड़ा जैसे कि कोई एक बड़ा केक हो और उस केक के दो टुकड़े, इनके - चार टुकड़े उनको, इस तरह से हमने बंदरबांट की जो पद्धति अपनाई थी उसके खिलाफ लोगों के दिमाग में काफी बातें आई। उन्होंने इस बात को समझना शुरू किया कि ये जो ऊपर से शक्ति की अवनति (डिवोल्यूशन आॅफ पावर), आर्थिक संसाधनों की अवनति (डिवोल्यूशन आॅफ इकोनाॅमिक रिसोर्सेज) की बात अभी तक हम करते आए हैं, उसको बदलने की जरूरत है। वास्तव में होता यह है कि जो ऊपर की सोच है, उसी को हम नीचे तक लाने की कोशिश करते है, लोगों की बात वहीं की वहीं रह जाती है।

हमारे समाज में जो खाई बढ़ती चली जा रही है गरीब और अमीर के बीच, अमीर क्षेत्र और गरीब क्षेत्रों के बीच, उसके वजह से जो अवसरों में कमियां आ रही हैं, जिसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि संसाधनों का शोषण की वजह से अवसरों में काफी गिरावट आई है। जो क्षेत्र अपनी संसाधनों से फायदे उठा सकते थे, उससे वो हमेशा के लिए बेदखल हो गया। यानी कि ये जो प्रक्रिया रही है उसमें हमारे संसाधन अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तो पहुंच रहे हैं, स्थानीय संसाधन राष्ट्रीय बाजार तक तो पहुंच रहे हैं, जहां-जहां उनकी जरूरतें है वहां तक तो सीधा पहुंच रहे हैं और विकास की प्रक्रिया भी शायद उसी ढंग से अपनाई गई है। यानी अमीर राज्यों को और अमीर देशों को जो चाहिए वो मिल जाता है। सारे संसाधन उनके पास पहुंच जाते हैं। बात यहीं खत्म हो गई।

जब हम किसी भी संसाधन को प्रक्रिया करते जाते हैं, यानी कि कपास से सूत बनाते हैं और सूत से कपड़ा बनाते हैं, कपड़े से शर्ट बनाते हैं - जब ये प्रक्रिया पूरी की पूरी उसी जगह पर स्थापित होती है और उसी जगह पर कार्यान्वित होती है तो वहां के लोगों को न सिर्फ अवसर मिलते हैं बल्कि और भी ज्यादा वहां के आय के स्तर को बढ़ाने में मदद करता है। ये सिर्फ आय को बढ़ाने और अवसरों को बढ़ाने का ज़रिया ही नहीं है, बल्कि ये भी है कि इसके साथ ही साथ जो लोग भी उसमें शामिल हैं, उनको उस संसाधन से जुड़े हुए जितने भी तौर तरीके हैं उनके बारे में जानकारी रहती है क्योंकि उनका इंटर-एक्शन जिस संसाधन से रहा है उसके साथ एक नए ढंग का संबंध बनता है, वहां पर एक नई तकनीक विकसित होती है।

ये बात मैं नहीं कह रहा हूं कि उस तकनीक में विकास की जरूरत नहीं हैं, उसमें बदलाव की जरूरत नहीं है। लेकिन अभी तक कि जो अवधारणा रही है जिसको कि मैंने उच्च स्तर से निम्न स्तर की अवधारणा कहा उसमें इस संसाधन से हम बिल्कुल वंचित हो जाते हैं। क्योंकि ये संसाधन उठाकर दूसरी जगह पहुंचा दिया जाता है और उसमें जो मूल्य हमें मिलना चाहिए, उससे हम वंचित हो जाते हैं। जैसा मैंने कहा कि उत्तराखंड में पर्यावरण विघटन की समस्या रही है। वहां पर जल, जंगल, जमीन और जन आदि सबको लेकर नई तरह की समस्याएं उभरी हैं और इसका संबंध मेरे ख्याल से धीरे-धीरे वहां पर जो गरीबी बढ़ रही है उससे है।

उत्तराखंड के क्षेत्रीय विकास के संदर्भ में देखें तो मैंने यहां पर कुछ चीजें उठाई हैं, वो ये है कि आज वैश्वीकरण की प्रक्रिया हमारे सामने है। जो नए तरीके की चुनौतियां उभर रही हैं उनके बारे में मैं थोड़ी बातेें आपके सामने रखने की कोशिश करूंगा।

सबसे पहली बात तो ये है कि क्षेत्रीय विकास की जो प्रक्रिया है उसमें सैद्धांतिक रूप से मैं विकेन्द्रीकरण में विश्वास करता रहा हूं। विकेन्द्रीकरण केवल उस तौर पर न देखें कि हमारे पास एक बड़ा सा कोई संसाधन है उसको तोड़-फोड़ कर लोगों के बीच बांट दिया। लेकिन वो स्वरूप जो बाद में प्लांट का, संसाधन का और क्षेत्रीय विकास का स्वरूप होगा, उसको हम नीचे से उत्तरोतर जोड़ते हुए जब जाते हैं यानी कि उसका फोकस वो व्यक्ति होता है जहां पर कि संसाधन स्थित हैं। तो मेरे ख्याल से ये सोच जो है क्षेत्रीय विकास के या प्रादेशिक विकास को आगे बढ़ाता है। ये हमें आज के काफी सारे मुद्दों से जोड़ता है जो कि वैश्वीकरण से उभर कर आया है। इसलिए मैं ये मानता हूं कि क्षेत्रीय विकास की जो प्रक्रिया है वो निम्न स्तर से उच्च स्तर की प्रक्रिया है, निम्न स्तर से विकास की प्रक्रिया है।

क्षेत्रीय विकास की परिकल्पना में स्थानीय समाज की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जो किसी विशेष संसाधन पर ध्यान देकर उसे विकसित करती है। उसे उपभोग करने या उससे केवल पैसा कमाने की बात नहीं है बल्कि पैसा कमाने की प्रक्रिया में हम उस संसाधन को कैसे उपयोगी वस्तु में बदलें यह महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही स्थिर विकास पर ध्यान देना भी जरूरी है जिससे कि उससे हर आयु वर्ग तथा हर तबके का व्यक्ति जुड़ सके। मेरे ख्याल से क्षेत्रीय विकास की परिकल्पना में ये भी मुद्दा शामिल है। हालांकि मेरी गैर सरकारी संस्थान के बारे में सही राय नहीं है। फिर इस काम को गैर सरकारी संस्थान अपने हाथ में ले तो सही परिणाम सामने आ सकते हैं।

जहां कहीं भी स्थानीय समाज में समुदाय पर आधारित संगठन ने स्थानीय संसाधनों को विकसित करने की कोशिश की है, वहां पर कम से कम तीन-चार बातें तो हुई हैं। एक तो पानी की किल्लत में कमी आई है, कृषि उत्पादकता बढ़ी है, पर्यावरण विघटन की प्रक्रिया में गिरावट आई है, लोगों की जो माली हालत है उसमें सुधार हुआ है। सबको लगता है कि उन्होंने कुछ हासिल किया है। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा पक्ष है जो किसी समाज को आगे बढ़ा सकता है। तो व्यक्तिगत रूप से सामाजिक रूप की ओर जो झुकाव है उसमें राजनैतिक इच्छा की बहुत जरूरत है।

चूंकि मेरा विषय भूगोल से संबंधित है, इसलिए जब हम क्षेत्रीय विकास की बात करते हैं तो भूगोल और क्षेत्रीय विकास दोनों में यह मान्यता है कि योजना प्रक्रिया या कोई भी विकास की प्रक्रिया बहुस्तरीय होती है। अर्थात केवल एक क्षेत्र विशेष या एक समुदाय विशेष को केंद्रित करके नहीं है बल्कि उसको वो दूसरे क्षेत्र और दूसरे समुदाय के साथ जोड़कर देखने की कोशिश करता है। इसलिए वैश्वीकरण से उसका कोई झगड़ा नहीं है। चाहे वो पूरे देश के या राष्ट्रीय स्तर के संसाधनों का प्रयोग हो, या जो अभी पूरी की पूरी बहस चल रही है ये संसाधन स्थानीय हों या राष्ट्रीय या क्षेत्रीय ही हों, पानी के बंटवारे को लेकर बात चल रही है, इस झगड़े को इस रूप में देखता है कि जो संसाधन स्थानीय लोगों या किसी समुदाय के लिए जरूरी हैं वो किसी स्थानीय के लिए जरूरी हैं तो पूरे देश के लिए भी जरूरी हैं। और इस तरह से उसमें बंटवारे की बात कही।

इस तरह से उसका इस्तेमाल होना चाहिए ताकि हर स्तर पर जो अपेक्षाएं है या इच्छित मात्रा है वो लोगों को मिल सके, प्रदेशों को मिल सके। इसलिए बहु स्तरीय योजना के अर्थात बहुस्तरीय सोच है, बहुस्तरीय योजना है, इसमें हम एकीकरण की बात करते हैं, एक-दूसरे को जोड़ने की बात करते हैं, राज्य अर्थव्यवस्था, स्थानीय राज्य अर्थव्यवस्था को, प्रादेशिक राज्य अर्थव्यवस्था के साथ जोड़कर विकसित करने की बात करते हैं।

प्रादेशिक राज्य अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय राज्य अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ते हैं। राष्ट्रीय स्टेट अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़कर देखें तो उसमें कोई गलती नहीं है। लेकिन इसमें बहुत जरूरी ये है कि जो संसाधन है उसके इस्तेमाल की नीचे से शुरूआत हो और वो वैश्विक पक्ष में हो। अगर वो वैश्विक पक्ष है तो हम फिर से उस पुराने माॅडल की तरफ चले जाएंगे जिसमें हमने अपने संसाधनों को तभी पहचाना जब वैश्विक बाजार में उसकी पहचान बनी। एक पहचान है हमारे संसाधन की जो स्थानीय समाज के लिए बहुत जरूरी है, इसका मूल्यांकन इस स्तर पर होना चाहिए। तब ये देखना चाहिए कि हम उस स्तर पर कैसे खड़ा उतर सकते हैं। इसी संदर्भ में मैं दो बातें आपके सामने रखना चाहूंगा।

एक तो जिसको हम कोटिश टेक्नोलाॅजी कहते हैं अभी तक रही है, जिसमें कि हमने संसाधन को एक कारखाने के अंदर उसकी शुरूआत से लेकर अंत तक पूरी की पूरी उत्पादक रेखा को यानी ट्रेन से लेकर कार तक उस कोटिश टेक्नोलाॅजी की अब मेरे ख्याल से 90 के दशक में और वैश्वीकरण में जहां कहीं भी लागत कम पड़े तो कोटिश टेक्नोलाॅजी की तिलांजली दी जा रही है। और दूसरा ये विचार भी बहुत उभरकर आया है जिसको कि हम कह रहे हैं फ्लेग्जिबल स्पेसलाइजेशन यानी कि जहां भी जिस व्यक्ति की जो स्पेसलाइजेशन है जो उसमें वो चुनौती लाए - माहौल को देखते हुए, बाजार को देखते हुए, तो फ्लेग्जिबल स्पेसलाइजेशन की जो बात की जा रही है इससे हम अपने आप को बचा नहीं सकते। उत्तराखंड के इतिहास को बचा नहीं सकते। वहां के गांव का एक आदमी अपने आप को बचा नहीं सकता। क्योंकि ये प्रक्रिया विश्व स्तरीय है।

मेरे ख्याल से जरूरत इस बात की है कि हम क्षेत्रीय विकास की परिकल्पना में ये जो वैश्वीकरण के दौर में फ्लेग्जिबल स्पेसलाइजेशन आ रहा है या जिसको कि हम कहेंगे पोस्ट कोटिश टेक्नोलाॅजी की बात की जा रही है, जिसमें कि कार कहीं और बने लेकिन दूसरा पार्ट हो सकता है उत्तराखंड के कोने में बने। एक माइक्रोचिप्स जो है उत्तराखंड के किसी गांव में बने। ये पाॅसिबलिटीज इमर्ज करके आ रही है जो कि आज मार्केट माहौल जो है, आर्थिक माहौल जो है, वैश्विक माहौल जो है वो इस बात की संभावना दे रहा है कि मेरे ख्याल से उत्तराखंड को इस बारे में भी सोचना चाहिए कि ये फ्लेग्जिबल स्पेसलाइजेशन आॅफ पोस्ट कोटिश टेक्नोलाॅजी के कंटेक्स्ट में जहां एक ओर संसाधन उत्तरोतर विकास की बात कर रहे हैं।

संसाधन को केंद्र में डालकर आगे के विकास की प्रक्रिया की बात कर रहे हैं, वहीं पर हम इस बात पर भी सोचे कि क्या यह नहीं हो सकता कि जो भी फ्लेग्जिबल स्पेसलाइजेशन के दौर में जो भी फायदे, जो भी उद्योग छोटे या बड़े पैमाने पर इधर-उधर विकसित हो सकती है, उसका कितना बड़ा हिस्सा हमारे पास है। ये बहुत जरूरी होगा। अब ये मेरे ख्याल से मुश्किल नहीं है। क्योंकि तमाम राज्यों के मुकाबले अगर हम देखें तो उत्तराखंड में शिक्षा का स्तर बहुत बढ़िया है। गुणवत्ता की बात मैं नहीं कर रहा हूं। जहां हिंदुस्तान के एवरेज इयर आॅफ स्कूलिंग 1.8 है, यानी दो साल से कम समय तक बच्चे स्कूल में रह पाते हैं, वहीं उत्तराखंड में 4.0 के लगभग है। तो ये दुगुने से भी ज्यादा है। और यहां तक वहां की जो राजनीति है वहां पर जो है उसमें भी बाकी जगहों से जो सामाजिक संघर्ष है, उस तरह से संघर्ष मेरे ख्याल से उत्तराखंड के संदर्भ में नहीं है।

इसलिए एक व्यापक रूप से सिद्धांत और दर्शन के अंतर्गत ये संभव है कि उत्तराखंड में हम विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया की जो हमने बात की है जिसमें निम्न स्तर से उच्च स्तर की योजना का माॅडल की बात है, बहुस्तरीय योजना की बात है, संसाधनों के केन्द्रीकरण की योजना की बात है। जिसमें राज्य की भागीदारी हो, समाज या स्थानीय समाज की भी भागीदारी हो और बाजार की भी भागीदारी हो, उसमें हम किस तरह की रचनात्मक परिकल्पना कर सकते हैं। मेरे ख्याल से अभी ऐसी व्यापक परिकल्पना की कमी पूरे हिंदुस्तान में है। पूरी दुनिया में है। लेकिन छोटे-छोटे स्तर पर कई प्रयोग हुए है। मैं ये समझता हूं कि अगर हम बाजार के पक्ष को भी देखें और उसके लिए जो भी नियंत्रक है, उनको हम एक राज्य के माध्यम से कर पाएं।

मुझे उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में एक बड़ी समस्या नजर आती है वो है कि जो कामकाजी वर्ग (मैं लिंग के आधार पर नहीं देख रहा हूं) जो वर्ग काम कर सकता है, जो उस तरह का इसमें भागीदारी दे सकता है, वो मेरे ख्याल से उत्तराखंड में कम बचा हुआ है। क्योंकि जो पलायन की प्रक्रिया रही है शुरू से, उसमें वो वर्ग है नहीं वहां पर। लेकिन जहां तक संसाधन के उपयोग और नियंत्रण की बात है, उसमें बहुस्तरीय योजना के अंतर्गत हर वर्ग उसमें शामिल हो, हर क्षेत्र शामिल हो जो किसी न किसी स्तर पर उसमें शिरकत कर रहा हो। यानी कि राज्य नियंत्रण की जो बात है अगर उनकी शिरकत है, तो मेरे ख्याल से सामर्थता बढ़ती है और संसाधनों की अवनति होती है वो नहीं हो पाता है। मेरे ख्याल से इसको लोगों ने कई जगहों पर देखा है। नेपाल के संदर्भ में वनों को लेकर बात देखी गई है, वन प्रबंधन संधि के संदर्भ में पश्चिम बंगाल में भी इस बात को समझा गया है और छोटे से इलाके में जहां पर कि मैंने एक छोटा सा फील्ड-वर्क किया था संथाल परगना के किसी इलाके में, वहां पर भी हमने देखा कि जब से ग्रामीण स्तर पर वन प्रबंधन की बात हुई है, वहां पर लोगों के आय स्तर में बहुत परिवर्तन आया है। हालांकि बिहार में जो नौकरशाही थी वो उतनी ही प्रबल थी जो लोगों को उनका हक लेने नहीं देती थी। लेकिन ऐसी नौकरशाही के बावजूद भी जहां पर ग्रामीण स्तर पर एक ऐसा संस्थान विकसित हो जाता है जिसको कि ऊपर तक और समाज में एक स्वीकृति मिल जाती है तो मेरे ख्याल से वो भव्य शासित कर पाता है। तो उसी परिप्रेक्ष्य में हमें राज्य की परिकल्पना करनी पड़ेगी, गैर सरकारी संस्थाओं की परिकल्पना करनी पड़ेगी।

पिछले साल ‘सहयोग’ का जो मसला था उस समय कुछ पढ़ने में आया कि उत्तराखंड में एन.जी.ओ. उतने हैं जितने कि गांव भी नहीं है। मुझे आश्चर्य हुआ कि अगर एन.जी.ओ. इतने हैं तो उत्तराखंड की ऐसी हालत क्यों है? अगर हर एन.जी.ओ. एक गांव ले लें तो उत्तराखंड की काफी चीजें बदल सकती हैं। तो समस्या ये है कि एन.जी.ओ. के परिप्रेक्ष्य में हमें मालूम है कि एन.जी.ओ. की कोई जवाबदेही नहीं है। आज एन.जी.ओ. को जो फंडिंग मिल रही है, उसमें इंटरनेशनल एजेंडा काम कर रहा है। जिसमें अभी भी वही वर्ग रूचि ले रहा है जो पहले उच्च स्तर से निम्न स्तर की नौकरशाही के साथ था। अर्थात आज एन.जी.ओ. का स्वरूप वही है जो कि 80 के दशक तक नौकरशाही की पहचान थी। तो एन.जी.ओ. में संस्थागत स्तर पर बदलाव आया है, उसका जो असली स्वरूप है अभी तक उसमें कहीं कोई तब्दीली नहीं आई है।

जहां तक मुझे मालूम है झारखंड की राजधानी रांची जिले में 90 एन.जी.ओ. काम कर रहे हैं, उसमें 75 को तो सेवानिवृत नौकरशाह चला रहे हैं। अर्थात ये सेवानिवृति के बाद का जरिया हो गया है। पैसे का कहां से किस तरह का इस्तेमाल हो रहा है उसके प्रति, समाज के प्रति, खासकर के उस समुदाय के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं होती। जब तक कि संस्थागत अनुपात न तैयार हो जिससे राज्य और समाज के प्रति एन.जी.ओ. की जवाबदेही की हम बात कर सकें, उनके उत्तरदायित्व की बात कर सकें, तब तक एन.जी.ओ. के बारे में बहुत सकारात्मक रूप से बात नहीं की जा सकती।

जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड एक नया राज्य है और इसमें अभी छोटे-छोटे 13 जिले हैं। 2011 में 15 जिले हो सकते हैं, उसके बाद हो सकता है 30 जिले भी हो सकते हैं। बिहार की शुरूआत 15 जिलों से हुई लेकिन मेरे ख्याल से जब तक बंटवारा नहीं हुआ था तब तक 52 जिले थे। छोटे-छोटे ऐसे जिले बनते रहेंगे, नए-नए आकार, नई-नई योजना, माॅडल, नौकरशाही के ढ़ांचे आदि में बदलाव आते रहेंगे। इसलिए मैं ये सवाल आप लोगों के सामने रखना चाहूंगा कि क्या ये जरूरी नहीं कि हम एक वैज्ञानिक और व्यवस्थ्ति आधार पर प्रशासनिक सेवाओं को फिर से स्थापित करने की कोशिश करें।

अगर हम प्रशासनिक सीमाओं को वैज्ञानिक तौर से देखने की कोशिश करें तो मुझे जो दो आधारभूत तत्व नजर आते हैं वो ये है कि उत्तराखंड के संदर्भ में हम उसको जल विभाजक प्रबंधन के संदर्भ में देखें। हम जल को केंद्र में रखते हुए निम्न स्तर लेकर यानी गांव, ब्लाॅक या तहसील से लेकर हम ऐसा संगठन तैयार करें जो कि स्थानीय जल विभाजक से लेकर कृषि जलवायु क्षेत्र तक लोगों को उनके संसाधन से जोड़ते रहे। तो मेरे ख्याल से ये जो पक्ष रहेगा, उसमें आय और अवसरों के विस्तार से अगर उसका फायदा अगर मेरे घर को है तो मेरे क्षेत्र को भी है। यानी कि जिले को है और गांव को है तो उसके पड़ोसी गांव को भी है। और मेरे ख्याल से ये जरूरी है कि नदी तथा वर्षा के जल का संग्रह, नदी में होता है, तालाबों में होता है।

लेकिन ये भी जरूरी है कि उत्तराखंड के प्राकृतिक स्वरूप को देखते हुए ऐसे ताल और तालाब छोटे-छोटे पैमाने पर काफी बड़े हो सकते हैं, जिससे कि हमारे स्थानीय जल संसाधन की आवश्यकता है वो काफी पूरी हो सकती है। तो जो आधारभूत तत्व होने चाहिए जिसके आधार पर हम पूरे इस स्वरूप का शासन का ढ़ांचे को वैज्ञानिक आधार पर प्रशासनिक इकाइयों के आधार पर देखें। मेरे ख्याल से अब दक्षिण अफ्रीका में ऐसा होना शुरू हो रहा है। जिसमें पूरी तरह से आर्थिक संदर्भ में और प्रादेशिक संदर्भ में उन तत्वों की पहचान की गई है। जिनके आधार पर फिर से हम वहां पर स्थानीय प्रशासन चला सकें। और स्थानीय प्रशासन का ढ़ांचा भी पूरी तरह से क्षेत्रीय और संसाधन संवेदनशील हो गया है। अर्थात प्रादेशिक और संसाधन संवेदी हो गया है। वह स्थानीय संवेदना से देश की संवेदना के बारे में भी सोच रखता है।

यहां पर मैं देख सकता हूं एक तरफ कुमाऊं है, दूसरी तरफ गढ़वाल है। दोनों क्षेत्रों की अपनी अलग पहचान है। इस पहचान को बरकरार रखते हुए अगर उनके अंदर जो अलग-अलग प्राकृतिक संरचनाएं है, उनके अंदर जो संसाधन है, उनको केंद्र में रखते हुए अगर हम एक प्रशासनिक ढ़ांचे की परिकल्पना करें तो मेरे ख्याल से बहुत जो विसंगतियां है प्रशासनिक स्तर पर वो काफी हद तक घटाई जा सकती है और एक आंतरिक संबधों को स्थापित करने के संदर्भ में मेरी सोच के हिसाब से बनेगी। वहां जो ऊर्जा, काम करने की क्षमता और तत्व हैं उसका फ्लो स्वतः होता रहेगा, उसमें रूकावट की गुंजाइश बहुत ही कम होगी।

इसलिए मेरे ख्याल से उत्तराखंड में केवल जल, जंगल और जमीन से जो जुड़े सवाल है, उनको हम तब नहीं सुलझा सकते जब तक कि हम स्थानीय संस्थानों की बात करें और स्थानीय संस्थानों को स्थानीय संसाधनों से जोड़कर देखना पड़ेगा। इसके लिए राजनैतिक इच्छा की आवश्यकता है। राज्य तो हमने हासिल कर लिया, लेकिन उसके बाद क्या? उसके बाद ये जरूरी है कि नए सिरे से हम इस राज्य को फिर से संवारे। उसकी राजनीति को बदलने की कोशिश करें और ये सब वैज्ञानिक आधार पर हो तो मेरे ख्याल से हर किसी का उसमें कल्याण होगा।उत्तराखंड तमाम संसाधनों के दोहन के बावजूद भी आज एक ऐसे कगार पर है वहां से भी वह आगे बढ़ सकता है - ऐसा मैं सोचता हूं। चीजें अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, वहां पर संसाधन हैं। संसाधनों के उत्तरोत्तर विकास की आवश्यकता है और वो तभी हो सकता है जब कि हम अपने इलाके की तरफ ज्यादा गौर से देखेंगे। मुझे उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में एक बड़ी समस्या नजर आती है वो है कि जो कामकाजी वर्ग (मैं लिंग के आधार पर नहीं देख रहा हूं) जो वर्ग काम कर सकता है, जो उस तरह का इसमें भागीदारी दे सकता है, वो मेरे ख्याल से उत्तराखंड में कम बचा हुआ है। क्योंकि जो पलायन की प्रक्रिया रही है शुरू से, उसमें वो वर्ग है नहीं वहां पर।

वहां पर आयु वर्ग नहीं है। लेकिन पलायन के साथ ही साथ क्योंकि सबसे बड़ा तत्व होता है, वो होता है मनीआॅर्डर अर्थव्यवस्था का बहुत सारे अर्थशास्त्रियों ने इस बात पर चर्चा की है कि जो पैसा आता है उसका किस तरह से इस्तेमाल होता है। दूसरा मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि अगर इसका सर्वेक्षण किया जाए तो मेरे ख्याल से उत्तराखंड में ये केवल उपभोग आधारित है, इसका कहीं उत्पादन निवेश नहीं हो पाता है। बहुत छोटा हिस्सा उत्पादन निवेश के तौर पर जाता है। अगर इसको पंजाब और हरियाणा से तुलना करें तो वहां से भी एक बहुत बड़ा तबका सैनिक क्षेत्र में गया।

उसी तरह से मेरे ख्याल से आपके उत्तराखंड में भी है। लेकिन इसके बावजूद भी सभी जगह जो प्रभाव रहा अर्थात कि जो लोग वापस लौटे उन्होंने जिस तरह से हरियाणा-पंजाब में सहयोग किया। मेरे ख्याल से वैसा कुछ उत्तराखंड में हो नहीं पाया। जरूरत इस बात की है कि हम इनका कैसे मूल्यांकन करें और देखें कि इसमें क्या किया जा सकता हैं? अंततः मैं ये कहना चाहूंगा कि उत्तराखंड को किसी भी विकास की पद्धति से अपने-आप ही जोड़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि मूल्यांकन की जरूरत है। मेरे ख्याल से यह तभी संभव है जब हम अपने योजना के माॅडल में विकेन्द्रीकरण को बहुत ज्यादा महत्व नहीं देंगे।

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